गुरुदेव हम कैसे जाने, कैसे पहचाने की यह आत्मा की ही आवाज है | कहीं भ्रमित होकर आत्मा को अनात्मा की आवाज, मन की बेईमानी को भी आत्मा की आवाज न मान लें |
आत्मा की आवाज आत्मवेता को ही आती है | बाकी के लोगों को अपने-अपने संस्कारो के अनुसार आवाजे मिलती हैं | जैसे वल्लभाचार्य बड़े आचार्य है, लाखो- लाखो साधु उनको मानते हैं | रामानुजाचार्य बड़े आचार्य है, रामानुज सम्प्रदाय के | शंकराचार्य बड़े आचार्य है जगद्गुरु शंकराचार्य | तो ये जो इन्होने वल्लभाचार्य ने, रामानुजाचार्य ने, त्र्यम्भकाचार्य ने जब ग्रंथ लिखा तो उन्होंने आरंभ में कहा कि हमारा इसमें कुछ भी नहीं , ये भगवत् प्रेरणा से लिख रहे हैं और उन्होंने सच्चाई पूर्वक लिखा, वो झूठ बोलने वाले महापुरुष नहीं हैं | लेकिन तीनो के ग्रंथ, सिद्धांत, अलग-अलग दिखाई देते हैं | जब भगवान की प्रेरणा से लिख रहे हैं तो भगवान तो एक है | वल्लभाचार्य के हृदय में जो भगवान है, वही रामानुजाचार्य के हृदय में, वही त्र्यम्भकाचार्य के हृदय में है | फिर उन आचार्यो के सिद्धांत अलग-अलग कैसे हुए ? कि भगवत् प्रेरणा हुई, सदभाव तो हुआ, लेकिन संस्कार का आइना अपना काम करता है |
जैसे एक लड़का आया वो अनुष्ठान करने गया, बहुत अच्छी तरह से अनुष्ठान में लगा और बार बार अंदर से जा बेटा शादी कर ले, जा बेटा शादी कर ले | आया गुरूजी के पास बोले भगवान प्रेरणा कर रहे है कि बेटा शादी कर ले | गुरूजी ने बोला ये भगवान प्रेरणा नही करता है, तेरा मन ही तेरा बाप बन जाता है और तेरे को बेटा बना रहा है जा शादी कर ले | काम-वासना भगवान की प्रेरणा का रूप ले आई है | ऐसे ही लोभी के अंदर धन बढ़ा ले ये वासना, राजा को स्वप्ना आया के खूब-खूब ऐसा करके अपना तिजोरी भर लो अल्लाह ताला | सुबह मंत्री को बोला कि अल्लाह ताला ने मेरे को बोला है कि अपने खजाने को छलका दो | मंत्री ने कहा ये अल्लाह ताला की प्रेरणा नही है, लोभ वृति ने अल्लाह ताला का ढोंग किया है |
तो भगवत् प्रेरणा तो महाराज भगवत् प्राप्त महापुरुषों को भी होती है तो उस में भी वो सावधान रहते हैं कि अपना संस्कार जुड़ गया है कि सचमुच में भगवत् संकल्प है इसीलिए जिस किसी बात को भगवत् प्रेरणा समझकर नहीं लगना चाहिए | जिस बात में अपना स्वार्थ ना हो, शास्त्र सम्मत हो, महापुरुष की सम्मति हो, करने में आम आदमी के सामने करने में लज्जा न आती हो, किसी का अहित न होता हो | भगवत् प्रेरणा किसीका अहित करने वाली नही होती है | जय रामजी की | भगवत् प्रेरणा अहं पोषने वाली नहीं होती | भगवत् प्रेरणा तो महाराज भगवत् प्राप्त महापुरुष के द्वारा ही भगवत् सत्ता निखालस्ता से काम करती है | बाकी तो अपन लोग तो अपना-अपना वासना का आइना लगाकर भगवत् प्रेरणा का मजाक उड़ाते हैं या हम गलत फायदा उठाते हैं | कभी-कभी सच्चा फायदा भी उठाते हैं | अंतःकरण अगर साफ-सुथरा है, तटस्थ है तो भगवत् प्रेरणा भी होती है ठीक से |
गुरुदेव हम कैसे जाने की यह आत्मा की ही आवाज है ?