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जप की संख्या

अपने इष्टमंत्र या गुरुमंत्र में जितने अक्षर हों उतने लाख मंत्रजप करने से उस मंत्र का अनुष्ठान पूरा होता है 

उदाहणार्थयदि एक अक्षर का मंत्र हो तो 100000 + 10000 + 1000 + 100 + 10 = 1,11,110 

मंत्रजप करने से सब विधियाँ पूरी मानी जाती हैं |

 

अनुष्ठान हेतु प्रतिदिन की माला की संख्या

 

कितने दिन में अनुष्ठान पूरा करना है?

मंत्र के अक्षर

दिनमें

दिनमें

11 दिनमें

15 दिनमें

21 दिनमें

40 दिनमें

एक अक्षर का मंत्र

150माला

115माला

95माला

70माला

50माला

30माला

दो अक्षर का मंत्र

300माला

230माला

190माला

140माला

100माला

60माला

तीन अक्षर का मंत्र

450माला

384माला

285माला

210माला

150माला

90माला

चार अक्षर का मंत्र

600माला

460माला

380माला

280माला

200माला

120माला

पाँच अक्षर का मंत्र

750माला

575माला

475माला

350माला

250माला

150माला

छः अक्षर का मंत्र

900माला

690माला

570माला

420माला

300माला

180माला

सात अक्षर का मंत्र

1050माला

805माला

665माला

490माला

350माला

210माला

 

दीक्षित साधक मंत्र अनुष्ठान करे बस ...

जिसको गुरुमंत्र मिला है वे सर्टिफिकेट लेके भटके नहीं , 

खाली  अनुष्ठान पर अनुष्ठान  करे सब होजाएगा - पूज्य बापूजी 

अनुष्ठान से पूर्व

अनुष्ठान शुरू करने के दिन

शुभ दिन: सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार और रविवार
शुभ तिथि : दूज, तीज, पंचमी, सप्तमी, दशमी, द्वादशी और त्रयोदशी. ( २,३,५,७,१०,१२,१३)
इन बताये गये दिनों और तिथि में अनुष्ठान शुरू करने में कोई बाधा नहीं होती और हमारा संकल्प पूरा होता है। 


विघ्न बाधा से बचने के लिए

  "ॐ ह्रीं ॐ" का १०८ बार जप करके अनुष्ठान शुरू करने से अनुष्ठान सफल होता है । रोज़ एक माला इस मंत्र की करने से कोई बाधा नहीं आएगी और शरीर व स्थान की शुद्धि होगी ।

आंवला प्रयोग   

  अनुष्ठान के पहले आंवले का जूस रोज सुबह नाश्ते में लें 5-7 दिन , जिससे नाडियाँ शुद्ध रहें |

अनुष्ठान के लिये

 अनुष्ठान करना हो तो सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार या रविवार, इन 5 दिनों में से किसी भी दिन शुरु करें अर्थात मंगलवार और शनिवार को छोड़कर बाकी के 5 दिन शुरु करें अनुष्ठान पूरा होकर रहेगा
  अनुष्ठान की शुरुआत करने से पहले “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र की माला करें तो अनुष्ठान में विघ्न नहीं आयेगा
    फिर श्वास रोककर गुरुमन्त्र का जप करें गुरुदेव की तस्वीर के सामने अपना संकल्प बोलें, ये संकल्प पूरा हो जाये ऐसी प्रार्थना करें जितने दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं, जैसे 7 दिन या 11 दिन तो उतने दिन तक हर दिन श्वास रोक कर गुरुमंत्र का जप करके संकल्प बोलने का प्रयोग करें, तो कार्य सिद्ध होगा| 

