आत्मविकास के 15 साधन

आत्मविकास के 15 साधन

आत्मविकास करना हो, आत्मबल बढ़ाना हो और अपना कल्याण करना हो तो विद्यार्थियों को 15 बातों पर ध्यान देना चाहिए ।

(1) संकल्प : संकल्प में अथाह सामर्थ्य है । दृढ़ संकल्पवान मनुष्य हर क्षेत्र में सफल और हर किसीका प्यारा हो सकता है । आत्मबल बढ़ाने के लिए कोई भी छोटा-मोटा जो जरूरी है, वह संकल्प करें ।

(2) दृढ़ता : अपनी योग्यता, आवश्यकता और बलबूते अनुसार संकल्प करें और फिर छोड़ें नहीं, उसको पूरा करें । मैं हिमालय में एक ऐसी जगह पर पहुँचा कि जहाँ 15-20 कदम चलो तो श्वास फूले । ऑक्सीजन कम थी और मेरे पास सामान भी था । मैं बार-बार थोड़ा रुक जाऊँ, सामान रखकर थोड़ा आराम करूँ फिर चलूँ । मुझे जाना था बस पकड़ने के लिए । मैंने सोचा, ‘ऐसे रुकते-रुकते जाऊँगा तो बस भी चली जायेगी, रात को ठंड में कहाँ भटकना !’ संकल्प किया कि ‘जब तक बस-स्टैंड नहीं आयेगा तब तक हाथ में से सामान नीचे नहीं रखूँगा ।’ शक्ति (बलबूते) के अनुसार थोड़ा दम तो मारना पड़ा लेकिन कैसे भी करके वहाँ पहुँच गये । दृढ़ता से कार्य-सम्पादन करने पर संतोष होता है । जो भी अच्छा काम ठान लें, बस उसमें दृढ़ रहें । इससे आत्मबल बढ़ता है और आत्मबल बढ़ने से संकल्प फलित होता है ।

(3) निर्भयता : भय मृत्यु है, निर्भयता ही जीवन है । दुर्बलता को अपने जीवन में स्थान मत दो । जो डरता है उसे दुनिया डराती है । भय आते ही ‘भय मन में है, मैं निर्भय हूँ ।’ - ऐसे शुद्ध ज्ञान के विचार करो । छोटी-सी पुस्तक ‘जीवन रसायन’ जेब में रखो और बार-बार पढ़ो । यह तुम्हें निर्भीक व निर्दुःख बना देगी । जो भी डरपोक हैं, उनको भी ‘जीवन रसायन’ पुस्तक भेज दो । यह बड़ी सेवा है । जिनके स्वभाव और घर में झगड़ा हो उन्हें ‘मधुर व्यवहार’ पुस्तक, जहाँ मृत्यु और शोक है वहाँ ‘मंगलमय जीवन-मृत्यु’, जिनको ईश्वर की ओर बढ़ना है उनको ‘ईश्वर की ओर’ और जिनको जीवन में विकास करना है उनको ‘जीवन विकास’ पुस्तक पहुँचायें ।

(4) ज्ञान : आत्मा-परमात्मा और प्रकृति का ज्ञान पाने से भी आत्मबल बढ़ता है । जब सद्गुरु सत्संग से आंतरिक ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित कर देते हैं तो वह पापों को जलाकर जीवन में प्रकाश, शांति और माधुर्य ले आती है ।

(5) सत्यस्वरूप परमात्मा का चिंतन : ‘जो साक्षी है, सत् है, चेतन है; जो कभी मरता नहीं, बिछुड़ता नहीं और बेवफाई नहीं कर सकता, उस परमात्मा के साथ मेरा नित्य योग है और मरने, बिछुड़ने, बेवफाई करनेवाले संसार और शरीर के साथ नित्य वियोग है ।’ - ऐसे चिंतन से भी आत्मबल विकसित होता है ।

(6) श्रद्धा : भगवान, भगवत्प्राप्त महापुरुष, शास्त्र, गुरुमंत्र और अपने-आप पर श्रद्धा आत्मविकास व परम सुख की अमोघ कुंजी है ।

(7) ईश्वरीय विकास : सत्संग, भगवन्नाम-जप, ध्यान एवं व्रत-उपवास से ईश्वरीय विकास होता है । ईश्वरीय अंश विकसित होने पर समता, नम्रता, प्रसन्नता, उदारता, परोपकार, आत्मबल आदि दैवी गुण स्वाभाविक ही आ जाते हैं ।                   

(8) सदाचार : जैसा व्यवहार आप दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहते हो, वही ‘दुराचार’ है । जैसा व्यवहार आप दूसरों से अपने प्रति चाहते हो, वही ‘सदाचार’ है । दूसरों को मान देना, आप अमानी रहना - यह सफलता की कुंजी है । झूठ-कपट, बेईमानी, दुराचार से नहीं, सदाचार से आत्मविकास होता है । बस, आप सत्कर्म करते रहो, सदाचारयुक्त जीवन जियो और अपने आत्मस्वभाव, ‘सोऽहं’ स्वभाव में स्थित होने का प्रयत्न करते जाओ, इसीसे आपका कल्याण होगा ।

