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सर्व मांगल्यकारी वैदिक रक्षासूत्र
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सर्व मांगल्यकारी वैदिक रक्षासूत्र

भारतीय संस्कृति में रक्षाबंधन पर्व’ की बड़ी भारी महिमा है । इतिहास साक्षी है कि इसके द्वारा अनगिनत पुण्यात्मा लाभान्वित हुए हैं फिर चाहे वह वीर योद्धा अभिमन्यु हो या स्वयं देवराज इन्द्र हो । इस पर्व ने अपना एक क्रांतिकारी इतिहास रचा है ।

वैदिक रक्षासूत्र

रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है । यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद्भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामथ्र्य असीम हो जाता है ।

कैसे बनायें वैदिक राखी ?

वैदिक राखी बनाने के लिए एक छोटा-सा ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें । उसमें (१) दूर्वा (२) अक्षत (साबूत चावल) (३) केसर या हल्दी (४) शुद्ध चंदन (५) सरसों के साबूत दाने - इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े में बाँधकर सिलाई कर दें । फिर कलावे से जोड़कर राखी का आकार दें । सामथ्र्य हो तो उपरोक्त पाँच वस्तुओं के साथ स्वर्ण भी डाल सकते हैं ।

वैदिक राखी का महत्त्व

वैदिक राखी में डाली जानेवाली वस्तुएँ हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जानेवाले संकल्पों को पोषित करती हैं ।

(१) दूर्वा : जैसे दूर्वा का एक अंकुर जमीन में लगाने पर वह हजारों की संख्या में फैल जाती है, वैसे ही ‘हमारे भाई या हितैषी के जीवन में भी सद्गुण फैलते जायें, बढ़ते जायें...’ इस भावना का द्योतक है दूर्वा । दूर्वा गणेशजी की प्रिय है अर्थात् हम जिनको राखी बाँध रहे हैं उनके जीवन में आनेवाले विघ्नों का नाश हो जाय ।

(२) अक्षत (साबूत चावल) : हमारी भक्ति और श्रद्धा भगवान के, गुरु के चरणों में अक्षत हो, अखंड और अटूट हो, कभी क्षत-विक्षत न हो - यह अक्षत का संकेत है । अक्षत पूर्णता की भावना के प्रतीक हैं । जो कुछ अर्पित किया जाय, पूरी भावना के साथ किया जाय ।

(३) केसर या हल्दी : केसर की प्रकृति तेज होती है अर्थात् हम जिनको यह रक्षासूत्र बाँध रहे हैं उनका जीवन तेजस्वी हो । उनका आध्यात्मिक तेज, भक्ति और ज्ञान का तेज बढ़ता जाय । केसर की जगह पिसी हल्दी का भी प्रयोग कर सकते हैं । हल्दी पवित्रता व शुभ का प्रतीक है । यह नजरदोष व नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है तथा उत्तम स्वास्थ्य व सम्पन्नता लाती है । 

(४) चंदन : चंदन दूसरों को शीतलता और सुगंध देता है । यह इस भावना का द्योतक है कि जिनको हम राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में सदैव शीतलता बनी रहे, कभी तनाव न हो । उनके द्वारा दूसरों को पवित्रता, सज्जनता व संयम आदि की सुगंध मिलती रहे । उनकी सेवा-सुवास दूर तक फैले ।

(५) सरसों : सरसों तीक्ष्ण होती है । इसी प्रकार हम अपने दुर्गुणों का विनाश करने में, समाज-द्रोहियों को सबक सिखाने में तीक्ष्ण बनें ।

अतः यह वैदिक रक्षासूत्र वैदिक संकल्पों से परिपूर्ण होकर सर्व-मंगलकारी है । यह रक्षासूत्र बाँधते समय यह श्लोक बोला जाता है :

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।

तेन त्वां अभिबध्नामि१ रक्षे मा चल मा चल ।।

इस मंत्रोच्चारण व शुभ संकल्प सहित वैदिक राखी बहन अपने भाई को, माँ अपने बेटे को, दादी अपने पोते को बाँध सकती है । यही नहीं, शिष्य भी यदि इस वैदिक राखी को अपने सद्गुरु को प्रेमसहित अर्पण करता है तो उसकी सब अमंगलों से रक्षा होती है तथा गुरुभक्ति बढ़ती है ।

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 भद्राकाल में रक्षासूत्र बँधवाने से होती है हानि 


पूज्य बापूजी कहते हैं : "जैसे शनि की क्रूर दृष्टी हानि करती है, ऐसे ही शनि की बहन भद्रा, उसका प्रभाव भी नुकसान करता है । अत: भद्राकाल  रक्षासूत्र नहीं बाँधना चाहिए । 

रावण ने भद्राकाल में सूर्पणखा से रक्षासूत्र बँधवा लिया, परिणाम यह हुआ कि उसी वर्ष में उसका कुलसहित नाश हुआ । इस काल में कोई बहन अपने भाई को राखी न बाँधे । 

भद्राकाल की कुदृष्टि से कुल में हानि होने की संभावना बढ़ती है ।" 

इस वर्ष 2016 में रक्षा बंधन का त्यौहार 18 अगस्त, को मनाया जाएगा. इस वर्ष 2016 में रक्षा बंधन का त्यौहार 18 अगस्त, को मनाया जाएगा ।

पूर्णिमा तिथि का आरम्भ 17 अगस्त 2016 को हो जाएगा. परन्तु भद्रा व्याप्ति रहेगी ।  इसलिए शास्त्रानुसार यह त्यौहार 18 अगस्त को 5:55 से 14:56 या 13:42 से 14:56 तक मनाया जा सकता है ।

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अहमदाबाद आश्रम में रक्षाबंधन कार्यक्रम

सामूहिक यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदलनाः  सुबह ८ बजे 

पूज्य बापूजी का विडियो सत्संगः  सुबह ९ से १०

श्री आशारामायणजी का पाठ सुबहः  १० से १०-३०

श्रीगुरुपादुका पूजन सुबहः  १०-३० से ११-३०

दोपहर की संध्या दोपहरः ११-४५ से १२-४५

पूज्य बापूजी का विडियो सत्संग दोपहरः  ३ से ४

सामूहिक जप शामः  ४ से ५

शाम की संध्या  व सत्संग शामः  ६-३० से

* रक्षाबंधन पर्व पर ४ अमृत कर्म - नूनत जनेऊ धारण, पंचगव्य पान, भस्म धारण, रक्षासूत्र बंधन । 

* श्रावणी पूर्णिमा पर्व पर धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है । इसे वर्ष में एक बार धारण करने से मनुष्य वर्षभर रक्षित हो जाता है ।(भविष्य पुराण)

* रक्षाबंधन समय :- सूर्योदय से दोपहर ३ बजे तक उत्तम समय है । रात्रि ९ बजे तक बाँध सकते हैं ।