गुरु-सान्निध्य याद आते ही हृदय गद्‌गद हो जाता है !
Ashram India

गुरु-सान्निध्य याद आते ही हृदय गद्‌गद हो जाता है !

पिछले अंक में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भगवत्स्वरूप, अहैतुकी कृपा बरसानेवाले पूज्य बापूजी के जीवन में भगवान का ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ यह वचन प्रत्यक्ष साकार होते दिखता है । अब आगे विजयभाई पूज्य बापूजी के अन्य कुछ जीवन-प्रसंग बताते हुए कहते हैं :

सबको भाग्य चमकाने का अवसर मिला

सन् 2009 में पूज्यश्री उदयपुर आश्रम पधारे थे । बापूजी जब भी आते, गरीबों के बीच जाकर उनकी आवश्यकता के अनुसार अनाज, पैसे, कम्बल आदि का वितरण करते थे अथवा हमको बोल देते थे कि जिसको जिस चीज की कमी हो, जाकर उसकी पूर्ति कर देना ।

उदयपुर आश्रम से करीब पौने दो कि.मी. दूर गरीब बस्ती थी । बरसात के दिन होने से रास्ते में कँटीले पौधे, झाड़ियाँ आदि उग गये थे, जाने में बड़ी परेशानी होती थी ।

मैं बगीचे की सेवा में था । बापूजी ने मुझसे कहा : ‘‘मुझे घूमते-घूमते गरीबों के बीच जाना है, रास्ते की सफाई हो जायेगी ?’’

मैंने कहा : ‘‘जी गुरुजी ! हो जायेगी ।’’

‘‘कितनी देर में हो जायेगी ?’’

‘‘जी, 25-30 मिनट में हो जायेगी ।’’

‘‘25-30 मिनट में कर लेगा ?’’

‘‘जी बापूजी ।’’

पूज्यश्री बोले : ‘‘चल, ठीक है । जा, करके दिखा ।’’

बाद में एक भाई ने मुझसे कहा : ‘‘अरे भाई ! गुरुदेव के सामने सोच-समझकर बोलना चाहिए । यह काम 25-30 मिनट में होने जैसा तो है नहीं ! इसको कई घंटे लग जायेंगे ।’’

मैंने मन-ही-मन सोचा कि ‘गुरुदेव ने बुलवाया है न, तो गुरुदेव ही करवायेंगे । मेरे हाथ में तो अब केवल पुरुषार्थ करना है, बाकी गुरुदेव सँभाल लेंगे ।’ गुरुदेव की ऐसी अंतर्प्रेरणा हुई कि हम दोनों भाई पंडाल गये तो वहाँ लगभग 60-70 लोग थे । मैंने सेवा के बारे में बताया तो गुरुसेवा का सौभाग्य मिल रहा है यह जानकर सब लोग बहुत प्रसन्न हुए । 30-40 हँसिये और 15-16 फावड़े लिये और सब एक साथ सेवा में लग गये ।

गुरुदेव की कृपा से ऐसा चमत्कार हुआ कि 30 मिनट में ही पूरे रास्ते की सफाई हो गयी और सुंदर पगडंडी बन गयी । हम सेवा पूरी करके कुटिया के पासवाले गेट से अंदर आ रहे थे तो बापूजी ने आते समय मुझे देखा और बोले : ‘‘अरे, तू 25-30 मिनट में पूरा करनेवाला था न ! हुआ कि नहीं अभी तक ?’’

‘‘जी बापूजी ! हो गया ।’’

गुरुदेव ने आश्चर्य दर्शाते हुए पूछा : ‘‘अरे, पूरा हो गया !’’

