Wednesday, June 19, 2013
 
 

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पूज्य गुरुदेव, संसार सत्य क्यों भासता है ?संसार मिथ्या है, यह बार बार सत्संग में सुनने को मिलता है, मगर यह सत्य क्यों भासता है ?

 


संसार नश्वर है, मिथ्या है, धोखा है, यह बार बार सुनते हैं फिर भी संसार में मन क्यों भागता है ? उधर के भागने की आदत पुरानी है और सुना है उसमें ज़रा दृढ़ता कम है इसीलिये बार बार भागता है, भागे तो भागे लेकिन तुम जागे रहो , यह मन भाग रहा है अब मैं भागु या जागु, मैं भगवान का हूँ, हे भगवान मन भाग रहा है अब इसके पीछे मैं क्यों भागु, मैं तो तेरा हूँ, ऐसे करते करते भगवान के भाव में आ जाओ, तो भागने से बचाव हो जायेगा, जैसे घर में कोई कुत्ता बिल्ली आ जाए तो आप दूध घी दही की रक्षा कर लेते हो जोर से आवाज लगाकर , ठीक ऐसे ही मन की रक्षा कर लो|

हे हरि, हे गोविन्द, हे प्रभु, आ गये चोर, संसार में भागने वाली वासना आ गयी महाराज, ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ प्रभुजी, प्यारेजी, गुरूजी ॐ, हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ हा हा हा तो मन को भगवान में लगा दो और क्या, तुलसीदास जी ने कहा प्रभु यह मेरा हृदय नहीं है यह तो आपका घर है लेकिन इसमें चोर घुस गए हैं कभी काम, कभी क्रोध, कभी लोभ , कभी मोह, ऐसे कई चोर घुस गए हैं आप जरा ख्याल करो|

लोग मुझे साधु बोलते हैं लेकिन मैं तो कभी काम में ,कभी क्रोध में ,कभी लोभ-मोह में फिसलता हूँ| लोग बोलेंगे भगवान का भक्त होकर ऐसा करता है मेरी ज़िन्दगी का भी सवाल है तो आपकी इज्ज़त का भी तो सवाल है |

मम हृदय भवन प्रभु तोरा, ताहि बसे आई बहु चोरा, इसमें बहुत चोर घुस गए हैं , मैं एकल अमित भट मारा कोई सुनत नहीं मोर पुकारा, रघुनायक बेगी करो सम्हारा, जल्दी सम्भाल लो, यह आपके ह्रदय को आप ही सम्भालो नहीं तो विकार इसे नोच लेंगे | महाराज महाराज हरि हरि सुबह शाम कमरा बंद कर के भगवान को पुकारो, रोओ, नाचों , हँसो , लम्बे पड़ जाओ, अंदर से बल मिलेगा, भगवान संभाल लेंगे |


मन संसार में क्यों भागता है ?


 

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