His glory is just indescribable…

His glory is just indescribable…

उनकी महिमा बरनी न जाय...

सुरेश मौर्य गुरु-सान्निध्य के कुछ और भी संस्मरण बताते हैं : हर वर्ष की तरह 2006 में भी जन्माष्टमी पर पूज्य बापूजी का सत्संग सूरत में होनेवाला था । उन्हीं दिनों में तापी नदी में भीषण बाढ़ आ गयी । सूरत व आसपास के क्षेत्रों में पानी भर गया । सूरत आश्रम में भी जमीन से 7-8 फीट ऊपर तक पानी भर गया था । चारों तरफ तबाही मच गयी । ऐसे में करुणासागर पूज्य बापूजी की प्रेरणा से बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों में जाकर साधक फूड पैकेट पहुँचाने तथा अन्य राहत-सेवाकार्यों में लग गये । बिजली उपलब्ध न होने से जनरेटर द्वारा बोर का पानी निकाल के बाढ़ग्रस्तों के लिए भेजा जा रहा था । पीड़ितों के उपचार हेतु तत्काल चिकित्सा-सेवा उपलब्ध करायी गयी तथा दूर-दराज के क्षेत्रों में चल-चिकित्सालयों द्वारा सेवा पहुँचायी जा रही थी ।

ऐसे में सत्संग-समारोह होने की दूर-दूर  तक कोई सम्भावना नहीं दिख रही थी । लेकिन जन्माष्टमी के 2 दिन पूर्व ही पूज्यश्री का संदेश आया कि ‘हम आ रहे हैं, तुम लोग तैयारी करो । जब हमारे बच्चे-बच्चियाँ ऐसी परिस्थिति में इतना सेवाकार्य कर रहे हैं तो हम बैठे रहेंगे क्या ?’

गुरुदेव का संदेश सुनकर हम सभी साधकों में उत्साह का संचार हो गया और सत्संग-समारोह की तैयारी में लग गये । आश्रम से 2 कि.मी. दूरी पर पूज्यश्री की कुटिया है, वहीं गुरुदेव का निवास बनाया गया । बाढ़ के  कारण सारे शहर की  बिजली को सबस्टेशन से बंद कर दिया गया था । गुरुदेव की कुटिया पर बिजली-व्यवस्था हेतु मैं किराये पर इनवर्टर लेने गया ।

इनवर्टरवाले भाई बोले : ‘‘इसके 4000 रुपये डिपोजिट के रूप में रखने होंगे व एक दिन का 2500 रुपये किराया लगेगा ।’’ पर जैसे ही मैंने बापूजी का नाम लिया तो वे बोले : ‘‘आप लोग समाज के लिए इतना करते हो, शहर में इतनी तबाही मची हुई है फिर भी आपके गुरुदेव सत्संग देने के लिए सूरत आ रहे हैं तो मेरा भी कुछ इस धर्मकार्य में लग जाय । मुझे किराया नहीं चाहिए, केवल डिपोजिट जमा करा दीजिये ।’’ मैं इनवर्टर लेकर आ गया ।

कुटिया के पास कीचड़ था । रेती छानते समय छन्ने के ऊपर जो बड़े कंकड़-पत्थर बच जाते हैं, उन्हें हम वहाँ पर डाल रहे थे । इतने में बापूजी की गाड़ी आ गयी । गुरुदेव ने हम लोगों को सेवा करते देखा । पूज्यश्री ने गाड़ी में धोती-कुर्ता आदि कपड़े निकाल दिये, केवल कच्छा पहने हुए नीचे उतरे और फावड़ा व तसला उठाया ।

एक भाई ने कहा : ‘‘नहीं बापू ! हम कर लेंगे ।’’

पूज्यश्री बोले : ‘‘हट जा, चारों तरफ इतनी बाढ़ है, इतनी बीमारियाँ फैली हुई हैं... ऐसे में मेरे बेटे-बेटियाँ सेवा कर सकते हैं तो क्या मैं नहीं कर सकता ? क्या मुझे सेवा का अधिकार नहीं है ?’’

गुरुदेव भी तसला भर-भर के डालने लगे । फिर बापूजी ने पूछा : ‘‘यह कहाँ से लाया ?’’ देखो, कैसी निगरानी रखते हैं बापू !

