ऐसे सर्वांतर्यामी, करुणानिधान सद्गुरु का क्या और कैसे वर्णन करूँ !

ऐसे सर्वांतर्यामी, करुणानिधान सद्गुरु का क्या और कैसे वर्णन करूँ !

सबकी पुकार सुनते, जप, सत्संग व ईश्वर में प्रीति बढ़ाते’ गतांक से आगे

सुशीला बबेरवाल पूज्य बापूजी के अन्य कुछ जीवन-प्रसंग बताते हुए कहती हैं :

अंतर्यामी गुरुदेव सब सुनते हैं

एक बार मैंने ‘मेरी प्रीत लगा दो गुरुवर, मेरी भक्ति जगा दो गुरुवर...’ यह भजन सुना । मुझे बहुत अच्छा लगा । मैं रोज सुबह बापूजी के श्रीचित्र के सामने बैठ जाती और गुरुदेव को भजन सुनाती थी । साथ में ‘नारायण... नारायण...’ भजन भी सुनाती थी । यह मेरा नियम बन गया था । ऐसा पौने दो महीने तक चलता रहा ।

एक दिन मैंने गुरुदेव के श्रीचित्र के सामने भजन गाया और कहा : ‘‘बापूजी ! मैं रोज आपको भजन सुनाती हूँ, आप कभी सुनते भी हो या नहीं ?’’

कुछ दिनों बाद बापूजी बहादुरगढ़ आश्रम में पधारे । हम सब दर्शन-सत्संग हेतु वहाँ गये । सत्संग पूरा होने पर गुरुदेव ने पूछा : ‘‘अरे, यहाँ की बहनें, माताएँ कोई भजन गाती हैं कि नहीं ?’’

एक बहन ने भजन गाना शुरू किया । उसका पूरा होते ही मैंने वही भजन गाना शुरू किया जो रोज घर पर गाती थी । एक भाई मुझे माइक देने लगे तो बापूजी बोले : ‘‘नहीं, नहीं, बिना माइक के गायेगी ।’’

मेरे मन में हुआ की रोज बिना माइक के सुनाती हूँ इसलिए बापूजी ने मना कर दिया है । बीच-बीच में पूज्यश्री कुछ पंक्तियाँ मुझे पुनः गाने को बोलते और मेरे साथ स्वयं भी गाने लगते थे । पूज्यश्री की प्रेममयी, कृपामयी दृष्टि, मधुर मुस्कान, अनोखी झाँकियाँ सब देखते ही रह गये । हम सबको लग रहा था कि बापूजी व्यासपीठ पर ही बैठे रहें ताकि हमको दर्शन-सान्निध्य का और भी लाभ मिले । इसलिए मैं ‘नारायण... नारायण...’ भजन भी गाने लगी । बापूजी व्यासपीठ पर खड़े हुए और कीर्तन के साथ नृत्य करने लगे । फिर गुरुदेव ने हम सबको बहुत प्रसाद बाँटा । भजन की आखिरी पंक्ति चल रही थी तब गुरुदेव व्यासपीठ से नीचे उतरे और मेरे सामने आकर बोले : ‘‘सुनता हूँ न मैं भजन !’’ मैंने विस्मित होकर कहा : ‘‘जी !’’

मुझे अनुभव हुआ कि सद्गुरुदेव सच्चे हृदय की पुकार अवश्य सुनते हैं । ब्रह्मवेत्ता संत चराचर ब्रह्मांड में व्याप्त होते हैं । जब भक्त हृदयपूर्वक पुकारता है तब दूरी कोई महत्त्व नहीं रखती । ऐसे परमात्मस्वरूप अंतर्यामी गुरुदेव के श्रीचरणों में शत-शत नमन !

