"Aasoj-Sud Dwitiya Samvat Beees Ikkees" was the blessed day when, by assimilating the Gyan of His Guru, Pujya Sant Shri Asaramji Bapu became one with the Supreme; transcended the carnal world to enter into the realm of the Eternal, infinite Brahman.


Across the world, His disciples celebrate this day by organizing Daridranarayan SevaHealth CareKirtan-Yatras, Bhandars, Satsang and much more...

आत्मसाक्षात्कार दिवस जैसा पावन अवसर हमें यह सीख देता है कि ‘बुद्धिमान पुरुष जीवन के अमूल्य समय को अमूल्य कार्यों में ही लगाते हैं और अमूल्य कार्य भी उसीको समझना चाहिए जिससे अमूल्य वस्तु की प्राप्ति हो| और वह अमूल्य उपलब्धि है – आत्मसाक्षात्कार| ऐसी सर्वोत्तम उपलब्धि को पानेवाले बापूजी जैसे प्रकट महापुरुष का अनुसरण करके मानवमात्र अपना मंगल कर सकता है| प्राणिमात्र के परम हितैषी पूज्य बापूजी के सभी साधक इस साक्षात्कार दिवस पर भजन-कीर्तन, सत्संग व गरीबों की सेवा करके अपने सद्गुरु का आत्मसाक्षात्कार दिवस मनाकर मावनमात्र को ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय का मंगलमय संदेश से लाभान्वित करें|

ब्रह्मनिष्ठ पूज्य बापूजी के ‘आत्मसाक्षात्कार-दिवसकी आप सभीको हार्दिक बधाइयाँ !

In this world there might be around 1.5 crore people celebrating birthday daily, about 1 lakh people’s marriage anniversary, may be many politicians take oath on that day, there might be a dozen devotees who might have seen god on the same day but Atma Sakshatkar day (divas) is seen very rarely. Hence, O Mankind! You also make your aim to attain Atma Sakshatkar (Self Realization). It is not at all difficult, just need to aspire it deeply and be determined.     - Pujya Bapuji



ऐसा वैभव है आत्मदेव का ! - पूज्य बापूजी

ऐसा वैभव है आत्मदेव का ! - पूज्य बापूजी

(पूज्य बापूजी का 55वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवस : 10 अक्टूबर)

यह प्रपंच मिथ्या है । प्रपंच क्यों बोलते हैं ? जैसे भेल-पूड़ी में सब एकत्र कर देते हैं न, ऐसे पाँच भूतों का आधा-आधा हिस्सा तो अलग रहा, बाकी आधा हिस्सा मिश्रित किया । उसीसे प्रपंच बना । जल में भी पृथ्वी के कण मिल जायेंगे, वायु में भी मिल जायेंगे, आकाश में भी मिल जायेंगे । और पृथ्वी में भी आकाश, वायु सब घुसा हुआ है । पाँचों के मिश्रण से 25 हो गये ।

मिथ्या परपंच देखि दुख जिन आनि जिय ।

देवन को देव तू तो सब सुखरासी है ।।

(विचारसागर : 6.12)

प्रपंच को मिथ्या देखकर दुःख मत आने दे दिल में । ‘यह देवता है कि नहीं’ इसको प्रमाणपत्र देनेवाला तू है । भगवान का भगवान-पना भी सिद्ध तेरे से होता है । तू भगवान का भी भगवान है, गुरु का भी गुरु है, ऐसा तेरा आत्मा है । यह गुरु का ज्ञान जितना पच जाय उतना ही नम्र हो जायेगा, उतना ही गुरु का प्रिय बन जायेगा ।

आपनै अज्ञान तैं जगत सब तू ही रचै ।

अपने-आपका (आत्मा का) ज्ञान नहीं है न ! जैसे रात को नींद में अपने-आपको भूल जाते हैं और स्वप्न का जगत बना लेते हैं और उसीमें सिकुड़ते हैं : ‘हे साहब ! हे फलाने साहब !...’ आँख खोलोगे तो सब गायब हो जायेंगे । जो बड़े-बड़े खूँखार हैं, बड़ी-बड़ी हस्तियाँ हैं सपनेवाली, तुम्हारे ही अज्ञान से उनका रुतबा है । तुम आँख खोल दो तो उनका रुतबा पूरा हो जायेगा । ऐसे ही जगत में तुम अपनी ज्ञान  की आँख  खोलो तो रुतबा पूरा हो जाय सबका । ऐसा है वह तुम्हारा आत्मदेव !