एक भाई ने बताया कि ‘‘आश्रम में निर्माण-कार्य चल रहा था, वहाँ रेती छानने पर जो कंकड़-पत्थर निकले थे वे ही लाये थे ।’’

गुरुदेव बोले : ‘‘इसको सँभाल के रखना चाहिए न, कहीं काम आता ।’’

भाई : ‘‘गुरुदेव आप यहाँ रुकेंगे तो आपको कीचड़ लगता इसलिए थोड़ा-सा रास्ता बना दिया ।’’

‘‘अरे, मेरे एक के लिए इतना चौड़ा रास्ता बना रहे हो ! पगडंडी रास्ता बनाओ और बाकी बचा के रखो, फिर काम आयेगा ।’’

धर्म की छोटी-से-छोटी वस्तु के अधिक-से-अधिक सदुपयोग का कैसा ध्यान ! धर्म-पथ पर कैसे चलना चाहिए यह किसीको समझना हो तो पूज्य बापूजी का जीवन देख ले ।

शाम होने के बाद अन्य लोग चले गये । मैं इनवर्टर लगा रहा था । गुरुदेव बोले : ‘‘इतना सब करने की क्या जरूरत थी ? जब तुम लोग इतने दिन बाढ़ की स्थिति में निकाल सकते हो तो मैं 1-2 दिन बिना बिजली के नहीं रह सकता क्या ?’’

मैं हाथ जोड़कर खड़ा हो गया । फिर गुरुदेव बोले : ‘‘ठीक है, जब ले ही आया है तो लगा दे ।’’

बिजली की व्यवस्था करते-करते कब रात के 10 बज गये मुझे पता ही नहीं चला ।

गुरुदेव कमरे से बाहर आये, बोले : ‘‘अरे, इतना समय हो गया, अब आश्रम कैसे जायेगा ? और तूने अभी तक भोजन भी नहीं किया ।’’

मैंने कहा : ‘‘बापू ! देखता हूँ, किसीको बुला लेता हूँ आश्रम से ।’’

बोले : ‘‘नहीं, बारिश का मौसम है, इतनी रात को किसको परेशान करेगा ! किसीको मत बुला ।

एक काम कर, तू रोड पर पहुँच, तुझे एक गाड़ी लेने आयेगी ।’’ कुटिया से थोड़ी दूरी पर रोड थी, मैं वहाँ पहुँचा । बापूजी स्वयं गाड़ी चलाकर आये । पूज्यश्री ने काँच खोला और मुझे प्रसाद दिया । तब तक एक बाइकवाला आया और गुरुदेव को देखकर रुक के उसने प्रणाम किया । पूज्यश्री मुझे बोले : ‘‘इसकी गाड़ी पर बैठ जा, यह तुझे आश्रम तक छोड़ देगा । और देख, आश्रम में तेरे लिए भोजन रखा है । रसोईघर का जो दरवाजा है न, उसके पीछे डोंगों1 में खिचड़ी और कढ़ी ढकी हुई रखी है । खा लेना और आराम करना ।’’

मैं आश्रम पहुँचा । रसोईघर का दरवाजा खोला तो देखा कि उसके पीछे डोंगों में भोजन रखा है । मेरी आहट से वहाँ सोये भाई की नींद खुल गयी । वे बोले : ‘‘कहाँ से आ रहे हो ? भोजन करना है क्या ?’’

मैंने कहा : ‘‘हाँ ।’’

बोले : ‘‘भाई ! लगता है यह भोजन तुम्हारे लिए ही परमात्मा ने रखवाया था । शाम को जो भोजन बच जाता है, हर रोज उसे बँटवा देते हैं लेकिन आज पता नहीं कैसे दिमाग में आया कि थोड़ी कढ़ी-खिचड़ी रख दूँ ।’’

मैंने कहा : ‘‘हाँ, वास्तव में परमात्मा ने ही रखवाया था और मुझे बताया भी था ।’’

मेरी बात सुनकर वे भाई आश्चर्य से मेरी ओर देखते रहे । भोजन के बाद मैंने उन भाई को सब बात बतायी तो वे भी गद्गद हो गये । मुझे तो ऐसे सद्गुरु मिले हैं कि उनकी लीला व महिमा का वर्णन नहीं कर सकता ।

