निर्लिप्त जीवन
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निर्लिप्त जीवन

अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती ।

सब तजि भजनु करौं दिन राती ।।

संत तुलसीदासजी कहते हैः ‘हे प्रभु ! तू मुझ पर ऐसी कृपा करना कि सब कुछ छोड़कर मैं दिन-रात तेरा ही भजन करूँ ।’

संत के इन वचनों में ‘सब’ का आशय सभी प्रकार के दोषों से है । महाभारत में भिष्म पितामह व युधिष्ठिर के मध्य मनुष्य के तेरह दोषों यथा – क्रोध, काम, शोक, मोह, विधित्सा, परासुता, मद, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, निंदा, दोषदृष्टि व कंजूसी की उत्पत्ति, वृद्धि व निवृत्ति विषयक विस्तृत चर्चा हुई है ।

संत तुलसीदासजी के वचनों में आये हुए ‘सब’ अर्थात् हम शरीरों में जो अहम् करते हैं उसे छोड़कर, शरीर को ‘मैं’ मानना छोड़कर ‘जो कुछ कर्म करूँ वह सब तेरी बन्दगी हो जाय’ इस प्रकार का भावार्थ यहाँ लेना  है ।

शरीर को ‘मैं’ मानने से ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, उद्वेग, भय, चिन्ता, ईर्ष्यादि दोष उत्पन्न होते हैं और हमारे चित्त में इन दोषों के रहते हम चाहे कितना भी भजन क्यों न करें, आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छूना मुश्किल है और शरीर को ‘मैं’ मानने का दोष निकल जाने पर आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छूना हमारे लिये आसान है जिससे नित्य नवीन रस भी सहज में प्रगट होता है ।

       श्रीमद्भागवत में गौकर्ण अपने पिता आत्मदेव ब्राह्मण को वैराग्य का उपदेश देते हुए कहता हैः

असारः खलु संसारो दुःखरोगविमोहकः ।

सुतः कस्य धनं कस्य स्नेहवात्र्ज्वलतेअनिशम् ।।

‘पिताजी! यह संसार असार है । यह अत्यंत दुःखरूप और मोह में डालनेवाला है । पुत्र किसका ? धन किसका ? स्नेहवान पुरुष रात-दिन दीपक के समान जलता रहता है । ’ (श्रीमद्भागवत माहात्म्यः 4.74)

न चेंद्रस्य सुखं किंचिन्न सुखं चक्रवर्तिनः ।

सुखमस्ति विरक्तस्य मुनेरेकान्तजीविनः ।।

‘सुख न तो इन्द्र को है और न चक्रवर्ती राजा को ही । सुख तो केवल विरक्त, एकान्तजीवी मुनि को है (श्रीमद्भागवत माहात्म्यः 4.75)

“पिताजी! आप अब घर-संसार छोड़कर वनगमन करें । इस घर का मोह त्यागें । विवेकपूर्वक विचार करके यह सब त्याग दें अन्यथा काल जबरदस्ती छुड़वा देगा । पिताजी ! इस शरीर में हाड़, माँस और रूधिर है । इसे अपना मानना छोड़ दें, स्त्री-पुत्रादि की ममता छोड़ दें । यह संसार क्षणभंगुर है । इसमें से किसी भी चीज को अपना मानकर उसमें राग और मोह न करें ।”

वैराग्यरागरसिको भव भक्तिनिष्ठः ।

बस, एकमात्र वैराग्य-रस के रसिक होकर भगवान की भक्ति में लगे रहें ।

यह शरीर भी आपका नहीं है क्योंकि इसे आप सदैव अपना मानकर नहीं रख सकेंगे । फिर यहाँ दूसरा तो अपना है ही क्या? इसलिये हे पिताजी! अब आप गंगातट पर जाकर भगवान का सहारा लेकर भगवन्मय जीवन व्यतीत करें और अपने चैतन्य आत्मदेव को पहचानें।”