‘इधर जाऊँ, उधर जाऊँ, उधर जाऊँ...’ ऐसा जो सोचेगा वह भटकेगा इस जगतरूपी सपने में ।

आपनै अज्ञान तैं जगत सब तू ही रचै ।

सर्व को संहार करैं आप अविनाशी है ।।

(विचारसागर : 6.12)

आत्मा माने ऐसी कोई चीज नहीं, जहाँ से ‘मैं, मैं’ स्फुरित होता है वही अपना चैतन्य ! उस आत्मदेव में निःशंक होकर समझ में आ जाय (उसे जान ले) । उसके लिए मेहनत नहीं है; मेहनत का विभाग अलग है, वह तपस्या विभाग है ।

दो विभाग - तपस्या और उपासना

एक होता है तपस्या विभाग; उसमें कठिनाई सहने से सिद्धि, शक्ति आती है । दूसरा होता है उपासना विभाग; इष्टदेव में प्रीति, गुरुदेव में प्रीति - यह उपासना है । ‘उप’ माने समीप... इष्ट और सद्गुरु के समीप आने की यह रीत है ।

कर्म-विभाग से वासनाएँ नियंत्रित होती हैं । गलत जगह जा के सुखी होने की आदत पर नियंत्रण करती है उपासना, धर्म । तो एक है मनमुखी कर्म, जैसा मन में आये ऐसा करो... तो वह तो और गिर रहा है गड्ढे में । अच्छे कर्म से हृदय पवित्र होता है और पवित्र हृदय में संकल्पबल आता है । कष्ट सहने से अंतःकरण की शुद्धि होती है । पीडोद्भवति सिद्धयः । पीड़ा सहने से सिद्धि प्राप्त होती है ।

उपासना में एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है, जिससे बल आ जाता है । इष्ट के, गुरु के सिद्धांत के समीप हो जाते हैं । इष्ट के लोक में भी जा सकते हैं मरने के बाद । उपासना में इतनी ताकत है कि कोई इष्टदेव है, उसका लोक है तो ठीक, और नहीं भी है तो आपकी उपासना से आपके लिए बन जायेगा । सपने में बन जाता है न सब, ऐसे ही तुम्हारे लिए इष्टलोक बन जायेगा ।

इतना आसान है आत्मसाक्षात्कार !

सारे देवताओं का, सारे उपास्यों का, उपासकों का मूल तत्त्व अपना आत्मदेव है । तपस्या, धर्म-परायणता अंतःकरण को शुद्ध करती है । उपासना अंतःकरण को एकाग्र करती है । जितना उसे एकाग्र करते हैं, उतनी शक्तियाँ भी आती हैं । कोई सोने की लंका भी पा सकता है उपासना के बल से । लेकिन मूल तत्त्व जो है सृष्टि का, इष्टदेवता का... अपना मूल तत्त्व... उसका साक्षात्कार नहीं हुआ तो देर-सवेर सब नीचे आ जाते हैं । जैसे कमाई हुई और खर्च हो गया । घाटा हुआ और फिर नफा हुआ तब भर गया । ऐसे ऊपर-नीचे चौदह लोकों में लोग घूमते रहते हैं... उत्थान-पतन, उत्थान-पतन के चक्र में घूमते रहते हैं । तो अब उत्थान-पतन नहीं करना है, जन्म-मरण के चक्र में नहीं आना है ।

