सफलता की महाकुंजी  शिव-संकल्प

सफलता की महाकुंजी शिव-संकल्प

आप शिव-संकल्प करो

वेद कहता है : जब भी आप संकल्प करो तो शिव-संकल्प करो अर्थात् सुखद संकल्प करो, कल्याणकारी संकल्प करो । अरे ! ये ऐसा बोलते हैं, वैसा बोलते हैं... क्या करें बचपन में ऐसा हो गया था, मेरी किसीने सँभाल नहीं ली... क्या करें, मैं पढ़ नहीं पाया, क्या करें आजकल ऐसा हो गया है... ।’ - यह नकारात्मक चिंतन जो है न, आपकी योग्यताओं को निगल जायेगा । फरियादवाला चिंतन न करो । अपने चिंतन की धारा ऊँची बनाओ - एक बात । दूसरी बात क्रिया से चिंतन ऊँचा है और चिंतन करते-करते चिंतन जहाँ से होता है उस परमात्मा में विश्रांति बड़ी ऊँची चीज है ।

घर से जाओ खा के तो बाहर मिले पका के ।

घर से जाओ भूखे तो बाहर मिले धक्के ।।

तो आप अपने घर से अर्थात् परमात्मा से सुबह जब नींद से उठो तो थोडी देर शांत हो जाओ, निश्चिंत नारायण की प्रीति में विश्रांति पाओ । तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु । मेरा मन सदैव शुभ विचार ही किया करे ।’ हमारे शिव-संकल्प हों । समझो, आप बीमार हो । तो ऐसा शिव-संकल्प करो कि मेरा पड़ोसी स्वस्थ हो, मुझे गाली देनेवाला भी स्वस्थ हो । मैं बीमार हूँ यह कल्पना है । सब स्वस्थ रहो, स्वस्थ रहो...’ आप स्वास्थ्य बाँटो । वे स्वस्थ होंगे तब होंगे, आपका दूसरों के लिए शिव-संकल्प आपको अभी स्वास्थ्य दे देगा ।

मैं दुःखी हूँ, दुःखी हूँ । इसने दुःख दिया और इसको ठीक करूँ ...’ तो वह ठीक हो चाहे न हो लेकिन तुम बेठीक हो जाओगे । जो फरियाद करते हैं, नकारात्मक सोचते हैं, दूसरों पर दोषारोपण करते हैं वे अपने लिए ही खाई खोदने का काम करते हैं ।

पागल से भी गया-बीता कौन ?

कोई आदमी अपने हाथ से शरीर के टुकड़े कर दे तो उसको आप क्या बोलोगे ? बोले : वह पागल है ।’ पागल भी ऐसा नहीं कर सकता । करता है क्या पागल ? अपने शरीर के चिप्स बनाता है क्या ? पागल से भी वह गया-बीता है । उससे भी ज्यादा वह व्यक्ति गया-बीता है जो अपने जीवन को ही नकारात्मक विचारों से काट रहा है । शरीर के चिप्स करो, टुकड़े करो तो एक ही शरीर की बलि होगी लेकिन अपने को नकारात्मक विचारों से जो काट रहा है, वह मरने के बाद भी न जाने कहाँ जाय... !

वास्तव में हम चैतन्य हैं और भगवान के हैं और भगवान हमारे परम हितैषी हैं, सुहृद हैं और जो कुछ हो गया अच्छा हुआ, जो कुछ हो रहा है अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा क्योंकि यह नियम हमारे सच्चे परमेश्वर की सरकार का है ।

जो नकारात्मक व्यक्ति है वह घर में भी बेचैन रहेगा, पड़ोस में भी बेचैन रहेगा और किसीसे बात करेगा तो सामनेवाला भी उससे ज्यादा देर बात करने में सहमत नहीं होगा परंतु जिसका विधेयात्मक जीवन है वह प्रसन्न रहेगा । तुमको अनुभव होता होगा कि कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे आप मिलते हो तो आपको लगता होगा कि बला जाय, जान छूटे...’, ‘‘अच्छा ठीक है, ठीक है...’’ जान छुड़ाने में लगते हो । और कुछ ऐसे व्यक्ति हैं कि अरे ! भइया, थोड़ा-सा और रुको न...’ तो जो प्रसन्न रहता है और विधेयात्मक विचारवाला है, वह हर क्षेत्र में प्यारा होता है और सफल होता है ।

ॐ ॐ प्रभुजी ॐ... ॐ ॐ प्यारेजी ॐ...

इधर (आश्रम में) एक वैष्णव साधु आया था, बोला : ‘‘बाबाजी ! मुझे रहने दोगे ?’’