महाभारत के शांतिपर्व में ऐसा ही एक सत्पात्र पुत्र देवशर्मा अपने पिता से कहता हैः “इस शरीर की जरावस्था आ जाय, मौत आकर शरीर को ग्रास बना ले और मैं अनाथ होकर मर जाऊँ उसके पहले मुझे परमात्मा की प्राप्ति कर लेने दें । जिस प्रकार हिरन जंगल में हरा-हरा घास जबाते हों और अचानक सिंह आकर उन पर हमला करे तो उनकी क्या हालत हो जाय? इसी प्रकार संसार के मनुष्य तेरा-मेरा करके मोह-माया का चिंतन करते हैं और कालरूपी सिंह आकर कब किसे उठाकर ले जाय उसका कुछ पता नहीं है । इसलिये मुझे बाल्यकाल से ही भजन करने दीजिये ।”

 दुर्लभो मानुषो देहोः देहिनां क्षणभंगुरः ।

तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम् ।।

मनुष्य शरीर दुर्लभ और क्षणभंगुर है । ऐसे क्षणभंगुर देह में भगवान के भक्त और संतों का मिलना तो उससे भी दुर्लभ है । ऐसी दुर्लभ अवस्था मुझे प्राप्त हुई है । अतः हे पिताजी! आप मुझे इस मौके का लाभ लेने दें । यह जीवन बहती हुई धारा के समान है । जिस प्रकार बती नदी की धारा समुद्र से जा मिलती है, उसी प्रकार जीवन की आयुष्य-धारा एक दिन मौत के सागर में जा मिलती है । यह जीवन मृत्यु के सागर में समा जाय उसके पहले मुझे अमर आत्मा के किनारे पहुँच जाने दें । मेरी आँख सदा के लिए बंद हो जाय उसके पहले मुझे मेरे प्रभु का ध्यान कर लेने दें । मेरे हृदय की धड़कनें बँद हो जाय उसके पहले मेरे हृदयेश्वर प्रभु का अनुभव मुझे कर लेने दें । मेरा शरीर वृद्ध  हो जाए... आँखें कमजोर हो जायें उसके पहले, कान कमजोर हो जाय उसके पहले और पैरों की शक्ति क्षीण होने लगे उसके पहले मैं संतदर्शन करके हरिकथा सुन लूँ और हरि को पाने की परमेश्वरीय यात्रा कर लूँ । अतैव हे पिताजी ! मैं आपसे कुछ नहीं माँगता हूँ, केवल थोड़े-से समय की याचना करता हूँ, जिससे मैं अपने आत्मा का उद्धार कर सकूँ । अपनी इन्द्रियों को मन में, मन को बुद्धि में तथा बुद्धि को बुद्धिदाता परमात्मा में लीन करने से मेरी मति ऋतुम्भरा प्रज्ञा  हो जाएगी । फिर मैं इच्छारहित होकर संसार में विचरण करूँगा लेकिन मुझे संसार का किंचित् भी लेप नहीं होगा । अभी मैं कुछ करता हूँ तो मुझे कर्त्ता और भोक्ता का भाव पकड़ लेता है । कर्त्ता और भोक्ता के भाव से हम जो कुछ कर्म करते हैं वह बंधनरूप हो जाता है ।

अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती ।

सब तजि भजनु करौं दिन राती ।।

‘सब’ कर्त्ता-भोक्ता भाव में छुपा हुआ है । आँख देखती है तो अहम् कहता है कि ‘मैं देखता हूँ’ । कान सुनते हैं तो अहम् बोलता है कि ‘मैं सुनता हूँ’ । जिह्वा बोलती है तो अहम् कहता है कि ‘मैं बोलता हूँ ’ । मन सोचता है तो अहम् बोलता है कि ‘मैं सोचता हूँ’। बुद्धि निर्णय करती है तो अहम् बोलता है कि ‘मेरा निर्णय है’ ।  लेकिन वास्तव में ‘मैं कौन हूँ ’ इसका हमें पता ही नहीं है ।

जिस प्रकार केले के वृक्ष का तना पत्तों का समूह होने से हमें मोटा दिखता है, उसी प्रकार इन्द्रियों में अहम्  करके जीव अपने को कुछ मानता है लेकिन अहंकार को खोजेंगे तो कुछ निकलेगा ही नहीं, इसलिये मुझे मेरे आत्मदेव को खोजने दो ।”

