संत के संग से वैराग्य का रंग
Ashram India

संत के संग से वैराग्य का रंग

इंदिरा गुलवाणी पूज्य बापूजी के अन्य कुछ जीवन-प्रसंग बताते हुए कहती हैं :

पूज्य बापूजी अपने साधकों को साधना में आगे बढ़ाने के लिए हर सम्भव प्रयास में रत रहते हैं । पूज्यश्री के जीवन में साधकों, सत्संगियों एवं आम जनों की उन्नति की ऐसी तीव्र लगन देखने को मिलती है कि सत्संग-समारोहों एवं ध्यानयोग शिविरों के दौरान अनेक बार पूज्यश्री अपने आसन करने, दूध लेने एवं भोजन करने का समय भी आगे सरकाकर साधकों को आत्मज्ञान, सहज ध्यान आदि से संतृप्त एवं सुपुष्ट करने में लगे रहते थे । कितने ही लोग इसके साक्षी हैं ।

अपनी सारी आध्यात्मिक कुंजियाँ लुटाने के बाद भी गुरुवर के हृदय में नित्य नवीन उमंगें उभरती रहती थीं कि ‘इन्हें और भी कुछ दे दूँ, आध्यात्मिक प्रसाद लुटाऊँ... कम समय में इनको और अधिक लाभ कैसे हो ?’ यह ये भक्तवत्सल महापुरुष सतत सोचते रहते हैं । नयी-नयी साधनाएँ खोजकर पहले स्वयं अनुभव करते हैं और अपनी कसौटी पर खरी उतरने पर साधकों को सिखाते व कराते रहते हैं । पूज्यश्री कहते थे कि ‘‘जब भी मन में तुम्हें कुछ देने का भाव आता है तो मैं तुम लोगों के बीच आ जाता हूँ ।’’ श्री आशारामायणजी में आता है : ‘नित्य विविध प्रयोग करायें, नादानुसंधान बतायें ।’ बापूजी ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, राजयोग, कुंडलिनी योग आदि सभी साधना-मार्गों के ज्ञाता हैं ।

साधना में आगे बढ़ाना चाहता हूँ

बापूजी पहले गोल-गोल घूमने का सक्रिय ध्यान-प्रयोग कराते थे, जिसमें खड़े-खड़े दोनों हाथ फैलाकर गोल-गोल घूमना होता था । हम घूमते-घूमते कहीं भी गिर पड़ते थे या बैठ जाते थे ।

एक घटना उस समय की है जब सत्संग-मंडप के पास ऊबड़-खाबड़ जमीन और गहरी खाइयाँ थीं । एक दिन बापूजी ध्यान करा रहे थे । मैं ध्यान की अवस्था में ही मंडप के किनारे पर चली गयी और लगभग 40 फीट नीचे खाई में गिर गयी और मुझे इस बात का भान ही नहीं था कि मैं गिर गयी हूँ । आश्रम में मैं नहीं दिखी तो मेरी खोज चालू हो गयी । बहुत ढूँढ़ने पर भी न मिली तो सब चिंतित हो गये और बात बापूजी तक पहुँची । तब पूज्यश्री ने ध्यान लगाया और ध्यान में मेरी स्थिति का पता लगाया और बोले : ‘‘वह नीचे गिर गयी है । जहाँ कचरा आदि डालते हैं न, वहाँ गिरी है । तुम लोग सँभल के जाना, वहाँ पर काँच, काँटे आदि भी पड़े हैं ।’’

चार लोगों को मुझे बाहर निकालने को भेजा । वे आये तो उनमें से किसीको काँच के टुकड़े लगे, किसीको काँटे चुभ गये, किसीके कपड़े फट गये पर इतने ऊपर से गिरने पर भी मुझे कुछ भी नहीं हुआ ! सभीको प्रत्यक्ष हो गया कि जब हम ईश्वर के ध्यान में, सद्गुरु-प्रदत्त शक्तिपात के प्रभाव से ध्यानस्थ होते हैं, उस समय कोई अत्यधिक विकट परिस्थिति भी आ जाय तो भी वे सर्वसमर्थ ईश्वर रक्षा कर लेते हैं ।

भारतवासियों एवं विश्वमानव की तीव्र गति से उन्नति हेतु जुटे हुए तत्त्वज्ञ महापुरुष पूज्य बापूजी ने कुछ समय बाद उस साधना को विराम दे दिया । गुरुदेव बोले : ‘‘मैं अपने साधकों से आध्यात्मिक उड़ान भराना चाहता हूँ । शुरू में नये-नये लोग आते थे तो सक्रिय ध्यान-प्रयोग कराते थे । देहाध्यास मिटाने के लिए यह एक प्रयोग है लेकिन यह साधना है बैलगाड़ी और ताँगे में जाने जैसी । अब भी वही यात्रा चालू रखें तो फिर पूर्णता कब मिलेगी ? मैं तुम लोगों को हवाई यात्रा कराना चाहता हूँ ।

