कैसे सर्वज्ञ हैं ये महापुरुष !
Ashram India

कैसे सर्वज्ञ हैं ये महापुरुष !

पूज्य बापूजी के जीवन-प्रसंग

अहमदाबाद निवासी सेवानिवृत्त शिक्षिका इंदिरा गुलवाणी, जिन्हें 1978 से पूज्य बापूजी के दर्शन-सत्संग का लाभ मिलता रहा है, वे बताती हैं कि मैं पहले संतों को नहीं मानती थी । मुझे धर्म-कर्म से कोई लेना-देना नहीं था, पढ़ाई को ही सब कुछ मानती थी ।

एक बार मैं कॉलेज से आ रही थी । बारिश आने से मैं एक पेड़ के नीचे खड़ी हो गयी । पास में बापूजी का सत्संग-कार्यक्रम चल रहा था । पूज्यश्री की वाणी मेरे कानों में पड़ी तो मुझे बड़ी शांति का अनुभव हुआ । मुझे लगा कि ‘ये तो बहुत ही अच्छी बात बता रहे हैं !’ मैं अपने को रोक न सकी और सत्संग-मंडप में आ के बैठ गयी । जो भी बातें अच्छी लगतीं उन्हें लिखने लगी । सत्संग के वचन लिखते देख बापूजी बड़े प्रसन्न हुए ।

बारिश बंद हुई तो मैं घर आ गयी और अपने कार्यों में लग गयी । पूज्यश्री ने जो बताया था वह सब भूल गयी पर कहते हैं कि संत की दृष्टि में जो आ जाता है उसका वे कल्याण किये बिना नहीं रहते ।

यह कार्य साधारण व्यक्ति का नहीं

2-3 दिन बाद बापूजी मेरे सपने में आकर बोले : ‘‘बेटी ! सत्संग सुनने आश्रम में आया कर ।’’ इस तरह मुझे चार बार सपना आया पर मैं पिताजी के डर से नहीं जा रही थी ।

मैंने सोचा, ‘कुछ तो है इन संत में !’ अपना संदेशा देने के लिए कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के सपने में आ जाय यह कार्य किसी साधारण व्यक्ति का नहीं ।

एक दिन एक पड़ोसन हमारे घर आयी और मेरी माँ को सत्संग की एक पुस्तक दिखाने लगी कि ‘‘देखो ! ये बहुत बड़े संत हैं और मोटेरा में रहते हैं ।’’

मैंने फोटो देखा तो मैं बोल पड़ी : ‘‘अरे ! ये तो मेरे सपने में आते हैं !’’

मैंने उससे कहा : ‘‘आप मुझे वहाँ ले चलो ।’’

मेरी माँ बोलीं : ‘‘बेटी ! तेरे पिताजी का संतों और सत्संग आदि के प्रति लगाव नहीं है, वे सुनेंगे तो गुस्सा करेंगे ।’’

मैं पड़ोसन के घर गयी और बोली : ‘‘किसीको बताना मत, हम लोग पिक्चर देखने के बहाने कल सत्संग सुनने चलेंगे ।’’

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कई विद्यार्थी विद्यालय जाने या पढ़ाई के नाम पर इधर-उधर घूमने, पिक्चर देखने चले जाते हैं लेकिन महापुरुषों के ओजपूर्ण अमृतवचनों का, उनके दर्शन का कैसा दिव्य प्रभाव होता है ! उम्र तो वही, शिक्षा वही, वातावरण भी वही था लेकिन मेरे चित्त में पिक्चर देखने के बहाने आश्रम में जाकर ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुनने व संत-दर्शन करने के दिव्य भाव उमड़ पड़े ! भगवान की कैसी अहैतुकी कृपा है ! आज यह सोचती हूँ तो मेरी आँखें भर आती हैं कि ‘कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया गुरुदेव ने !’

कैसे सर्वज्ञ हैं ये महापुरुष !

दूसरे दिन हम आश्रम गये । सत्संग शुरू हुआ ही था, हम सत्संग-मंडप में पहुँचे तो पूज्यश्री बोले : ‘‘सत्संग में आयी तो हो पर बड़ी देरी से ।’’ मुझे समझने में देर न लगी कि पूज्यश्री की स्वप्न में इतनी बार आज्ञा होने पर भी मैंने देरी से आने की भूल की है । मुझे आश्चर्य भी हुआ कि ‘कैसे सर्वज्ञ हैं ये महापुरुष !’

