आत्मनिरीक्षण के द्वारा परमात्मदर्शन आसान
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आत्मनिरीक्षण के द्वारा परमात्मदर्शन आसान

कितने ही साधक-भक्त ऐसे हैं जो लम्बे अर्से से साधना कर रहे हैं । साधना में प्रगति के लिए साधक के जीवन में स्वयं का मूल्यांकन आवश्वक है । साधक को खुद ही अपना आत्म-विश्लेषण करना चाहिए । जितना ठीक ढंग से हम स्वयं अपना निरीक्षण कर सकते हैं उतना अन्य नहीं कर सकता, क्योंकि हम जितने अच्छे से अपने गुण-दोषों से, कमजोरियों से परिचित होते हैं, उतने अन्य व्यक्ति नहीं होते । जिज्ञासु साधकों को निम्नांकित प्रश्नों का उत्तर स्वयं ही खोजना चाहिए ताकि साधना में शीघ्र उन्नति होः

·         साधना में रुचि दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है अथवा घट रही है या उदासीनता आ रही है?

·         सत्संग सुनने के बाद उसे जीवन में उतारने की जिज्ञासा भी है या नहीं?

·         ध्यान-भजन-सत्संग का लक्ष्य आपके लिए परमात्मा की प्राप्ति है या नश्वर संसार के क्षणभंगुर भोग?

·         शास्त्रवचन और संत-उपदेश में श्रद्धा है या नहीं?

·         मंत्रदीक्षा के समय साधना की जो पद्धतियाँ बतायी गयी थीं, उनसे कितने लाभान्वित हुए हैं या याद ही नहीं है?

·         संसार के प्रति आकर्षण कम हुआ है या ज्यों-का-त्यों बना हुआ है?

·         कहीं आप सेवा-साधना के बहाने प्रशंसा के रोग से तो ग्रस्त नहीं हो गये हैं?

·         भोगों से मन उपराम हुआ है या अभी भी उनमें सुखबुद्धि बनी हुई हैं?

·         त्रिकाल संध्या का नियम माह में कितनी बार पूर्ण करते हैं? ध्यान-भजन और सेवा के लिए दिनभर में कितना समय देते हैं?

·         क्या कभी प्रभु के साथ एकाकार हो जाने की तड़प मन में उठती है?

·         मंत्रजाप करते-करते कहीं आप मनोराज में तो नहीं उलझ जाते हैं?

·         चित्त की चंचलता, मन की मनमुखता शांत होकर अंतर का आराम प्रगट हो रहा है या नहीं?

·         सुख में सुखी और दुःख में दुःखी होने की प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर आप अग्रसर हो रहे हैं या नहीं?

·         सत्संग में जाने के बाद सत्संग का, मनुष्य जीवन का महत्त्व समझ में आया है अथवा रोजी-रोटी के लिए ही जीवन पूरा हो रहा है?

·         जीवन में निर्भयता, निश्चिंतता और प्रसन्नता जैसे उन्नति के परम गुणों का प्रादुर्भाव हो रहा है?

·         मौन, एकांत, अनुष्ठान के प्रति रुचि कितनी है?

·         उद्वेग के प्रसंग में आप कितना धैर्य और संयम रख पाते हैं ?

अपने जीवन में किसी प्रकार की कमियाँ दिखें ते सुबह 10-12 प्राणायाम करके, उन कमियों को निकालने के लिए सद्गुणों का विचार कीजिए । इस प्रकार सद्गुणों विचार करने से आपके दुर्गुण धीरे-धीरे निवृत्त होते जायेंगे एवं हृदय सद्गुणों से भरता जायेगा । सद्गुणों के विकास से सर्वगुणसंपन्न परमात्मा का दीदार करना भी आसान होता जायेगा ।

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