‘‘जी बापूजी ।’’

गुरुदेव प्रसन्न होते हुए बोले : ‘‘शाबाश ! यह होती है गुरुसेवा !’’ उसके बाद पूज्यश्री मुझे और मेरे साथवाले भाई को अपने साथ कुटिया में ले के गये और हम दोनों को प्रसाद देकर बोले : ‘‘देख ले, सेवा करनेवालों को (विशेष कृपा-प्रसाद) मिलता है ! यहाँ सेवा में जितने भी लोग तेरे साथ मदद में थे, उन सबको अच्छी तरह से भोजन करा देना ।’’

भोजन होने के बाद गुरुदेव ने सबको दर्शन दिये और सत्संग में बताया कि ‘‘निमित्त तो एक बना और कितनों को गुरुसेवा करने का अवसर मिला, सान्निध्य मिला, अपना भाग्य चमकाने का मौका मिला ।’’

मुझे तो यह लगता है कि सेवा का अवसर भी पूज्य गुरुदेव की कृपा से मिलता है और उसे पूरा करने की सूझबूझ भी वे ही देते हैं । इसमें मेरी अपनी योग्यता कुछ भी नहीं । जैसे लौहचुम्बक के निकट रखी लोहे की वस्तु में जो आकर्षणी शक्ति दिखती है वह उसकी अपनी नहीं, लौहचुम्बक की है, वैसे ही मुझमें या बापूजी के अन्य साधक-शिष्यों में जो भी अच्छाइयाँ, योग्यताएँ लोगों को दिख पड़ें तो सचमुच में वे हमारी नहीं हैं, हमारे बुद्धिदाता, शक्तिदाता, प्रेरणादाता सद्गुरुदेव पूज्य बापूजी की ही हैं ।

कर्म-बंधनों को काटकर ईश्वर की ओर आगे बढ़ाया

2012 की बात है । बापूजी उदयपुर आश्रम में पधारे थे । मैं सुबह 4:30 बजे स्नान करके जैसे ही बाहर निकला, देखा कि बापूजी एकदम मेरे कमरे के सामने हैं । इतनी सुबह गुरुदेव को देखकर मैं स्तम्भित रह गया । गुरुदेव के मुखमंडल पर ऐसा ब्रह्मतेज था कि मैं डर गया । मैंने तुरंत दंडवत् प्रणाम किया, फिर खड़ा हुआ और दूसरी बार दंडवत् किया... इस प्रकार मैंने चार बार दंडवत् किया । पूज्यश्री बोले : ‘‘अरे, क्या कर रहा है ? बहुत हो गया । चल, गाय को मेरे साथ कुटिया पर ले चल ।’’

मैंने दो गायों को साथ में लिया । वे चल नहीं रही थीं तो बापूजी स्वयं ही उनको दौड़ाने लगे । गुरुदेव ने मुझे गायों को कुटिया के पीछे नीम के पेड़ से बाँधने को कहा । मैं बाँध रहा था तभी गाय ने गोमूत्र का त्याग किया, बापूजी बोले : ‘‘देख, बढ़िया हुआ न, यहाँ का स्थान पवित्र हो गया ।’’

फिर गुरुदेव ने पूछा : ‘‘कहाँ का है तू ?’’

‘‘जी, बिहार का हूँ ।’’

‘‘तेरा जो कुछ भी है पहले का और अभी का, सब बता दे ।’’

मैंने मन-ही-मन सोचा कि ‘जिनकी विशाल सहानुभूति एवं मातृवत् हृदय है ऐसे गुरुदेव के सामने अपनी गलतियाँ बताकर मन हलका करने का अवसर तो बड़े भाग्य से किसी-किसी विरले को मिलता है ।’ मुझसे जो भी कर्म हुए थे, कुछ भी छुपाये बिना गुरुदेव को मैंने सब बताना शुरू किया । सुबह 4ः45 से 6ः30 हो गये ।

मैंने कहा : ‘‘बापूजी ! मैं पहले नाच-गान, लड़ाई-झगड़े आदि बहुत करता था । मेरे 3 भाई और 1 बहन गुजर गये थे । उनके बाद मेरा नम्बर था । गुरुदेव ! आपकी कृपा से मैं बच गया ।’’

बापूजी : ‘‘ऐसा-ऐसा किया था तूने ? देख बेटे ! कर्म का फल तो भुगतना ही पड़ता है लेकिन जो ब्रह्मवेत्ता की शरण में आ जाता है उसके कर्म कट जाते हैं, कुछ भी कर्म बाकी नहीं रहते ।’’ गुरुदेव के ऐसे करुणामय वचन सुनकर मेरा हृदय द्रवीभूत हो गया ।

फिर गुरुदेव बोले : ‘‘ईश्वरप्राप्ति करेगा ?’’

