Bapuji removes sorrow of the distressed

Bapuji removes sorrow of the distressed

 पूज्य बापूजी के प्रेरक जीवन-प्रसंग

श्रीमती शारदा पटेल द्वारा बताये पूज्यश्री के कुछ मधुर प्रेरक प्रसंग :

कर्फ्यू और दंगे में सुरक्षा

दिसम्बर 1992 की बात है । उस समय अयोध्या में मस्जिद तोड़ने पर बवाल मचा था तो पूरे गुजरात में कर्फ्यू लगा था और उसी समय डीसा में पूज्य बापूजी का सत्संग था । मैं भी सत्संग में गयी थी । जगह-जगह आग की लपटें दिख रही थीं । कहीं रिक्शा जल रहा था तो कहीं मकान । चारों तरफ तनावपूर्ण माहौल था । हम लोग सत्संग सुनने जाते तो पुलिसवाले रोकते, हम बोलते : ‘‘बापूजी का  सत्संग  सुनने जा रहे हैं ।’’ तो पुलिसवाले  बोलते : ‘‘जाओ-जाओ, हरि ॐ वाले हो तो जाओ ।’’ पुलिस को भी पता था कि बापूजीवाले हैं तो दंगा-फसाद नहीं करेंगे ।

मेरे साथ एक 5 साल का लड़का था । हम एक जगह दंगे में फँस गये थे । पुलिसवाले आये तो मैंने उनसे कहा : ‘‘मुझे बापूजी के सत्संग में जाना है ।’’

वे बोले : ‘‘चलो-चलो, हम गाड़ी से छोड़ देते हैं । अभी बाहर मत निकलना, अभी सारा गाँव जल रहा है ।’’

सब जानते हैं कि बापूजी अपने साधकों को हमेशा शांति, प्रेम और न्याय के, ‘सबका मंगल सबका भला’ चाहने-करने के मार्ग पर चलाते हैं । बापूजी के साधक हिंसावादी नहीं, शांति, प्रेम व सत्य मार्ग के अनुगामी, ईश्वरवादी होते हैं ।

दुःखियों के दुःखहर्ता बापूजी

मेरे चाचा-चाची बहुत दुःखी रहते थे क्योंकि उनका एक जवान बेटा और बेटी मर गये थे । मैंने उन्हें समझाया कि ‘‘आप लोग दुःखी मत होइये । जो हो गया उसे भूल जाइये । दुःखी होने से तो मृतात्मा को भी दुःख होता है । मेरे गुरुदेव का सत्संग सुनो, हिम्मत मिलेगी, दुःख कम होगा ।’’ मैंने उनको पूज्यश्री के सत्संग की कुछ कैसेट्स ला के दीं । उन्होंने सुनीं तो उनको इतना अच्छा लगा कि फिर तो वे सारा दिन सत्संग ही सुनते रहते थे ।

एक दिन चाची बोली : ‘‘तू मुझे बापूजी के पास ले चल ।’’ मैं दोनों को सत्संग-शिविर में लायी । बापूजी को सारी बात बतायी तो पूज्यश्री ने उनको आश्वासन तथा प्रसाद दिया । पूज्यश्री के दर्शन-सत्संग से उनका दुःख एकदम दूर हो गया ।

कुछ दिन बाद रामपुरिया (राज.) आदिवासी क्षेत्र में भंडारा था । बापूजी चाचा को बोले : ‘‘गरीबों में भंडारा करो, दूसरों का दुःख दूर करने से अपना दुःख बचता नहीं है ।’’

चाचा : ‘‘जी बापूजी ! आप जो बोलेंगे, हम करेंगे पर हमारा उद्धार कर दीजिये ।’’

बापूजी : ‘‘तेरा तो उद्धार हो गया । भंडारा तो हमारा है पर उद्घाटन करने तुम दोनों को जरूर आना है ।’’

अगले दिन हमें रामपुरिया पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी । आदिवासी इलाका, घनघोर जंगल था और हम रास्ता भूल गये थे ! ड्राइवर भी पहली बार आया था । हम सोच रहे थे कि ‘अब क्या करें !’ इतने में टॉर्च का प्रकाश दिखा । देखा तो सामने से बापूजी आ रहे थे ।

पूज्यश्री : ‘‘काका ! रास्ता भूल गये क्या ?’’