यह तेरी धरोहर है मेरे पास,

कई गुना करके वापस दूँगा

2005 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर, प्रतापगढ़ व सुलतानपुर क्षेत्र में ‘भक्ति जागृति प्रचार यात्रा’ रखी गयी थी । सूरत से हम 150 साधक भाई-बहन गये थे । गाँव-गाँव में कीर्तनयात्रा निकालते, सत्साहित्य बाँटते । दोपहर होने पर सत्संग व भंडारा होता तथा शाम को फिर से कीर्तनयात्रा निकलती व संध्या के बाद सत्संग होता ।

वहाँ खूब बढ़िया सेवा हुई और 72,000 रुपये बच भी गये । दिसम्बर में सूरत आश्रम में शिविर था । गुरुदेव व्यासपीठ पर विराजमान थे । हम लोग सेवा से बचे हुए उन पैसों को लेकर गुरुदेव के चरणोें में पहुँचे ।

गुरुदेव ने पूछा : ‘‘यह क्या है ?’’

‘‘जी, सेवा होने के बाद ये पैसे बचे हैं ।’’

‘‘रखो न अपने पास, अगले साल फिर सेवा नहीं करनी है क्या ?’’

‘‘बापू ! फिर ले लेंगे न ।’’

‘‘अच्छा, यह तुम्हारी धरोहर मेरे पास जमा है । इसका कई गुना करके मैं वापस करूँगा, जब चाहोगे तब ले लेना ।’’ और हुआ भी ऐसा ही !...

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1. डोंगा = भोजन रखने या परोसने का बर्तन


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His glory is just indescribable…


Reminiscing a few more incidents of Guru’s proximity, Suresh Maurya shares: Like every year, in 2006 also, Pujya Bapuji’s Janamashtami Satsang was scheduled to be held in Surat. At that time, the Tapi river became severely flooded. The city of Surat and its neighbouring areas were deluged. Even Surat ashram was inundated with up to 7-8 feet of water above ground level. The floods wreaked havoc everywhere. Given such a situation, the sadhakas, under the inspirational aegis of Pujya Bapuji, the Ocean of compassion, visited the flood-affected areas and actively engaged in delivering food packets (to the victims and the needy) and other flood relief works. Owing to the power outage, the bore water was being drawn with the help of generators and was then being sent to the flood-victims. Emergency Medical Services were provided in order to treat the flood-victims; and in the remote areas, the same was being provided via Mobile Dispensaries.

Given such a situation, there was barely any possibility of a Satsang-programme being conducted even in distant future. However, just 2 days prior to Janmashtami, we received a message from Pujyashri – ‘I am coming; please make the necessary arrangements (for Satsang programme). When my children (disciples and followers) have engaged themselves in so much sewa work (pertaining to flood relief works) in such a situation; can I remain idly seated, doing nothing?’


Bapuji’s message infused enthusiasm in all of the sadhakas; and thus, we got engaged in the preparation of the Satsang-programme. Pujyashri’s kutir (cottage) is located 2 kilometers from the ashram and that’s where Bapuji’s accommodation was arranged and set-up. Because of flooding, the power supply of the entire city was cut-off from the electric substation. So, in order to arrange for the power-supply to Gurudev’s kutir, I set out to rent a power-inverter.


The inverter renter said, “You need to pay INR 4000/- as advance security deposit for this; and then pay INR 2500/- rent per day.” But as soon as I mentioned it was intended for Bapuji, he said, “You people have been doing so much for society; despite there being so much devastation in the city, your Gurudev is coming to Surat to deliver satsang discourse; so, let me also contribute something to this act of righteousness. I don’t want the rent (for the inverter); you may just pay the security deposit.” And I returned with the inverter.

The area around the kutir was quite muddy. We were graveling that area with the help of gravel & stones (left after filtering the sand). In the meantime, Bapuji’s car arrived; and Gurudev saw us engaged in sewa. Pujyashri, taking His outfit (Dhoti, Kurta, etc.) off in the car, got down from the vehicle only in His loincloth; picked up a spade & a bricklayer’s trough.


One sadhaka-brother said, “No, Bapu, we will manage.”


Pujyashri said, “Clear off! There’s so much flood and widespread epidemics… And in this situation if my children (disciples and followers) can do sewa (and serve selflessly), can’t I do the same? Don’t I have the right to do sewa?”