ये वचन सुनते ही मैं एकदम सुध-बुध खो बैठा । गुरुदेव बोले : ‘‘अरे तेरे को बोल रहा हूँ, तेरे को ! ईश्वरप्राप्ति करनी है न ?’’

‘‘जी बापूजी, करनी है ।’’

‘‘पक्का, ईश्वरप्राप्ति करनी है ?’’

‘‘जी, पक्का करनी है ।’’

ऐसा चार बार गुरुदेव ने मुझसे बुलवाया ।

फिर बोले : ‘‘संत तुलसीदासजी ने कहा है :

जाके प्रिय राम-बैदेही

तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।।

जिनकी ईश्वर में प्रीति नहीं है, चाहे वे मित्र हों, परिचित हों या संबंधी हों ऐसे लोगों से संबंध नहीं रखना चाहिए । उनके बारे में सोचना व उनसे बात करना छोड़ देना चाहिए । सच्चा संबंध तो वह है जो भगवान की तरफ ले जाय । वे ही हमारे पिता हैं, वे ही हमारी माता हैं, वे ही हमारे बंधु हैं और वे ही हमारे सखा हैं जो हमें ईश्वर के सुख में, ईश्वर के ज्ञान में, ईश्वर के माधुर्य में और ईश्वर के आनंद में ले जाते हैं ।’’

‘‘जी ।’’

‘‘ईश्वरप्राप्ति के लिए ईमानदारी से लगे रहना । चाहे कुछ भी हो जाय, भागना नहीं । कोई भी परेशानी हो तो मुझे बता देना लेकिन यहाँ से ईश्वरप्राप्ति किये बिना जाना नहीं ।’’

‘‘जी बापूजी ।’’

गुरुदेव के ये प्रेमभरे वचन मेरे लिए आशीर्वाद बन गये ।

एकांत-सेवन का भूत भागा

पहले मेरे मन में एकांत-सेवन का भूत सवार था । इससे मैं समर्पित होने के बाद 2-3 बार गुरुदेव से अनुमति लिये बिना एकांत की खोज में चला गया था । गुरुदेव के इस मार्गदर्शन और प्रीतिपूर्वक सत्संग सुनने से मुझे बाद में समझ में आ गया कि सच्चा एकांत क्या है । पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘जिनके लिए एकांत दुर्लभ है, आश्रम में आ के रहना दुर्लभ है उनके लिए हम एकांत की बात कहते हैं तो जो आश्रम में रहते हैं न, आश्रम में रहकर कर्मयोग कर रहे हैं उनको भूत लगेगा कि ‘हम एकांत में जायें... एकांत में जायें...’ अरे ! तुमको तो नित्य एकांत है । एक ही ईश्वर के निमित्त जो कर्म कर रहे हैं वह भी एकांत है । बाह्य एकांत में रहना सबके वश की बात नहीं है । जिसका कर्मयोग सिद्ध हो जाय और गुरु कहें कि ‘जाओ, बंद हो जाओ कमरे में ।’ तब तो ठीक है वरना कर्मयोग छोड़कर एकांत में रहेगा तो पति-पत्नी, मित्र, पिक्चर आदि के पुराने संस्कार याद आयेंगे और हावी हो जायेंगे, अपनी अति बरबादी कर लेगा । तो ऐसे लोगों के लिए एकांत नहीं है । एकांत की महिमा बताना तो मेरा कर्तव्य है लेकिन नासमझ लोग मेरी बात का सही अर्थ नहीं समझते हैं तो और नीचे की स्थिति में भी जा सकते हैं ।’’

गुरुकृपा से 2012 से लेकर आज तक कभी भी मुझे एकांत में भटकने की, गुरुद्वार छोड़कर कहीं जाने की या सांसारिक मोह-माया में फँसने की इच्छा नहीं हुई । मैं ईश्वर के मार्ग से दूर रहनेवाले मित्रों, परिचितों आदि के संग से बचा व उनसे बात भी नहीं की ।   (क्रमशः)


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The memory of Guru’s proximity is so ecstatic!


