And the entire body started to become tranquil and purified
Ashram India

And the entire body started to become tranquil and purified

Shri Bijal Bhai Vihol of Ahmedabad has been availing himself of the pious company of Pujya Bapuji right since 1979. With an ecstatic sense of profound gratitude he narrates the divine experiences he had in the Satsang and company of Pujya Shree.

And the entire body started to become tranquil and purified

I attended the Uttrayan Dhyan Yog Shaktipat Sadhana Shivir in the presence of Pujya Bapuji in 1980. Bapuji blessed me with Shaktipaat (transmission of spiritual energy) in such a manner that I got into the posture of ‘Paadapashchimottanasana’ effortlessly during a dynamic meditation. The entire body started to become tranquil and purified. Bapuji said to me, “Stay put in this Aasan (posture) for three and a half minutes.”

However, due possibly to some past sin of mine, I couldn’t stay in that Aasan for the prescribed period and resultantly my body started to stink awfully. My body became so sick as if I’d had a chronic illness for six months. After the Shivir (camp) was over, I returned home. Gradually, the foul odour of my body vanished completely in a week. Thereafter, when I went for Bapuji’s Darshan, He said to Ammaji (Maa Mehangiba), “See, what a great transformation has occurred in him within seven days as a result of the transmission of spiritual energy.”

After attending that Dhyan Yog Shivir I experienced great energy and joy in my body and mind.

‘The strong resolve made us return’

This incident took place in 1984. Bapuji’s Satsang was held in the ‘Kadi village’. I prayed at Pujya Bapuji’s lotus feet, “Bapuji, please sanctify my house by the pious touch of Your lotus feet.”  Bapuji said, “I shall think about it. But do not stand waiting on the way (if my car comes near your house).” When the car drove past my house, the attendants of Bapuji reminded Him, “Bapuji, Bijal Bhai had requested Your Holiness to move Your holy feet in his house. But we have travelled far beyond his house already.” Bapuji told them to reverse the route of the vehicle; and upon reaching my residence, he said, “Someone’s strong resolve here made us return even after having travelled far beyond this place.”

Then He remarked, “Your house is just like a bird’s nest.”

We thought, ‘When Guruji has made this observation, a positive change is but due.’ And indeed, within a short time, we had a big house over there.

Bapuji enabled me to have Darshan of my ancestors

Once during the Shraaddha days I said, “Bapuji, I want to perform Shraaddha. Bapuji in His spiritually intoxicated carefree mood said, “Whosoever feels the need would do it, you do nothing.”

I gave up all efforts. My family members performed the Shraaddha ritual. That night, I dreamed of a turbaned man smoking a small pipe. I had never seen that person before. I related everything to my father, and he was wonderstruck. He said that the turbaned man was none other than my grandfather. I realised the significance of obeying the Guru’s command. Although the Shraaddha ritual was performed by my family members, it was I who had Darshan of the ancestors.

I fell directly into His lap

In order to scale new heights in Sadhana rapidly, the inquisitive Sadhaks stay locked in Mauna Mandirs (temple of silence) of the ashram for seven days. Food and other necessities are provided to them in there through a small window.

I too stayed therein for 7 days. Bapuji would come to visit us occasionally in the evening or night and ask about our well-being. Those (devotees) who came out of Mauna Mandirs after seven days would narrate about undergoing some spiritual experiences or Yogic Kriyas (involuntary movements of the body). But when I came out, I rushed straight to the Vyas Peeth and jumped into the lap of Pujya Shri, Who was delivering Satsang. I simply don’t know how I managed to jump like that. There wasn’t a glass cabin at that time.

Pujya Shri said, “You could not assimilate the grace showered upon you.”

There was immaturity in my Sadhana. Sadhana is dissipated by the desires and lust present in the heart. Whosoever surrenders himself completely to Bapuji is enlightened by Him to the core.

Nepal tour in the holy company

of Bapuji

Once Narayan Sai reported in Haridwar, “Bapuji, 10-12 passengers of a Nepal-bound luxury bus have not arrived. The bus conductor is looking for new passengers.”

