भगवत्प्राप्ति के 14 विघ्न व 6 महत्त्वपूर्ण बातें
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भगवत्प्राप्ति के 14 विघ्न व 6 महत्त्वपूर्ण बातें

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

भगवत्प्राप्ति में 14 प्रकार के विघ्न आते हैं :

(1) स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही: यह बड़े-में-बड़ा विघ्न है । यदि मनुष्य अस्वस्थ है तो ध्यान-भजन नहीं कर पाता । अतः यह जरूरी है कि शरीर स्वस्थ रहे लेकिन शरीर के स्वास्थ्य की चिंता व चिंतन न रहे । यदि किसी कारण से स्वास्थ्य-लाभ नहीं रहता तब भी अपने को भगवान में व  भगवान को अपने में मानकर देह की ममता और सत्यता हिम्मत से हटाओ ।

(2) खानपान में अनियमितता: देर से खाना खाने से भी अस्वस्थता घेर लेगी और ध्यान-भजन में अरुचि हो जायेगी ।

(3) साधन आदि में संदेह: यह संदेह कि ‘हम यह साधन करते हैं, ठीक है कि नहीं? भगवान मिलेंगे कि नहीं ?’ अरे, अंतर्यामी भगवान जानते हैं कि आप भगवान के लिए साधन करते हैं, फिर क्यों संदेह करना ?

उलटा नामु जपत जगु जाना ।

बालमीकि भए ब्रह्म समाना ।।

(श्री रामचरित. अयो. कां. : 193.4)

(4) सद्गुरु का संग या सत्संग न मिलना: जिसने सत्संग और सेवा का लाभ नहीं लिया, सद्गुरु का महत्त्व नहीं समझा, वह सचमुच अभागा है । आत्मवेत्ताओं का सत्संग तो मनुष्य के उद्धार का सेतु है । सत्संग माने सत्यस्वरूप परमात्मा में विश्रांति । जिसके जीवन में सत्संग नहीं होगा वह कुसंग तो जरूर करेगा और एक बार कुसंग मिल गया तो समझ लो तबाही-ही-तबाही! लेकिन अगर सत्संग मिल गया तो आपकी 21-21 पीढ़ियाँ निहाल हो जायेंगी । हजारों यज्ञों, तपों, दानों से भी आधी घड़ी का सत्संग श्रेष्ठ माना गया है, सद्गुरु का सान्निध्य सर्वोपरि माना गया है क्योंकि सद्गुरु का सत्संग-सान्निध्य जीव को जीवत्व से शिवत्व में आरूढ़ करता है । इतना ही नहीं, सत्संग से आपके जीवन को सही दिशा मिलती है, मन में शांति और बुद्धि में बुद्धिदाता का ज्ञान छलकता है ।

(5) नियमनिष्ठा न होना: इससे भी साधना में बरकत नहीं आती । जिसके जीवन में कोई दृढ़ नियम नहीं है उसका मन उसे धोखा दे देता है । नियमनिष्ठा आदमी को बहुत ऊँचा उठाती है ।

(6) प्रसिद्धि की चाह: थोड़ी-बहुत साधना करते हैं तो उसकी पुण्याई से प्रसिद्धि आदि होने लगती है । यदि व्यक्ति असावधान रहता है तो प्रसिद्धि के लिए कुछ-का-कुछ करने लग जाता है, फिर साधन-नियम छूट जाता है ।

(7) कुतर्क: कुतर्क मतलब ‘भगवान हैं कि नहीं हैं? यह मंत्र सच्चा है कि नहीं है ?’ अथवा विधर्मियों या ईश्वर से दूर ले जानेवाले व्यक्तियों के प्रभाव में आकर फिसल जाना ।

(8) प्राणायाम व जप का नियम छोड़ना: जो 10 प्राणायाम और 10 माला का छोटा-सा नियम दीक्षा के समय बताते हैं, उसको छोड़ देना भी भगवत्प्राप्ति में बड़ा विघ्न है ।

(9) बाहरी सुख में ही संतुष्ट होना: अल्प (सीमित) में ही संतोष हो जाय... ‘चलो, घर है, नौकरी है... बस, खुश हैं ।’ नहीं-नहीं, बाहर के थोड़े-से सुखों में आप संतुष्ट न हों, आपको तो परमात्मा का परम सुख पाना है । थोड़े-से ज्ञान में आप रुको नहीं, आपको परमात्मा का ज्ञान पाना है ।