आसन सिद्ध करने के लिए :-
अनुष्ठान शुरू कर रहे हो तो पहले आसन सिद्ध करें...स्थापना करें । पूर्व दिशा की ओर मुंह करके आसन पर बैठें । चावल के दाने ( अक्षत ) हल्दी से पीले कर दें । अग्नि कोण (पूर्व और दक्षिण के बीच का ) में आसन के नीचे कोने पर वो दाने रख दिए और ' ॐ गं गणेशाय नमः ' मेरा आसन और अनुष्ठान सिद्ध हो ...मेरे जप ध्यान में कोई विघ्न न आए। फिर नेर्रित्त्य कोण ( दक्षिण और पश्चिम के बीच का कोण ) के आसन के कोने के नीचे दाने रख दिए और प्रार्थना करें ' ॐ एं सरस्वत्यै नमः ' ...हें सरस्वती मुझे सद्बुद्धि देना... मेरे अनुष्ठान में मैं ही अड़चन न बनूँ ...मैं उपवास न तोडूं .... मेरी बुद्धि बनी रहे । फिर वायव्य कोण ( पश्चिम और उत्तर के बीच का कोण ) के आसन के कोने के नीचे चावल के दाने रखे और ' ॐ दुं दुर्गाय नमः ' हें माँ दुर्गा ... काम , क्रोध , लोभ, मोह, मद, मत्सर, आदि अगर मेरे जप अनुष्ठान में अड़चन बनें तो मेरे ये दुर्गुणों को भी तू दूर करना । फिर ईशान कोण ( उत्तर और पूर्व के बीच का कोण ) के कोने के नीचे दाने रख दिए और ' श्याम क्षेत्रपालय नमः ' जपे ।

गुरुदेव का स्मरण–प्रेम–अनुष्ठान –

गुरुदेव की ध्यान की एम्. पी. थ्री वगैरह सुनते हुये कभी गुरुदेव की तस्वीर को देखते रहे | फिर आँखों के द्वारा ऐसी भावना की कि मेरे गुरुदेव को मेरे भीतर ही ले जा रहा हूँ | मन से दूसरी चिंताएं और दूसरे लोगों का चिंतन नहीं निकलता हो ना ! तो गुरुदेव की तस्वीर को देखते देखते ये भाव किया कि मैं मेरे गुरुदेव को भीतर ले जा रहा हूँ और भीतर जो भी कचरा है मेरे-तेरे का वो जाये बाहर| ये भी कर सकते हैं | कभी अनुष्ठान किया जाए तो केवल माला का ही नहीं गुरुदेव के ही सुमरन-ध्यान-प्रेम आदि का अनुष्ठान २१ दिन, ११ दिन, ७ दिन| दिन में तीन बार गुरुदेव के सामने बैठ जाये और उनकी तस्वीर को निहारते –निहारते उन्ही में खो जाये | दूरी, भेद और भिन्नता को मिटाये, शरणागती और प्यार को सजीव बनाये | कभी ऐसा भी एक अनुष्ठान क्यों ना किया जाए |

हिमालय में अनुष्ठान का अवसर

ग्रीष्मकालीन ऋतु में विशेष सामूहिक अनुष्ठान शिविर - - 1अप्रैल से 30 जून तक

पूज्य बापूजी की प्रेरणा से ग्रीष्मकालीन ऋतु में विशेष सामूहिक अनुष्ठान शिविर का आयोजन किया जा रहा है ।

स्थान : संत श्री आशारामजी आश्रम, चवाल खेत, नंदनवन, नई टिहरी (उत्तराखंड )

समय -सीमा : सात दिन से लेकर नब्बे दिन तक अपनी - अपनी समय और सुविधा के अनुसार कर सकते हैं ।

दिनांकः 1अप्रैल से 30 जून तक ।

संपर्क : 09411185589

नोट :  नंदनवन , नई टिहरी आश्रम में बहनों की भोजन एवं आवास की व्यवस्था नहीं है । 

केवल दर्शन हेतु जा सकते हैं ।

संत श्री आशारामजी आश्रम में पूज्य बापूजी के आज्ञा से

ग्रीष्मकालीन ऋतु में विशेष सामूहिक अनुष्ठान शिविर का आयोजन किया जा रहा है ।

स्थान : संत श्री आशारामजी आश्रम, हरिपुर कलां, सप्त सरोवर, हरिद्वार (उत्तराखंड )

समय -सीमा : सात दिन से लेकर नब्बे दिन तक अपनी - अपनी समय और सुविधा के अनुसार

कर सकते हैं |

दिनांकः 1 अप्रैल से 30 जून तक ।

संपर्क : 09359508387, 08810072176, 09359291954

*  पूज्य बापूजी एवं स्वामी रामतीर्थ जी का तपस्थली, पवित्र, पावन हिमालय का शांत, अरण्य वातावरण जो आपको हमेशा प्रसंचित रखेगा ।