पड़ा रहेगा माल खजाना, छोड़ त्रिया सुत जाना है ।

कर सत्संग अभी से प्यारे, नहीं तो फिर पछताना है ।।

“हे पिताजी! इस देह को चाहे जितना भी खिलाएँगे-पिलाएँगे लेकिन अंत में उसे अग्नि में ही जलाना है । इस शरीर को अग्निदान मिले, इससे पहले में आत्मा-परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लूँ । जरावस्था में आँखों की देखने की शक्ति क्षीण हो जाय, कान सुन न सकें, पैरों में चलने की शक्ति कम हो जाय, परिजन हमारी हँसी उड़ावें उसके पहले मैं अपने परमात्मा को प्राप्त कर लूँ । इस शरीर करो परिजन जला दें, उसके पहले मैं शरीर में छुपे हुए अहंकार को अपने गुरुदेव की ज्ञानाग्नि में जलाकर स्वाहा कर दूँ और निरहंकार नारायण के दर्शन कर लूँ ।”

ऐसी ही बात दक्ष प्रजापति की मानसपुत्री केतकी अपने पिताजी से कहती हैः “पितजी ! मैं सयानी होने लगी हूँ, इसलिये आप मेरी शादी करवाने का चिन्तन करते हैं । आप किसी देव के साथ मेरा विवाह करवाएँगे लेकिन देव भोगी होते हैं । मेरे शरीर का उपयोग भोग के लिए होगा और मृत्यु के समय तो मुझे अकेला ही मरना पड़ेगा । पति मुझे छोड़कर जाएगा अथवा तो मैं पति को छोड़कर जाऊँगी । पिछले जन्म में भी मेरा कोई पति रहा होगा । ऐसे मेरे कितने ही जन्म बीत गये होंगे । अब आपके घर मेरा जन्म हुआ है  तो किसी देव के साथ मेरा विवाह करावाकर झंझट में फँसाने की चिन्ता छोड़कर आप मुझे देवों के देव परमात्मादेव की भक्ति करने दें । अब मुझे विकारों में नहीं फँसना है बल्कि ‘सब’ तजकर भजन करना है ।”

दक्ष प्रजापति ने पुत्री को बहुत समझाया लेकिन पुत्री की तीव्र जिज्ञासा देखकर वे सहमत हो गये ।

केतकी कहती हैः “पिताजी ! आप मुझे आशीर्वाद दीजिये । मैं परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए तप करने जाती हूँ ।”

पिता के आशीर्वाद लेकर केतकी उत्तराखंड की ओर निकल पड़ी । वह युग सात्त्विग युग था । वर्तमान युग की तरह खान-पान की दुर्दशा तथा आँखों में पाप नहीं था । लोगों की बुद्धि पवित्र थी । केतकी बद्रीनाथ की तरफ देवगंगा में झोपड़ी बाँधकर रहने लगी । वह प्रातःकाल उठकर परमात्मा से प्रार्थना करतीः ‘हे प्रभु ! मैं अपनी आत्मा का उद्धार कैसे करूँ? हे अन्तर्यामी आत्मदेव ! तू ही मुझे प्रेरणा देना ।’

केतकी ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ब्रह्मचिन्तन करती थी इसलिये उसका ब्रह्मतेज बढ़ता जाता था । शुद्ध, प्राकृतिक वातावरण में रहती हुई वह प्राणायाम करती तथा कन्दमूल का ही आहार लेती थी ।

प्राचीनकाल में त्रिकाल संध्या का विधान था । त्रिकाल संध्या में प्राणायाम, प्रणव का दीर्घ गुंजन, वैदिक अथवा गुरुप्रदत्त मंत्र का जप साधक की आत्मोन्नति करता है । केतकी भी पूर्ण निष्ठा के साथ त्रिकाल संध्या के इस नियम का पालन करती थी । ऐसा करते-करते कुछ माह बीत गये ।

एक बार ईश्वर की आह्लादिनी शक्ति महामाया ने विचार किया किः ‘चलकर केतकी की परीक्षा ली जाय । केतकी का तप बढ़ रहा है लेकिन तप के साथ नम्रता आई है या अहंकार बढ़ा है ?’

