एक श्लोक हृदय में पैठा...

एक श्लोक हृदय में पैठा...

पूज्य बापूजी के जीवन-प्रसंग

(गतांक से आगे)

एक श्लोक हृदय में पैठा...

पूज्यश्री की विद्यालयीन पढ़ाई तो तीसरी कक्षा में ही छूट गयी थी मगर देवभाषा संस्कृत के प्रति बापूजी का लगाव था । वेद-शास्त्रों के अमृतरस का पान करने व उसे समाज तक पहुँचाने में संस्कृत बहुत उपयोगी है इसलिए पूज्यश्री युवावस्था में संस्कृत पढ़ने हेतु असारवा (अहमदाबाद) के एक संस्कृत महाविद्यालय में कुछ दिन अध्ययन करने गये थे । उस समय विवेकदासजी महाराज संस्कृत व्याकरण पढ़ाते थे । वे कहते थे कि ‘‘यह विद्यार्थी बहुत शांत रहता है, सुबह जल्दी उठकर जप करने बैठ जाता है । इसके लक्षण देखकर लगता है कि यह आगे चलकर बहुत महान बनेगा और नाम रोशन करेगा ।’’ पढ़ानेवाले आचार्य बापूजी को बड़े आदर की दृष्टि से देखते थे ।

वहाँ जो संन्यासियों की समाधियाँ बनी थीं उनके पास जा के पूज्यश्री परीक्षा के समय एकांत में बैठकर पढ़ते थे । तभी एक श्लोक पढ़ने में आया और सोया वैराग्य जाग उठा । आप ईश्वरप्राप्ति के लिए घर त्यागकर सद्गुरुदेव भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज के चरणों में चले गये तथा 7 वर्ष तक गुरुदेव की छत्रछाया में रहे । वैराग्य जगानेवाला वह श्लोक था :

तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् ।

येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम् ।।

‘उसीने सब अध्ययन कर लिया, उसीने सब श्रवण कर लिया, उसीने सारे अनुष्ठान कर लिये, जिसने इच्छा-वासना छोड़कर आशारहितता का सहारा लिया है ।’           (हितोपदेश : 1.146)

नियमितता

जब बापूजी माउंट आबू की गुफा में साधना करते थे उस समय की बात याद करके पूज्यश्री के भानजे रमेश बताते हैं कि मैं जब सुबह दूध आदि लेकर जाता था तब आबू की उतनी कड़ाके की सर्दी में भी पूज्यश्री जप-ध्यान के बाद आसन आदि करते मिलते थे । बापूजी का आसन, कसरत करने तथा तैरने का अभ्यास भी बचपन से ही है और आज भी इतनी उम्र में नियमित आसन करते हैं । उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम - ये छः गुण बचपन से ही पूज्यश्री में विद्यमान हैं ।

बालक आसुमल की कैसी परहितपरायणता !

पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है कि ‘‘किसी भी बहाने किसी गरीब, दुःखी व्यक्ति के आँसू पोंछकर देखना, आपके हृदय में प्रसन्नता भर जायेगी ।’’

अपने संबंधियों-मित्रों के दुःख से दुःखी तो सारी दुनिया होती है पर जिनसे कोई संबंध नहीं उनके दुःख से तो वे ही व्यथित होते हैं जो सारे विश्व को अपना कुटुम्ब मानते हैं, प्राणिमात्र को आत्मवत् अनुभव करते हैं । पूज्य बापूजी के जीवन के ऐसे कई प्रसंग हैं जिनसे पता चलता है कि आपके हृदय में जीवमात्र के प्रति करुणा, दया और प्रेम के भाव बचपन से ही विद्यमान थे ।

बचपन में बालक आसुमल जहाँ रहते थे वहाँ पास की सोसायटी में एक शिव-मंदिर था । उनका यह नियम था कि भगवान शिव को जल चढ़ाये बिना वे खाना तो दूर, दूध तक नहीं लेते थे ।

एक दिन आसुमलजी रोज की भाँति पूजन करने जा रहे थे । घर से 50-60 कदम आगे निकले ही थे कि एक व्यक्ति सड़क के किनारे पड़ा मिला । आसुमलजी ने अपना पूजा का सामान एक तरफ रखा और उस व्यक्ति को हिलाया-डुलाया । भगवान के लिए जो जल लाये थे उसीसे उसके चेहरे पर छींटे लगाये तो वह होश में आया । हालचाल पूछा तो बोला : ‘‘बाबूजी ! भूख लगी है ।’’