ऐसे दूसरे भी कई प्रयोग हैं लेकिन वे सब क्रियायोग हैं । क्रिया कर्ता के अधीन हैै और क्रिया में कर्तापन का भाव रहता है । क्रिया में उस समय मजा भी आता है, सामान्य से कुछ अच्छा भी लगता है लेकिन फिर साधक वही करता रहा तो क्रिया में बँध जायेगा । बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी अथवा ऊँट की मुसाफिरी में थोड़ा तो मजा आयेगा, पैदल से तो अच्छा लगेगा पर इनकी सवारी थका देगी । हवाई जहाज की मुसाफिरी कम थकायेगी और कम समय में बहुत दूर तक ले जायेगी ।’’

अब तो ऐसी-ऐसी साधना बताते हैं गुरुदेव कि जिनसे सहज ही मन वश हो जाय, बिना कुछ किये सहज में ध्यान लग जाय, जीवन में अविकम्प योग आ जाय । बापूजी कहते हैं कि ‘‘दूसरे लोग जो मनमाना साधन करते हैं, वे 12 साल साधना करके जहाँ पहुँचे हैं वहाँ मेरा साधक 12 सप्ताह में पहुँच सकता है । लाखों लोगों का अनुभव है ।’’

यदि कोई साधक सद्गुरुदेव द्वारा निर्दिष्ट मार्ग छोड़कर ‘इधर अच्छा है, उधर और कुछ मिल जाय...’ ऐसा सोचने लगता है तो उसकी स्थिति दयाजनक हो जाती है । वह बेचारा फँस जाता है, पराधीन हो जाता है । ईश्वरीय सुख, माधुर्य से दूर ही रहता है । उसका ईश्वर उससे दूर ही रहता है ।

ईश्वर के मार्ग पर प्रायः होनेवाला विरोध

आज के युग में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि जब तक संतानें फिल्में देखने जाती हैं, फैशन करती हैं, इधर-उधर की बातों में रची-पची रहती हैं तब तक तो घर के लोगों को कोई समस्या नहीं लगती पर जब वे सत्संग में जाने लगती हैं, ध्यान, जप, समाज-हित के सेवाकार्य आदि करने लगती हैं, ईश्वर के मार्ग पर चलती हैं तो कई बार घर के कुछ लोग चिंतित-से हो जाते हैं । मेरे जीवन में कुछ ऐसा ही हुआ । मुझे सहनशक्ति की परीक्षा लेनेवाली कुछ कठिनाइयाँ भी सहनी पड़ीं । फिर भी जिन सुख-सुविधाओं के लिए सारी दुनिया के लोग पूरी जिंदगी भाग-दौड़ करते रहते हैं, वे सारी सुविधाएँ छिन जाने पर भी मुझे कोई शिकायत न थी क्योंकि बापूजी ने उस भगवद्-सुख की झलक दिखा दी थी जिसके आगे संसारी सुख की कोई कीमत नहीं होती । संतों के पास उस आत्मसुख का खजाना होता है । जब उसकी एक झलक मिल जाती है तो सारा जीवन ही परिवर्तित हो जाता है ।

संत के संग से वैराग्य का रंग

मैं इतनी फैशनबाज थी कि अपने पिताजी की कपड़े की दुकान में जो भी ड्रेस पसंद आती, उठाकर ले आती एवं बाहर से भी खरीदकर ले आती । बापूजी ज्ञान-वैराग्य की जीती-जागती मूरत हैं । उनके दर्शन-सत्संग के प्रभाव से मेरी वह आदत कहाँ चली गयी, पता ही न चला । सत्संग से जीवन में आनेवाले उदारता, सहनशीलता, मधुरता आदि सद्गुणों के कारण पूरे मुहल्ले के लोग बोलने लगे कि ‘कितनी बदल गयी अब यह !’

मेरे पिताजी बोलते थे कि ‘यह पहले तो फैशन करती थी, सारा दिन गाने सुनती थी, पिक्चरें देखती थी... अब न शृंगार करती है, न बाहर घूमने जाती है । केवल तुलसी-माला और सादे सफेद कपड़े पहनती है बस । रोज फरमाइश करनेवाली यह अब कुछ माँगती नहीं, न बातें करती है, न खाने का शौक, न बनाने का शौक... सब कैसे खत्म हो गया !’ वे मुझ पर तरस खाकर बोलते थे कि ‘यह जीवन कैसे जी पायेगी ?’ पर उनको यह पता नहीं था कि भगवान के रास्ते चलनेवालों को कैसा रस मिलता है !

संयम व वैराग्य से ओतप्रोत जीवन एवं उपदेशों का चमत्कार !

