What a dispassionate life!

What a dispassionate life!

पूज्य बापूजी के जीवन-प्रसंग

(गतांक से आगे)

कैसा वैराग्यपूर्ण जीवन !

जिसका लक्ष्य ही ईश्वरप्राप्ति हो, जिसका जन्म परोपकार एवं समाज में लोक-मांगल्य के बड़े-बड़े कार्य करने के लिए हुआ हो वह भला कैसे माया में फँस सकता है ! कैसा भी भोगप्रधान वातावरण उस पर अपना असर नहीं डाल सकता ।

पूज्य बापूजी स्वयं अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं : ‘‘मेरा स्वभाव बचपन से ही विरक्त था परंतु मेरे परिवारवाले मुझे संसार में घसीटना चाहते थे इसलिए वे एक बार मुझे समझा-बुझाकर जबरन पिक्चर दिखाने ले गये थे ताकि वह पिक्चर देखकर मेरे मन में भी यह विचार आ जाय कि ‘अपन भी शादी कर लें ।’

उसमें एक गीत था । मेरा यार बना है दूल्हा, फूल खिले हैं दिल के । मेरी भी शादी हो जाय, दुआ करो सब मिल के ।ऐसा संगीत था कि दर्शक बैठे-बैठे डोल रहे थे लेकिन मेरे मन में विचार आया कि ‘जिनकी शादियाँ हो गयी हैं वे सुखी हो गये क्या ? उनकी समस्याएँ हल हो गयीं क्या ? उनको ईश्वर मिल गया क्या ?’

अपने-आपसे जब मैंने ये प्रश्न पूछे तो उनका पिक्चर दिखाना व्यर्थ हो गया । वहाँ आँखें बंद करके बैठ गया । खूब रोना आ रहा था कि ‘हे भगवान ! क्या यह सब दिखाकर अपनी माया में फँसाने के लिए तूने मुझे यहाँ भेजा है ? ये सब तो फँसा रहे हैं, तू भी फँसा रहा है क्या ? तू निकालेगा नहीं मुझे ?’

मुझे जो लेकर आये थे वे मेरे दोनों तरफ बैठे थे और बोलते : ‘‘देखो न, क्या करते हो ?’’

‘आता हूँ जरा’, ऐसा कहकर मैं बाहर चला गया और वहाँ भी खूब रोया । फिर वे बुलाने आये तो फिर अंदर आकर खूब रोया कि ‘क्या ऐसे ही जिंदगी जायेगी ? ये तो प्लास्टिक की पट्टियाँ हैं । बाहर भी तेरी फिल्म और यह (संसार) भी तेरी फिल्म, तो तू कब मिलेगा ?’

ईश्वरप्राप्ति की आकांक्षा और तीव्र तड़प ने मुझे गुरु के द्वार तक पहुँचा दिया; गुरु में अडिग श्रद्धा कर दी और अपने-आप तक पहुँचा दिया ।’’

ऐसी थी स्वाध्याय की लगन !

पूज्य बापूजी को बचपन से ही स्वाध्याय की बड़ी रुचि थी । पूज्यश्री के सत्संग में आता है : ‘‘किसीने मुझे कहा नहीं था शास्त्र-अध्ययन के लिए, कुदरती प्रेरणा हुई तो अपने जेब-खर्च के पैसों से भगवद्गीता ले आया और पढ़ता था । उसके छठे अध्याय पर मेरा चित्त ज्यादा ठहर जाता था । यह श्लोक मेरा बचपन का खूब पढ़ा हुआ है :

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः 

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।।

भगवान कहते हैं : ‘ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अंतःकरणवाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण हो के स्थित होवे ।’ (गीता : 6.14)

प्रशांतात्मा - ‘प्र’ उपसर्ग है; आधिभौतिक, आधिदैविक व आध्यात्मिक - ये मानसिक शांतियाँ नहीं, परम शांति मिल जाती है ।’’

जो अपने जीवन का अनमोल समय व्यर्थ के उपन्यास, पत्र-पत्रिकाएँ, अश्लील चलचित्र व वेबसाइटें आदि पढ़ने-देखने में बरबाद करते रहते हैं, उनके लिए तो यह प्रसंग विशेष प्रेरणादायी है ।

कीर्तन की भाव-सरिता

बालक आसुमल भगवत्प्रार्थना, कीर्तन व ध्यान के बड़े प्रेमी थे । वे भालकिया बस स्टैंड (अहमदाबाद) के पास स्थित रामजी मंदिर में भगवन्नाम-कीर्तन में बड़े ही तल्लीन हो जाते थे । और फिर ऐसे ध्यानस्थ हो जाते कि समय का भान ही नहीं रहता था कि कितना समय बीता ।

पूज्यश्री के सत्संग में आता है : ‘‘बचपन में हम रोज मंदिर में जा के प्रार्थना व कीर्तन करते थे ।

अच्युतं केशवं रामनारायणं

कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् 

श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं

जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ।।

(अच्युताष्टकम् : 1)

