जीवन में जगे माधुर्य श्रीकृष्ण का

जीवन में जगे माधुर्य श्रीकृष्ण का
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जीवन में जगे माधुर्य श्रीकृष्ण का

जन्माष्टमी का उत्सव स्वार्थ में, शोषण में लगकर सुखी होने की कंस-परम्परा को चुनौती देने के लिए है । ‘हम अधिक सत्तावान, अधिक बलवान, अधिक बुद्धिमान हैं तथा पाण्डव पाँच हैं और हम सौ हैं'- बाह्य उपलब्धि के इस अहंकार की परम्परा की पोल खोलने के लिए है । भक्तों की प्रीति का पान करने के लिए और परस्परं भावयन्तु... परस्पर उन्नति का प्रसाद बाँटने के लिए है । तुम देख सको, छू सको, नचा सको, बुला सको ऐसे प्रेमी, प्राणिमात्र के हितैषी परमात्मा का हमें दीदार करानेवाला अवतार कृष्ण-अवतार है ।


नंद घेर आनंद भयो...


नंद कौन हैं ? जीवात्मा नंद है और पवित्र बुद्धि यशोदा । उसके घर आनंद होता है । यशोदा क्या है ? जो हर परिस्थिति में परमात्मा को यश दे : ‘वाह प्रभु ! सुख देकर तुमने उदारता का आनंद जगाया, सेवा का रस जगाया । वाह ! वाह !! संसार की आसक्ति मिटाने के लिए, विवेक जगाने के लिए तथा संयम सिखाने के लिए दुःख और विपरीत अवस्था आयी । तू कैसा है ! अमीर हो चाहे गरीब हो, पठित हो चाहे अपठित हो, बडा हो, छोटा हो, किसी भी मजहब का हो, सभीके जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, यश-अपयश की तानाबुनी करके अपने अमरत्व की तरफ लाता है । वाह प्रभु ! वाह !!' ऐसी बुद्धि का नाम है ‘यशोदा' ।


ऐसी बुद्धि जिसके पास रहती है, ऐसे मनुष्य का नाम है ‘नंद' । आनंद कैसे हुआ ?


हाथी दीन्हे, घोडा दीन्हे और दीन्हे पालकी ।
जय कन्हैयालाल की ।।... 


ये प्रिय वस्तुएँ, जो क्रियाजन्य भोग की सामग्री हैं, वे तो लुटायीं और भाव की तथा ज्ञान की मस्ती, आनंद नंद के घर रहा ।
भगवान क्यों इतनी मुसीबतें मोल लेते हैं ? देवकी के गर्भ में आना, छाछ के लिए नाचना, कंस, धेनुकासुर, बकासुर की इतनी मुसीबतें झेलना !


पी.एम. भी गंदी बस्ती में नहीं जाते, सी.एम. को आदेश कर देते हैं । सी.एम. भी गंदी बस्तियों में और लुच्चे-लफंगों के बीच नहीं जाते हैं,


डी.जी. को कह देते हैं । डी.जी. भी नहीं जाते हैं, आई.जी., डी.आई.जी. को बोल देते हैं । आई.जी., डी.आई.जी. भी नहीं जाते, पी.एस.आई. अथवा अन्य पुलिसवाले निपटा देते हैं । तो क्या भगवान को इतना ख्याल नहीं आया कि मुझे नहीं जाना चाहिए ! कैसे भगवान हैं हिन्दुओं के ! आये तो फिर क्या-क्या करते हैं, घोडागाडी चलाते हैं, द्रौपदी की जूतियाँ उठाते हैं, युधिष्ठिर और भीम आते हैं तो उठकर खडे हो जाते हैं, ऐसा क्यों करते हैं ?