एक समय था जब मुझे ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं था, बस खाओ-पियो, मौज करो । इससे ऐसा कई बार मन में हुआ कि ‘अब मैं सत्संग में नहीं जाऊँगी ।’ यही तुच्छ लोगों की-सी तुच्छ मानसिकता थी मेरी लेकिन फिर रहा नहीं जाता और मैं सत्संग सुनने पहुँच जाती । मैं तो आधुनिकता के रंग में रँगी हुई थी, इच्छाओं की जंजीरों से जकड़ी थी लेकिन बापूजी के सत्संग में आते-जाते कब मेरा मन बदल गया, पता ही न चला । भगवत्सुख मिलने से संसार का सुख फीका लगने लगा । योगवासिष्ठ पढ़ने से ऐसा लगता कि ईश्वरप्राप्ति के सिवाय कुछ भी सार नहीं । मुझे भी आश्चर्य होता है कि ‘मैं संत के पास शादी का आशीर्वाद लेने आयी थी और ऐसा पवित्र वैराग्य का रंग चढ़ा कि जीवनभर ब्रह्मचर्य-व्रत पालने का, संयमी, अविवाहित जीवन जीने का संकल्प ले लिया !’

यह है पूज्यश्री के संयम और वैराग्य से ओतप्रोत जीवन एवं उपदेशों का चमत्कार ! जिनके सत्संग-सान्निध्य में आनेवालों का जीवन इतना संयमी-सदाचारी हो जाता है तो फिर उनमें कैसा संयम-सदाचार का बल होगा !! पूज्यश्री के जीवन में संयम आदि का कितना महत्त्व है यह तो लाखों लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है ।

जिन महापुरुष ने जीवनभर ब्रह्मचर्य की महिमा जन-जन तक पहुँचायी, उनके ऊपर ही कुछ मूर्खों ने कैसा गंदा आरोप लगवाया !

बापूजी पूर्ण समर्थ और अवतारी महापुरुष हैं । उनकी महिमा अल्पज्ञ और मूढ़ लोग नहीं समझ सकते । मैं सत्संग का ‘स’ भी नहीं जानती थी पर बापूजी की कृपा ने सत्संग का ऐसा रंग लगा दिया, ऐसा ध्यान लगा दिया जो शायद वर्षों की साधना करनेवालों को भी कठिन होगा ।  (क्रमशः)


-------------------

Indira Gulwani shares some life incidents of Pujya Bapuji:

 

Pujya Bapuji makes every possible effort to help his sadhakas advance on the path of Sadhana (spiritual discipline). The interest in uplifting the sadhakas, satsang lovers and common people is observed so intense in Bapuji’s life, that many a time during satsang programmes and meditation intensives, he remained engaged in satisfying and nourishing the sadhakas by introducing them in sahaja meditation and imparting self-knowledge, deferring his daily routine like doing yogasana, drinking milk and even eating meals. Many have witnessed this.

Even after distributing all of his spiritual techniques and keys, new ambitions would arise in His heart to give out even something more, to distribute spiritual gifts so that they could attain more benefits in less time. Bhaktavatsala (one who is kind to his Bhaktas) great man keeps thinking this constantly. He discovers new techniques of Sadhana, tries out them himself and then teaches the same to sadhakas in theory and practice when he is satisfied with their veracity. Pujyashri would say: “Whenever my mind is inclined to give you something, I come to you all.” As states Shri Asharamayana: “He makes the sadhakas experiment various techniques; shows the technique of Nadanusandhana (meditation on Nada or sound)”. Bapuji is a Master of all of the paths of Sadhana – Jnana Yoga, Bhakti Yoga, Karma Yoga, Raja Yoga, Kundalini Yoga, etc.

I want you to progress on the path of Sadhana

Bapuji lead dynamic meditation in which we had to open our arms whilst standing, then rotate continuously clockwise or anticlockwise. This would result in us to falling or sitting down.

This incident happened when the satsang place (of Amdavad ashram) was surrounded by hilly land and canyons. One day when Bapuji was conducting meditation, I reached the edge of satsang mandap in a meditative trance and fell off, into a 40 feet deep gorge filled with thorns, glass and garbage. I didn’t even realise that I had fallen so deep. When they couldn’t see me in the ashram they started looking for me and when they couldn’t find me, after an extensive search and feeling alarmed they reported the matter to Bapuji. Bapuji became absorbed in meditation and searched for me. He said, “She has fallen into the gorge where we throw the garbage. Go there but be careful, as that place is strewn with pieces of glass, thorns, etc.”

He sent four people to help me get out. Even though they came down carefully, still some got hurt with thorns or glass pieces; some got their clothes torn but with the grace of Gurudev I didn’t get even a single scratch. When we become engrossed in meditation on God, under the influence of blessings, or the transfer of spiritual energy, (Shaktipata) by a SatGuru, the Almighty saves us from any calamity that may befall us.