मैंने संत और संस्कृति विरोधी फिल्में देखी थीं इसलिए मुझे संतों के प्रति श्रद्धा न थी । मैं बापूजी को नहीं मानती थी फिर भी कोई ईश्वरीय शक्ति मुझे प्रेरित करती और कुछ दिन बाद मैं पुनः आश्रम चली आती ।

एक दिन सत्संग के बाद मेरी पड़ोसन ने पूज्यश्री से कहा : ‘‘बापूजी ! मुझे बड़ी अशांति हो रही है । क्या करूँ ?’’

पूज्यश्री : ‘‘बड़दादा के पत्ते उबाल के उसका पानी पिया कर, 40 दिन में ठीक हो जायेगी ।’’ (महापुरुष जब कोई उपाय बताते हैं तो उसके पीछे उनका संकल्प होता है । अब यदि कोई बिना उनके संकल्प के, बिना आज्ञा के यह प्रयोग करेंगे तो लाभ नहीं होगा ।)

बापूजी तो मोक्ष कुटीर में चले गये । 

पड़ोसन मुझसे बोली : ‘‘पूज्यश्री ने पिछली बार भी ऐसा ही कहा था ।’’

मैंने कहा : ‘‘गुरु तो औलिया होते हैं, भगवान होते हैं । उनकी बात पर अविश्वास नहीं करना चाहिए ।’’

हम लोग थोड़ी देर बाद मोक्ष कुटीर के पास गये तो बापूजी उससे बोले : ‘‘गुरु औलिया होते हैं, भगवान होते हैं ।’’ जो शब्द मैंने कहे थे वे ही शब्द पूज्यश्री ने बोले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ‘बापूजी को कैसे पता चला कि मैंने क्या बोला ! पूज्यश्री तो मोक्ष कुटीर के अंदर थे और हम लोग तो बाहर लगभग 100 फीट दूर बात कर रहे थे । इन संत में कुछ तो है !’

हिमालय-सी दृढ़ता और फूल-सी मृदुता

ज्ञान में हिमालय-सी दृढ़ता और व्यवहार में फूल-सी मृदुता - दोनों का एक साथ संगम बापूजी के जीवन में देखने को मिलता है ।

1978 के आसपास कई साधक सत्संग सुनने हेतु साबरमती नदी पार करके आते थे । सत्संग के बाद कई बार बापूजी उन्हें एक छोटी-सी नाव में बैठा के मौज में कीर्तन करते-कराते स्वयं पतवार चला के दूसरे किनारे छोड़ आते थे । एक बार पूज्यश्री मेरे 5-6 साल के भाई को अपने कंधों पर बैठाकर नदी के उस पार उतार के आये थे ।

एक महान संत, ब्रह्मवेत्ता महापुरुष होते हुए भी कितने सहज और सरल हैं पूज्य बापूजी ! बड़प्पन की परम ऊँचाई पर होते हुए भी बड़प्पन के अहं का तो अंशमात्र भी नहीं !

परमात्मा से बाँध दी जीवन-डोर

एक बार मैं बापूजी का आशीर्वाद लेने गयी कि ‘मुझे शादी के लिए अच्छा लड़का मिल जाय ।’ पर संकोच हो रहा था कि कैसे बोलूँ ? इतने में पूज्यश्री बोले : ‘‘बेटी ! तेरी उम्र कितनी है ?’’

‘‘जी, 20-21 वर्ष होगी ।’’

‘‘शादी की भी बातें चलती ही होंगी न ?’’

‘‘जी, चलती हैं ।’’

‘‘तो क्या होता है...’’

मुझे आश्चर्य हुआ कि ‘मेरे मन की बात कैसे समझ गये बापूजी !’

मैंने कहा : ‘‘मुझे पसंद ही नहीं आते ।’’

‘‘क्यों पसंद नहीं आते ?’’

‘‘कोई लड़का अप-टू-डेट नहीं तो किसी लड़के की माँ अप-टू-डेट नहीं इसलिए कोई पसंद ही नहीं आता ।’’

पूज्यश्री : ‘‘तो तुझे यशोदा मैया जैसी सास चाहिए ?’’ फिर बोले :

‘‘अच्छा, साधना कर । किन्हीं सद्गुरु से मंत्र लिया है तूने ?’’

