सावधानी से चित्त की सुरक्षा
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सावधानी से चित्त की सुरक्षा

गुजरातियों में एक मुहावरा प्रचलित है जिसका अर्थ हैः

चाय बिगड़ी उसकी सुबह बिगड़ी ।

दाल बिगड़ी उसका दिन बिगड़ा ।

अचार बिगड़ा उसका वर्ष बिगड़ा ।

       लेकिन मैं तो कहता हूँ कि चाहे चाय बिगड़े, चाहे दाल बिगड़े, चाहे अचार बिगड़े तो भी कोई हर्ज नहीं, परंतु अपना हृदय नहीं बिगड़ना चाहिए क्योंकि हृदय में हृदयश्वर परमात्मा, खुदा खुद होता है । हृदय बिगडता है राग-द्वेष से, काम-क्रोध से, भय-चिंता से । कैसे भी करके अपने हृदयकोष की रक्षा करनी चाहिए और हृदयकोष की रक्षा होती है निश्चिंतता से । निश्चिंतता से चित्त शांत रहता है और शांत चित्तवाला व्यक्ति ही प्रसन्न रहता है । जिसे चित्त की प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है उसे फिर सुख के लिए कुछ विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता है । दुःख या मुसीबत आ जाये तब भी वह चिंता करके अपना बोझा नहीं बढ़ता परंतु चिंतन करके उसका हल निकालता है । जो चिंता की खाई में नहीं गिरता है उसके हृदय में आनंद का झरना फूट निकलता है। वह खुद भी आनंद में रहता है और दूसरों को भी आनंदित करता है । ऐसा मनुष्य व्यवहार करते हुए भी जल में कमल की तरह निर्लेप रहता है ।

       भगवान श्रीकृष्ण का जीवन देखो तो... जेल में ही जन्म हुआ । यमुना पार कर रहे थे उसी समय यमुना में बाढ़ आ गयी । कभी पूतना आई तो कभी धेनकासुर आया, कभी बकासुर आया तो कभी अघासुर आया । हजार-हजार विघ्न-वाधाएँ आईं लेकिन श्रीकृष्ण कभी भी सिर पर हाथ रखकर चिंतित होकर नहीं बैठे । इससे हमें भी सीख लेनी चाहिए कि, ‘चाहे कैसे भी परिस्थिति आ जाए किंतु चिंतित हुए बिना उसका उपाय खोजेंगे ।’

       मुस्कुराकर गम का जहर जिसको पीना आ गया ।

       यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया ।

       आज से ही आप जीवन जीने का ढंग बदल दो । ‘मैं बड़ा हूँ...बाप हूँ और ये छोटे हैं....बेटे हैं’ – ऐसी अकड़ में मत रहो । सब जगह बुजुर्ग होकर मत रहो । न्यायधीश होकर, वकील होकर, डॉक्टर-इंजिनीयर या प्रोफेसर होकर मत रहो । महंत या महामंडलेश्वर होकर मत रहो । छोटे-छोटे बच्चे-बेटे-बेटियों के साथ हँसो, बातचीत करो । सदा मुँह पर साढ़े बारह मत बजाये रखो । विनोद करते समय अपने को भी पूर्णतः बाल्यावस्था में ले जाओ । बालवत् निर्दोष जीवन होने से प्रसन्नता प्राप्त होती है ।

हँसते के साथ हँसे दुनियाँ, रोते को कौन बुलाता है?

जो होना है सो होना है, जो पाना है सो पाना है ।

जो खोना है सो खोना है, सब सूत्र प्रभु के हाथों में ।

नाहक करनी का बोझ उठाना है ।

       जो अपने को शरीर मानता है और शरीर से जो कुछ करता है उसे ‘मैं करता हूँ’ ऐसा मानता है तो उसमें कर्त्तृत्व-भोक्तृत्व का भाव आ ही जाता है और साथ मैं चित्त में राग-द्वेष भी अनायास आ जाते हैं ।

       जो अपने को शरीर मानता है और जो शरीर से सुख लेने की बेवकूफी करता है उसको संसार की चीजों में, परिस्थितियों में राग होता है । जो अपने को आत्मा मातता है, जो आत्मज्ञान पाने में लगता है उसे संसार में राग भी नहीं रहता है और द्वेष भी नहीं रहता है । वह तो संसार का उपयोग करता है, उपभोग नहीं । संसार से सुख लेने की बेवकूफी में नहीं फँसता ।