वे परात्पर ब्रह्म जब देवकी के गर्भ में आये तो ब्रह्मा, महेश, देवता, गंधर्व, किन्नर स्तुति करने आये । ब्रह्मा और शिवजी ने स्तुति की कि ‘मन-इन्द्रियों से परे अंतर्यामी और सभीके अंतरात्मा, सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण ऐसे आप आज यहाँ पधारे हैं । कंस, शिशुपाल जैसों को मारने के लिए ही नहीं, बल्कि भक्तों के ऊपर कृपा करने तथा प्रेमियों के प्रेम की अभिवृद्धि करने के लिए आप यह प्रेमावतार लेते रहे हैं ।'


भगवान कृष्ण पाण्डवों के राजसूय यज्ञ में साधुओं की जूठी पत्तलें उठाते हैं, चरण धोते हैं । संध्या को जब युद्ध खत्म होता है तो अन्य लोग आराम करते हैं, संध्या करते हैं लेकिन श्रीकृष्ण घोडों के घावों पर मलहम लगाते हैं, मालिश करते हैं । इस तरह इलाज करते हैं कि घोडे दूसरे दिन काम में आ जायें । चिकित्सक भी ऐसे हैं, कलाकार भी ऐसे हैं लेकिन इतना छोटा काम क्यों करते हैं ?


भगवान का आना और छोटा काम करना, इसीमें भगवान के बडप्पन का दर्शन होता है, इसमें ही ईश्वर का ऐश्वर्य छलकता है । जो छोटा काम करने से कतराता है, उसका बडप्पन लोक-आश्रित है । उसका बडप्पन किसीका दिया हुआ है । भगवान का बडप्पन लोक-आश्रित नहीं है, किसीका दिया हुआ नहीं है । प्रेमियों के प्रेम में भगवान बडप्पन के भाव को सँभाले रखें, प्रेमस्वरूप भगवान की यह ताकत नहीं है । ईश्वर का बडप्पन स्वतंत्र है, कुछ भी छोटा काम करने से जिसके ऐश्वर्य में रत्तीभर भी कमी-वृद्धि नहीं होती, उसीका नाम ईश्वर है ।


बच्चा नाव में से गिर गया तो क्या बाप नौकरों को बुलायेगा, खलासियों को बुलायेगा ? माँ-बाप तुरंत कूद पडेंगे । यह भगवान का औदार्य, प्रेम और लोकमांगल्य की मधुर व्यवस्था है कि वे स्वयं आते हैं ।


ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ।।
(गीता : १३.२४)


भगवान कहते हैं : कुछ लोग ध्यानयोग के द्वारा, कुछ कर्मयोग के द्वारा तो कोई सांख्य (तत्त्वज्ञान) के द्वारा मुझ आत्मा को, परमेश्वर-स्वभाव को पाकर मुक्त हो जाते हैं ।


लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो ध्यान नहीं कर सकते, जिनकी तत्त्वज्ञान में गति नहीं है, कर्म को योग बनाने में रुचि नहीं, शक्ति नहीं है । वे क्या करें ? ‘गीता' के १३वें अध्याय के २५वें श्लोक में कहा है :


अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।


दूसरे मनुष्य इस प्रकार नहीं जानते हैं - ज्ञान, ध्यान, कर्मयोग । केवल जीवन्मुक्त महापुरुषों से सुनकर उपासना करते हैं । ऐसे वे सुनने के परायण मनुष्य भी मृत्यु को तर जाते हैं ।


कोई घर से कुछ लाया, कोई कुछ लाया और यशोदालाल भी कुछ लाया । ग्वाल-गोपों के साथ मिल-मिलाकर खाते हैं । वृद्ध ब्रह्माजी को शंका हुई कि ‘यही ब्रह्म हैं, जो संकल्पमात्र से सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय कर सकते हैं ! वे बछडे चरानेवालों के साथ बैठकर खायें ! शायद कुछ गलती हो रही है । परीक्षा करते हैं ।'