(9) सच्चाई का आचरण : सत्य, मधुर एवं  हितकर  वाणी से  सद्गुणों का पोषण होता है, मन पवित्र व बुद्धि निर्मल बनती है । तुम्हारी वाणी में जितनी सच्चाई होगी उतनी ही  तुम्हारी  और तुम जिससे बात करते हो उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी ।

(10) संयम : जीवन के विकास का मूल संयम है । जिसके जीवन में संयम नहीं है, वह न तो स्वयं की ठीक से उन्नति कर पाता है और न ही समाज में कोई महान कार्य कर पाता है । हाथों-पैरों का संयम, वाणी का संयम, संकल्प-विकल्पों का संयम और ब्रह्मचर्य का पालन - इनसे आत्मविकास होता है । मौन है, नहीं बोलना है तो नहीं बोलना है । एकादशी है, अन्न नहीं खाना है तो नहीं खाना है । संकल्प-विकल्प रोकने के लिए बार-बार दीर्घ प्रणव का जप करना चाहिए । आश्रम की पुस्तक ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश’ में ब्रह्मचर्य के लिए निर्दिष्ट उपायों का अवलम्बन लेकर ब्रह्म-परमात्मा में पहुँचना चाहिए । सुबह जल्दी

उठें, ध्यान-भजन करें, दीर्घ प्रणव का जप करें तो सत्त्वगुण बढ़ जाता है । इससे आत्मविकास होता है ।

(11) अहिंसा : किसीको मन से, शरीर से, वचन से दुःख न पहुँचाना अहिंसा है ।

(12) दया : जो दूसरों का दुःख मिटाकर आनंद पाता है, उसको अपना दुःख मिटाने हेतु अलग से मेहनत नहीं करनी पड़ती । यदि तुम्हारा दिल परोपकार की भावना से ओतप्रोत हो, निर्भयता और निष्कामता से भरा हो तो प्रकृति तुम्हारे अनुकूल होने को तत्पर रहती है । इसीलिए सबके मंगल के लिए दयाभाव रखो ।

(13) सेवा : महापुरुषों, गुरुओं या किसीकी भी निःस्वार्थ सेवा से आत्मबल बढ़ता है । सेवा का अपना आनंद, औदार्य, पुण्य व प्रभाव है । ईमानदारी की सेवा से अंतःकरण शुद्ध होता है । सेवा में दिखावा न हो । आप लौकिक दुनिया में हों चाहे आध्यात्मिक जगत में, सेवा के बिना प्रगति सम्भव ही नहीं है ।

(14) न्याय : न्याय के पक्ष में रहने से भी आत्मबल बढ़ता है । स्वार्थरहित, कामनारहित होकर, दूसरों का हित हो यह ध्यान रख के न्याय करो तो आपको आत्मसंतोष मिलेगा । अपने लिए न्याय, औरों के लिए उदारता की नीति जो बर्तता है, उसका बड़प्पन खूब खिलता है ।

(15) परमात्म-प्रेम का विकास : प्रेम में अपनत्व होता है, विश्वास होता है, परमात्मा प्रेम से प्रकट होते हैं । बुद्धि में परमात्म-प्रेम की जागृति ही मनुष्य-जीवन का लक्ष्य होना चाहिए । परमात्मा में, गुरु में प्रीति करने से आत्मबल, आत्मसुख बहुत बढ़ता है । जितना हम निष्काम, निःस्वार्थ, गुरुप्रेमी, प्रभुप्रेमी होते हैं, उतना ही हमारी बुद्धि में गुुरु का, प्रभु का प्रसाद विकसित होता है ।

तुम अगर चाहो तो अपने जीवन को उत्साह एवं तत्परता से भरकर भारत माता के महान सपूत बन सकते हो । तुम ठान लो, प्रतिभा विकसित करो । ईश्वर का असीम बल तुममें छुपा है । ॐ ॐ ॐ...


15 Steps to Self-Development - Pujya Bapuji


Students must pay attention to 15 things for self-development, self-good and attainment of self-force.

(1) Develop will power: There is immense strength in the will. The man of strong will can be successful in every walk of life and can become beloved of all. Take some vow, small or big to strengthen your willpower.

(2) Resoluteness: Make a determination according to your requirement, capability and potentials and stick to it. Accomplish it. Once, I was travelling in the Himalayas at such an altitude that mere 15-20 steps of walking would render me breathless. Oxygen was less in the environment and I was carrying some luggage also. This would make me halt frequently. I would keep aside my luggage, rest for a few minutes and then resume my journey. I had to catch a bus for my onward journey. I deliberated, ‘If I stop frequently like this, I shall miss my bus and then get stranded in the cold night.’ I immediately made a resolve, ‘I’ll not keep the luggage on the ground till I reach the bus stop.’ Of course, it was strenuous and I had to exert myself, yet I reached my destination in time. One who accomplishes any task with firm determination gets inner satisfaction. So be firm in fulfilling whatever good resolve you make. It strengthens willpower which in turn fulfils your resolves.

