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ब्रह्मचर्य रक्षा हेतु मंत्र

एक कटोरी दूध में निहारते हुए इस मंत्र का इक्कीस बार जप करें तदपश्चात उस दूध को पी लें, ब्रह्मचर्य रक्षा में सहायता मिलती है यह मंत्र सदैव मन में धारण करने योग्य है :

 

ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय

मनोभिलाषितं मनः स्तंभ कुरु कुरु स्वाहा |

 

ॐ अर्यमाय नमः’ ये मन्त्र जपने से ब्रम्हचर्य पालने में मदद मिलती है

 

जब कभी भी आपके मन में अशुद्ध विचारों के साथ किसी स्त्री के स्वरूप की कल्पना उठे तो आप ॐ दुर्गा देव्यै नमः मंत्र का बार-बार उच्चारण करें और मानसिक प्रणाम करें |”

-शिवानंदजी

 

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Youvan Suraksha-2

Apne Rakshak Aap

 

 

Photoनारी तू नारायणी

 

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गृहस्थ में किसको भगवान मिला बताओ ?

सुनो मेरे भाइयो सुनो मेरे मित्रो कबीरो बिगड़ गयो रे पारस संग भाई लोहा बिगड़ो कंचन रूप भइयो रे कबीरो बिगड़ गयो रे दही संग दूध बिगरो मक्खन रूप भयो रे कबीरो बिगड़ गयो रे.... ...............

तो जिसको संसारी लोग बिगड़ना मानते.... ऐसे बेवकूफ लोग किसी का बेटा साधू बनता तो हजारो लाखो लोग बापूजी बापूजी मत्था टेकते लेकिन अपना बेटा अगर साधुताई के रास्ते जाते तो लोग बोलते मेरा बेटा चला गया

अमेरिका चला जाता है जुआरियो शराबियो लोफरों की सोहबत में तो छाती फूलाते है की मेरा बेटा अमेरिका गया है,मेरा बेटा यूरोप गया है
लेकिन बेटा जब एकांत में भजन में ईश्वरीय दुनिया में रहते तो लोग रोने लगते हमारे घरवाले भी किसी का बेटा साधू बना है तो हमारे घरवाले उसके चरण छूते थे और हम घर छोड़ भगवन के रस्ते गए तो रोने लग गए लो.... तो किसी का बेटा संत बने तो लोग चरण छुए अपना बेटा संतो के रास्ते जाए तो लोग दुखी होते, चिंतित होते

तो लोगो को चाहिए अपना घर का बेटा हो बेटी हो भगवान के रास्ते अगर जाता है तो ये असली कमाई हो रही है एक कुटुम्बी भी अगर ईमानदारी से ईश्वर के रस्ते जाता है तो सारे कुटुम्बियों फायदा मिलता है…मिलता है

हमारे घरवाले भी........... किसी का बेटा साधू बना है तो हमारे घरवाले उसके चरण छूते थे और हम घर छोड़  भगवन के रस्ते गए तो रोने  लग गए |
लो.... तो किसी का बेटा संत बने तो लोग चरण छुए ,अपना बेटा संतो के रास्ते जाए तो लोग दुखी होते, चिंतित होते

तो लोगो को चाहिए अपना घर का बेटा हो बेटी हो भगवान के रास्ते अगर जाता है तो ये असली कमाई हो रही है

एक कुटुम्बी भी अगर ईमानदारी से ईश्वर के रस्ते जाता है तो सारे कुटुम्बियों  फायदा  मिलता है…मिलता है 
फिर तो जितना ज्यादा वो व्यापक होगा ईश्वर के साथ जुड़ेगा उतना लोगो को फायदा होगा हम दुकान पे जाकर जितना कमाते थे एक लेकर दस तोला सोना लेकर खरीद कर रख देते थे इतना कमाई होता था  | पंद्रह तोला सोना.......