जो गायें और बछडे चर रहे थे, ब्रह्माजी ने उनको अपने बल से ब्रह्मलोक भेज दिया । ग्वाल-बाल बोले : ‘‘गायें कहाँ गयीं ? कन्हैया ! हमारी गायें नहीं हैं, माँ मारेगी ।''


कन्हैया ने देखा, ‘एक-दो नहीं, सब-की-सब गायब !' ध्यान करके देखा कि ‘अरे ! मेरे बारे में शंका का समाधान करने के लिए ब्रह्माजी गायें ब्रह्मलोक ले गये । कोई बात नहीं ।'


फिर ब्रह्माजी ग्वाल-बालों को भी चुराकर ब्रह्मलोक ले गये । ब्रह्माजी ने सोचा कि ‘अब देखें कि जूठन खानेवाले कृष्ण की क्या हालत होती है ! अगर भगवान नहीं हैं तो पुकारेंगे कि हे ब्रह्माजी ! हाय-हाय !! लाज रखो !'


कृष्णजी ने देखा कि जो ग्वाल-बाल गायें खोज रहे थे, वे भी गायब ! एकोऽहं बहु स्याम् । श्रीकृष्ण ने वैसी-की-वैसी गायें, वैसे-के-वैसे ग्वाल प्रकट कर दिये । एक दिन बीता (देवलोक का एक दिन इस जगत के एक वर्ष के समान है) तो ब्रह्माजी ने देखा कि ‘उतने-के-उतने ग्वाल, उतनी-की-उतनी गायें ! मेरे जैसा धोखा खा गया परमात्मा को पहचानने में तो दूसरों की क्या बात है !' फिर ब्रह्माजी ने जो स्तुति की वह भागवत में है ।


श्रीकृष्ण की एक ही दिन में १६,१०० शादियाँ हुर्इं । एक शादी अगर एक दिन में निपटायी जाय तो १६,१०० के लिए ४४ साल से अधिक समय चाहिए । श्रीकृष्ण ने एक दिन में इतनी शादियाँ कैसे कीं ? १६,१०० श्रीकृष्ण बन गये, १६,१०० पुरोहित भी बना दिये ।


ऐसा अवतार, ऐसा भगवान वैदिक संस्कृति के सिवाय, हिन्दू धर्म के सिवाय दूसरी जगह हमने सुना नहीं, देखा नहीं, पढा नहीं है । इसलिए भारतीय संस्कृति मानव के माधुर्य को जगानेवाली संस्कृति है । भारतीय संस्कृति मानव की गरिमा बढानेवाली संस्कृति है । उस संस्कृति की जडें काटकर कोई अपने मजहब का या अपने धर्म का प्रचार करता है तो मानवता के साथ द्रोह करने की गलती करता है । 

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Jap Significance

On the holy eve of Janmastami, Sri Krishna himself incarnated on Night at 12. Janmastami Night , is one of the Mahaaraatris when doing Japa, Dhyan is uncountable times beneficial than on a normal day. Keeping fast on Janmastami is more than thousand times beneficial than Ekadashi fast. A person, who, on this day, worships Lord Krishna washes away his sins, either great or small, or performed in childhood, youth, or maturity, in seven births.

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अहमदाबाद आश्रम में जन्माष्टमी (24 अगस्त)


पूज्य बापूजी का विडियो सत्संगः सुबह ९ से १०

श्री आशारामायणजी का पाठः सुबह १० से १०-३०

श्रीगुरुपादुका पूजनः सुबह १०-३० से ११-३०

दोपहर की संध्याः दोपहर ११-४५ से १२-४५

पूज्य बापूजी का विडियो सत्संगः दोपहर ३ से ४

सामूहिक जपः शाम ४ से ५ 

जप,पाठ, सत्संग व जन्माष्टमी उत्सवः रात्रि ९-३० से १२-३०

(बहनों के लिए महिला आश्रम में)

* एक जन्माष्टमी का व्रत एक हजार एकादशी के बराबर है ।

* भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण)

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