Even Gurudev started to pour bricklayer’s troughs filled with gravel.


Then Bapuji asked, “Where have you got this gravel from?” See, how watchful is Bapu!


One sadhaka-brother said, “There was some construction work going on in the ashram; so, we got the stones & gravel that were left after filtering the sand used there.”


Gurudev said, “You should have stored it carefully! It could have been used somewhere.”


Brother: “Gurudev, given the fact that you would be staying here, we laid a gravel-path for you so as to keep the mud off your way.”

“Why are you making such a wide path for me? Make a narrow path and save the rest of the gravel; it will be of use at a later time.”


How mindful of Him to make the most of even the tiniest bit of material intended for the purpose of Dharma (meritorious work)! Someone who wants to learn how to tread the path of Dharma; he should learn it from Pujya Bapuji’s life.


With the falling of dusk, others left the place. I was installing the inverter. Gurudev said, “Was it necessary to do all this? When you people can live without electricity during floods for all these days, can’t I do the same for a day or two?”


I stood with folded-hands. Then Gurudev said, “Fine, now that you have already brought it, you may install it.”


While arranging the power-supply (with the help of the inverter), I didn’t realise when the clock struck 10 o’clock at night.


Gurudev came out of His room and said, “Oh, it’s so late already; how will you go to ashram now? And you haven’t even had your supper.”


I said, “Bapu! I shall manage. I am going to call someone from ashram.”


Bapu: “No, it’s rainy season; whom would you bother so late at night! Don’t call anyone. Do one thing, you just walk up to the road, and a vehicle will come and pick you up.”


There was main road at walkable distance from the kutir; so, I made it to the road. Bapuji came driving up the road Himself. Pujyashri rolled the car-window down and gave some prasada to me. In the meantime, a motorbike rider arrived; looking at Gurudev, he stopped and bowed down to Him. Pujyashri said to me: “You get on his motorbike. He will drop you at the ashram. And look, there’s some food for you in the ashram. Right behind the kitchen-door, there is some khichdi and kadhi in the serving bowls covered with lids. Make sure you have it and then take rest.”


I reached the ashram. On opening the kitchen-door, I saw the food in the serving bowls. The approaching sound of my footsteps woke up the sadhaka-brother sleeping there. He said: “Where are you coming from? Do you want to have food?”


I said, “Yes.” He said, “Brother! Looks like Paramatma – the Supreme Lord Himself has the food kept for you alone. Every day, we distribute the entire leftovers after the evening. But I don’t know how come I felt like keeping some kadhi-khichdi aside today.”


I said: “Yes, It’s verily the Supreme Lord who inspired you do so; and He also told me about it.”


On hearing this, the brother looked at me in astonishment. After taking supper, when I narrated the whole episode to him, he too was overwhelmed with emotion. I am blessed with such a SatGuru, whose Lila (i.e. Divine play) and glory is just indescribable.


This is your Security-deposit with me; I shall give you a thousand-fold returns for this


In 2005, there was ‘Bhakti Jagriti Prachar Yatra’ (a procession for devotional awakening) being organised in the Jaunpur, Pratapgarh and Sultanpur areas of Uttar Pradesh. Some 150 sadhaka brothers & sisters went to the procession from Surat. We would carry out the kirtan-yatra (devotional chanting procession) from village to village; and would thus distribute spiritual books and literature. At midday, we would have Satsang session followed by the Bhandara (mass meal-distribution programme). And in the evening, the kirtan-yatra would be held again, which was then followed by evening-Sandhya worship and Satsang.


The sewa was carried out quite successfully and, we saved INR 72,000/- from the whole event expenses. In December, there was a Shivir going on in Surat ashram. Gurudev was seated on Vyasa-peetha. We all went humbly to Gurudev with the remaining sewa amount.


Gurudev asked, “What is this?”


“Ji, this is the amount that we are left with after the sewa-event.”


“Just keep it with you. Don’t you want to do the sewa again next year?”


“Bapu! We will take it at that time.”


“OK, so this is your security-deposit with me. I shall give you thousand-fold returns for this. You may take it whenever you want to.” And that’s exactly what happened!

[Rishi Prasad-Edition-316-April-2019]

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