साधना में अपनी उन्नति को स्वयं कैसे मापें ?
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साधना में अपनी उन्नति को स्वयं कैसे मापें ?

कितने ही साधक-भक्त ऐसे हैं जो लम्बे समय से साधना कर रहे हैं । साधना में प्रगति के लिए साधक के जीवन में स्वयं का मूल्यांकन आवश्यक है । साधक को खुद ही अपना आत्म-विश्लेषण करना चाहिए । जितना ठीक ढंग से हम स्वयं अपना निरीक्षण कर सकते हैं उतना अन्य नहीं कर सकता क्योंकि हम जितने अच्छे-से अपने गुण-दोषों, कमजोरियों से परिचित होते हैं, उतने अन्य व्यक्ति नहीं होते । जिज्ञासु साधकों को इन प्रश्नों का उत्तर स्वयं ही खोजना चाहिए ताकि साधना में शीघ्र उन्नति हो :

(1) साधना में रुचि दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है अथवा घट रही है या उदासीनता आ रही है ?

(2) सत्संग सुनने के बाद उसे जीवन में उतारने की जिज्ञासा भी है या नहीं ?

(3) ध्यान-भजन-सत्संग का लक्ष्य आपके लिए परमात्मा की प्राप्ति है या नश्वर संसार के क्षणभंगुर भोग ?

(4) शास्त्रवचन और संत-उपदेश में श्रद्धा है या नहीं ?

(5) मंत्रदीक्षा के समय साधना की जो पद्धतियाँ बतायी गयी थीं, उनसे आप कितने लाभान्वित हुए हैं या वे याद ही नहीं हैं ?

(6) संसार के प्रति आकर्षण कम हुआ है या ज्यों-का-त्यों बना हुआ है ?

(7) कहीं आप सेवा-साधना के बहाने प्रशंसा के रोग से तो ग्रस्त नहीं हो गये हैं ?

(8) भोगों से मन उपराम हुआ है या अभी भी उनमें सुखबुद्धि बनी हुई है ?

(9) त्रिकाल संध्या का नियम माह में कितनी बार पूर्ण करते हैं ? ध्यान-भजन और सेवा के लिए दिनभर में कितना समय देते हैं ?

(10) क्या कभी प्रभु के साथ एकाकार हो जाने की तड़प मन में उठती है ?

(11) मंत्रजप करते-करते कहीं मनोराज में तो नहीं उलझ जाते हैं ?

(12) चित्त की चंचलता, मन की मनमुखता शांत होकर अंतर का आराम प्रकट हो रहा है या नहीं ?

(13) सुख में सुखी और दुःख में दुःखी होने की प्रवृत्ति से निवृत्ति  की ओर  आप अग्रसर हो रहे हैं या नहीं ? सुख-दुःख में सम हो रहे हैं या नहीं ?

(14) सत्संग में जाने के बाद सत्संग का, मनुष्य-जीवन का महत्त्व समझ में आया है अथवा रोजी-रोटी के लिए ही जीवन पूरा हो रहा है ?

(15) जीवन में निर्भयता, निश्चिंतता, प्रसन्नता जैसे  उन्नति के  परम  गुणों का प्रादुर्भाव (प्राकट्य) हो रहा है ?

(16) मौन, एकांत, अनुष्ठान के प्रति रुचि कितनी है ?

(17) उद्वेग के प्रसंग में आप कितना धैर्य और संयम रख पाते हैं ?

अपने जीवन में किसी प्रकार की कमियाँ दिखें तो सुबह 10-12 प्राणायाम करके उन कमियों को निकालने के लिए सद्गुणों का विचार कीजिये । इस प्रकार सद्गुणों का विचार करने से आपके दुर्गुण धीरे-धीरे निवृत्त होते जायेंगे एवं हृदय सद्गुणों से भरता जायेगा । सद्गुणों के विकास से सर्वगुणसम्पन्न परमात्मा का दीदार (अनुभव) करना भी आसान होता जायेगा ।

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