कीर्तन करनेवालों में भी हम सबके अगुआ थे ।... ‘तुलसी मस्तक तब नवै धनुष-बान लो हाथ ।।’ यह गाकर उस समय ‘जय सियाराम’ कर लेते थे पर अब पता चला इसका रहस्य कि संत तुलसीदासजी ने आम जन का ज्ञान बढ़ाने के लिए ऐसा हठ ले लिया था - वे श्रीकृष्ण की मूर्ति देखकर बोले : ‘‘ये तो बाँकेबिहारी हैं, मैं तो रामजी को प्रणाम करूँगा ।’’ और वे बाँकेबिहारी रामजी बन गये । तो लोगों को सोचने का मौका मिला कि ‘भई ! देखो, ऐसा भी हो सकता है !’ व्यक्ति उस अच्युत की लीला देखने-समझने के बहाने भी आये और विश्रांति पाये । केवल बाहर के बाँकेबिहारी में ही रुक न जाय बल्कि उनके तत्त्वरूप का ज्ञान पा के मुक्त हो जाय । बाँकेबिहारी के बाह्य रूप की पूजा करने के साथ उनके उपदेश को भी समझे । वे उपदेश देते हैं कि

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया 

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।

‘उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ । उनको भलीभाँति दंडवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़ के सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे ।’ (गीता : 4.34)

कभी-कभी संतों के द्वारा भी वह अच्युत खेल करवा लेता है । कैसी व्यवस्था है उसकी !’’

नन्ही उम्र में ऐसी नियमनिष्ठा !

पूज्य बापूजी की बचपन में ऐसी नियमनिष्ठा थी कि पूजा आदि का नियम किये बिना दूध तक नहीं पीते थे । पूज्यश्री के सत्संग-वचनों में आता है : ‘‘मैं जब बच्चा था तभी से पीपल देवता को जल चढ़ाता और फिर उनके तने को ऐसे दबाता जैसे एक बच्चा अपने पिता की चरणचम्पी करता है । हरि ॐ ॐ... तू ही ॐ ॐ... शिवाय ॐ ॐ... करके फेरे फिरता, फिर नाचते-गाते, आनंद लेते-लेते घर तक आता । रास्ते में कहीं पीपल देवता मिल गये तो फिर मेरी गाड़ी वहाँ खड़ी हो जाती (मैं वहाँ खड़ा हो जाता), चक्कर लगाता और भाव से आलिंगन करता था । लोगों की नजर में मैं बावरा जैसा लगता था लेकिन मुझे तो बहुत फायदा हुआ । यह मुझे किसीने सिखाया नहीं था, कुटुम्ब-खानदान में लोग शनिवार को पीपल को जल चढ़ाते थे तो हम भी चढ़ाने लग गये लेकिन हमारी प्रीति हो गयी । अभी पता चलता है कि पीपल का पेड़ लगाने से कितना फायदा होता है । अन्य 24 वृक्ष लगाओ तो जितना पुण्य होता है उतना एक पीपल का वृक्ष लगाने से होता है ।’’

अपने बच्चों के जीवन में भी बचपन से ही नियमनिष्ठा के सद्गुण का सिंचन करना चाहिए,जैसे - गुरुमंत्र या भगवन्नाम की इतनी माला तो जपनी ही हैं, गुरुदेव द्वारा दीक्षा के समय दिया गया नियम पूरा करना ही है, इतना समय तो सत्संग सुनना ही है... ऐसे ही सूर्य को अर्घ्य देना आदि नियमों के प्रति निष्ठा बढ़ायें । (क्रमशः)

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Inspirational Life-tales of Pujya Bapuji

(Continued from the previous issue)

What a dispassionate life!

How can a person whose ultimate goal is the attainment of God, who is born for great philanthropic acts of social welfare, ever get entrapped in the snare of Maya’ (illusion)? However hedonistic the environment may be, it cannot influence him.

Pujya Bapuji reminisces about an incident from the past: “My nature was dispassionate from childhood but my family wanted to drag me into worldliness. Hence, they pressurised me into accompanying them to go to the theatre to watch a film so that I may get a thought in my mind to get married.

There was a song track in the film and the lyrics were: Yaar banaa hai Dulha, Phool khile hai dil ke | Meri bhi shaadi ho jaaye, Duaa karo sab milke|” (The literal translation of the lyrics is- “My friend has become a groom, the flowers of heart have blossomed. You all bless me together such that I too get married.”) The music was so good that the spectators were swaying to the melodious tune, but a thought flashed through my mind: “Are the people, who got married, truly happy? Have all their problems been resolved? Have they attained God?”

When I asked these questions to myself, the effort of my family members to drag me to the theatre failed. I closed my eyes and sat there. I was weeping bitterly: “Oh God! Have you brought me to this place to entangle me in your maya by showing all these scenes? These people are trying to do that. Are you doing the same? Won’t you extricate me from this situation?”

I was flanked by the persons who had taken me to the cinema. They said, “Watch the film. What are you doing?”

