श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य

श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य
Admin
/ Categories: PA-001454-Janmashtmi

श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य

मनुष्य को दुःख तीन बातों से होता है - एक कंस से दुःख होता है, दूसरा काल से और तीसरा अज्ञान से दुःख होता है। मथुरा के लोग कंस से दुःखी थे, यह संसार ही मथुरा है। कंस के दो रूप हैं - एक तो खपे-खपे (और चाहिए, और चाहिए...) में खप जाय और दूसरे का चाहे कुछ भी हो जाय, उधर ध्यान न दे। यह कंस का स्थूल रूप है। दूसरा है कंस का सूक्ष्म रूप - ईश्वर की चीजों में अपनी मालिकी करके अपने अहं की विशेषता मानना कि ‘मैं धनवान हूँ, मैं सत्तावान हूँ...।’ यह अंदर में भाव होता है।


दुसरा है काल का दुःख। यह कलियुग का काल है; इस काल में अमुक-अमुक समय में, अमुक-अमुक वस्तु से, अमुक-अमुक स्थान में व्यक्ति दुःख पाता है। दूषित काल है, प्रदोषकाल है तो उस काल में व्यक्ति पीड़ा पाता है, दुःख पाता है। यह काल का दुःख है कि अभी तो कर लिया लेकिन समय पाकर दुःख होगा। अभी तो निंदा कर ली, सुन ली लेकिन समय पाकर अशांति होगी, दुःख होगा, नरकों में पड़ेंगे, आपस में लड़ेंगे, उपद्रव होगा।


तीसरा होता है अज्ञानजन्य दुःख। अज्ञान क्या है? हम जो हैं उसको हम नहीं जानते और हम जो नहीं हैं उसको हम मैं मानते हैं तो 


अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।


‘अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है उसीसे सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।’ (गीता - 5.15)


कितने बचपन आये, कितनी बार मृत्यु आयी, कितने जन्म आये और गये फिर भी हम हैं... तो हम नित्य हैं, चैतन्य हैं, शाश्वत हैं, अमर हैं। इस बात को न जानना यह अज्ञान है।


तो कंस से, काल से और अज्ञान से छुटकारा - यह है श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य। श्रीकृष्ण कंस को तो मारते हैं, काल से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और ज्ञान से अज्ञान हर के भक्तों को ब्रह्मज्ञान देते हैं। यह श्रीकृष्ण-अवतार है।


तो अब क्या करना है? अपना उद्देश्य बना लें कि हमारे अंतःकरण में श्रीकृष्ण-अवतार हो, भगवदावतार हो, भगवद्ज्ञान का प्रकाश हो, भगवत्सुख का प्रकाश हो तो भगवदाकार वृत्ति पैदा होगी। जैसे घटाकार वृत्ति से घट दिखता है, ऐसे ही भगवदाकार वृत्ति बनेगी, ब्रह्माकार वृत्ति बनेगी तब ब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार होगा। तो भगवद्ज्ञान, भगवत्प्रेम और भगवद्विश्रांति सारे दुःखों को सदा के लिए उखाड़ के रख देगी। इसलिए ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुनना चाहिए, उसका निदिध्यासन करके विश्रांति पानी चाहिए।



Previous Article जीवन में जगे माधुर्य श्रीकृष्ण का
Next Article प्रेमावतार का प्रागट्य – दिवस : जन्माष्टमी
Print
4639 Rate this article:
4.2
Please login or register to post comments.

Articles

RSS

Jap Significance

On the holy eve of Janmastami, Sri Krishna himself incarnated on Night at 12. Janmastami Night , is one of the Mahaaraatris when doing Japa, Dhyan is uncountable times beneficial than on a normal day. Keeping fast on Janmastami is more than thousand times beneficial than Ekadashi fast. A person, who, on this day, worships Lord Krishna washes away his sins, either great or small, or performed in childhood, youth, or maturity, in seven births.

------------------------------

अहमदाबाद आश्रम में जन्माष्टमी (24 अगस्त)


पूज्य बापूजी का विडियो सत्संगः सुबह ९ से १०

श्री आशारामायणजी का पाठः सुबह १० से १०-३०

श्रीगुरुपादुका पूजनः सुबह १०-३० से ११-३०

दोपहर की संध्याः दोपहर ११-४५ से १२-४५

पूज्य बापूजी का विडियो सत्संगः दोपहर ३ से ४

सामूहिक जपः शाम ४ से ५ 

जप,पाठ, सत्संग व जन्माष्टमी उत्सवः रात्रि ९-३० से १२-३०

(बहनों के लिए महिला आश्रम में)

* एक जन्माष्टमी का व्रत एक हजार एकादशी के बराबर है ।

* भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण)

Videos


Audios