‘‘हाँ बापूजी! कोई रास्ता ही नहीं दिखता । अच्छा हुआ आप आ गये ।’’

‘‘मैं तो रास्ता दिखाने ही आया हूँ ।’’

‘‘बापूजी! जीप में बैठ जाइये ।’’

‘‘नहीं, मैं घूम के आता हूँ । तुम लोग जाओ । रास्ता सामने है, थोड़ा इधर की ओर जाने पर जहाँ जाना है वहाँ की लाइट दिखेगी ।’’

थोड़ी दूर चलने पर हमें लाइट दिखने लगी । दो मिनट में हम पहुँच गये । देखा तो बापूजी सत्संग कर रहे हैं ! हमको आश्चर्य हुआ कि अभी तो पूज्यश्री हमको मिले थे और इतनी जल्दी आकर सत्संग करने लगे ! लोगों से पूछा तो वे बोले : ‘‘बापूजी तो 1 घंटे से सत्संग कर रहे हैं ।’’ तब हम सबका हृदय अहोभाव से भर गया कि ‘सच में, बापूजी तो भगवान हैं ! हमको रास्ता दिखाने दूसरा रूप बनाकर आये थे ।’

वास्तव में, हम भटके हुए जीवों को भवसागर से पार उतारने के लिए परमात्मा ही सद्गुरु का रूप लेकर आये हैं ।

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Inspirational life-tales of Pujya Bapuji

Shrimati Sharada Patel narrates several sweet reminiscences of Pujya Bapuji in the following words:

Protection in curfew and riots

The incident dates back to December 1992. Pujya Bapuji’s Satsang was held in Disa, when a curfew was imposed all over Gujarat due to the outrage of the demolition of Babri Masjid (mosque). I also went there to attend the Satsang discourse. Conflagrations were visible all around. Somewhere a rickshaw lay burning while at other places houses were found ablaze. The environment was tensed all around. When we went to listen to the Satsang discourse, policemen would stop us, we said, “We are going to listen to Bapuji’s Satsang.” The policemen would reply, ‘Okay, you can go if you belong to the Hari Om group (devotees of Bapuji are recognized due to Hari Om chant). The policemen were very well aware of the fact that Bapuji’s devotees would not cause any public disturbance.

A five-year-old boy was with me. We had got trapped at a place in the riots. When policemen came, I said, “I wish to attend Bapuji’s Satsang.”

They said, “Come with us. We will drop you at the venue by our vehicle. Don’t come out now, as the entire village is on fire.”

Everyone knows that Bapuji always leads his devotees towards the path of peace, love and justice, and they wish and do things for the ‘good of all and welfare of all.’ Bapuji’s Sadhaks are not followers of violence but followers of the truth. They are theists.” 

Bapuji removes sorrow of the distressed

My uncle and aunt would remain very sad on account of the recent demise of their young son and daughter. I counselled them, “Please do not be sad. Forget what has happened. Lamenting over the dead will also cause pain to the departed souls. Listen to my Gurudev’s Satsang discourses and you will find solace and courage.” I brought some audio cassettes of Pujya Shri’s Satsang discourses and gave to them. Upon listening to them, they loved it so much that they would keep listening to the Satsang the whole day.

One day the aunt (Kaki) said, “Please take me to Bapuji.” I took both of them to attend a Satsang Shivir (meditation intensive). When I told the whole matter to Bapuji, He gave them assurance and Prasada. By having Pujya Shri’s Satsang and Darshan their entire sorrow vanished instantly.

Some days later, a Bhandara (free community feast) was to be organized in Rampuria, (a tribal area of Rajasthan). Bapuji said to the uncle (Kaka), “You manage to arrange a Bhandara for the poor. One’s own sorrow is removed by alleviating sufferings of others.”

Uncle: “Yes, Bapuji. We will do your biddings, but please redeem us.”

Bapuji replied, “You are already redeemed. The Bhandara may have been organized by us, but both of you must come to inaugurate it.”

On the next day, it was already night when we arrived at Rampuria. We lost our way in the dense forest of that tribal area. It was the first time the driver had driven to that place. We thought, ‘What shall we do now?’ Just then we noticed a flashing torch. We found Bapuji approaching us.

Pujya Shri: “Uncle (Kaka), have you lost your way?”

He said, “Yes, Bapuji. We can’t find the way. It is good that You have come.”

“I have come only to show the path to you.”

“Bapuji, please be seated in the jeep.”

“I shall return after having a stroll. The way is in front of you. Upon moving a little ahead in this direction you will see the lights of the venue.”

After going some distance, we could see the light. We arrived in two minutes. There we saw Bapuji delivering Satsang. We were wonderstruck as we had met Pujya Shri just a few moments ago and there He was delivering Satsang, so quickly. When we asked the Satsang listeners, they said, “Bapuji has been delivering Satsang for the last one hour.” Then we realized that Bapuji is truly God. He came to us to show the path by assuming another form.

In fact God has descended on earth in the form SatGuru in order to help us, the astray Jivas, cross the ocean of Samsara (Transmigration).

"Rishi Prasad Issue 291"


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