I said, “I am just coming” and went out of the theatre. I wept bitterly even then. They came out and called me in again. I went inside and wept, “Is my life going to get wasted in this manner? These are celluloid films. It is Your film that is running externally (in the theatre) and the world is also Your film. When will I attain You?” The aspiration for God-realization and yearning for God paved my way to the Gate of Guru, made my faith in Guru unshakable and lead me to my Self.”

Such intense was his interest in self-study!

Pujya Bapuji was deeply interested in self-study (study of scriptures) since childhood. Pujyashri mentioned in His Satsang discourses, “Nobody had advised me to study scriptures. But I was inspired naturally to buy a copy of the Bhagawad Gita with my pocket money. I studied it. My mind would get absorbed in the 6th Chapter. I had read this Shloka umpteen times in my childhood:

 

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।।

 

Lord Krishna said, “Serene-minded, fearless, firm in the vow of Brahmacharya, having controlled the mind, thinking on Me and balanced, let him sit, having Me as the Supreme Goal.”               (The Gita: 6.14)

Prashantatma– “Pra” is the prefix. One gets not only physical, celestial and mental peace of relative nature, but supreme peace (absolute peace).

This anecdote is inspirational, especially for those who waste their priceless time reading novels, magazines, and watching obscene films, porn websites, etc.

The overwhelming emotions of ‘Kirtan’

Child Asumal was an ardent lover of Prayers, Kirtan and meditation. He would become deeply absorbed in the Kirtan at the Shri Rama temple near Bhalakiya bus stand in Ahmedabad and, then He would become absorbed in such a deep state of meditation that he would become unconscious of the passage of time.

Pujya mentions in his Satsang discourses: “During my childhood, I went to the temple every day and sang kirtans.”

Achyutam Keshavam Rama Narayanam

Krishna Damodaram Vaasudevam Harim|

Shridharam Maadhavam Gopika Vallabham Jaanaki Naayakam Ramachandram Bhaje||

“I worship Achyuta (the Immutable Lord), Keshava (the Lord with beautiful Hair), Rama (the One who gives delight), Narayana (the refuge of every one), Krishna, Damodara (Who is known through the purified mind), Vasudeva’s son, Hari (the destroyer of evil), Shridhara (Who has Lakshmi at His bosom), Madhava (the Lord of the goddess Lakshmi), the beloved of the Gopis, the Lord of Sita, Shri Ramachandra.” (Achyutashtakam: 1)

“I lead the group of Kirtan singers. I would sing this couplet "तुलसी मस्तक तब नवै धनुष-बान लो हाथ ।।' (Tulsidas will bow his head only if you take a bow and an arrow in your hands.) and conclude it with ‘Jai Siyaram chanting’. Now I clearly understand the mystery of this. Tulsidasji had become so obstinate to enhance the knowledge of the common masses through miracles. He saw the idol of ‘Baanke Bihari’ (Lord Krishna) in a temple and said, “This is Baanke Bihari, I will bow down only at the feet of ‘Ramaji’ (Lord Rama).” Immediately, the idol of Baanke Bihari transformed into an idol of Ramaji. The people got a point to ponder over and thought that that was also possible. People may come to the temple under the pretext of seeing and understanding the lila of that Achyuta and get peace. They may not stop their spiritual journey on having darshan of the external idol of Banke Bihari, but attain the knowledge of His tattva and get liberated. Along with idol worship of Baake Bihari, they may understand His spiritual instructions. He instructs (in the Gita):

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।

“Know that through prostration, inquiry and service. The wise ones who have realized the Truth will impart the Knowledge to you.”        (The Gita: 4.34)

Sometimes that Achyuta does divine play even through Saints. What a wonderful arrangement is His!

What a staunch observer of Niyama in childhood!

Pujya Bapuji was so staunchly devoted to religious observances that he did not take even milk before completion of religious observance, such as worship etc. Pujya Bapuji says in his satsang discourses: “When I was a child I offered water to the Peepal God (Sacred Fig tree) and then massaged its stem just like a child massages his father’s feet. I circumambulated it while chanting Hari Om Om… Tu hi Om Om… Shivaay Om Om…, and then set off home dancing, singing, and reveling in bliss. On my way, I would stop if I came across another Peepal tree. I would circumambulate and embrace it affectionately. People thought I was crazy, but I have been hugely benefitted from that. Nobody taught me that. People from my family offered water to the Peepal tree every Saturday; I also started doing the same but I developed devotional love for Peepal trees. Now I understand the numerous benefits of planting a Peepal tree. The benefits derived from planting a Peepal tree are equal to the benefits derived from planting 24 other trees.”

The virtue of Niyam Nishtha should be inculcated into our children right from their childhood- like the Niyamas of chanting Guru mantra, for this many Malas every day, completing the set of rules (regarding daily religious observances) given by Gurudev at the time of Mantra diksha, hearing Satsang for a minimum amount of time must be rigidly observed. Be strict in such religious observances like offering oblations of water to Sun god, etc. (To be continued…)


[Rishi Prasad Issue307]


 

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