मैंने कहा : ‘‘साधु नहीं रहेगा तो कौन रहेगा यहाँ ?’’ वह कई वर्ष रहा । उसका नाम मैंने विनोद में रखा था ‘ब्रह्म’ । एक दिन वह ध्यान में बैठा बड़ा मस्त हो रहा था । मैं पीछे खड़ा देख रहा था । मैंने कहा : ‘‘ऐ ब्रह्म ! क्या कर रहे हो ?’’

उसने कहा : ‘‘मेरी प्रार्थना सफल हो गयी । गुरुजी ! भोग लगा दिया आपको ।’’

‘‘कैसे ?’’

‘‘गुरुजी! मैं सवा मन लड्डू का आपको भोग लगा रहा था ।’’

‘‘ये कैसे? इधर तो एक भी लड्डू नहीं रखा ?’’

‘‘गुरुजी! षोडशोपचार की पूजा से भी मानसिक पूजा ज्यादा प्रभावशाली होती है, तो मन-ही-मन मैंने आपको स्नान कराया, वस्त्र पहनाये, गुलाब के फूलों की दो माला पहनायी, एक मोगरे की भी पहनायी, चंदन का तिलक किया, आरती की, फिर गुरुजी के लिए देशी घी लाया, लड्डू बनाये और अच्छी तरह से सवा मन लड्डू का मैंने भोग लगाया मन से ।’’

‘‘इतने सारे!’’

‘‘गुरुजी! जब मन का ही खिलाना है तो फिर डालडा का क्यों बनाना, देशी घी के

बनाये थे ।’’

बड़ा खुश हो रहा था और उसकी खुशी को याद करके मैं भी तो खुश हो रहा हूँ ।

दूसरी मैंने कहानी सुनी है कि दो मित्र साधु जा रहे थे । कहीं भिक्षा हुई नहीं । उन्होंने सोचा, ‘चलो, मानसिक भोजन कर लेते हैं ।’ दोनों ने कल्पना की, कुछ बनाया, अपने-अपने इष्ट को भोग लगाया । फिर प्रसाद खाते-खाते पहला साधु बोल पड़ा : ‘‘वाह-वाह ! क्या मजा आया ! कितना सुंदर है ! किशमिश भी मजे की है ।’’ और दूसरा बोलता है : ‘‘हाय रे हाय... ! मर गये रे... मुँह जल गया ।’’

पहला साधु बोला : ‘‘क्या बात है ? क्या खा रहे हो ?’’

‘‘कढ़ी में हरी मिर्च ज्यादा आ गयी है । हाय रे...’’

‘‘अरे हाय-हाय क्यों कर रहे हो ? जब मन का ही बनाना था तो ज्यादा मिर्चवाली क‹ढी क्यों बनाना ? हाय रे... इतना दुःखी हो रहा है ! मैंने तो इतना बढ़िया हलवा बनाया, मनपसंद भोजन बनाया, ठाकुरजी को भोग लगाया और खा रहा हूँ । तू काहे को दुःखी हो रहा है !’’

‘‘मेरे को तो ऐसा ही हो रहा है, मेरे भाग्य में तो ऐसा ही लिखा है ।’’

भाग्य में ऐसा नहीं लिखा, तेरा चिंतन गलत है । शिव-संकल्प नहीं है । 

सुबह उठो तो सोचो, ‘मेरे मन में मंगलकारी संकल्प हो, सुखकारी संकल्प हो, विधेयात्मक संकल्प हो ।

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।’

मैंने देखा, एक ज्यादा अक्लवाला व्यक्ति है लेकिन उसको कोई काम सौंपता हूँ तो वह विफल हो जाता है । क्यों ? उसका सोचना जरा नकारात्मक है । वह बेचारा विफल-ही-विफल हो जाता है । अक्लवाला भी है, श्रद्धावाला भी है परंतु उसका बचपन से नकारात्मक चिंतन है । फिर दूसरे को वही काम सौंपता हूँ तो देखता हूँ कि हँसते-खेलते हो गया । तो जिसकी बचपन से नकारात्मक चिंतन की आदत हो गयी वह आध्यात्मिक जगत में जाता है, तब भी ‘ऐं... ऊँ...’ । कभी किसी वैद्य के पास तो कभी प्राकृतिक चिकित्सावालों के पास तो कभी होमियोपैथीवालों के पास वह बेचारा चक्कर काटता रहता है । नकारात्मक चिंतन आदमी को खाई में ले जाता है । आदत पुरानी है । वह

पुरानी आदत आप जब तक खुद नहीं निकालना चाहोगे तब तक नहीं निकलेगी । तो आज

संकल्प करो कि ‘दुःखात्मक, नकारात्मक चिंतन जो भी आये उसको निकाल के फेंक दूँगा ।

हो-हो के क्या होगा ! चिंतावाले विचारों को

महत्त्व नहीं दूँगा ।’

