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आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, पुष्टि, धन-धान्य देनेवाला श्राद्ध-कर्म
Ashram India
/ Categories: Shraaddh, Hindi

आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, पुष्टि, धन-धान्य देनेवाला श्राद्ध-कर्म

(श्राद्ध पक्ष : 24 सितम्बर से 8 अक्टूबर)


आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को ‘पितृ पक्ष’ या ‘महालय पक्ष’ बोलते हैं । आपका एक माह बीतता है तो पितृलोक का एक दिन होता है । साल में एक बार ही श्राद्ध करने से कुल-खानदान के पितरों को तृप्ति हो जाती है ।

श्राद्ध क्यों करें ?


गरुड़ पुराण (10.57-59) में आता है कि ‘समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता । पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशुधन, सुख, धन और धान्य प्राप्त करता है ।’


‘हारीत स्मृति’ में लिखा है : 


न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुषः ।
न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम् ।।


‘जिनके घर में श्राद्ध नहीं होता उनके कुल-खानदान में वीर पुत्र उत्पन्न नहीं होते, कोई निरोग नहीं रहता । लम्बी आयु नहीं होती और किसी तरह कल्याण नहीं प्राप्त होता (किसी-न-किसी तरह की झंझट और खटपट बनी रहती है) ।’
महर्षि सुमंतु ने कहा : ‘‘श्राद्ध जैसा कल्याण-मार्ग गृहस्थी के लिए और क्या हो सकता है ! अतः बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए ।’’


श्राद्ध पितृलोक में कैसे पहुँचता है ?


श्राद्ध के दिनों में मंत्र पढ़कर हाथ में तिल, अक्षत, जल लेकर संकल्प करते हैं तो मंत्र के प्रभाव से पितरों को तृप्ति होती है, उनका अंतःकरण प्रसन्न होता है और कुल-खानदान में पवित्र आत्माएँ आती हैं ।


‘यहाँ हमने अपने पिता का, पिता के पिता का और उनके कुल-गोत्र का नाम लेकर ब्राह्मण को खीर खिलायी, विधिवत् भोजन कराया और वह ब्राह्मण भी दुराचारी, व्यसनी नहीं, सदाचारी है । बाबाजी ! हम श्राद्ध तो यहाँ करें तो पितृलोक में वह कैसे पहुँचेगा ?’


जैसे मनीऑर्डर करते हैं और सही पता लिखा होता है तो मनीऑर्डर पहुँचता है, ऐसे ही जिसका श्राद्ध करते हो उसका और उसके कुल-गोत्र का नाम लेकर तर्पण करते हो कि ‘आज हम इनके निमित्त श्राद्ध करते हैं’ तो उन तक पहुँचता है । देवताओं व पितरों के पास यह शक्ति होती है कि दूर होते हुए भी हमारे भाव और संकल्प स्वीकार करके वे तृप्त हो जाते हैं । मंत्र और सूर्य की किरणों के द्वारा तथा ईश्वर की नियति के अनुसार वह आंशिक सूक्ष्म भाग उनको पहुँचता है ।


‘महाराज ! यहाँ खिलायें और वहाँ कैसे मिलता है ?’ 


भारत में रुपये जमा करा दें तो अमेरिका में डॉलर और इंग्लैंड में पाउंड होकर मिलते हैं । जब यह मानवीय सरकार, वेतन लेनेवाले ये कर्मचारी तुम्हारी मुद्रा (करंसी) बदल सकते हैं तो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए जो प्रकृति काम करती है, वह ऐसी व्यवस्था कर दे तो इसमें ईश्वर व प्रकृति के लिए क्या बड़ी बात है ! आपको इस बात में संदेह नहीं करना चाहिए । 


जैसी भावना वैसा फल


देव, पितर, ऋषि, मुनि आदि सभीमें भगवान की चेतना है । निष्काम भाव से उनको तृप्ति कराने से भगवान में प्रीति होगी । सकाम भाव से उनको तृप्ति कराने से कुल-खानदान में अच्छी आत्माएँ आयेंगी । भगवान ने 5 हजार से भी अधिक वर्ष पहले कहा था :


यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।।


‘देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं । इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता ।’ (गीता : 9.25)


प्रतिमा, मंत्र, तीर्थ, देवता एवं गुरु में जिसकी जैसी बुद्धि, भावना होती है, उसे वैसा फल मिलता है । पितृलोक में जाने की इच्छा से पूजन करता है तो मरने के बाद पितृलोक में जायेगा लेकिन पितरों की भलाई के लिए निष्काम भाव से, कर्तव्यबुद्धि से, भगवान की प्रसन्नता के लिए करता है तो हृदय प्रसन्न होकर उसके हृदय में भगवद्रस तो आयेगा, तड़प बढ़ी तो साकार-निराकार का साक्षात्कार करने में भी सफल होगा ।


भूत-प्रेत की सद्गति के लिए कुछ कर लें तो ठीक है लेकिन ‘भूत-प्रेत मुझे यह दे दें’ ऐसी कामना की और उनके प्रति स्थायी श्रद्धा और चिंतन हो गया तो भूतानि यान्ति भूतेज्या... ‘भूतों को पूजनेवाले (मरने के बाद) भूतों को प्राप्त होते हैं ।’ (गीता : 9.25)


श्राद्ध फलित होने का आसान प्रयोग


स्वधा देवी पितरों को तृप्त करने में सक्षम है । तो उसी देवी के लिए यह मंत्र उच्चारण करना है । श्राद्ध करते समय यह मंत्र 3 बार बोलने से श्राद्ध फलित होता है :


ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा ।


जो जाने-अनजाने रह गये हों, जिनकी मृत्यु की तिथि का पता न हो, उनका भी श्राद्ध-तर्पण सर्वपित्री अमावस्या को होता है ।