Bapuji is an absolutely carefree saint. He instantly got ready to go and said, “Is there anyone who wishes to join me?”

All of us raised our hands. Then, we sat with Bapuji in the cab. Pujya Shri would Himself drive the bus at times.

Bapuji would say, “Come here and sit with me.” We would hesitate as to how we could sit with Bapuji? Bapuji would rebuke, “Why do you disobey my command?”

In Nepal, Bapuji would sit in the truck and say, “Come, sit here; you are sitting with me now. A time will come when even having my Darshan will become difficult for you.”

Later on, the number of devotees increased so greatly that it became really difficult to have such a close company and Darshan. Bapuji will be acquitted shortly and then the number of devotees will surge so enormously that it would be extremely difficult to have even His mere Darshan

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पूज्य बापूजी के प्रेरक जीवन-प्रसंग

अहमदाबाद के श्री बिजल भाई विहोल पूज्य बापूजी का दिसम्बर 1979 से सान्निध्य पाते रहे हैं । पूज्यश्री के सत्संग-सान्निध्य से हुई अनुभूतियों को वे गद्गद हृदय से बताते हैं :

और पूरा शरीर शांत व निर्मल हो गया

मैंने 1980 में पूज्य बापूजी के सान्निध्य में उत्तरायण ध्यानयोग शक्तिपात साधना शिविर में भाग लिया । शक्तिपात द्वारा बापूजी ने ऐसी कुछ करुणा की कि ध्यान के दौरान अपने-आप मेरा पादपश्चिमोत्तानासन लग गया । पूरा शरीर शांत व निर्मल होने लगा । पूज्यश्री बोले : ‘‘साढ़े 3 मिनट तक इसी आसन में रुक जाओ ।’’

लेकिन पूर्व का कोई पाप रहा होगा कि मैं साढ़े 3 मिनट तक नहीं रुक पाया, जिससे मेरे शरीर से खूब बदबू निकलने लगी । जैसे मुझे 6 महीने से बीमारी हो ऐसा मेरा शरीर हो गया । शिविर पूरा हुआ तो मैं घर गया । हफ्तेभर में मेरे शरीर की बदबू कम होते-होते खत्म हो गयी । फिर मैं बापूजी के दर्शन करनेे आया तो बापूजी ने अम्माजी (माँ महँगीबाजी) को बोला : ‘‘देखो, सम्प्रेषण शक्ति से 7 दिन में इसमें कैसा परिवर्तन हो गया !’’

उस ध्यानयोग शिविर के बाद मुझे तन-मन में बहुत स्फूर्ति व आनंद का एहसास हो रहा था ।

प्रबल संकल्पवश हमें वापस आना पड़ा’

1984 की बात है । कड़ी गाँव में बापूजी का सत्संग था । मैंने पूज्यश्री के श्रीचरणों में प्रार्थना की : ‘‘बापूजी ! हमारे घर को पावन कीजिये, एक बार चरण घुमाइये ।’’

बापूजी बोले : ‘‘सोचेंगे, लेकिन रास्ते में खड़े मत रहना ।’’

मेरे घर के नजदीक से गाड़ी निकली तो सेवकों ने पूज्यश्री को बताया कि ‘‘बापूजी ! बिजल भाई ने आपश्री को अपने घर में चरण घुमाने की प्रार्थना की थी । वैसे उनके घर से हम काफी आगे निकल चुके हैं ।’’ बापूजी ने गाड़ी का मार्ग बदलवाया और हमारे घर आकर बोले : ‘‘यहाँ किसीका प्रबल संकल्प था इसलिए हमें आगे जाकर भी वापस आना पड़ा ।’’

फिर बोले : ‘‘तुम्हारा घर चिड़िया के घोंसले जैसा है ।’’

हमने सोचा कि गुरुवर के श्रीमुख से ऐसे वचन निकले हैं तो जरूर कुछ बदलाव आयेगा और वास्तव में कुछ ही समय में हमारा घर बहुत बड़ा हो गया ।