We read in the respective article in the previous issue of the magazine how the Lord’s words: Yogakshemam Vahamyaham(meaning: I arrange for securing what they lack and preserving what they have…) came true in the life of Pujya Bapuji – the God Incarnate to shower motiveless grace on His devotees. Sharing a few more reminiscences of inspirational life-incidents of Pujya Bapuji, Vijay Bhai continues…


Everyone got a chance to brighten-up their fortune


Pujyashri came to the Udaipur ashram in 2009. Whenever Bapuji visited, He would go amidst the poor and distribute food-grains, money, blankets, etc. as per the requirements of the latter; otherwise, He would instruct us to provide them with whatever they needed.


There was a settlement of poor people around 1.75 kilometers from Udaipur ashram. Owing to the rainy season, growing along the way were thorny weeds, bushes, etc.; which would greatly hinder the transit via the route.


I was engaged in the seva of gardening. Bapuji said to me, “I want to go amidst the poor wandering about their settlement; would the pathway be cleaned-up by then?”


I said, “Sure Guruji! It would be done.”


“How long would it take?”


“Ji, it would be done in 25-30 minutes.”


“Would you be able to do so in just 25-30 minutes?”


“Ji, Bapuji.”


Pujyashri said, “OK, fine. Do it and show me.”


Later, one of the sadhaka brothers said to me, “O brother! You should speak thoughtfully to Gurudev. This task is not the kind to be done in 25-30 minutes! It will take many hours.”


I said to myself, ‘As Gurudev has made me say these words; its none but He Himself who will get this accomplished. All I can do now is – put the best of my efforts, and the rest will be taken care of by Gurudev.’ Then, Gurudev, inspired both, me and the sadhaka brother, to go to the pandal, where around 60-70 people were already present. When I told them about the seva, they were quite pleased to know that they were being blessed with an opportunity of serving the Guru. We took 30-40 sickles and 15-16 spades; and engaged ourselves in the seva all-together.


Gurudev’s grace brought about such a miracle that the entire pathway was cleared in just 30 minutes and a beautiful trail was laid. After finishing the seva, we came inside from the gate near the kutir (Bapuji’s cottage), Bapuji saw me and said, “Hey, you were to finish the task within 25-30 minutes, weren’t you! Has it been done?”


“Ji, Bapuji! It has been done.”


Expressing His astonishment at this, Gurudev asked, “O really! Is it done and completed already?”


“Ji, Bapuji.”


Pleased at this, Bapuji said, “Kudos to you! This is called Guruseva!” After that Pujyashri took me and the sadhaka brother accompanying me to the kutir, and giving prasada to both of us, He said, “See, those doing Guruseva get special grace & prasada! Make sure you feed well all those who participated in the seva and lent a helping hand.”


After they took food, Bapuji blessed everyone with His darshan and said in satsanga, “Just one person played an instrumental role, and so many people got the opportunity to participate in Guruseva, and to be in Guru’s proximity, thereby brightening-up their fortune.”


I personally feel that it’s by Pujya Gurudev’s grace that one gets an opportunity of seva; and it’s none but He who blesses one with enough common-sense and acumen to complete it. I can’t attribute it to my own capability. The way the magnetic force, that an iron-object shows when placed near a magnet, is not its inherent property, it’s rather the property of the magnet; similarly, all the good qualities and capabilities that I or other disciples & followers of Bapuji may show, are actually not of our own, they rather belong to our SatGurudev – the giver of intellect and strength, and our source of inspiration.


He broke my fetters of Karma and led me on the path divine 


This incident dates back to 2012. Bapuji was visiting Udaipur Ashram. Coming out after taking a bath at 4:30 in the morning, I saw Bapuji standing right in front of my room. I was taken aback and became motionless seeing Gurudev so early in the morning. I was awe-struck on seeing the Brahmic splendour around Bapuji’s face. I fell flat like a stick let down in front of Bapuji. Then stood up and did the same a second time again… Thus, I prostrated before Him four times. Pujyashri said, “Hey, what are you doing? It is enough. Come along and drive the cows to the kutir.”


