साधना में जल्दी प्रगती के लिए महत्त्वपूर्ण छः बातें

साधना में जल्दी प्रगती के लिए महत्त्वपूर्ण छः बातें

कई लोग कहते हैं कि माला करते-करते नींद आने लगती है तो क्या करें ? सतत माला नहीं होती तो आप सेवा करें, सत्शास्त्र पढ़ें । मन बहुआयामी है तो उसको बहुत प्रकार की युक्तियों से सँभाल के चलाना चाहिए । कभी जप किया, कभी ध्यान किया, कभी स्मरण किया, कभी सेवा की - इस प्रकार की सत्प्रवृत्तियों में मन को लगाये रखना चाहिए ।


साधक यदि इन 6 बातों को अपनाये तो साधना में बहुत जल्दी प्रगति कर सकता है :


(1) व्यर्थ की बातों में समय न गँवायें । व्यर्थ की बातें करेंगे-सुनेंगे तो जगत की सत्यता दृढ़ होगी, जिससे राग-द्वेष की वृद्धि होगी और चित्त मलिन होगा । अतः राग-द्वेष से प्रेरित होकर कर्म न करें ।


सेवाकार्य तो करें लेकिन राग-द्वेष से प्रेरित होकर नहीं अपितु दूसरे को मान देकर, दूसरे को विश्वास में लेकर सेवाकार्य करने से सेवा भी अच्छी तरह से होती है और साधक की योग्यता भी निखरती है । भगवान श्रीरामचन्द्रजी औरों को मान देते और आप अमानी रहते थे । राग-द्वेष में शक्ति का व्यय न हो इसकी सावधानी रखते थे ।


(2) अपना उद्देश्य ऊँचा रखें । भगवान शंकर के श्वशुर दक्ष प्रजापति को देवता लोग तक नमस्कार करते थे । ऋषि-मुनि भी उनकी प्रशंसा करते थे । सब लोकपालों में वे वरिष्ठ थे। एक बार देवताओं की सभा में दक्ष प्रजापति के जाने पर अन्य देवों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया लेकिन शिवजी उठकर खड़े नहीं हुए तो दक्ष प्रजापति को बुरा लग गया कि दामाद होने पर भी शिवजी ने उनका सम्मान क्यों नहीं किया ?


इस बात से नाराज हो शिवजी को नीचा दिखाने के लिए दक्ष प्रजापति ने यज्ञ करवाया। यज्ञ में अन्य सब देवताओं के लिए आसन रखे गये लेकिन शिवजी के लिए कोई आसन न रखा गया। यज्ञ करना तो बढ़िया है लेकिन यज्ञ का उद्देश्य शिवजी को नीचा दिखाने का था तो उस यज्ञ का ध्वंस हुआ एवं दक्ष प्रजापति की गर्दन कटी । बाद में शिवजी की कृपा से बकरे की गर्दन उनको लगायी गयी । अतः अपना उद्देश्य सदैव ऊँचा रखें।


(3) जो कार्य करें, उसे कुशलता से पूर्ण करें। ऐसा नहीं कि कोई विघ्न आया और काम छोड़ दिया । यह कायरता नहीं होनी चाहिए । योगः कर्मसु कौशलम् । योग वही है जो कर्म में कुशलता लाये ।


(4) कर्म तो करें लेकिन कर्तापने का गर्व न आये और लापरवाही से कर्म बिगड़े नहीं, इसकी सावधानी रखें । यही कर्म में कुशलता है । सबके भीतर बहुत सारी ईश्वरीय सम्पदा छिपी है । उस सम्पदा को पाने के लिए सावधान रहना चाहिए, सतर्क रहना चाहिए ।


(5) जीवन में केवल ईश्वर को महत्त्व दें । सबमें कुछ-न-कुछ गुण-दोष होते ही हैं । ज्यों-ज्यों साधक संसार को महत्त्व देगा त्यों-त्यों दोष बढ़ते जायेंगे और ज्यों-ज्यों ईश्वर को महत्त्व देगा त्यों-त्यों सद्गुण बढ़ते जायेंगे ।


(6) साधक का व्यवहार व हृदय पवित्र होना चाहिए । लोगों के लिए उसका जीवन ही आदर्श बन जाय, ऐसा पवित्र उसका आचरण होना चाहिए ।


इन 6 बातों को अपने जीवन में अपनाकर साधक अपने लक्ष्य को पाने में अवश्य कामयाब हो सकता है । अतः लक्ष्य ऊँचा हो । मुख्य कार्य और अवांतर कार्य भी उसके अनुरूप हों ।   

**********

Six important points to remember for rapid progress in sadhana...  

– Pujya Bapuji

Many people ask what they should do when they feel sleepy while doing japa with a rosary. If you cannot do japa with a rosary incessantly then do sewa (selfless service), read spiritual books. Since the mind is multidimensional, it should be harnessed carefully using various techniques. One should keep his mind engaged in different virtuous acts such as doing japa, meditation, devotional remembrance and selfless service at different times.


If a sadhaka follows the following six points, he can progress rapidly in sadhana:


(1) Do not waste time in idle gossiping. When you indulge in idle gossiping, your sense of reality in the world will become stronger which will increase attachment and aversion making your mind impure.


Do works of service but not provoked by attachment and aversion; rather give respect to others and take them into confidence while doing sewa. This will not only facilitate better service but also develop your potential. Lord Rama used to give respect to others, while himself remaining modest. He was careful not to waste energy in love and hatred.


(2) Set a lofty goal of your life. Daksha Prajapati, the father-in-law of Lord Shiva, was even respected by the gods. Even the sages praised him. He was the senior most of all Lokapalas. Once when he entered the assembly of gods, all the gods rose to salute him but Lord Shiva did not. He felt insulted. He thought, ‘Why didn’t Lord Shiva show respect to me despite being my son-in-law?’

Being angry at the arrogance of Lord Shiva, he performed a sacrifice (yajna) to insult Shiva. In this yajna he so arranged that there was a seat for every invited god except Lord Shiva. Conducting a sacrifice was good, but the goal was to take revenge on Shiva by disparaging him. So the yajna was destroyed and Daksha Prajapati’s head was cut off. Later on by the grace of Shivaji, the head of a goat was put in the place of the lost head. Therefore always keep your goal high.


(3) Accomplish your work skilfully. Not that some hurdle comes and you leave the work. Such cowardice should not be there. Yoga is skill in action. Yoga is only that which brings skill in work.


(4) Do work but without feeling conceited of doer-ship and be careful not to spoil your work due to negligence. A great divine treasure is hidden in all persons. To get that wealth one should be alert and careful enough.


(5) Give importance to god alone in your life. Everyone has some virtues and some vices. The more a sadhaka gives importance to the world, his vices go on increasing; likewise, the more he gives importance to God, his virtues keep developing.


(6) Conduct and heart of the sadhaka should be pure. His conduct should be as pious as to make his life itself an ideal for others to follow.


A sadhaka putting these six points into practice can attain his goal certainly. Therefore, set a lofty goal. Main work and other works should also be done in accordance with that goal in mind.


 

Previous Article सफलता की महाकुंजी शिव-संकल्प
Print
949 Rate this article:
4.3

Please login or register to post comments.

Name:
Email:
Subject:
Message:
x