हे गुरुवर ! कामना रहित गुरु भक्ति कैसे करें कि मन में कोई कामना ना रहे और आप से प्रीति हो जाये ?
कामना रहित गुरु भक्ति कैसे करें ?
अरे भगवान को पाने की कामना रखने से दूसरी कामनाएँ चट हो जाती हैं | फिर भगवान को पाने की कामना, कामना में नही गिनी जाती तो हो गये कामना रहित |
आप से प्रीति कैसे करें ?
तो हमको आप क्या मानते ? ये दाड़ी वाले बाबा इधर बैठे हैं ऐसा मान के प्रीति करेंगे, इधर घुसेंगे, चिपकेंगे, इसका नाम प्रीति है क्या ? अथवा मेरे पैर दबाएँगे अथवा मेरे को कुछ खिलाएंगे उसको प्रीति बोलते हैं तो आपको वहम है |
आप मेरे मुझ को प्रीति करिये, तो मेरा तो चित्त वपु विभू व्याप्त है , अर्थात आप अपने आप को प्रीति करेंगे तो मुझे ही करेंगे | आप अपने आप को प्यार करिये, कि सुख रूप हूँ, चेतन रूप हूँ, अमर रूप हूँ | दुःख से, चिन्ताओं से, भय से, कल्पनाओं से मेरा कुछ लेना देना नहीं है | ऐसे करके अपने को प्रीति करिये तो मेरे को कर लिया और मेरे को इस रूप में माना तो अपने को प्रीति हो गयी क्योंकि तुम और हम आकृति से दो दिखते हैं वास्तव में एक ही तत्व हैं हम सब | ठीक है लाला, समझ में आ गया ऐसा दिव्य ज्ञान |
हे गुरुवर ! कामना रहित गुरु भक्ति कैसे करें?