*  देहरादून से नई टिहरी की दुरी -110 km है |

*  हरिद्वार से नई टिहरी की दुरी -100 km है |

*  नई टिहरी आश्रम में इस समय तापमान लगभग 15- 20 डिग्री तक रहता है । 

अतः अपने साथ कम्बल अवश्य लायें ।

*  ऋषिकेश से नई टिहरी की दूरी 80 k.m है। सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक बसो की सुविधा ऋषिकेश से उपलब्ध है।

 

Anushthan Vidhi

 

 
अमदावाद आश्रम में अनुष्ठान करने के इच्छुक साधक यह विडियो अवश्य देखें 

मंत्र जपने की विधिमंत्र के अक्षरमंत्र का अर्थमंत्र अनुष्ठान की विधि जानकर तदनुसार जप करने से साधक की योग्यताएँ विकसित होती हैं 

वह महेश्वर से मुलाकात करने की योग्यता भी विकसित कर लेता है किन्तु यदि वह मंत्र का अर्थ नहीं जानता या अनुष्ठान की विधि नहीं जानता या 

फिर लापरवाही करता हैमंत्र के गुंथन का उसे पता नहीं है तो फिर राँग नंबर की तरह उसके जप के प्रभाव से उत्पन्न आध्यात्मिक शक्तियाँबिखर जायेंगी

 तथा स्वयं उसको ही हानि पहुंचा सकती हैं जैसे प्राचीन काल में इन्द्र को मारनेवाला पुत्र पैदा हो’ इस संकल्प की सिद्धि के लिए दैत्यों द्वारा यज्ञ किया गया 

लेकिन मंत्रोच्चारण करते समय संस्कृत में हृस्वऔर दीर्घ की गलती से इन्द्र से मारनेवाला पुत्र पैदा हो’ - ऐसा बोल दिया गया तो वृत्रासुर पैदा हुआजो इन्द्र को नहीं मार पाया वरन् इन्द्र के हाथों मारा गया अतः मंत्र और अनुष्ठान की विधि जानना आवश्यक है |

 

1. अनुष्ठान कौन करे ?: गुरुप्रदत्त मंत्र का अनुष्ठान स्वयं करना सर्वोत्तम है कहीं-कहीं अपनी धर्मपत्नी से भी अनुष्ठान कराने की आज्ञा हैकिन्तु ऐसे प्रसंग में पत्नी

 पुत्रवती होनी चाहिए स्त्रियों को अनुष्ठान के उतने ही दिन आयोजित करने चाहिए जितने दिन उनके हाथ स्वच्छ हों मासिक धर्म के समय में अनुष्ठान खण्डित हो जाता है |

 

2. स्थान: जहाँ बैठकर जप करने से चित्त की ग्लानि मिटे और प्रसन्नता बढ़े अथवा जप में मन लग सकेऐसे पवित्र तथा भयरहित स्थान में बैठकर ही अनुष्ठान करना चाहिए |


3. दिशासामान्यतया पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना चाहिए फिर भी अलग-अलग हेतुओं के लिए अलग-अलग दिशाओं की ओर मुख करके जप करने का विधान है |

श्रीगुरुगीता में आता हैउत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करने से शांतिपूर्व दिशा की ओर वशीकरणदक्षिण दिशा की ओर मारण सिद्ध होता है 

तथा पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप करने से धन की प्राप्ति होती है अग्नि कोण की तरफमुख करके जप करने से आकर्षणवायव्य कोण की तरफ शत्रु नाश

नैॠत्य कोण की तरफ दर्शन और ईशान कोण की तरफ मुख करके जप करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है आसन बिना या दूसरे के आसन पर बैठकर कियागया जप फलता नहीं है 

सिर पर कपड़ा रख कर भी जप नहीं करना चाहिए |

 

साधना-स्थान में दिशा का निर्णय जिस दिशा में सूर्योदय होता है वह है पूर्व दिशा पूर्व के सामने वाली दिशा पश्चिम दिशा है 

पूर्वाभिमुख खड़े होने पर बायें हाथ पर उत्तर दिशा और दाहिने हाथ पर दक्षिण दिशा पड़ती है पूर्व औरदक्षिण दिशा के बीच अग्निकोणदक्षिण और पश्चिम दिशा के बीच नैॠत्य कोण

पश्चिम और उत्तर दिशा के बीच वायव्य कोण तथा पूर्व और उत्तर दिशा के बीच ईशान कोण होता है |