जो इष्टदेव की पूजा-अर्चना करता है उसको गुरुदेव मिलते हैं और गुरुदेव भी कई किस्म के होते हैं । उनमें भी तत्त्ववेत्ता, आत्मसाक्षात्कारी गुरु बड़े दुर्लभ होते हैं । वे मिल जायें तो वे संस्कार डालते हैं कि ‘भाई ! तुम आत्मतत्त्व हो ।’ जब तक तत्त्ववेत्ता गुरु नहीं मिले थे तब तक हमको भी पता नहीं था आत्मसाक्षात्कार क्या होता है, तुमको भी पता नहीं था; किसीको भी पता नहीं था ।

तो सृष्टि के मूल तत्त्व का अनुभव करना तो बड़ा आसान है । कर्मी कर्म कर-करके थक जाय, उपासक उपासना कर-करके कई जन्म बिता दे... लेकिन यह तत्त्वज्ञान, आत्मसाक्षात्कार तो एक हफ्ते में भी हो जाय, इतना आसान भी है ! राजा परीक्षित को एक हफ्ते में हो गया था । उन्हें शुकदेवजी का उपदेश मिला और कैसी तड़प थी कि अन्न-जल छोड़कर सत्संग में ही बैठे रहते, खाने-पीने का भी खयाल नहीं रहता था क्योंकि मौत सामने है । एक शब्द भी सत्संग का चूकते नहीं थे । आखिर में गुरु ने कहा : ‘वह (आत्मा-परमात्मा) तू ही है ।’ और उन्हें आत्मसाक्षात्कार हो गया । बहुत ऊँची चीज है । इसकी ऊँचाई के आगे कुछ भी नहीं है ।

कभी न छूटे पिंड दुःखों से

जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं ।

आत्मा का स्वरूप क्या है ?

आत्मा किसको बोलते हैं ? जहाँ से ‘मैं’ स्फुरित होता है । सभीके हृदय में ‘मैं’, ‘मैं’ होता है । तो इतना व्यापक है यह... यह तो अपने चमड़े के अंदर बोलते हैं इधर-इधर, बाकी केवल इधर नहीं है, सर्वत्र वही है... वृक्षों में यही आत्मदेव रस खींचने की सत्ता देता है । यह जो पक्षियों का किल्लोल हो रहा है, यह भी आत्मा की सत्ता से हो रहा है । इन पेड़-पौधों, पत्थरों में भी वही आत्मचेतना है किंतु उनमें सुषुप्त है । सारा जगत उस आत्मा का ही विवर्त1 है । जैसे सागर की एक भी तरंग सागर से अलग नहीं है, ऐसे ही सृष्टि का एक कण भी आत्मा से अलग नहीं है ।

एक बार उस आत्मा-परमात्मा को जान लो, उसमें 3 मिनट बैठ जाओ, टिक जाओ, गुरु की कृपा से आत्मसाक्षात्कार हो जाय केवल 3 मिनट के लिए तो पार हो गये... फिर गर्भवास नहीं होता, जन्म-मरण नहीं होता ।

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1. वस्तु में अपने मूल स्वभाव को छोड़े बिना ही अन्य वस्तु की प्रतीति होना यह ‘विवर्त’ है । सीपी में चाँदी दिखना, रस्सी में साँप दिखना विवर्त है ।

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Such is the majesty of Self-God  – Pujya Bapuji

(10th October: Pujya Bapuji’s 55th Self-realization Day)

This prapancha (world appearance) is unreal. Why is it called prapancha? Just as all constituents are mixed in Bhel puri (a type of mixed snack), similarly half of each of the elementary constituents of the universe (the five elements) remained un-quintuplicated and half were quintuplicated. That created the physical universe (Prapancha). Particles of earth are found even in water, even in
the air and even in space. And earth (matter) also contains space, air, etc. The five elements compounded with one another
to form 25 entities.

मिथ्या परपंच देखि दुख जिन आनि जिय ।

देवन को देव तू तो सब सुखरासी है ।।

“Looking at the unreal world, why bring misery on your Self, You are the Deva of Devas, and a mass of felicity.”