(10) भगवान को छोड़कर संसार की तुच्छ चीजों की कामना करना: सांसारिक तुच्छ कामनाएँ न बढ़ायें । भगवान का भजन भी निष्काम भाव से करें । ‘यह मिल जाय... वह मिल जाय...’ ऐसा सोचकर भजन न करें बल्कि भगवान की प्रीति के लिए भगवान का भजन करें ।

(11) ब्रह्मचर्य का अभाव: कामविकार में अपनी शक्ति का नाश हो जाता है तो फिर ध्यान-भजन में बरकत नहीं आती है । तो ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश’ पुस्तक का अभ्यास करना और संयम रखना ।

(12) कुसंग: कुसंग में आने से भी अपना साधन-भक्ति का रस बिखर जाता है । जैसे-तैसे व्यक्तियों के हाथों का बना खानेे, जैसे-तैसे व्यक्तियों के सम्पर्क में आने और उनसे हाथ मिलाने से भी अपनी भक्ति क्षीण हो जाती है । उससे बचना चाहिए ।

(13) दोष-दर्शन: दूसरों में दोष-दर्शन करने से वे दोष अपने में पुष्ट हो जाते हैं । हमारे मन में थोड़े दोष होते हैं तभी दूसरों में दोष दिखते हैं । इसलिए आप किसीके दोष देखकर अपने मन को दोषों का घर न बनाइये, उसकी गहराई में छुपे हुए अंतर्यामी परमात्मा को देख के अपने दिल में भगवद्भाव जगाइये ।

(14) साम्प्रदायिकता: ‘मैं फलाने धर्म का हूँ, फलाने मजहब का हूँ, ऐसा हूँ... ।’ नहीं-नहीं, हम जो भी हैं, सब उस एक परमेश्वर के हैं ।

इन 14 विघ्नों से बचनेवाला व्यक्ति जल्दी से परमात्मा को पा लेता है ।

भगवत्प्राप्ति की ओरले जानेवालीं 6 महत्त्वपूर्ण बातें

(1) जो साधना करें, उससे ऊबे नहीं ।

जन्म कोटि लगि रगर हमारी ।

बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ।।

(श्री रामचरित. बा.कां. : 80.3)

‘पायेंगे तो परमात्मा का आनंद पायेंगे, परमात्मा का सुख, परमात्मा की सत्ता पायेंगे, बाहर की नश्वर सत्ता, नश्वर सुख पाकर रुक नहीं जायेंगे!’ ऐसा दृढ़ विचार करनेवाला जल्दी ईश्वर-सुख को पाता है ।

(2) अपना नियम और साधना निरंतर करना ।

(3) सत्कारपूर्वक (आदरपूर्वक) और श्रद्धापूर्वक साधना करना ।

(4) सभीसे सज्जनता का व्यवहार करना ।

(5) पाप करने से बचना ।

(6) प्रभु में विश्वास और प्रीति करनेवाले को जल्दी-से-जल्दी भगवत्प्राप्ति होती है ।  

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14 Obstacles in God-realization and six pointers

  Fourteen types of obstacles act as stumbling blocks in the path of God-realization:

(1) Negligence towards health: This is the biggest of all obstacles. A sick man cannot meditate nor do other spiritual practices. Hence, it is necessary to keep the body healthy; but one should not be worried about physical health. One should not mull over it. If you do not enjoy the health due to any reason even then you muster courage to remove the sense of mine-ness in the body and sense of reality in it by considering yourself in God and God in yourself.

(2) Irregular diet: Taking food too late will lead to illness, which in turn will diminish your interest in meditation and devotional practice.

(3) Doubt about spiritual practice: An aspirant begins to doubt whether he is doing the right practices and whether or not he will succeed in his God-realization. Hey, the Antaryamin God knows that you are doing practices for Him. Then why do you doubt?