प्रारब्ध पहले रच्यो, पीछे भयो शरीर ।

तुलसी चिंता क्या करे, भज ले श्री रघुवीर ।।

परिस्थितियाँ कैसी भी आयें, उनमें डूबो मत, उनका उपयोग करो । समझदार लोग संतों से, सत्संग से सीख लेते हैं और सुख-दुःख का सदुपयोग करके बहुतों के लिए सुख, ज्ञान व प्रकाश फैलाने में भागीदार होते हैं ।

कुलीन राजकुमार जैसे काम करो

नकारात्मक विचार जैसे ‘मेरा कोई नहीं है, मेरा ऐसा है... क्या करें ? फलाने को खुश रखें, कभी काम आयेगा...’ तो आप बिल्कुल हीन विचार के हो, बिल्कुल छोटे विचार में गिर रहे हो । किसीका सहारा क्या ढूँढ़ना ! सारे विश्व का जो स्वामी है सर्वेश्वर, परमेश्वर, ब्रह्म वह तो अपना आत्मा होकर बैठा है । एक कुलीन राजकुमार जैसे विनोद व आनंद के लिए कोई खेल खेलता है, ऐसे ही तत्परता से सेवा को, कर्म व नौकरी-धंधे को एक आनंद का साधन बना लो ।

एक महात्मा जा रहे थे । रास्ते में कोई बड़ा निर्माण-कार्य हो रहा था । कोई पत्थर का काम कर रहे थे तो कोई कुछ ।

महात्मा ने एक मजदूर से पूछा : ‘‘क्या कर रहे हो ?’’

मजदूर बोला : ‘‘क्या करें बाबा ! हमारे तो भाग्य फूटे हैं । बस, अपनी किस्मत पर रो रहे हैं । क्या करें ? धूप में मजदूरी कर रहे हैं ।’’

दूसरे से आगे जाकर पूछा तो बोला : ‘‘महाराज ! भगवान ने इनको प्रेरणा दी, इतना बड़ा काम हो रहा है तो हमें रोजी मिल रही है । हम रोजी कमा रहे हैं ।’’

फिर दूर, दूसरी तरफ गये, तीसरे से पूछा : ‘‘क्या कर रहे हो ?’’

बोला : ‘‘महाराज ! हम लोग मंदिर बना रहे हैं ।’’

‘‘तुम्हारा है ?’’

‘‘महाराज ! हमारा ही है, सब अपना ही है ।’’

‘‘तुमको क्या मिलेगा ?’’

‘‘हमको रोज के पैसे मिलेंगे ।’’

‘‘यहाँ मंदिर बनेगा ?’’

‘‘महाराज ! सबके मन में भगवान है, अल्लाह है । कोई भी आकर रहेगा तो मंदिर ही तो हो गया !’’

एक बोलता है, ‘भाग्य कूट रहा हूँ’, दूसरा बोलता है, ‘रोजी कमा रहा हूँ’, तीसरा बोलता है, ‘मैं मंदिर बना रहा हूँ ।’ तो काम तो वही-का-वही लेकिन नजरिया बदल गया ।

नजरें बदलीं तो नजारे बदले ।

किश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदले ।।

तो आप शिव-संकल्प करो । बोझ समझकर काम मत करो ।

मम दिल मस्त सदा तुम रहना

कई ऐसे लोग हैं जिनके पास ज्यादा साधन नहीं हैं, अपना पक्का मकान नहीं है, अपनी पक्की नौकरी नहीं है, फिर भी मस्ती से जीते हैं, गाते हैं : फागणियो आयो रे...’ और सोचते हैं, ‘आज तक तो भगवान ने दिया है, तो कल भूखे रहेंगे क्या ? रहेंगे तो रहेंगे, देखा जायेगा ।’ और ऐसे लोग भी हैं, जिनके पास हजारों-लाखों रुपये हैं फिर भी चिंता में हैं कि क्या होगा ? यह हो गया, वह हो गया... ।’

तो आदमी के चिंतन की धारा अशिव नहीं हो तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । हमारा संकल्प शिव हो । मंगलकारी, सुखकारी व विधेयात्मक संकल्प हो । सुबह उठो तो परमात्म-विश्रांति पाओ और विचारो, ‘हमारा सुखकारी संकल्प हो, आनंदकारी संकल्प हो ।’ 

Previous Article नामोचारण का फल
Print
759 Rate this article:
3.7

Please login or register to post comments.

Name:
Email:
Subject:
Message:
x