परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू मंत्रदीक्षा के समय विद्यार्थियों को सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा देते हैं । सारस्वत्य मंत्र के जप से बुद्धि कुशाग्र बनती है और विद्यार्थी मेधावी होता है । दीक्षा के समय सिखायी जानेवाली यौगिक युक्तियों से फेफडे व हृदय मजबूत बनते हैं, रोगप्रतिकारक शक्ति व धारणाशक्ति बढती है। ऐसे अनेक-अनेक फायदे होते हैं । वीरेन्द्र मेहता नामक एक सामान्य विद्यार्थी ने ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरीङ्क के ८० हजार शब्द पृष्ठसंख्या सहित याद कर एक महान विश्वविक्रम दर्ज किया है । तांशु नामक ५ साल के छोटे-से बच्चे ने दिल्ली की जोखिम भरी सडकों पर १० कि.मी. कार चलाकर अपने छोटे भाई की जान बचायी । उसे राष्ट्रपति एवं अन्य अनेक मान्यवरों द्वारा सम्मानित किया गया । हाल ही में पंजाब के एक विद्यार्थी विनय शर्मा ने ‘कौन बनेगा करोडपति शो में २५ लाख रुपये जीते । ऐसे तो लाखों विद्यार्थी हैं जिन्होंने पूज्य बापूजी से सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा पाकर अपना भविष्य उज्ज्वल बनाया है ।


‘‘मंत्र ऐसा साधन है कि हमारे भीतर सोयी हुई चेतना को वह जगा देता है, हमारी महानता को प्रकट कर देता है, हमारी सुषुप्त शक्तियों को विकसित कर देता है । सद्गुरु से प्राप्त मंत्र का ठीक प्रकार से, विधि व अर्थसहित, प्रेमपूर्ण हृदय से जप किया जाय तो क्या नहीं हो सकता !

Regular and sincere jap of Saraswatya mantra leads to the development of the intellect and memory power beyond our imagination. The elevated lives of great many students initiated by Pujya Bapuji in the Saraswatya mantra bear a testimony to this.




- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू 

 saraswati mantra

If a student wants to make his life brilliant, vibrant and divine and to emerge out victorious in all fronts of life, he must observe an Anushthana of Saraswatya mantra. The procedure for the Anushthana is as follows:

  • The Anushthana of Saraswatya mantra is to be completed in seven days.
  • 170 rounds of mala are to be done each day.
  • One should wear only white clothes during these seven days.
  • One should take a saltless diet during the Anushthana. Khir prepared from milk and rice is recommended.
  • One should worship goddess Saraswati with white flowers before beginning the jap of the mantra. The Bhog offered to Goddess Saraswati should also be Kheer.
  • One should pray to Maa Saraswati for a pure and sharp intellect.
  • One should sleep on the ground on a mat or a blanket and observe Mauna as much as possible.
  • Jap done on a mala of crystal beads is all the more beneficial.

Other rules regarding place, sleeping, purity, etc. are common to an Anushthana of other mantras. A detailed account of the guidelines and precautions for an Anushthana of mantras is given in the Hindi books Mantra-Jap Mahima evam Anushthana Vidhi and Ishtasiddhi published by the Ashram.

यदि विद्यार्थी अपने जीवन को तेजस्वी-ओजस्वी, दिव्य एवं हर क्षेत्र में सफल बनाना चाहे तो सदगुरु से प्राप्त सारस्वत्य मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करे।

1. सारस्वत्य मंत्र का अनुष्ठान सात दिन का होता है।

2. इसमें प्रतिदिन 170 माला करने का विधान है।

3. सात दिन तक केवल श्वेत वस्त्र ही पहनने चाहिए।

4. सात दिन तक भोजन भी बिना नमक का करना चाहिए। दूध चावल की खीर बनाकर खाना चाहिए।

5.श्वेत पुष्पों से सरस्वती देवी की पूजा करने के बाद जप करो। देवी को भोग भी खीर का ही लगाओ।

6.माँ सरस्वती से शुद्ध बुद्धि के लिए प्रार्थना करो।

7.स्फटिक के मोतियों की माला से जप करना ज़्यादा लाभदायी है।

8.         बाकी के स्थान, शयन, पवित्रता आदि के नियम मंत्रानुष्ठान जैसे ही हैं।

 

ओजस्वी-तेजस्वी व महान बनने के लिए विद्यार्थी-जीवन में आठ सदगुण आने ही चाहिए-

शांत स्वभावः शांत रहना सीखो मेरे बच्चे ! ૐઽઽઽ….. उच्चारण किया और जितनी देर उच्चारण किया उतनी देर शांत हो गये। ऐसा 10 से 15 मिनट ध्यान करें। शांत रहने से याददाश्त, सामर्थ्य बढ़ेंगे और दूसरे भी कई लाभ होंगे।

इन्द्रिय-संयमः कौन कितनी ज्यादा देर चुप रह सकता है ? कौन कितनी देर अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित कर सकता है ? – ऐसे अपनी इन्द्रियों पर अपना प्रभाव जमाओ। जो जितना संयमी होता है, उसका जीवन उतना ही अधिक सफल होता है।

निर्दोष व्यवहारः माँ-बाप से झूठ बोलना, लड़ना-झगड़ना आदि दोष जिनमें हैं – उनके दोष अपने में न आयें और उनके भी दोष निकलें, ऐसा अपना निर्दोष व्यवहार रखें। अपनी खुशी से दूसरे के गम हरो। अपनी सूझबूझ से दूसरे की बेवकूफी दूर करो बापू के बच्चे ! 

सदाचारः झूठ-कपट, पलायनवादिता, कपटाचार अपना बहुत नुकसान करते हैं। जिसके जीवन में संयम है, सदाचार है वह विद्यार्थी जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता है। 

ब्रह्मचर्यः ʹदिव्य प्रेरणा प्रकाशʹ पुस्तक पढ़ना। ब्रह्मचर्य का गुण विद्यार्थी-जीवन में होना ही चाहिए। यह बुद्धि में प्रकाश लाता है, जीवन में ओज-तेज, ऊँची समझ लाता है कि ʹआत्मा ब्रह्म है, उसको पहचानना ही हमारा लक्ष्य है।ʹ 

अनासक्तिः विद्यार्थी आसक्ति-रहित होना चाहिए। ʹमुझे ऐसा कपड़ा चाहिए, ऐसा खाना चाहिए।ʹ नहीं-नहीं। हर हाल में मस्त रहने का सदगुण ! माँ-बाप का ख्याल रखो और अपने अड़ोस-पड़ोस का भी मंगल और ख्याल….! 

सत्याग्रहः कोई झूठ-कपट करके तुम्हें दबाये और तुम उसके आगे घुटने टेक के दिखावटी माफी माँगों, काहे को ? तुम सचमुच दीन-हीन नहीं हो तो ऐसा करना भी असत् है। अपनी महिमा में रहो। सहिष्णुताः कोई परिस्थिति सदा नहीं रहेगी। न अपने को पापी मानो, न चिंतित मानो, न दोषी मानो। अपने को प्रभु का और प्रभु को अपना मानो तो तुम्हारी सारे दोष मिटाने की शक्तियाँ विकसित होंगी। इन सदगुणों के विकास से सर्वगुणसम्पन्न परमात्मा का दीदार करना भी आसान हो जायेगा। 

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