Pujya Bapuji, a Self-realized great man, devoted to speedy elevation of Indians and entire humanity, stopped that sadhana after some time. Gurudev said: “I want to lead my sadhakas by aerial route (through a spiritual flight). Initially the novices were coming. So I led them by Chakriya sadhana which is for the removal of false identification with the body. But it is like travelling in a bull-cart or horse carriage. If you continue the journey by the same vehicle, how will you attain to perfection? I want you to travel by air.

There are other such methods too, but they are all based on Kriya yoga. Practice of any method depends upon the doer (Practicer) and it is associated with the sense of doership. The yogic technique gives joy and one feels good while doing it, but if the sadhaka keeps doing it alone, he will be bound (conditioned) by it. Travel by riding a bull-cart or horse-carriage or a camel will give some pleasure and the traveller will feel better than walking, but it will eventually make him tired. Flight will not be that tiresome and will cover a great distance in less time.”

Now, Gurudev teaches such techniques that help control the mind easily, meditate effortlessly and bring Avikampa Yoga (unfaltering Yoga) in life. Bapuji says: “What others achieve by doing their chosen sadhana for 12 years is easily achieved by my sadhakas in merely 12 weeks. This has been experienced by lakhs.”

If a sadhaka disregards the path shown by his SatGuru and starts thinking ‘It is good in this place…May I get something from there…’ his condition becomes pitiable. That poor guy gets trapped and becomes dependent on others. He never attains divine joy and divine bliss. His God remains far from him.

Opposition encountered on the path to God

These days it is quite noticeable that the family does not consider it problematic when their children go to movie theatres, lead a fashionable life, and remain engaged in useless matters. But the same family becomes worried when their children start attending satsang discourses, doing japa, meditation and engage in works of social service and tread the path to God. I had to face a similar thing in my life. I had to bear some hardships as would test my forbearance. Still I have no complaint about the loss of worldly pleasures and comforts to attain which the entire world strives lifelong, because Bapuji showed me the glimpse of that divine joy which makes the worldly pleasures worthless. Saints have the treasure of such Self-bliss. Receiving even a glimpse of such joy transforms the entire life.

Company of a Saint developed Dispassion

I was so fashionable that I would bring dresses of my choice from my father’s shop, apart from regular shopping. Bapuji is the epitome of knowledge and dispassion. I didn’t even know when the bad habit, under the influence of His satsang and darshan, left me. The virtues of compassion, endurance and amiability that I developed through satsang in my life made everyone in my colony say: “She has changed so much!”

My father would say earlier, “She used to do fashion, listen to radio and watch movies the entire day. Now she doesn’t wear any makeup nor does she go out. She just wears a tulsi mala and white clothes. From being so demanding, she has been transformed into a person with no demands, no talks, no hobbies and no interest in preparing and eating delicious food. How did all her vices vanish?” Showing pity on me, he would say “How will she be able to live now?” He was unaware of the joy one gets when treading the path to God.

Magical impact of His teachings and Life filled with Dispassion and Continence

There was a time when I was not at all interested in God and was leading my life with the philosophy of ‘Eat, drink and be merry’. Many times I thought, “I will not go to satsang.” My base mentality was the same as that of low-minded people. It occurred many times in my mind, “Now I will not go to satsang, but then, feeling restless somehow, I would go to hear satsang. I was entirely influenced by modernity and shackled with the fetters of desires. I didn’t realise how my mind eventually changed just by attending Bapuji’s satsang. The divine joy that I received through satsang made worldly pleasures tasteless. Reading Shri Yoga Vasishtha made me feel there is nothing substantial except the attainment of God. I wonder how “I had gone to the Saint to receive blessings for marriage, but on the contrary, his company blessed me with such pure dispassion that I took a vow to practice Brahmacharya and lead a self-restrained and unmarried life.”

Such is the magical impact of Pujyashri’s teachings and life filled with dispassion and self-control. If his company and proximity can make the lives of those availing them so self-restrained and virtuous, then how great power of self-restraint and good conduct he would be possessing! Millions of people have seen how much importance Pujyashri attaches to celibacy and moral values in his life. What a dirty allegation is levelled by some fools on a great man who has spread the glory of celibacy, all his life, among masses.

Bapuji is an Avatar, an almighty, great man. Ignorant and deluded people cannot understand His greatness. I didn’t know even alphabets of Satsang, but by Bapuji’s grace, dyed my mind in the colour of satsang and meditation so much that it would be difficult for others to attain even after doing sadhana for years.  (To be continued…)


[Rishi Prasad-October-2018]

Print
2894 Rate this article:
No rating

Please login or register to post comments.

Name:
Email:
Subject:
Message:
x