बापूजी ने पितरों के दर्शन कराये

एक बार की बात है, श्राद्ध के दिन थे । बापूजी से मैंने कहा : ‘‘बापूजी ! मुझे श्राद्ध करना है ।’’

पूज्यश्री मौज में आकर बोले : ‘‘जिसको गरज होगी वह करेगा, तुम कुछ मत करना ।’’

मैंने प्रयास छोड़ दिया । घरवालों ने मिलकर श्राद्ध कर लिया । रात को स्वप्न में मुझे एक पगड़ीधारी व्यक्ति दिखे जो चिलम पी रहे थे । उन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था । मैंने सब कुछ पिताजी को बताया तो वे दंग रह गये ! उन्होंने बताया कि वे मेरे पितामह थे । मुझे गुरुआज्ञा-पालन का महत्त्व पता चला कि श्राद्ध तो घरवालों ने किया  लेकिन  पितरों के  दर्शन मुझे हुए ।

सीधे गोद में जाकर गिरा

साधना में तीव्रता से ऊँचाई पर पहुँचने के लिए जिज्ञासु साधक 7 दिन के लिए आश्रम के मौन-मंदिर में रहते हैं । भोजन व आवश्यकतावाली वस्तु वहीं पहुँचायी जाती है ।

मैं भी 7 दिन अंदर रहा । पूज्यश्री शाम या रात को कभी-कभार आते थे और ‘कैसा है ? क्या है ?...’ ऐसा पूछते थे ।

जो लोग मौन-मंदिर से 7 दिन बाद बाहर निकलते थे उनको कुछ अनुभूति या क्रियाएँ होती थीं । पर मैं बाहर निकला तो दौड़ के वहाँ पहुँचा जहाँ व्यासपीठ पर बापूजी सत्संग कर रहे थे और सीधा पूज्यश्री की गोद में जा गिरा । पता नहीं मैंने कैसे छलाँग लगा दी ! पहले काँच की केबिन नहीं थी ।

 पूज्यश्री ने कहा : ‘‘तुम (कृपावर्षा को) झेल नहीं पाये ।’’

भीतर कचाई थी । हृदय में इच्छा-वासना होती है तो वह साधना को बिखेर देती है । जो पूरा समर्पित होता है उसको तो बापूजी पूरा पहुँचा देते हैं ।

बापूजी के सान्निध्य में नेपाल-यात्रा

एक बार हरिद्वार में नारायण साँईंजी ने पूज्यश्री को बताया : ‘‘बापूजी ! नेपाल जानेवाली एक लक्जरी बस की 10-12 सवारियाँ चली गयी हैं । बसवाला यात्रियों को ढूँढ़ रहा है ।’’

बापूजी तो अलमस्त संत हैं । वे जाने के लिए तैयार हो गये और बोले : ‘‘और किसको आना है हमारे साथ ?’’

हम सबने उँगली उठा दी । फिर बापूजी के साथ गाड़ी में बैठे । पूज्यश्री कभी-कभी स्वयं लक्जरी बस चलाते थे ।

बापूजी बोलते : ‘‘हमारे साथ बैठो इधर ।’’ हमें तो संकोच होता कि बापूजी के साथ कैसे बैठें ! बापूजी डाँटते थे कि ‘‘हमारा वचन क्यों काटता है !’’

नेपाल में बापूजी ट—क में बैठते, बोलते : ‘‘तुम इधर बैठो । अभी साथ में बैठे हो, आगे ऐसा समय आयेगा कि दर्शन दुर्लभ हो जायेंगे ।’’

और बाद में भक्तों की संख्या इतनी बढ़ गयी कि वैसा सान्निध्य और दर्शन दुर्लभ ही हो गया । बापूजी शीघ्र ही निर्दोष छूटकर आयेंगे और तब तो भक्त इतने बढ़ेंगे कि केवल दर्शन भी महादुर्लभ हो जायेंगे ।  

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