I took two cows along. As they weren’t moving at all, Bapuji Himself started to trigger them to run. On reaching the kutir, Gurudev told me to tie the cows to the Neem (Margosa) tree located behind the kutir. While I was doing so, one of the cows passed urine (Gau-Mutra), to which Bapuji said, “See, isn’t it good that this place got sanctified thus!”


Then Gurudev asked, “Where are you originally from?”


“Ji, I am from Bihar.”


“OK, just tell me all your good & bad deeds of the past and present.”


I said to myself, “Only the rarest of the rare gets blessed with the opportunity to relax his mind by confessing one’s misdeeds before such a hugely sympathetic and motherly hearted Gurudev.” So, I started to relate all my deeds & misdeeds of the past to Him, without hiding anything; and in the process, the clock passed from 4:45 am to 6:30 am.


I said, “Bapuji! Earlier, I indulged in dance, music, and picked quarrels, fights, etc. My three brothers and sister had passed away. And after them, I was destined to depart. However, Gurudev! By Your grace, I was saved.”


Bapuji, “Oh, so you had done all this in your life? Dear son! See, whatever deeds we perform, we have to certainly suffer the results of the same. However, the one who takes refuge in a Brahmavetta (i.e. a Self-realized one), gets freed from the bondage of all actions, and one isn’t left with any residual karma.” After listening to such kind words of Gurudev, my heart just melted.


Then Gurudev asked, “Would you like to attain God?”


As soon as I heard these words, I lost my senses. Gurudev said, “Hey, I am asking you, no one else! You want to attain God, don’t you?”


“Ji Bapuji, I want to.”


“You sure, you want to attain God?”


“Ji, most certainly, I want to.”


Thus, Gurudev made me repeat the same statement four times. Then he said, “Sant Tulsidas said,



जाके प्रिय न राम-बैदेही ।

तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।।


‘Those who do not hold Rama and Sita dear, shun them as your dire enemies, howsoever closely related.’


One should not keep any relationship with those who don’t love God, be it your friends, acquaintances, or relatives. One should shun talking to them, and even thinking of them. He is our true relative who leads us to God. He alone is our father, mother, brother and friend who leads us to divine happiness, divine knowledge, divine joy and divine bliss.


“Ji, sure.”


“Persevere sincerely in your efforts to attain God. Don’t run away, come what may. In the event of any trouble or hindrance, just let me know; but don’t leave this place without attaining God.”


“Ji, Bapuji.”


These loving words of Gurudev turned out to be a blessing for me.


Good riddance to my Obsession with seeking Solitude

Earlier, I used to be highly obsessed with seeking solitude. Owing to this obsession, after joining the ashram as a resident sadhaka, it so happened that 2-3 times I left the ashram in the search of solitude, that too without seeking Gurudev’s permission. However, after receiving the above mentioned guidance from Gurudev and hearing his satsang discourses with devotional love, I realised what solitude is, in the real sense. Pujya Bapuji says, “I talk about solitude only for those who don’t get the rare opportunity of being in solitude or staying in the ashram. However, what happens is – those, living in the ashram, practicing Karma Yoga already, get obsessed with the idea of seeking solitude and they keep wishing and nagging – ‘I shall go in solitude… I shall go in solitude…’. Arre! You are already availing constant solitude. Doing work for attaining one God is also solitude. It is not possible for everyone to live in physical solitude or isolation. It is fine only for the one who has attained perfection in Karma-Yoga; and whom Guru Himself instructs – ‘OK, now you go to a secluded place and shut yourself in a room.’ Otherwise, if someone leaves the practice of Karma Yoga to live in solitude; then one would remember one’s spouse, or friends, movies, etc.; and such past impressions would dominate and overpower him; as a result of this, he would end up doing tremendous harm to himself. So, physical solitude is not meant for such people. It’s my duty to sing the glory of solitude; but if the ignorant don’t interpret it in the right way; they may end up facing a downfall.”


Starting from 2012, I haven’t had any word with either my family members, or even acquaintances; nor did I ever feel like leaving the refuge of Guru (or His ashram) or getting entangled in worldly attachment and delusion. I shunned the company of those friends, acquaintances who were averse to the path of God-realisation; nor did I ever even talk to them. (To be continued…)



[Rishi Prasad Edition-320-August-2019]

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