जैसे विश्वामित्र का तप बढ़ा था तो साथ-साथ उनमें अहंकार की वृद्धि भी हुई थी किन्तु वशिष्ठजी का तप बढ़ा था तो उनमें मधुर आत्मज्ञान का प्राकट्य हुआ था । वशिष्ठजी को आत्मज्ञान सरलता से समझ में आ गया जबकि विश्वामित्र को ठोकर खाने के बाद समझ में आया था । इसलिये तुलसीदासजी ने कहा हैः

सरल सुभाव न मन कुटिलाई ।

जथा लाभ संतोष सदाई ।।

केतकी की परीक्षा लेने के लिए भगवान की महामाया ने गाय का रुप लिया । केतकी तप तो करती है लेकिन उसमें तप का अहंकार उठ खड़ा हुआ है । ईश्वर की महामाया गाय का रूप लेकर केतकी की झोपड़ी के आगे ‘हम्मा... हम्मा....’ करके रम्भाने लगी तो केतकी को हँसी आई ।

उसे अभी तक आत्मप्रकाश नहीं हुआ है कि गाय में भी मेरा ही राम रम रहा है । गाय तीन बार रम्भाई लेकिन उसने गाय का आदर तो नहीं किया अपितु मजाक उड़ाया । गाय फिर दो बार रम्भाई ।

आपमें अहंकार होगा तो दूसरों की मजाक करेंगे और प्रेम होगा तो दूसरों में भी सद्गुण दिखने लगेंगे ।

जब पाँच बार रम्भाने के बात भी केतकी की समझ नहीं लौटी तो महामाया ने अपना तेजस्वी रूप धारण करके उसे शाप दियाः “तू अपने को क्या समझती है ? स्त्री में पालनशक्ति और प्रजननशक्ति अर्थात् बालक को जन्म देने की और उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करने की शक्ति है । तू ब्रह्मचारिणी होकर रहती है फिर भी धैर्य धारण नहीं करती और स्वयं को धार्मिक मानती है । अभी तक तेरे अहंकार का विलय नहीं हुआ है अपितु उसमें और अधिक वृद्धि हो रही है । तू पति न होने का अहंकार करती है लेकिन सुन लेः तुझे एक नहीं, पाँच-पाँच पतियों की भार्या बनना पड़ेगा । ”

मानसपुत्री केतकी को शाप देकर आद्यशक्ति अन्तर्धान हो गई । केतकी स्नान करने गई लेकिन उसे आद्यशक्ति का दिया हुआ शाप स्मरण आने लगाः ‘एक नहीं, तुझे पाँच-पाँच पतियों की भार्या बनना पड़ेगा । विधाता ! यह क्या?’ स्नान करते-करते उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी ।

सुबह का समय था । इन्द्र, यम, वायु आदि पाँच मित्र घूमने निकले । उन्होने देखा कि एक सुन्दर तपस्विनी, तेजस्वी सुन्दरी नदी की धारा में रोती हुई खड़ी थी । उसके आँसुओं की प्रत्येक बूँद, जो जल में गिरती थी, सुवर्णमय कमल बन जाती थी । उसे देखकर उनके मन में थोड़ी कामवृत्ति जागृत हुई । मन से तो थोड़ा पाप हुआ लेकिन तन पर काबू रखकर यम ने पूछाः “तुम्हारे पिताजी कौन हैं?” तुम कहाँ से आती हो? तुम मेरे साथ शादी कर लो । ”

तब केतकी ने कहाः “मैं चिंतित हूँ, शाप से पीड़ित हूँ और आप मुझ अबला से इस तरह की अनुचित बातें करते हैं ?” इतना कहकर केतकी एक मिनिट अनजाने ही अन्तर्यामी परमात्मा में शान्त हो गई । ‘मेरा कोई सहारा नहीं है’ ऐसा सोचते ही उसका ‘सब कुछ’ त्याग हो गया । इतने में एक परम तेजस्वी दिव्य योगी पुरुष आये और यम को उन्होंने एक गुफा में बंद कर दिया । एक-क करके सभी देवताओं ने केतकी के विवाह का प्रस्ताव रखा और वे योगी पुरुष उन सबको गुफा में बंद करते गये । अन्त में इन्द्र ने आकर केतकी से कहाः “मैं तुम्हैं अपनी पटरानी बनाऊँगा ।”

केतकीः “आपके पूर्व जो देवता आये थे, उनके जो हाल हुए हैं, क्या आपको भी अपने वैसे ही हाल करने हैं ?”

