साधना में उन्नति के अनमोल सूत्र
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साधना में उन्नति के अनमोल सूत्र

- पूज्य बापूजी

राग (आसक्ति) के कारण दीनता आती है और भय, शोक, रोग आदि दुर्गुण भी आते हैं । राग के कारण ही द्वेष होता है और राग के कारण ही पाप होते हैं । किंतु अंतरात्मा का सुख मिलने से राग मिटने लगता है और वैराग्य परिपक्व होने लगता है ।

अंतरात्मा का शुद्ध सुख जैसा आत्मज्ञानियों को मिलता है, वैसे ही सुख की झलकें साधक के जीवन में भगवान और सद्गुरु की कृपा से संचारित हो जाती हैं । उससे साधक का विवेक और वैराग्य प्रखर होने लगता है । विवेक-वैराग्य प्रखर होने से निर्भयता तथा साहस उसका स्वभाव बन जाता है और उसकी वृत्ति सहज ही आत्माभिमुख होने लगती है ।

परमात्म-शांति में विघ्न

साधना में दृढ़ता दृढ़ संकल्प से आती है । दृढ़ संकल्प शक्ति के बिना नहीं होता । शक्ति संयम के बिना नहीं आती और व्यर्थ के आकर्षणों व व्यर्थ के कर्मों का त्याग किये बिना संयम नहीं आता । व्यर्थता का त्याग करने से सार्थक आत्मा-परमात्मा में प्रीति होने लगती है ।

सत्संग के बिना विवेक नहीं होता । श्रद्धा के बिना सत्संग का लाभ नहीं मिलता । अपनत्व के बिना श्रद्धा और प्रीति में निखार नहीं आता और अपनत्व आता है व्यर्थ कामनाओं का त्याग करने से ।

‘भगवान ! यह दे दो... गुरुदेव ! इतनी कृपा कर दो...’ - ऐसा सकाम भाव नहीं रखें क्योंकि निष्कामता से प्रीति उभरती है और कामना से प्रीति पर लांछन लगता है । जब हम व्यर्थ कामनाओं का त्याग करते हैं, तब हमें वासना-त्याग करने का भी बल मिलता है ।

साधक के लिए ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर यह बड़े-में-बड़ा विघ्न है कि वह अपनी रुचि का दास बन जाता है । और यही वह कारण है जिससे कि सहज में ईश्वरप्राप्ति का अधिकार मिलते हुए भी हम ईश्वरप्राप्ति से वंचित रह जाते हैं । अपनी मान्यताओं, रुचि और वासनाओं का त्याग करने से कामनाएँ शिथिल होती हैं । उनके शिथिल होने से भगवान और संत या सद्गुरु में श्रद्धा व अपनत्व प्रगाढ़ होने लगता है और इससे मन प्रीतियुक्त होने लगता है । मन प्रीतियुक्त होने से बुद्धि निर्दोष होने लगती है । बुद्धि निर्दोष होने से श्रद्धा प्रगाढ़ होने लगती है । श्रद्धा प्रगाढ़ होने से संत का संग अंतरंग (भीतर में) होने लगता है । फिर कभी बाहर से मिले तभी उनका संग हुआ ऐसा नहीं बल्कि हजारों मील दूर होते हुए भी वे प्रेमी भक्त भगवत्संग और सत्संग का एहसास कर लेते हैं । परमात्मप्राप्त संतों के प्रति श्रद्धा न होने से सुख के लिए कोई देश-परदेश भटकते हैं तो कोई तीर्थों में । भगवान श्रीकृष्ण के प्रति जिन्होंने श्रद्धा की वे तो अंतरात्म रस व ज्ञान से तृप्त हुए लेकिन उनके पुत्र उनमें श्रद्धा नहीं कर पाये बल्कि उनकी आज्ञा की अवहेलना ही करते रहे, जिससे वे अंततः गुटबंदी करके लड़ मरे ।

कई लोग भगवान और गुरु के निकट रहते हुए भी उनके प्रति श्रद्धा-विश्वास एवं साधना की तत्परता में कमी होने के कारण अमृतरस से वंचित रह जाते हैं । जिनमें श्रद्धा और साधना की तत्परता होती है उन्हें बाह्य दूरी प्रभावित नहीं करती । वे भगवान या गुरु से अंतरात्मा का संबंध जोड़ लेते हैं । ऐसे भक्त नित्य नवीन प्रीति, नित्य नवीन रस का आस्वादन करने लगते हैं । फिर संसार के तुच्छ आकर्षणों और तुच्छ सुखों से उनका मन सहज ही उपराम होने लगता है ।

जब तुच्छ आकर्षणों व सुखों से मन उपराम होने लगता है, तब व्यर्थ का चिंतन और व्यर्थ के कर्म अपने-आप छूट जाते हैं और संयम साधक का स्वभाव हो जाता है । संयम के अनुचर शक्ति और दृढ़ संकल्प - ये साधक में आ जाते हैं और उसको साधना के ऊँचे शिखर पर, सिद्धत्व तक पहुँचा देते हैं, जिससे साधक परमात्म-शांति को प्राप्त हो जाता है ।

परमात्म-शांति सामर्थ्य की जननी है । परमात्म-शांति से मुदिता (प्रसन्नता) बढ़ती है, एकाग्रता आती है, समता का सद्गुण विकसित होता है, बुद्धि में विलक्षण लक्षण उभरने लगते हैं, जीवन में संतोष आने लगता है, अपने-आपमें सुखी रहने का सौभाग्य उभरता है ।

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