उसको  ठोकर मार के हम गुरु के द्वार गए

तो लोग बोले क्या कर  दिया, ऐसा कर दिया, शादी नहीं कर रहे। फिर जबरदस्ती शादी करवाई तो शादी के आठ दिन पहले हम भाग गए,रो धो के पकड़ के शादी तो करवा दी फिर उसको समझा के हम चले गए तो उस समय लोगो में तहलका मच गया की क्या ......................
अरे क्या हो गया ,अरे क्या हो गया शादी के दिन भी लोग समझाने लगे की ये तो...दूल्हा बनाये ट्रैन में जबरदस्ती कपडे पहनाए तो आँखों में आंसू आ रहे थे बोले ये इसको मौका मिलेगा तो ये भाग जाएगा तो जहाँ ट्रैन बदलनी थी वहाँ सब थे आसपास तो भाग नहीं पाये फिर शादी हो गई, तो उसको समझा के फिर हम भाग गए
 सात साल तक गुरु के चरणो में रहे।
उन दिनों में क्या क्या रोने वालों रोया ने होगा ,समझाने वालो ने समझाया होग… अरे शादी होते ही सात दिनों में साला समझाने लग गया ,गृहस्थी में ही  भगवान मिलता है, ऐसा है, वैसा है ,वो साले का साला भी साला समझाने लग गया की संसार में देखो कबीर जी रहे थे, ये रहे थे, वह  रहे थे.............

तो गृहस्थ में ही मिलता है गृहस्थ में किसको भगवान मिला बताओ ???

बोले रामकृष्ण को तो अरे गृहस्थ  जीवन भोगा क्या उन्होंने ??हम भी अगर गृहस्थी होकर जीते तो हमारी सत्यानाश हो  जाती
44 साल हो गए ,नारायण की माँ को कसम डाल  के पूछो माइयाँ  44 घंटे भी हमारे साथ रही है ?
गृहस्थ,गृहस्थ,गृहस्थ  वो ब्रह्म नाड़ी होती है,हमारे शरीर में 72 लाख 10 हजार 201 नाड़ियाँ है,उसमे से 22 नाड़ियाँ  बहुत मुख्य हैं,22 में भी दस दायीं और मस्तक में दस बायीं और ,20 हो गयी.... इक्कीसवी है तालु में,
कुछ याद करना हो तो तालु में जीभ लगा के याद करो 
अथवा तालु में जीभ लगा के ध्यान  करो तो स्थिति अच्छी रहती है 

बाइसवीं नाड़ी है ब्रह्मनाड़ी, तो ब्रह्मचर्य पालने से वो ब्रह्मनाड़ी मजबूत होती है,तब ब्राह्मिस्थिति  प्राप्त होती है।

रामकृष्ण को पूछा की आपको इतने अनुभव करते तो हम भी तो भगवान को मानते श्रद्धा तो हमारे में भी है लेकिन आपको ईश्वरप्राप्ति हो गयी हमको नहीं हुई ???
बोले आप लोग ब्रह्म नाड़ी का महत्व नहीं जानते संसार में विषय विकार में वो तेज खो देते..जो  संसारी विषय विकार के पहले परमात्मायोग में आ जाता है, एक बार ऊँचा अनुभव कर ले फिर निचे आएगा तो टिकेगा नहीं, मन वासना में रुकेगा नहीं।
फिर आ गये बच्चे हो गए लेकिन रुकेगा नहीं,तो पहले जमाने में भगवान राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न... दीक्षा हुई फिर शिक्षा मिलती है,अब तो  शिक्षा शिक्षा  शिक्षा..........
पांच साल के ध्रुव को ईश्वरप्राप्ति हो गई |