4. आसन विद्युत के कुचालक (आवाहकआसन पर  जिस योगासन पर सुखपूर्वक काफी देर तक स्थिर बैठा जा सकेऐसे सुखासन,

 सिद्धासन या पद्मासन पर बैठकर जप करो दीवार पर टेक लेकर जप  करो |

 

5. माला: माला के विषय में मंत्रजाप विधि नामक अध्याय में विस्तार से बताया जा चुका हि अनुष्ठान हेतु मणिमाला ही सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है |

 

6. जप की संख्या : अपने इष्टमंत्र या गुरुमंत्र में जितने अक्षर हों उतने लाख मंत्रजप करने से उस मंत्र का अनुष्ठान पूरा होता है 

मंत्रजप हो जाने के बाद उसका दशांश संख्या में हवनहवन का दशांश तर्पणतर्पण कादशांश मार्जन और मार्जन का दशांश ब्रह्मभोज कराना होता है 

यदि हवनतर्पणादि करने का सामर्थ्य या अनुकूलता  हो तो हवनतर्पणादि के बदले उतनी संख्या में अधिक जप करने से भी काम चलता है उदाहणार्थयदिएक अक्षर का मंत्र हो तो 100000 + 10000 + 1000 + 100 + 10 = 1,11,110 मंत्रजप करने सेसब विधियाँ पूरी मानी जाती हैं |

 

अनुष्ठान के प्रारम्भ में ही जप की संख्या का निर्धारण कर लेना चाहिए। फिर प्रतिदिन नियत स्थान पर बैठकर निश्चित समय मेंनिश्चित संख्या में जप करना चाहिए।

अपने मंत्र के अक्षरों की संख्या के आधार पर निम्नांकित तालिका के अनुसार अपने जप की संख्या निर्धारित करके रोज निश्चित संख्या में ही माला करो। कभी कमकभी ज़्यादा......... ऐसा नहीं।

 

जप करने की संख्या चावलमूँग आदि के दानों से अथवा कंकड़-पत्थरों से नहीं बल्कि माला से गिननी चाहिए। चावल आदि से संख्या गिनने पर जप का फल इन्द्र ले लेते हैं।

7.मंत्र संख्या का निर्धारणः कई लोग ’ को ओम’ के रूप में दो अक्षर मान लेते हैं और नमः को नमह के रूप में तीन अक्षर मान लेते हैं।

 वास्तव में ऐसा नहीं है। ’ एक अक्षर का है और नमः दो अक्षर का है। इसीप्रकार कई लोग  हरि’ या  राम’ को केवल दो अक्षर मानते हैं 

जबकि ... ... रि...’ इस प्रकार तीन अक्षर होते हैं। ऐसा ही  राम’ संदर्भ में भी समझना चाहिए। इस प्रकार संख्या-निर्धारण में सावधानी रखनी चाहिए।

 

जप कैसे करेंजप में मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करो। जप में  बहुत जल्दबाजी करनी चाहिए और  बहुत विलम्ब। गाकर जपनाजप के समय सिर हिलानालिखा हुआ मंत्र पढ़कर

 जप करनामंत्र का अर्थ  जाननाऔर बीच में मंत्र भूल जाना.. ये सब मंत्रसिद्धि के प्रतिबंधक हैं। जप के समय यह चिंतन रहना चाहिए कि इष्टदेवतामंत्र और गुरुदेव एक ही हैं।

 

9.समयः जप के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त है किन्तु अनुष्ठान के समय में जप की अधिक संख्या होने की वजह से एक साथ ही सब जप पूरे हो सकें

यह संभव नहीं हो पाता। अतः अपना जप का समय 3-4बैठकों में निश्चित कर दो। सूर्योदयदोपहर के 12 बजे के आसपास एवं सूर्यास्त के समय जप करो तो लाभ ज्यादा होगा।

 

10. आहारः अनुष्ठान के दिनों में आहार बिल्कुल सादासात्त्विकहल्कापौष्टिक एवं ताजा होना चाहिए। हो सके तो एक ही समय भोजन करो एवं रात्रि को फल आदि ले लो। 

इसका अर्थ भूखमरी करना नहीं वरन् शरीर कोहल्का रखना है। बासीगरिष्ठकब्ज करने वालातला हुआप्याजलहसुनअण्डे मांसादि तामसिक भोजन कदापि ग्रहण  करो।