आसुमलजी शिवजी के लिए जो दूध लाये थे वह उन्होंने उस जवान को पिला दिया और घर जाकर माँ से मीठी रोटियाँ बनवाकर लाये तथा उसको खिलायीं ।

उस व्यक्ति ने बताया कि ‘‘मैं बिहार का रहनेवाला हूँ । मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया है । मुझे नौकरी नहीं मिल रही, कुछ कमाता नहीं हूँ इसलिए चाचा ने मुझे घर से निकाल दिया है । धंधे की तलाश में आया था । बाबूजी ! भीख माँगने की तो हिम्मत नहीं होती है, धंधा मिलता नहीं है तो चार दिन ऐसे ही सड़कों पर घूमता रहा । रात को फुटपाथ पर सोता तो पुलिसवाले मारते थे । भूख के कारण चक्कर आ गया तो गिर गया था ।’’

आसुमलजी ने अपने जेब-खर्च के पैसों में से कुछ पैसे निकालकर उसे दे दिये और रिक्शे में बैठाकर विदा किया ।

उसी समय उनके अंतर में आवाज आने लगी कि ‘आज तुमने मेरी असली पूजा की है । अब तुम्हें मेरा प्रसाद प्राप्त होगा । अब मैं तुम्हें पूरा-का-पूरा मिलूँगा, मैं तुम होऊँगा और तुम मैं (मुझ परमात्मस्वरूप) हो जाओगे ।’

जो मेरे प्रभु को अच्छा लगे वही करूँगा

पूज्य बापूजी बताते हैं कि ‘‘हम जब घर में रहते थे तो हमारे भाई हमको डाँटते थे कि ‘‘तुम किसी जगह शादी-बारात में क्यों नहीं जाते ? अच्छा, एक काम करो, अभी मामा के बेटे की शादी है । कुछ और नहीं खाना, केवल आइसक्रीम खाकर आ जाना ।’’

मैंने कहा : ‘‘मैं नहीं खाता ।’’

‘‘अरे भाई ! उनको अच्छा लगेगा ।’’

‘‘उनको अच्छा लगेगा इसलिए मैं ऐसे ही जा सकता हूँ परंतु मैं वहाँ कुछ खाऊँगा नहीं ।’’

मेरे भाई ने मुझे खूब डाँटा ।

मैंने कहा : ‘‘उनको अच्छा लगे और अपन नरकों में जायें ऐसी बेवकूफी मुझे नहीं करना । जो मेरे प्रभु को अच्छा लगेगा वही मुझे अच्छा लगेगा ।’’

भाई ने डाँटा : ‘‘बड़ा आया प्रभु का भगत !’’

हम मुँह चढ़ाकर चले  गये  और मंदिर में जा के बैठ गये । तीन घंटे बाद जब मामा के बेटे की शादी हो गयी तो आ गये ।

बाद में तो वे ही लोग पूनम-व्रतधारी बन गये और हम जहाँ भी जाते वहाँ दर्शन करने को आ जाते । अगर हम उनको रिझाते रहते, बारात में जाते और आइसक्रीम खाते तो वे तो रीझते नहीं और दुनिया को रिझाते-रिझाते हम ही मर जाते । हमको बचपन से शादी-पार्टी में जाने  की  रुचि  नहीं  थी, हमें  तो  सत्संग  अच्छा  लगता  था,  जप  अच्छा             लगता  था ।’’                    (क्रमशः)

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Inspirational Life-tales of Pujya Bapuji

(Continued from the previous issue)

One shloka pierced his heart…

Pujya Bapuji had to leave formal schooling when he was a student of Class 3. However, Pujya Bapuji had a strong penchant for learning Sanskrit (the language of celestial beings). As Sanskrit language is very useful in imbibing the nectar of the Vedas and Shastras and propagating the same in society, young Pujya Bapuji studied Sanskrit for a few days in a Sanskrit school at Asarava (Ahmedabad). Vivekdasji Maharaj was the teacher of Sanskrit grammar in those days. He would express his views about Pujya Bapuji: “This student is very quiet by nature. He wakes up early in the morning and sits for doing japa. His demeanour indicates that He will become a very great and famous personality someday.” The teacher used to display a great sense of admiration and respect for Pujya Bapuji.

