आत्मस्वरूप निष्क्रिय, अव्यक्त और तृप्त होते हुए भी वृत्तियों से कैसे जुड़ जाता है ? आत्मा तो निष्क्रिय है, अव्यक्त है और तृप्त है, फिर वृत्तियों से कैसे जुड़ जाता है ? न जुड़े इसका कोई उपाय बताने की कृपा करो |
न जुड़े ऐसा उपाय मैं बता ही नही सकता हूँ क्योंकि आत्मा कभी जुड़ा ही नही है तो न जुड़े कैसा उपाय बताऊँ | आत्मा वृत्तियों से नही जुड़ता,तुम्हारा अंतःकरण का स्फुरण वृत्तियों से जुड़ता है | वो वृत्तियाँ ही वृत्तियों में घूम रही है| आत्मा सदा दृष्टा है, असंग है, अच्युत है, अपनी महिमा में ज्यों का त्यों है, आत्मा कभी किसीसे जुड़ा था अथवा जुड़ा है या जुड़ेगा, ऐसा हो नही सकता | जब-जब जुड़ा, जुड़ता है तो चित्त जुड़ता है,अंतःकरण जुड़ता है, भाव जुड़ता है और जुड़ते, टूटते, बदलते रहते हैं |
पिक्चर में हँसी का दृश्य आता है, कहीं चोरी का आता है, कहीं बदमाशी का आता है, कहीं साहूकारी का आता है, कहीं गुंडागर्दी का आता है, ये सारे दृश्य दर्शक के विनोद के लिए हैं | ऐसे ही चित्त में सब हो रहा है ऐसा चित्त की दशा को चित्त की दशा समझकर उससे अपना सबंध विच्छेद कर दे अथवा तो सत्वगुण बढ़ा ले, सात्विक खान-पान, सात्विक रहन-सहन तो चित्त सात्विक होगा तो सुखाकर वृति बनी रहेगी और फिर उस वृति से भी परे आत्मा की तृप्तता में टिक जाओगे |
आत्मस्वरूप निष्क्रिय, अव्यक्त और तृप्त होते हुए भी वृतियों से कैसे जुड़ जाता है ?