(3) Fearlessness: Fearlessness is life; fear is death. Banish thoughts of weakness from your mind. People take advantage of one weak and fearful. Whenever a fearful thought comes to your mind, contemplate pure Knowledge, ‘Fear is only in the mind; I’m fearless.’ Always keep the small booklet, ‘Jeevan Rasayana’ (‘Elixir of Life’ in English) in your pocket and read it time and again. This will rid you of fear and sorrow. Send this book to others who are fearful. This will be a great service to them. Send the book ‘Madhur Vyavahar’ (‘Winsome Behaviour’ in English) to those who are quarrelsome or have family strife. Send the book “Mangalamaya Jivanmrityu” to the bereaved and grief-stricken people. Send the book ‘Ishwar ki Or’ (‘Towards God’ in English) to those who want to tread the path to God-Realization, and send ‘Jivan Vikas’ to those who want to develop in their life.

(4) Knowledge: Attainment of Knowledge of the Self, the Supreme Self and of the nature also helps increase self-force. When Sadguru lights the flame of inner knowledge through satsang, it reduces sins to ashes and brings effulgence, peace and joy to life.

(5) Reflection on Supreme Self, the Truth Absolute: ‘I am eternally united with Supreme Self, who is Existence Absolute, Pure Consciousness, witness to everything; who is deathless, who never parts from me and who is unable to desert me.  And I am continually separated from the world and this body that is fleeting, dying and deserting me every moment.’ Such contemplation also increases self-force.

(6) Faith: Belief in the Supreme Lord, God-Realized saints, Shastras, Guru-mantra, and belief in oneself is the unfailing means to self-development and Supreme Bliss.

(7) Development of Divine Element: Satsang, japa of divine Name, meditation and observance of fasts and vows develop the Divine element. This in turn naturally cultivates divine virtues like equanimity, humility, cheerfulness, generosity, altruism and self-force.        

(8) Good Conduct: The kind of behavior that you don’t wish to be done to you is immoral behavior or evil conduct. The kind of behavior that you expect from others is righteous behavior or good conduct. The key to success lies in giving respect to others while oneself remaining humble, free from pride. Self-development is achieved through right conduct, not through lies, deceit and dishonesty. You just have to keep engaged in virtuous acts, while leading a righteous life and continuing your efforts towards getting established in your essential nature, “I am That” nature. This will lead you to blessedness.

(9) Practice of truthfulness: Speaking truth, sweet and benevolent words increases virtues, purifies mind and intellect. The more you are truthful in speech, the more you and the person conversing with you develop spiritually.

(10) Self-restraint: Self-restraint is the key to true development of life. One, who is not self-restrained, can neither evolve spiritually nor do something great for the society. Restraint of the limbs, speech, resolves and counter resolves and practice of continence ensure true Self-development. If you have decided to observe silence, do it by every means. If Ekadashi fast is to be done, abstain completely from eating any type of food. To stop the flow of thoughts and counter thoughts one should resort to elongated chanting of Aum repeatedly. One ought to follow the instructions for observing Brahmacharya as given in the ‘Divya Prerana Prakash’ (Divine Inspiration) published by the ashram, and thereby attain the Supreme Brahman. Get up early in the morning, do meditation and devotional practices, chant Aum in an elongated manner. This will increase your Sattvaguna and thereby bring true Self-development.

(11) Non-violence: Hurting or harming none in thought, word and deed is non-violence.

(12) Kindness: One, who takes delight in removing the unhappiness of others, doesn’t have to do anything extra to remove his own unhappiness. If your heart is filled with benevolence, fearlessness and selflessness, the Nature is always ready to favor you. Hence, have compassion in your heart for the welfare of all.

(13) Service: Selfless service rendered to great men, Guru or anybody, for that matter, increases your self-force. Service itself gives joy, generosity, merits and power. Honestly rendered service purifies the heart (internal organ). An ostentatious display of service is avoidable. True development in the mundane or spiritual world is not possible without service.

(14) Justice: Self-force increases by favoring justice. If you judge remaining free from selfishness and desires you will get inner satisfaction. Bring yourself to justice and forgive others. You will become very great. 

(15) Developing love for God: Love develops a sense of ownness and trust. God is revealed only by love. The only goal of human life should be awakening of love for God in the mind. Love for the Guru and God increases Self-force and Self-bliss. The more we become free from desires and love God or Guru selflessly the more our intellect is blessed with the grace of the Guru and God.

If you so will, you can become a great worthy son of Mother India by filling your life with zeal and readiness. Just make up your mind and develop your genius. Infinite power of God is hidden in you. Aum…Aum…Aum.  

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