थोड़ी भी सेवा का देते कई गुना फल

सन् 2006 में मैं गुरुपूनम पर्व के निमित्त अहमदाबाद आश्रम में आयी थी और 2 महीने का मौन अनुष्ठान करने हेतु रुक गयी । मेरे मन में बार-बार बापूजी के दर्शन करने, गुरुदेव से बात करने की तीव्र उत्कंठा होती थी । अनुष्ठान पूरा होने के एक दिन पहले बड़े सौभाग्य से पूज्यश्री से बातचीत करने का अवसर मिला । बापूजी ने मेरा मौन खुलवाया और बोले कि ‘‘तेरे से बाद में बात करूँगा ।’’ मैंने सोचा, ‘कितनी मुश्किल से तो बात होती है, अब फिर कब बात करेंगे !’

दूसरे दिन बापूजी हवाई जहाज द्वारा अहमदाबाद से दिल्ली जा रहे थे तब मेरी पूज्यश्री से बात हुई । हमारा परिवार बापूजी से कैसे जुड़ा इसके बारे में पूज्यश्री ने पूछा ।

मैंने कहा : ‘‘जी, मेरे पिताजी एक सच्चे गुरु की खोज में लगे रहते थे । वे टी.वी. पर जब आपका सत्संग सुनते थे तो उन्हें बहुत अच्छा लगता था । सन् 1996 की बात है । हमारे पड़ोस के राजीव सोमानी नाम के एक भाई आपश्री से दीक्षित थे । एक बार वे आश्रम के कैलेंडर का बंडल हाथ में ले के जा रहे थे । पिताजी की दृष्टि कैलेंडर पर छपे आपके श्रीचित्र पर पड़ी तो वे अनायास ही बोल पड़े : ‘‘यह तो गुरुजी का कैलेंडर है, एक मुझे दोगे ?’’

उस समय तो घर में किसीने भी दीक्षा नहीं ली थी पर पिताजी के मुँह से आपके लिए ‘गुरुजी’ शब्द निकल गया । उन भाई ने बहुत प्रसन्न होते हुए एक कैलेंडर दिया । पिताजी ने उसे बड़े आदर से लिया और उन भाई से उसके पैसे पूछने लगे तो उन्होंने पैसे लेने से मना कर दिया ।’’

‘‘अच्छा, तो उन्होंने सेवा कर ली ।’’ इतना बोलकर गुरुदेव ने कुछ सेकंड के लिए आँखें बंद कीं । ब्रह्मवेत्ता संत का हृदय संतुष्ट होता है तो कल्याण किये बिना नहीं रह सकता । वह चाहे आज दिखे, चाहे कल या परसों... संत की कृपा तो पीछे-पीछे चलती ही है । मैंने देखा कि उन भाई को गुरुकृपा से जीवन में बहुत सारे अनुभव हुए । पहले वे किराये के मकान में रहते थे पर बाद में स्वयं का बड़ा बँगला हो गया । उनकी पत्नी की भयंकर दुर्घटना में जान बची । और पूज्यश्री को उन भाई की सेवा की बात बताने से पूर्व भी वर्षों से पुत्रहीन उनके परिवार को पूज्य बापूजी की कृपा से पुत्ररत्न की प्राप्ति भी हुई थी । आध्यात्मिकता में गुरुदेव ने उन्हें कितना दिया होगा यह तो वे ही जानें । हम थोड़ी भी सेवा करते हैं तो भी ब्रह्मवेत्ता संत पूज्य बापूजी उसका कई गुना फल देते हैं ।

उन सर्वज्ञ से कुछ नहीं छिपा होता

फिर गुरुदेव बोले : ‘‘आगे क्या हुआ ?’’

‘‘बापूजी ! एक बार अचानक पिताजी को बुखार आ गया । कई टेस्ट करवाने के बाद भी बुखार का निदान नहीं मिल रहा था । 20-25 दिन हो गये । एक दिन शाम को अचानक उनकी तबीयत ज्यादा खराब हो गयी । बोलना बंद हो गया । हम तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर गये । डॉक्टर बोले : ‘‘कॉमा में चले गये हैं । बुखार ब्रेन में चढ़ गया है । अब 3 सम्भावनाएँ हैं...’’