 भोजन बनने के तीन घंटे के अंदर ही ग्रहण कर लो। अन्याय से अर्जितप्याज आदिस्वभाव से अशुद्धअशुद्ध स्थान पर बना हुआ एवं अशुद्ध हाथों से (मासिक धर्मवाली स्त्री के हाथों से

बना हुआ भोजन ग्रहण करना सर्वथा वर्ज्य है।

 

11. विहारः अनुष्ठान के दिनों में पूर्णतया ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी है। अनुष्ठान से पूर्व आश्रम से प्रकाशित यौवन सुरक्षा’ पुस्तक का गहरा अध्ययन लाभकारी होगा। ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिए एक मंत्र भी हैः

 नमो भगवते महाबले पराक्रमाय मनोभिलाषितं मनः स्तंभ कुरु कुरु स्वाहा।

रोज दूध में निहार कर 21 बार इस मंत्र का जप करो और दूध पी लो। इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है। यह नियम तो स्वभाव में आत्मसात् कर लेने जैसा है।

 

12.  मौन एवं एकान्तः अनुष्ठान अकेले ही एकांत में करना चाहिए एवं यथासंभव मौन का पालन करना चाहिए। अनुष्ठान करने वाला यदि विवाहित हैगृहस्थ हैतो भी अकेले ही अनुष्ठान करें।

 

13. शयनः अनुष्ठान के दिनों में भूमि शयन करो अथवा पलंग से कोमल गद्दे हटाकर चटाईकंतान (टाटया कंबल बिछाकर जप-ध्यान करते-करते शयन करो।

 

14. निद्रातन्द्रा एवं मनोराज से बचोः शरीर में थकानरात्रि-जागरणगरिष्ठ पदार्थ का सेवनठूँस-ठूँसकर भरपेट भोजन-इन कारणों से भी जप के समय नींद आती है। स्थूल निद्रा को जीतने के लिए आसन करने चाहिए।

कभी कभी जप करते करते झपकी लग जाती है। ऐसे में माला तो यंत्रवत चलती रहती हैलेकिन कितनी मालाएँ घूमीं इसका कोई ख्याल नहीं रहता।

यह सूक्ष्म निद्रा अर्थात तंद्रा है। इसको जीतने के लिए प्राणायाम करने चाहिए। कभी कभी ऐसा भी होता है कि हाथ में माला घूमती है 

जिह्वा मंत्र रटती है किन्तु मन कुछ अन्य बातें सोचने लगता है। यह है मनोराज। इसको जीतने के लिए ॐ’ का दीर्घ स्वर से जप करना चाहिए।

 

15. स्वच्छता और पवित्रताः स्नान के पश्चात् मैलेबासी वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। शौच के समय पहने गये वस्त्रों को स्नान के पश्चात् कदापि नहीं पहनना चाहिए।

 वे वस्त्र उसी समय स्नान के साथ धो लेना चाहिए। फिरभले बिना साबुन के ही पानी में साफ कर लो।

लघुशंका करते वक्त साथ में पानी होना जरूरी है। लघुशंका के बाद इन्द्रिय पर ठण्डा पानी डालकर धो लो। हाथ-पैर धोकर कुल्ले भी कर लो। लघुशंका करके तुरंत पानी  पियो। पानी पीकर तुरंत लघुशंका  करो।

दाँत भी स्वच्छ और श्वेत रहने चाहिए। सुबह एवं भोजन के पश्चात भी दाँत अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए। कुछ भी खाओ-पियोउसके बाद कुल्ला करके मुखशुद्धि अवश्य करनी चाहिए।

जप करने के लिए हाथ-पैर धोकरआसन पर बैठकर शुद्धि की भावना के साथ जल के तीन आचमन ले लो। जप के अंत में भी तीन आचमन करो।

जप करते समय छींकजम्हाईखाँसी  जाये या अपानवायु छूटे तो यह अशुद्धि है। उस समय की माला नियत संख्या में नहीं गिननी चाहिए। 

आचमन करके शुद्ध होने के बाद वह माला फिर से करनी चाहिए। आचमन केबदले  संपुट के साथ गुरुमंत्र सात बार दुहरा दिया जाये तो भी शुद्धि हो जाएगी।

 जैसे मंत्र है नमः शिवाय’ तो सात बार  नमः शिवाय ’ दुहरा देने से पड़ा हुआ विघ्न निवृत्त हो जाएगा।