11 साल के प्रह्लाद  ईश्वर प्राप्ति हो गई

8 साल के रामी रामदास को ईश्वर प्राप्ति हो गई

मीरा का ब्रह्मचर्य था,शादी जबरन कराइ,सयंम से रही फिर भी, ईश्वरप्राप्ति हो गई  

आनंदमयी माँ बहुत देखने में सज्जन थी,सुन्दर थी,जितनी  बाहर से सुन्दर थी उससे ज्यादा अंदर से सुन्दर थी तो पति नजदीक आता तो उसे भगवत भाव से समझा के दूर रख देती,
तो कुल मिलाकर मनुष्य के अंदर ईश्वर कि अथाह शक्तिया पड़ी है। चपरासी होकर तहसीलदार होकर कलेक्टर होकर, सेठ-साहूकार होकर जिंदगी खोने के लिए नहीं मिली है,भगवान का होकर भगवान को पाकर मुक्त आत्मा  होने लिए जीवन मिला है |
तो कुल मिलाकर ईश्वरप्राप्ति के लिए ही मनुष्य जनम मिला है | पेट भर लिया ,बच्चे बच्चियां पैदा कर लिया, तो वो तो घोडा गधा कुत्ता भी करता है,इसमें क्या बड़ी बात है ?? और ईश्वरप्राप्ति कठिन नहीं है 
जो कभी हमें छोड़ ना सके और जिसे हम छोड़ ना सके उसका नाम है परमात्मा।
मनुष्य की मांग का नाम है परमात्मा ,मनुष्य चाहता है की वो सदा खुश रहे ,दिव्या ज्ञान का अनुभव करू,पराधीन न रहू,तो उसी का  नाम है ईश्वर ,जो पराधीन नहीं है, सदा सुखरूप  है और ज्ञान स्वरुप है उसी आत्मा का नाम ईश्वर है ,तो अपने आत्मा को जान लो ,
शरीर मरे उसके पहले अपनी अमरता को जान लो
दुःख आता है चला जाता है  सुख आता है चला जाता है  जो कभी नहीं जाता है उसको जान लो
"ना दूर्रे ना दुर्लभः "
वो दूर भी नहीं है और दुर्लभ भी नहीं है,लेकिन उसको जानने वाले महापुरुषों का मिलना कठिन है मनमानी कितनी भी कुछ खोजो प्रकृति के रहस्य खुलते,ये खुलते,वो खुलते लेकिन
सद्गुरु की कुंजी के बिना आखिरी द्वार खुलता नहीं है 
इसीलिए बोलते वो रामकृष्ण परमहंस को वो रामकृष्ण परमहंस बाद में बने,उनका नाम था गदाधर पुजारी ,तो काली माता प्रगट हो जाती थी भावना के बल से,तो काली माता ने कहा तोतापुरी गुरु से दिक्षा लो, बोले मैया तुम मेरे समक्ष आती हो,प्रकृति के रहस्य प्रगट होते ,शंका समाधान होता,सारा प्रकृति का कुछ  दीखता है बोले
ये सब मानसिक जगत तक है,
इसके ऊपर बौद्धिक जगत है ,
इसके ऊपर आनंद जगत है, इसके ऊपर तात्विक जगत है
वह  गुरु की कृपा से ही मिलता है 
इसमें तुम अपनी कल्पना में उलझो मत,तोतापुरी गुरु से दीक्षा ले लो..तो गदाधर पुजारी ने तोतापुरी गुरु से दीक्षा ली
तोतापुरी गुरु ने गदाधर को रामकृष्ण परमहंस पद पर पहुँचाया ऐसे ही नरेंद्र ने रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा ली और नरेंद्र को विवेकानंद पद पर पहुँचाया,
ऐसे ही आसुमल ने लीलाशाह गुरूजी से दीक्षा ली और आशाराम बनाकर
समाज के सामने धर दिया................. 
गुरुकृपा ही केवलम् शिष्यस्या परम मंगलम् 
मंगल तो खूब तप करोगे तो देवी देवता भी कर देंगे लेकिन परम मंगल तो परमपुरुष परमात्मा को पाये हुए महापुरुष की कृपा से ही होगा। इसीलिए भगवान अवतार लेते तो आत्मसाक्षात्कार करे हुए गुरु की शरण जाते,कृष्ण संदीपनी गुरु की शरण गए,भगवान राम गुरु वशिष्ठ की शरण गए |
गुरुकृपा ही केवलम्  शिष्यस्या परम मंगलम्
मनमाना कितना  भी साधन करो और खोपड़ी में कुछ भी घुस जाएगा तो मानेगा की हाँ.. बस यही सार है पेड़ उठा के जंगल का सड़क पे रख दू यही सार है, अथवा हाथी को सूंड से पकड़कर गरूत्व नियम  के पार फेंक दू तो यह तो भीम कर चुका है कुछ भी नहीं है आत्मसाक्षात्कार  के आगे तो ये सब खिलौनाबाजी है,ये इसका विभाग अलग है तो ये बहुत छोटी चीजे है और बेआत्मबुद्धि है इससे पर होकर .........................और उनको शाबाश है जो छोटी छोटी धारणाओं के ऊपर चले जाते है
 तो समझो भगवान की कृपा है सयंम का फल है 
 
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विवेक की धनीः कर्मावती

Admin 0 23316 Article rating: 4.0
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