(Vicharsagar: 6.12)

Look at the unreal world and do not bring misery in your Self. “Is this Deva or not?” You are the one who certifies Him. Even the divinity of God is established by you. You are the God of the God, the Guru of the Guru, such is your Atman. As much as you digest this knowledge imparted by the Guru, you become that much humble and dearer to Him.

आपनै अज्ञान तैं जगत सब तू ही रचै ।

“With your ignorance, you create the world…”

You don’t have the knowledge of your own Self (Atman)! Just like in the night while in deep sleep we forget about ourselves and create a dream world, and shrink back in fear, “Hello Sir! Hey Policeman! Hey so and so Sir!...”, and all of them disappear on waking up. All those big guns, eminent persons seen in the dream have their eminence because of your ignorance. If you open your eyes, then their eminence will vanish. Similarly, in this world, if you open your eye of knowledge, then the eminence of all will vanish. Such is your Atman! One who thinks about going from place to place, will wander in this world, which is like a dream.

आपनै अज्ञान तैं जगत सब तू ही रचै ।

सर्व को संहार करैं आप अविनाशी है ।।

“With your ignorance, you create the world; destroy them all and be eternal yourself.”                   (Vicharsagar: 6.12)

Atman is not anything other than Consciousness from which the “I” arises! Realize that Atman, without any doubt. It requires no effort. The discipline that needs effort is different. It is the discipline of penance.

Two paths – Penance and Upasana (Worship)

One is the path of penance in which one attains siddhi and powers by bearing hardships. The other is the path of upasana. Love for your Ishta (presiding deity), Love for Guru is the path of upasana. “Upa” means near. This is the way to get close to the Guru or the Ishta.

In the path of karma yoga, desires are checked. Upasana and Dharma, check the habit of going to wrong places to get pleasure. One is Manmukhi karma, obeying the dictates of one’s mind. Such a person is doomed to greater downfall. With good actions, the heart becomes pure and pure hearts develop strong will power. Your desires will be materialized. On bearing hardships, the subtle body gets purified. पीडोद्भवति सिद्धयः By bearing hardships, siddhi is attained.”

In upasana, one practices concentration and thereby attains power. One comes very close to the established doctrine of Guru or God. One may go to the world of the Ishta, after death. Upasana is so powerful that if there is a world of your presiding deity; that is fine, if not by the strength of your upasana a new world will be created for you. Just like everything is created in the dream, similarly the world of your presiding deity will be created for you.

Self-Realization is so easy

The ultimate Truth (essence) of all the devas, objects of worship and upasakas (worshippers) is our Self-God. Penance and life devoted to righteousness purifies the internal organ (mind). Upasana develops concentration of mind. As much one concentrates the mind, that much power one attains. One may attain the golden city of Lanka, with the power of upasana. But if one does not realize the ultimate Truth of the Creation, the presiding deity, and oneself, then sooner or later one falls down. Just like earning and spending. Like one incurred loss and then balanced it with profit. This way, people (jivas) keep wandering in the fourteen worlds up and down, rising and falling in the wheel of birth and death. So now we do not have to rise and fall. We do not have to continue moving in the cycle of birth and death.

One who worships his presiding deity gets Gurudev and there are different types of Gurudev too. Among them one who has realized the Truth through Self-realization, such Gurus are very rare to find. If such a Guru is found, he will inculcate the sanskara that, “Brother! You are the Atman, the Truth”. Until I met a Self-realized Guru, even I did not know what is Self-Realization; you also didn’t know, no one knows.

So, to have realization of the ultimate Truth of the Creation is very easy. The man of rituals may get tired of performing rituals, a devotee may spend several lives in devotion, but realization of Truth, Self-realization can happen even in one week, it is that easy! King Parikshita attained it in one week. He received the teachings from Shukdevji. He had such a deep yearning that forgoing food and water, he would sit in the satsang only. He didn’t have thoughts of eating or drinking as death was very close to him. He did not miss even a single word of satsang. In the end Guru said: “Thou art That, Supreme Self ”, and he attained Self-realization. It is a very lofty goal. No other thing can be compared with it.