(श्राद्ध से संबंधित विस्तृत जानकारी हेतु आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ‘श्राद्ध-महिमा’ पढ़ें ।)


‘सामूहिक श्राद्ध’ का लाभ लें


सर्वपित्री दर्श अमावस्या (8 अक्टूबर 2018) के दिन विभिन्न स्थानों के संत श्री आशारामजी आश्रमों में ‘सामूहिक श्राद्ध’ का आयोजन होता है, जिसमें आप सहभागी हो सकते हैं । इस हेतु अपने नजदीकी आश्रम में 7 अकटूबर तक पंजीकरण करा लें । अधिक जानकारी हेतु पहले ही अपने नजदीकी आश्रम से सम्पर्क कर लें ।
अगर खर्चे की परवाह न हो तो अपने घर में भी श्राद्ध करा सकते हैं ।

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Shraaddha for longevity, son, fame, heaven, health and wealth


(Shraaddha Paksha: from 24th September to 8th October)


The dark fortnight of the Aashwin month in the Hindu calendar is called “Pitri Paksha” or “Mahaalaya Paksha”. Our one month is equal to one day of the Pitri Loka (the manes’ world). Performance of Shraaddha only once in a year satiates the manes of an entire lineage.


Why should Shraaddha be performed?


According to the Garuda Purana (10.57 – 59) “A timely performance of Shraaddha makes everyone in the entire family absolutely immune to all sorrows. By worshipping manes one attains longevity, son, fame, heaven, renown, health, strength, good fortune, animal wealth, happiness, opulence and abundance of food grains.”


The ‘Haarit Smiriti’ states:


न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुषः । 

न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम् ।।


“Those households wherein no Shraaddha ritual is performed are never blessed with a heroic son, and none enjoys a good health. They do not live long and fail to attain true welfare and peace (some problem or the other continues to plague such families).”


Sage Sumantu has asserted, “For the householders, nothing is as propitious as the ritual of Shraaddha. Therefore, a wise person should perform Shraaddha by all means.”


How does the Shraaddha reach the Pitri Loka?


During the days of Shraaddha, a relevant resolve is made accompanied by recitation of mantras while holding the sesame seeds (Til), unbroken rice (Akshat) and water in the hand; whereupon the manes are satiated by the power of the mantras. Their mental sheaths are pleased and resultantly, holy souls are born in the family.


“We perform Shraaddha by taking the names of our father and grandfather while also mentioning the name of our lineage (Gotra); next, we serve the meal (Kheer) to a Brahmin in the prescribed manner, and that Brahmin should be of good conduct and in no case a debauchee; then our Shraaddha reaches our manes. Babaji, we perform Shraaddha in this world. How does it reach the world of our manes?”


As a money order inscribed with the correct address of the recipient reaches him. Same way, when Shraaddha is performed by duly naming the manes and their lineage while offering oblations for their satisfaction after making the resolve: ‘Today, I am performing Shraaddha for such and such manes of mine belonging to such and such lineage.’ –it reaches them. The gods and manes have the competence to gain satisfaction by receiving our feelings and resolves even from a distance. Through our chanting of mantras and the activated Sun channel, the subtle essence of the offered food reaches our manes according to divine providence.


“Maharaj! How is it received by them in that world when we are offering the food here?”


You deposit rupees in India and it is received as dollars in America or as pounds in England. If a human government can change your currency, then no wonder if the divine Nature (Prakriti) that works for the pleasure of God also makes such arrangements! You should not have doubts in this regard.


As are your feelings, so are the fruits


Gods, manes, Rishis, Munis, etc. all have divine consciousness. By satiating them selflessly you will develop love for God. Whereas by satisfying them with a cherished desire you shall find pious souls taking birth in your family. Lord Krishna had declared even more than five thousand years ago:


यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । 
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।।


“The worshippers of the Devas or gods go to the Devas; to the Pitris or manes go to the ancestor-worshippers; to the Bhutas or the ghosts and spirits go worshippers of the Bhutas; but My worshippers come unto Me. (Therefore, My devotees are not born again.)”    (The Gita: 9.25)


The benefit one gains from an idol, mantra, sacred place, god and Guru is directly proportional to the quality of the feelings one has towards them. If you want to go to the world of manes and you have worshipped them for that reason, you will definitely meet your desire; and if you have no desires but have worshipped them dutifully and selflessly for their own good, only to please God, then you shall attain divine joy within, and you may also succeed in attaining God both in His formal and formless existence if your yearning is intense enough.


It is good if you perform a ritual for the emancipation of the Bhutas, i.e. ghosts and spirits; but if you pray them with a desire, ‘O ghost or spirit, give me this thing’, and thus you develop permanent faith in them and think of them, then remember the teaching of the Gita: ‘To the Bhutas or the ghosts and spirits go worshippers of the Bhutas.’


An easy procedure to make the Shraaddha ritual fruitful


Swadhaa goddess is capable of satiating the manes. So you have to chant a mantra for her. Chant the following mantra three times while performing the Shraaddha ritual:


Om Hrim Shrim Klim Swadhaadevyai Swaahaa(ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा ।)


Those for whom Shraaddha could not be performed for some reason, and if the definite date of their death is not known, then Shraaddha for them can be performed on Sarva Pitri Amavasya.



(For detailed information about Shraaddha Karma please read the book ‘Shraaddha Mahima’ published by the ashram.)


You may take benefit of “Collective Shraaddha”


“Collective Shraaddha” ritual is organised in different branches of Sant Shri Asharamji Ashram on the Sarva Pitri Amavasya (8th October ). You can participate in it. Please register by 7th October at your nearest ashram. For further details please contact your nearest ashram in advance. If you have no financial constraints, you may get the Shraaddha ritual performed even at your home.  


 

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