During examination days, Pujya Bapuji studied in solitude sitting near the Samadhi (Shrine) of Saints. While studying, he happened to read a Shloka which kindled his latent dispassion. Pujya Bapuji renounced his home and took refuge at the Lotus feet of Bhagwatpada Swami Lilashahji Maharaj for God-realisation. Pujya Bapuji lived under His protection for seven years. The Shloka which kindled Pujya Bapuji’s dispassion was:

तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् ।

येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम् ।।

‘All is known, digested, tested; nothing new is left to learn.

When the soul serene, reliant, Hope’s delusive dreams can spurn.’ (Hitopadesha: 1.146)

Regularity

Reminiscing the time when Pujya Bapuji practiced sadhana in a cave of Mount Abu, Ramesh Bhai says: “Whenever I went to give milk, etc. to Him in the morning, I would see Pujyashri doing Yoga asana, etc. after doing japa and meditation even in the biting cold of Mount Abu. Pujya Bapuji has been doing Asanas, physical exercises, swimming since childhood. Even now at this ripe age Pujya Bapuji does yogic postures on a regular basis. Pujya Bapuji has been gifted with these six qualities from childhood- Industriousness, Adventurousness, Fortitude, Intelligence, Strength and Bravery.

What a benevolent child Asumal was!

Pujya Bapuji teaches in satsang discourses: “Help any poor or miserable person by any means and your heart will instantly experience joy.”

Everyone becomes afflicted at the sorrows of one’s own kith and kin. But only those people who consider the whole world as their family and feel every creature as his own Self, become afflicted at the sorrows of strangers. Several incidents from Pujya Bapuji’s life are suggestive of the fact that the feelings of compassion, kindness and love towards every living being were present in his heart since childhood.

Child Asumal used to visit a Shiva temple located in a nearby society. Child Asumal followed a religious observance not to consume food or even milk before offering water to Lord Shiva.

One day, as usual, Asumalji was proceeding towards the temple for worship. He had walked barely 50-60 steps from His home and he saw a man lying unconscious by the roadside. He put the articles for worship aside and shook the man. He sprinkled some water from the vessel that he carried for offering to Lord Shiva, on the man’s face. When the man regained consciousness, He said, “How are you?” The person replied, “Babuji! I am hungry.”

Asumalji fed the milk that he had brought for offering to Lord Shiva, to the youth. He went home, asked his mother to prepare some sweet Chapatis, and fed him.

The person narrated his story: “I am a resident of Bihar. My father has already left for heavenly abode. I don’t have a job. I don’t earn money. So my uncle expelled me from his house. I came here in search of a job. Babuji! I don’t have the courage to beg for alms, so was just wandering around the streets for the last 4 days. I slept on the footpath at night, but the police came and thrashed me. I became giddy due to hunger and collapsed.”

Asumalji gave some of his pocket money to the man, hired a rickshaw for him and sent him on his way.

That very moment Pujyashri heard the inner voice: “Today you have worshipped me in real sense. Now you will attain my grace. Now you will attain me in my absolute nature. I will become You and you will become myself.”

I will do only what my Lord likes!

Pujya Bapuji narrates: “When I lived at home, my elder brother used to scold me. He insisted one day: “Why don’t you ever attend any wedding functions? Today is our cousin’s wedding, just go, eat no other item but ice-cream and come home.”

I said: “I will not eat.”

He said: “Oh Brother! He will be glad to see you.”

I said: “Ok. I shall go for his pleasure, but I will not eat anything.”

My brother scolded me a lot.

I replied: “I do not want to commit an act of imprudence that may please him, but lead me to hell. I will do only what my Lord likes.”

My brother sarcastically said: “Oh, you are a very big devotee of God!”

“I was displeased. I went to the temple and sat there for three hours. Once the wedding concluded, I went home.”

“The same people, who reprimanded me earlier, became Poonam Vratadhari (who take meals only after having my Darshan on every full moon day.) Had I tried to please them, then I would have attended the wedding and relished the ice-cream and even after that they would never be pleased, but in the process of pleasing them I would have met death (not attained immortality of Self). I was never interested in weddings, parties since my childhood. I loved satsang and Japa. (To be continued…)

 


 

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