कभी न छूटे पिंड दुःखों से

जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं ।

“He who considers unreal to be real, is doomed and is never free from suffering.”

What is the nature of Self?

What is meant by Atman? From where this “I” arises. In everyone’s heart there is this, “I, I”. This is so vast. We say this “I, I” pointing to the body, but it is not only there, it is everywhere. This Self-God alone gives the energy to absorb the sap to the trees. The cuckoo’s calling is happening with the power of Atman. The same Consciousness Atman is in these trees, plants and stones, but in the dormant state. The whole world is just a vivarta1 of Atman. Even a single wave of ocean is not separate from the ocean. In the same way not a single particle of the universe is different from the Atman.

Once you realize the Atman as the Supreme Self, abide in That for 3 minutes, stay in That, attain Self-realization with the grace of Guru just for three minutes you have crossed the ocean of birth and death forever. Then you will not have to live as a fetus in mother’s womb, you will be free from the cycle of birth and death.

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1. When the original reality remains what it is and an apparent change seems to occur - it is called Vivarta. Silver in the nacre, and snake in the rope are examples of Vivarta.


[Rishi Prasad-Issue309-September 2018]

 

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इस पावन अवसर पर सभी समितियाँ एवं साधकअपने-अपने क्षेत्र में सेवाकार्यों को और भी व्यापक रुप से करें । इस पावन दिवस के उपलक्ष्य में सेवाकार्य करने हेतु कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार है ।

1)  सामूहिक जप व हवन :-सामूहिक मंत्रजप व संकल्प में बहुत बल होता है ।  अतः पूज्य बापूजी के आत्मसाक्षात्कार दिवस पर श्री आशारामायण पाठ और भजन, किर्तन के साथ-साथ पूज्य बापूजी के स्वास्थ्य,दीर्घायु एवं शीघ्र रिहाई हेतु सामूहिक मंत्रजप, प्रार्थना व हवन करें । हवन करने हेतु हवन की विधी संलग्न है ।

2)   संकिर्तन यात्रा व प्रभातफेरी का आयोजन :- पूज्य बापूजी के आत्मसाक्षात्कार    दिवस पर सभी समितियाँ तन तंदुरुस्त,मन प्रसन्न और वातावरण को पवित्र करनेवाली संकिर्तन यात्रा व प्रभातफेरी का अपने-अपने क्षेत्र में आयोजन जरुर करें, जिसमें सुप्रचार का साहित्य का वितरण करें । संकीर्तन यात्रा के लिए बैनर, तख्ती छपवाएँ ।

3)  साक्षात्कार दिवस निमित्त निकाली गयी संकीर्तन यात्रा हेतु समाचार पत्रों में देने के लिए प्रेस विज्ञाप्ति संलग्न हैं एवं समाचार पत्रों में छपवाने हेतु आर्टिकल भी संलग्न है.

4)  पूज्यश्री के साक्षात्कार दिवस पर यथासंभव अन्य सेवायें जैसे गरीबों में भंडारा,अनाज विरतण, अस्पताल में फल वितरण आदि भी कर सकते हैं ।

5)   जो भी सेवाकार्य हो रहे है उन सेवाकार्यों के फोटोज,वीडियो, अखबारों की कटींग, samitiseva@gmail.com पर जरुर भेजें ।

ब्रह्मनिष्ठ पूज्य बापूजी के‘आत्मसाक्षात्कार-दिवस’ की आप सभीको हार्दिक बधाइयाँ !

आत्मसाक्षात्कार दिवस निमित्त पाम्पलेट, फ्लैक्स, प्रेसनोट, संकीर्तन यात्रा, भंडारा सेवा हेतु बैनर एवं अन्य प्रचार सामग्री भी उपलब्ध है ।

नीचे दी गयी लिकं पर क्लीक करके प्रचार सामग्री डाउनलोड कर सकते है।
https://drive.google.com/drive/folders/0B5itJHYy-0tMU0tYVTlYd0s3Rlk?usp=sharing