मन्त्र रक्षा एवं स्थान भेद

आप गुरु प्रसाद की सुरक्षा करते हैं? यह बात है इष्ट मन्त्र विषयक, इष्ट मंत्र के जप और प्रभाव विषयक । इष्ट मंत्र सदा गोपनीय है । इसे गुप्त रखना चाहिए । इष्ट मंत्र के रहस्य का पता इष्ट के सिवाय और किसी को नहीं होना चाहिए 


एक दंतकथा हैः

एक बार एक व्यक्ति भगवान के पास गया । भगवान का द्वार बन्द था । खटखटाने पर भगवान ने कहाः "प्रिय ! तुम आये हो, लेकिन मेरे लिए कोई ऐसी चीज लाये हो जो किसी की जूठी न हो?"

उसने कहाः 'मेरे पास एक मंत्र था लेकिन मैं उसे गुप्त नहीं रख पाया हूँ । मैंने उसे अखबारों में छपवा दिया है '

भगवान ने कहाः "तो अभी लौट जाओ । दुबारा जब आना हो तो मेरे लिए कोई भी ऐसी चीज ले आना जिस पर किसी की दृष्टि न पड़ी हो और किसी की जूठी न हो "

इस दंतकथा से समझना है कि अपना इष्ट मंत्र बिल्कुल गुप्त, दूसरों से नितान्त गोपनीय रखना चाहिए । मंत्र गुप्त होगा तभी वह अपना भाव, प्रभाव, मूल्य प्रकाशित करेगा । संतों ने कहा है कि मंत्र अंतर्मुख होता है। 'जो अंतर में रहे सो मंतर' तथा 'जिससे मन तर जाय सो मंतर'

 

जप तीन प्रकार से होता हैः

  1. वाचिकः मुँह से बोलकर, आवाज करके किया जाता है 
  2. उपांशुः जिसमें आवाज नहीं आती, सिर्फ ओंठ फड़कते-से दिखते हैं। वाचिक जप से उपांशु जप का फल सौगुना विशेष है 
  3. मानसिकः इसमें न आवाज होती है न ओंठ फड़कते हैं। जप मन ही मन होता है। मानसिक जप का फल सहस्र गुना अधिक है 

 

मंत्रजप के स्थान-भेद से भी फल-भेद होता है। अपने घर में जप करने की अपेक्षा गौशाला में (जिसमें बैल न हों), तुलसी, पीपल(अश्वत्थ) के वृक्ष के नीचे सौ गुना, नदी, सागर, संगम में सहस्र गुना, देवालय, शिवालय, मठ, आश्रम में जहाँ शास्त्रोक्त क्रिया, साधना, अध्ययन आदि होता हो वहाँ लाख गुना और संत-महात्मा-सत्पुरुष के समक्ष जप करना अनंतगुना फलदायी होता है । ये संत-महात्मा-सत्पुरुषयदि अपने सदगुरुदेव हों तो सोने में सुहागा है 

जप करने का मतलब केवल माला के मनके घुमाना ही नहीं है । जप करते समय मंत्र के अर्थ में, मंत्र के अर्थ में, मंत्र के भाव में डूबा रहने का अभ्यास करना चाहिए 

विशेष ध्यान रहे कि जप करते समय मेरूदण्ड को सीधा रखें । झुककर मत बैठो । जिह्वा को तालू में लगाकर मानसिक जप करने से अनुपम लाभ होता है 

 

जप करने वाले जापक के तीन प्रकार हैं-

  1. कनिष्ठ जापक वे हैं जो नियम से एक बार जप कर लेते हैं 
  2. मध्यम जापक वे हैं जो बार-बार अपने इष्ट की स्मृति रखते हुए जप करते हैं 
  3. उत्तम जापक वे हैं जिनके पास जाने से ही सामान्य व्यक्ति के जप भी चालू हो जाये 

 

साधक को उत्तरोत्तर श्रेष्ठ अवस्था की सम्प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए 