जप के समय यदि मलमूत्र की हाजत हो जाये तो उसे दबाना नहीं चाहिए। ऐसी स्थिति में जप करना छोड़कर कुदरती हाजत निपटा लेनी चाहिए।

 शौच गये हो तो स्नानादि से शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र पहन कर फिर जप करो।यदि लघुशंका करने गये हो तो केवल हाथ-पैर-मुँह धोकर कुल्ला करके शुद्ध-पवित्र हो जाओ। फिर से जप का प्रारंभ करके बाकी रही हुई जप-संख्या पूर्ण करो।

 

16. चित्त के विक्षेप का निवारण करोः अनुष्ठान के दिनों में शरीर-वस्त्रादि को शुद्ध रखने के साथ-साथ चित्त को भी प्रसन्नशान्त और निर्मल रखना आवश्यक है। 

रास्ते में यदि मल-विष्ठाथूक-बलगम अथवा कोई मराहुआ प्राणी आदि गंदी चीज के दर्शन हो जायें तो तुरंत सूर्यचंद्र अथवा अग्नि का दर्शन कर लोसंत-महात्मा का दर्शन-स्मरण कर लोभगवन्नाम का उच्चारण कर लो ताकि चित्त के क्षोभ का निवारण हो जाये।

 

17. नेत्रों कि स्थितिः आँखें फाड़ फाड़ कर देखने से आँखों के गोलकों की शक्ति क्षीण होती है। आँखें बँद करके जप करने से मनोराज की संभावना होती है। 

अतः मंत्रजप एवं ध्यान के समय अर्धोन्मीलित नेत्र होने चाहिए| इससे ऊपर की शक्ति नीचे की शक्ति से एवं नीचे की शक्ति ऊपर की 

शक्ति से मिल जायेगी। इस प्रकार विद्युत का वर्तुल पूर्ण हो जायेगा और शक्ति क्षीण नहीं होगी।

 

18.मंत्र में दृढ़ विश्वासः मंत्रजप में दृढ़ विश्वास होना चाहिए। विश्वासो फलदायकः। 

यह मंत्र बढ़िया है कि वह मंत्र बढ़िया है... इस मंत्र से लाभ होगा कि नहीं होगा...’ ऐसा संदेह करके यदि मंत्रजप किया जायेगा तो सौप्रतिशत परिणाम नहीं आयेगा।

 

19. एकाग्रताः जप के समय एकाग्रता का होना अत्यंत आवश्यक है। एकाग्रता के कई उपाय हैं। भगवानइष्टदेव अथवा सदगुरुदेव के फोटो की ओर एकटक देखो। 

चंद्र अथवा ध्रुव तारे की ओर एकटक देखो। स्वस्तिक या’ पर दृष्टि स्थिर करो। ये सब त्राटक कहलाते हैं। एकाग्रता में त्राटक का प्रयोग बड़ी मदद करता है।

 

20.नीच कर्मों का त्यागः अनुष्ठान के दिनों में समस्त नीच कर्मों का त्याग कर देना चाहिए। निंदाहिंसाझूठ-कपटक्रोध करने वाला मानव जप का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। इन्द्रियों को उत्तेजित करनेवाले नाटक,सिनेमानृत्य-गान आदि दृश्यों का अवलोकन एवं अश्लील साहित्य का पठन नहीं करना चाहिए। आलस्य नहीं करना चाहिए। दिन में नहीं सोना चाहिए।

 

21. यदि जप के समय काम-क्रोधादि सतायें तोः काम सताये तो भगवान नृसिंह का चिंतन करो। 

मोह के समय कौरवों को याद करो। लोभ के समय दान पुण्य करो। सोचो कि कौरवों का कितना लंबा-चौड़ा परिवार था किन्तुआखिर क्याअहं सताए तो अपने से धनसत्ता एवं रूप में बड़े होंउनका चिंतन करो।

 इस प्रकार इन विकारों का निवारण करकेअपना विवेक जाग्रत रखकर जो अपनी साधना करता हैउसका इष्टमंत्र जल्दी फलता है।

विधिपूर्वक किया गया गुरुमंत्र का अनुष्ठान साधक के तन को स्वस्थमन को प्रसन्न एवं बुद्धि को सूक्ष्म करने में तथा जीवन को जीवनदाता

 के सौरभ से महकाने में सहायक होता है। जितना अधिक जपउतना अधिक फल।अधिकस्य अधिकं फलम्।