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Scientific View of Shraaddh

श्राद्ध का वैज्ञानिक विवेचन

अन्य मासों कि अपेक्षा श्राद्ध के दिनों में चन्द्रमा पृथ्वी के निकटतम रहता है | इसी कारण उसकी आकर्षण-शक्ति का प्रभाव पृथ्वी तथा प्राणियों पर विशेष रूप से पड़ता है | इस समय पितृलोक में जाने की प्रतीक्षा कर रहे सूक्ष्म शरीरयुक्त जीवों को उनके परिजनों द्वारा प्राप्त पिंड के सोम अंश से तृप्त करके पितृलोक प्राप्त करा दिया जाता है |

श्राद्ध के समय पृथ्वी पर कुश रखकर उसके ऊपर पिडों में चावल,जौ,तिल,दूध,शहद, तुलसीपत्र आदि डाले जाते है | चावल व जौ में ठंडी विद्युत् , तिल व दूध में गर्म विद्युत् तथा तुलसीपत्र में दोनों प्रकार की विद्युत होती है | शहद की विद्युत् अन्य सभी पदार्थो की विद्युत और वेदमंत्रों को मिलाकर एक साथ कर देती है | कुषाएं पिडों की विद्युत् को पृथ्वी में नहीं जाने देती | शहद ने जो अलौकिक विद्युत् पैदा की थी, वह श्राद्धकर्ता की मानसिक शक्ति द्वारा पितरों व परमेश्वर के पास जाती है जिससे पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है |

श्राद्ध मृत प्राणी के प्रति किया गया प्रेमपूर्वक स्मरण है, जो कि सनातन धर्म की एक प्रमुख विशेषता है | आश्विन मास का पितृपक्ष हमारे विशिष्ट सामाजिक उत्सवों की भाँति पितृगणों का सामूहिक महापर्व है | इस समय सभी पितर अपने प्रथ्वीलोकस्थ सगे-संबंधियों के यहाँ बिना निमत्रंण के पहुँचते है | उनके द्वारा प्रदान किये गए 'कव्य' (पितरों के लिए डे पदार्थ) से तृप्त होकर उन्हें अपने शुभाशीर्वादों से पुष्ट एवं तृप्त करते है |   

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