४ प्रकार के जप - वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति , परा

भगवान के नाम जप में तो भगवान की शक्ति काम विशेष  करती है करने वाले की शक्ति तो जो होती है उतनी ही 
होती है लेकिन भगवान के नाम में भगवतीय शक्ति जुड जाती है । 

नाम प्रसाद शम्भू अविनाशी साज अमंगल मंगल राशि ।

शिवजी के गहने गाठे तो अमंगल रुप हैं, बागम्बर है मुण्डों की माला है शमशान की राख है सांप है ये सब साज तो 
 अमंगल रुप हैं फिर भी शिवजी मंगल मूर्ति हैं । शिवजी का नाम सुमिरन करके शिवरात्री का थोडा जागरण कर 
उपवास करता है तो उसको तो अनंत गुणा फल हो जाता है क्योंकि शिवजी जानते हैं नाम की महिमा
नाम प्रसाद शम्भू अविनाशी साज अमंगल मंगल राशि ।
ये नाम की कमाई तो शुरु-२ में बाहर होंठो से जपते, आप हम सुने ऐसे जोर से जपते उसको बोलते हैं वैखिरी , वैखिरी  
जप करते-२ फिर थोडे समय में मध्यमा जप होता है अर्थात दूसरा नहीं सुने लेकिन अपने होंठ और जीभा हिलती रहे , 
कंठ आदि में होत है उसको मध्यमा बोलते हैं । फिर और गहरे में जाते हैं तो पशयन्ति उसका प्रभाव और ज्यादा होता 
है लेकिन बहुत उँचे साधक उस गहरे में जाते हैं और उससे भी गहरा अभ्यास हो जाता है तो ऐसे चुप बैठे मारा मन नाम 
के अर्थ में चला गया रुक गया चित्त इसको बोलते हैं परा । जब हुई नाम कमाई परा पहुंचे तो परमात्मा की एकतांता हो 
जाती है आत्मा परमात्मा की, इसको बोलते हैं मदभक्ति लभते परा मेरी भक्ति परा भक्ति प्राप्त हो जाती है जैसे हरि 
ओम हरि ओम ,राम राम , शिव ओम नमो जो भी है दुसरा सुने और अपन भी सुन सकें उसको बोलते हैं वैखरी कि 
दुसरा ना सुने और अपन जप-तप कर रहें हैं समझ ले दुसरा उसको बोलते हैं मध्यमा, उसकी गहराई में कंठ आदि में 
चले अथवा ह्रदय में उसको बोलते है पशयन्ति और अभ्यास बढ जाये तो फिर ऊपर आओ मंत्र के अर्थ में चित्त बार-२ 
एकाकार हो उसको बोलते हैं परा तो वैखरी, मध्यमा, पशयन्ति, परा जाप होता है ।