गुरुदेव एकदम ध्यान से सुन रहे थे । मैं आगे का बता ही रही थी इतने में गुरुदेव बोले : ‘‘रुक... रुक... रुक... अब मैं बताता हूँ कि डॉक्टर ने 3 सम्भावनाएँ कौन-कौन-सी बतायी थीं ! डॉक्टर ने बोला था कि ‘या तो ये मर जायेंगे या लकवा (paralysis) हो जायेगा या याददाश्त चली जायेगी ।’ ऐसा ही बोला था न ?’’

यह सुनकर मैं तो आश्चर्य से भर गयी । मुझे समझ में आ गया कि सब कुछ जाननेवाले गुरुदेव अनजान बनकर मुझसे यह सब पूछ रहे हैं ।

मैंने कहा : ‘‘जी... ऐसा ही बोले थे डॉक्टर । मेरी माँ अस्पताल से घर आयी और मुझे गले लगा के बहुत रोने लगी । इतने में उनकी दृष्टि दीवार पर लगे आपश्री के कैलेंडर पर पड़ी और श्रीचित्र को देखते हुए माँ बोलीं कि ‘‘देखिये, मेरे पतिदेव ने भले अनायास ही क्यों न बोला हो लेकिन आपको ‘गुरुजी’ बोला है, अगर आप समर्थ हो तो आप गुरु बन के दिखाइये तो आपको जानूँ !’’

बापूजी बोले : ‘‘अच्छा, तेरी माँ बड़ी तेज है ! मुझे सीधा चैलेंज करती है !’’

‘‘जी ! अगले दिन ही पिताजी को होश आ गया । डॉक्टरों ने याददाश्त चेक की तो वह भी ठीक थी । फिर डॉक्टरों ने कहा कि ‘‘इनको ठीक होने में 2-3 महीने लग जायेंगे ।’’

इतना सुनकर अंतर्यामी गुरुदेव बोले : ‘‘रुक... रुक... मैं बताता हूँ आगे क्या हुआ ! तेरे पिता 16वेेंं दिन ही घर आ गये थे ।’’

‘‘जी, ऐसा ही हुआ था ।’’

‘अंतर्यामी’ शब्द का अर्थ जो पहले सुन रखा था, उसका उस दिन प्रत्यक्ष दर्शन करने को मिल रहा था । जो ज्ञान सुन रखा था उसका प्रैक्टिकल अनुभव होकर वह विज्ञान में परिणत हो रहा था । वेदांत दर्शन प्रत्यक्ष अनुभव का सूक्ष्मतम विज्ञान है । यह कपोल-कल्पना नहीं है । महापुरुषों का जीवन जीता-जागता वेदांत दर्शन है । मैंने आगे बताया: ‘‘जिस प्रकार से पिताजी के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था, उसे देखकर डॉक्टरों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ । गुरुदेव ! आपकी ही कृपा से मेरे पिताजी आज तक जीवित हैं ।’’

पूज्यश्री मुस्कराते हुए विनोद में बोले : ‘‘और क्या, वह तो है ही !’’

मैंने कहा : ‘‘जी, इसके बाद मेरे पिताजी की आपके श्रीचरणों में श्रद्धा बढ़ गयी और फिर हम सभीने दीक्षा ले ली ।’’

इस प्रकार पूज्य बापूजी मुझसे पूछते भी जा रहे थे और आगे की बात स्वयं बताते भी जा रहे थे । ऐसे त्रिकालदर्शी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष से कुछ भी नहीं छिपा होता । ऐसे करुणानिधान, दुःखभंजन और सबके परम हितैषी सद्गुरु की महिमा व लीलाओं का क्या वर्णन करूँ और कैसे करूँ ? वेद और शास्त्र भी ऐसे संतों की महिमा का पूरा वर्णन नहीं कर सके । वे साधक-शिष्य धन्य हैं जिन्हें ईश्वर से भी बढ़कर करुणा-कृपा बरसानेवाले परम गुरु पूज्य बापूजी सद्गुरुरूप में मिले हैं ।                              (क्रमशः)

 

Ref: ISSUE328-329-ARPIL-MAY-2020

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