       आप संसार में रहते हुए संसार की चीज-वस्तुओं का उपयोग तो करो परंतु ‘वे चीजें ऐसी ही बनी रहें’ – ऐसा दुराग्रह मत रखो । भोजन करना मना नहीं है लेकिन मजा लेने के लिए ठूँस-ठूँसकर खाओगे तो गड़बड़ हो जाएगी । अच्छे कपड़े पहनने की मना नहीं है लेकिन ‘ऐसा ही रंग-डिजाईन-सिलाई हो’ – ऐसा आग्रह रखकर उसीमें समय-शक्ति गँवा देना यह बेपकूफी नहीं तो और क्या है ?  बोलना मना नहीं है लेकिन बिनजरूरी बोलकर वाणी का व्यय करने से अपनी ही हानी होती है । देखना बुरा नहीं है लेकिन आँखों द्वारा भी बुराई अंदर घुसती है इसलिए बुरे दृश्य देखने से अपने को बचाएँ । बुद्धिमानी इसीमें है कि खाने-पीने, देखने-सुनने से कुछ आत्मिक या आध्यात्मिक हानि न होती हो इसका ध्यान रखें । यदि रात को सोते वक्त ठाकुरजी को देखते-देखते, गुरुजी की छबि को निहारते हुए, उन्हीं को अपना मानते हुए, स्नेह करते हुए सो जाओ तो तुम्हारे भीतर भी ठाकुरजी का, गुरुजी का स्वभाव प्रकट होता जायेगा लेकिन किसी नट-नटी, एक्टर-एक्ट्रेस का चित्र देखते-देखते या किसी ऐसी ही नॉवेल या गंदी किताब पढ़ते-पढ़ते सो जाओगे तो फिर वही संस्कार चित्त में गहरे उतरेंगे ।

       संसार में रहने की मना नहीं है । संसार में रहो परंतु संयम से रहो । हफ्ते में एक-दो बार ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक पढ़ो । संयम और सदाचार से जीवन जियो तो जीवन महक उठेगा एवं जीवन जीने का असली आनंद आयेगा ।

       रोज सुबह उठो तब पक्का निर्णय करो कि आज अपने चित्त को प्रसन्न रखूँगा । दो आदमी के आँसू पोंछूँगा, उनके दुःख दूर करने का प्रयत्न करुँगा और चार आदमियों को हँसाऊँगा । फिर पता चलेगा कि बिना स्वार्थ के कर्म करने में कितना आनंद आता है! फिर तो तुम्हारा व्यवहार ही साधना बन जाएगा । नियम से प्राणायाण-जप-ध्यान करोगे तो तुम्हारा हृदयकमल खिलने में देर नहीं लगेगी ।

       साधना किसी मजदूरी का नाम नहीं है । भगवान को पाना कोई मेहनत-मजदूरी का काम नहीं है । साधन-भजन का एकाध अंश लेकर, एकाध कला सीखकर नियम से साधना करोगे तो साधना का सत्य तुम्हारे हृदय में संचारित होने लगेगा । तुम तनावरहित, भयरहित, चिंतारहित होने लगोगे । अपना जीवन माधुर्यमय बना सकोगे और इसी जन्म में जीवनदाता से मुलाकात भी कर सकोगे । बस, केवल थोड़ी सावधानी की जरूरत है ।

       ...और सावधानी यही है कि चिंता, काम-क्रोध, लोभ-मोहरूपी खाई में गिरे बिना संयम, सदाचार, निर्भयता आदि को अपनाकर महापुरुषों के जीवन की नाईं अपने जीवन को ढालने का प्रयत्न करो । अपने हृदयस्थ प्रभु को प्यार करते-करते उसीमें विश्रांति पाते जाओ । इससे तुम्हारा हृदय मधुर, शांत एवं प्रसन्न होता जायेगा और तुम हृदयेश्वर के प्रसाद को पाने में सफल हो जाओगे । 

(ऋषि प्रसाद-अंक -61)

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