उलटा नामु जपत जगु जाना ।

बालमीकि भए ब्रह्म समाना ।।

“The whole world knows how Valmiki became as good as Brahman (God himself) by repeating the Name in reverse way (as Maraa).” (Shri Rama Charita Manasa: Ayodhya Kanda: 193.4)

(4) Lack of SatGuru’s company or Satsang: One, who has not reaped the benefit of Satsang and rendering selfless service; one who has not considered the importance of the SatGuru, is indeed unfortunate. Satsang delivered by Self-realized saints is but the bridge for human beings to cross the ocean of samsara to get emancipated. Satsang means getting repose in the Truth personified Supreme Self. One whose life lacks in satsang will certainly do kusanga (bad company); and once one gets into bad company, it is sure to ruin him completely! Whereas Satsang (the pious company and spiritual discourse of a Self-realized saint), once attained, will ensure emancipation of one’s 21 generations together. Even half a Ghadi (24 minutes) of Satsang is considered to be superior to the performance of thousands of sacrificial rites, penances, charities etc. The company and satsang of a SatGuru is considered to be supreme as it enables the jiva transcend the state of jivahood (state of being an individual soul) to get established in Shivahood (state of being Brahman). Not only this, Satsang gives your life the right direction; inundates your mind with and intellect with the knowledge of the Supreme Lord, the Giver of intellect.

(5) Lack of allegiance to regular practices and observances: This too prevents advancement in sadhana. One who does not observe any spiritual vow strictly in his life is deceived by his mind. Steadfast adherence to one’s spiritual routine elevates one to great heights.

(6) Desire for name and fame: The religious merit earned by practice of some Sadhana brings name and fame. If the person is not vigilant, he may start doing anything unfair for name and fame, and thus he will skip sadhana and observances.

(7) Fallacious logic: Application of fallacious logic -whether ‘God exists or not’ or ‘this mantra is efficacious or not’, or to fall from the path of sadhana under the influence of followers of other religions or atheists who lead one away from God.

(8) Cessation of the daily routine of Pranayama and Japa: Skipping the daily routine of doing 10 Pranayamas and 10 malas of Gururmantra Japa given at the time of Diksha is also a big obstacle to God-realization.

(9) Getting satisfied with merely external happiness: One may tend to be satisfied with the alpa (lower experiences) ‘I have a house, a job, I am happy.’ No-no. Don’t be satisfied with small external pleasures; you have got to attain the Supreme Bliss of the Supreme Self. Don’t stop on attaining a little knowledge. You have to attain the Knowledge of the Supreme Self.

(10) Desire for petty worldly things instead of God: Don’t increase your desire for petty worldly things. Even worship God with selfless mental attitude. Don’t do religious practices for attaining this thing or that thing; rather worship God for the sake of Love Divine.

(11) Lack of Celibacy (Brahmacharya): Meditation and devotional practice does not lead to much advancement if sexual energy is dissipated in sexual indulgence. Study and follow the rules prescribed in the book ‘Divya Prerana-Prakash’, and observe continence.

(12) Evil Company: Evil company also leads to the loss of spiritual joy attained through Sadhana Bhakti (comprised of Ashtanga Yoga, sadhana saptaka etc.). Even eating food prepared by just anyone, coming in contact with lowly people and shaking hands with them diminishes our Bhakti. One should shun it.

(13) Fault-finding: When we find fault with others, our faults flourish. We can see faults in others only if they are present to some degree in our mind. Hence, don’t make your mind a haven of vices by finding them in any person; rather arouse divine feelings in your heart by beholding the Antaryamin Supreme Self in his depth.

(14) Religious hypocrisy: ‘I belong to such and such religion or sect, I am like this or that….’ No-no, we all belong to that One Supreme Lord irrespective of our religion or sect.

One who saves himself from these 14 obstacles attains God quickly.

6 Pointers that lead to God-realization

(1) Don’t lose faith or interest in your sadhana.

जन्म कोटि लगि रगर हमारी ।

बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ।।

“As for myself I must wed Shambhu or remain a virgin, no matter I have to continue the struggle for ten million lives.” (Shri Rama Charita Manasa: Bala Kanda: 80.3)

‘I will attain Bliss, Joy and Existence of the Supreme Self. I will not stop on attaining external perishable power and perishable joy.’ The man of such a resolute mind attains divine joy quickly.

(2) Do one’s daily spiritual practices and sadhana without a break. (3) Do sadhana with due reverence and faith.

(4) Behave politely with everyone.

(5) Avoid committing sins.

(6) One who believes in God and loves God attains God at the earliest.            

[Rishi Prasad Issue-294]
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