इन्द्रः “मेरे मित्र कहाँ गये  ?”

        केतकीः “वे सामने गुफा में बंद हैं ?”

        “उन्हें किसने बंद किया?”

        “कोई सिद्ध योगी महाराज आकर समाधि में बैठे हैं, उन्हौंने बंद किया है ।”

        इन्द्रदेव जानते थे कि योगीराज को कैसे प्रसन्न करना है । योगीराज के चरणों में वन्दन करते हुए उन्होंने कहाः “मैं इन्द्र हूँ । अपने नेत्र खोलकर आप मुझे आशीर्वाद प्रदान करें ।”

तब योगीराज आँखें खोलकर बोलेः “इन्द्र! तूने मर्यादा की अवहेलना नहीं की है इसलिये मैं तुझे मुक्त करता हूँ । केतकी के लिए तुम पाँचों मित्रों के मन में पाप आ गया था इसलिये देवयोनि  से तुम्हारा पतन होगा । केतकी ने अहंकार के कारण गौमातापरुपी भगवान की आह्लादिनी शक्ति का अपमान किया था इसलिये केतकी को भी मनुष्य देह में जन्म धारण करना पड़ेगा । केतकी दूसरे जन्म में द्रौपदी होगी और आप पाँचों देव पाँच पांडव बनोगे ।”

आज बहुत से लोग द्रौपदी के पाँच पति देखकर कहते हैं कि ‘हम दूसरे पति करें तो क्या हरकत है ?’ यह बात  सोचने के पहले हमें यह समझ लेना, जान लेना चाहिये कि  द्रौपदी अगले जन्म में कौन थी । द्रौपदी के पाँच पति होने का विधान  विधि ने बना दिया था, इसीलिये कुंतीजी के श्रीमुख से निकल गया किः “तुम जो लाये हो उसे पाँचों भाई बाँट लो ।”

पांडवों को यह अनर्थ लगा लेकिन वेदव्यासजी ने प्रगट होकर बतलाया किः “यह अनर्थ नहीं है । जो होनेवाला होता है वही सत्पुरुषों के श्रीमुख से निकलता है । द्रौपदी कोई साधारण स्त्री नहीं है । विधि को जो करवाना था, वही आपके श्रीमुख से कहला दिया ।”

इस प्रकार शापित केतकी ने द्रौपदी के रूप में अवतार धारण किया तथा भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते-करते भक्ति को पा लिया । भगवान श्रीकृष्ण उनके साथ ही रहते थे अतः द्रौपदी का दूसरा नाम कृष्णा भी पड़ा ।

स्वतःसिद्ध है कि किया हुआ जप, तप, ध्यान, भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता है । द्रौपदी ने केवल एक मिनट ‘सब’ तजकर भजन किया तो भगवान श्रीकृष्ण का सान्निध्य मिल गया  लेकिन जो तीन मिनट ‘सब’ तजकर भजन करता है उसे कृष्ण-तत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है । हम भजन तो करते हैं लेकिन शरीर में अहंता और सम्बन्धित वस्तु-व्यक्ति में ममता रखकर करते हैं ।

जीव का अहंकार ही महा दुःखदायक है क्योंकि वह अनात्मा शरीर में आत्माभिमान कराता है । इन्द्रियाँ अपने विषयों को ग्रहण करती हैं लेकिन अहंकारी विमूढ़ मनुष्य अपने को कर्त्ता मानता है । ऐसे ही मनुष्य सुख-दुःख भोगते हैं और राग-द्वेष की अग्नि में जलते हैं लेकिन जिसे अनात्मा शरीर में अहम् भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्त्तृत्त्व-भोक्तृत्त्व से लिप्त नहीं होती, ऐसे महापुरुष इस अनर्थरूप संसार-बंधन से मुक्त हो जाते हैं ।

ऋषि प्रसाद 

 

 

 

 

 

 

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