अजपा गायत्री Ajapa Gayatri

तो कबीर जी ने बोला कि सुमिरन
ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट खरा निशानाक्या है जहां से मन को बुद्धि को इन्द्रियों को सत्ता-स्फुर्ति मिलती है  उस 
चैतन्य में स्थिति हो जाये ये खरा निशाना है 
सुमिरन ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट । मन ईश्वर में लीन हो हले ना जीभा होंठ 
जीभ भी नहीं हिलती, होंठ भी नहीं हिलते और ऐसे जप में पहुंचने के लिये एक उत्तम साधन बताते हैं माला श्वसो 
श्वास की श्वास अन्दर गया ओम बाहर आया तो गिनती श्वास अन्दर गया राम बाहर आया तो २ श्वास अन्दर या 
शान्ति ऐसे ही श्वासो-श्वास की गिनती होती रहे पचास साठ सत्तर सौ तक , गलती ना हो गलती हो तो फिर से करें
। ऐसा अभ्यास करने वाले का जल्दी हले ना जीभा होंठ ऐसे मंत्र-जप में पहुंच जायेगा । जल्दी मतलब ऐसा नहीं कि 
मतलब दो दिन में या दो हफ्ता में दुसरे कोई बारह साल में करें बारह महीने में उससे भी आगे निकल जाये , जभी 
मौका मिले श्वासो-श्वास की माला  फिर आपको तकलीफें छू नहीं सकती दुसरों को लगे कि ये बैठी है बैठा है लेकिन 
आपकी यात्रा अंदर से चलती है ये आप ही जानते हैं भगवान जानते हैं अभी मैं कुछ नहीं कर रहा हूं बैठ रहा हूं लो, 
ध्यान में तो आंखें बंद करो एक जगह देखो या खाली श्वास पर नजर रखो एक जगह देखने का भी आग्रह नहीं है आंख 
बंद करने का भी आग्रह नहीं है किसी को पता ही ना चले कि इसके साथ ध्यान चल रहा है माला श्वासो-श्वास की 
जगत​-भगत के बीच जो फेरे सो गुरुमुखी ना फेरे सो नीच । जो छोटी मत्ति के हैं अथवा जो छोटा साधन करते हैं उनको 
ये पता ही नहीं चलता कि कैसा खजाना है अथवा जिनके छोटे गुरु हैं स्वर्ग तक की यात्रा वाले , ब्रह्मज्ञानी गुरु करे 
सब​, एक दम पहुंचे हुये गुरु की ये साधना पद्धति सत्पात्र शिष्य को फलीभुत हो जाती है । अंगुठा बाहर ऐसे बैठना 
है जैसे घडी का लोलक नहीं हिलता है काँटा वो घडियाल जो दीवाल की घडी होती है पहले के जमाने में लोलक  नहीं 
हिलता है ऐसे, ऐसे दायें-बायें । जो श्वासो-श्वास का कर लेते हैं तो अच्छा है समझो श्वासो-श्वास में मन नहीं लगता तो 
दायें गया तो ओम एक आनन्द दो शान्ति तीन माधुर्य चार गुरू जी पांच ओम छः ये सभी लोग कर सकते हैं दायें गया 
तो नाम बायें गया तो गिनती करो जरा पच्चीस की गिनती का आनन्द लो ।सुनने के लिये सुनना है जिससे सुना जाता 
है उस परमेश्वर में शांति, आनन्द और अपनत्व पाना है ऐसा हो जाये ऐसा मिल जाये ऐसा करुं वैसा करुं कोई इच्छा 
छोडो जो है ठीक है बढिया है इधर जाऊं बढिया है ऊधर जाऊं जो जहां है अगर वहां संतुष्ट सुखी नहीं है तो स्वर्ग में भी 
नहीं रहेगा , अभी अभ्यास हो गया चालू रखो मेरे को अब जाना है।

Mantra Shakti Ki 10 Baaten (मंत्र शक्ति की १० बातें )

मंत्र शक्ति की १० बातों का ख्याल रखने वाला , मंत्र की अदभुत शक्तियों का अनुभव कर सकता है …

१) दृढ इच्छा शक्ति

२) अडिग आस्था

३) एकांतवास

४) उपवास

५) सादा ओर पवित्र वस्त्र

६) सादा रहन — सहन

७) मौन

८) सतत भगवद चिंतन और मानसिक जप

९) विकारों से बचें

१०) कहीं राग न रहे , तन्मय होके जप करें

Mantra VCDs

3 प्रकार के उच्चारण - 3 ways of chanting


सत्संग के समय सावधानी

How to do Japa using fingers - Kar mala - कर माला जप विधि

Way to Chant [Jap Vidhi] जप करने की विधि

Jap mala ki suraksa

How to do Ajapa Jap & mental chanting


contains English Subtitles

Errors in Mantra recitation - मंत्र जप में दोष एवं उनका निवारण 1

MALA KARNE KI ICHHA NAHI HOTI, KYA KARU?

Jap Mala and Its Importance

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Japa mala ki pujan vidhi aur mahattav

Mala ghumane kī sastriya vidhi