‘‘वह क्या होता है ? मैंने नहीं लिया है ।’’

‘‘गुरुमंत्र ले ले ।’’

मैं जब भी आऊँ तो बापूजी साधना करने को बोलते ।

एक बार उत्तरायण पर आयी तो पूज्यश्री बोले : ‘‘आज मंत्रदीक्षा का कार्यक्रम होगा, तू भी बैठ जाना ।’’

पूज्यश्री के बोलने पर सबके साथ मैं भी मंत्रदीक्षा के लिए बैठ गयी । उस समय मुझे मंत्रदीक्षा की कोई महत्ता पता नहीं थी लेकिन जैसे बच्चा नहीं चाहता फिर भी माँ उसे ऊँचा उठाने के लिए समझाती है, सिखाती है वैसे ही बापूजी ने मेरी जिज्ञासा न होते हुए भी गुरुमंत्ररूपी अनमोल रत्न मेरी झोली में डाल दिया और मेरे जीवन की डोर उस अमिट परमात्मा के साथ बाँध दी ।  (क्रमशः)

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Inspirational Life-tales of Pujya Bapuji

This experience has been narrated by retired teacher Indira Gulvani, a resident of Ahmedabad, who was fortunate to be blessed with Pujya Bapuji’s darshan and satsang since 1978. She mentions that she was an atheist earlier. She had nothing to do with religious rites and rituals. She regarded education as everything.

“One day I was returning home from college. As it started raining, I took shelter under a tree. Pujya Bapuji was delivering a Satsang in the nearby premises. While waiting, I heard the divine talks of Pujya Bapuji and suddenly felt very peaceful. I thought to myself, this Saint is talking very beautiful things! I couldn’t resist my curiosity and went and sat in the Satsang place. I started jotting down the points which I liked. Pujya Bapuji was very pleased to see me taking notes.

When the rain ceased, I returned home and got immersed in other work. I forgot all the points mentioned by Pujyashri. However, it is said that the saint definitely emancipates the person who is glanced
by Him.

An ordinary person cannot do this!

After 2-3 days, Pujya Bapuji appeared in my dream and said: “Beti! Come to the Ashram to hear Satsang discourses.” Pujya Bapuji appeared in my dreams around 4 times but I did not attend satsang because I was afraid of my father who was very strict.

I thought to myself, ‘There is something indeed in this saint. An ordinary person cannot appear in dreams to give his message.’

One day a female neighbour came to our house and started showing a Satsang book. She started telling my mother, “See! This is a great saint and stays at village Motera.”

I looked at the photo and exclaimed, “Arrey! This Saint appears in my dreams.”

I said, “Please take me there.”

My mother said, “Beti! Your father doesn’t have any inclination towards Satsang or Saints, he will be angry with you.”

I went to my female neighbour’s house and said, “Don’t tell anyone. We will go to Satsang tomorrow on the pretext of going to a movie.”

It has been observed that students go wandering here and there, watching movies under the pretext of going to school or college for study. But how divine the influence of the brilliant ambrosial words and darshan of the great man is! Though I was of the same age, like my peers, exposed to the same kind of education and materialistic environment, divine bhavas of going to a hermitage for having darshan of a saint and hearing satsang on Brahma Jnana on the pretext of going to watch a movie arose in my mind! How the motiveless grace of God works! Whenever I think about it, my eyes well up in tears. Gurudeva has uplifted me from where to where (transformed from a materialist to a spiritual aspirant).

How omniscient this Great Man is!

We went to Ashram the next day. The Satsang had just started. As soon as we entered the satsang place Pujya Bapuji said: “You have come to Satsang, but too late.” I acknowledged instantly the mistake I had committed of coming very late despite receiving His commands in my dreams so many times. I was surprised too. How omniscient this great man is!

I did not have faith in saints because I had seen many movies deriding saints and Indian culture. Though I did not believe in Bapuji, I revisited the ashram after a few days, being inspired by some divine Shakti.

One day after Satsang was over, my female neighbour said to Pujya Bapuji:
“I am feeling very restless. What should I do?”

Pujyashri told her, “Boil 40 leaves of Barhdada (a banyan tree charged with spiritual power by Pujya Bapuji) in water and drink it. Do this for 40 days. You will become well. (When a great man gives a remedy to any person His will power works through it. If someone tries this remedy without His command and will power, it might not work.)

Bapuji went inside the Moksha- Kutir. My neighbour said, “Bapuji told me the same remedy last time too.”

I said: “Guru is a saint; Guru is God. One should never distrust His words.”

When we went near the Moksha- Kutir after some time, Bapuji told my neighbour: “Guru is a saint; Guru is God.” I was astonished when Pujyashri repeated my words. How did Bapuji know what I had said? He was inside the Moksha- Kutir and we were standing about 100 feet away from the Moksha Kutir. It was a clear indication of Pujya Bapuji’s spiritual power!

Pujyashri is as adamant as the Himalayas and as tender as a flower

As adamant as the Himalayas in Knowledge and as tender as a flower in practice- the synthesis of both these qualities can be observed in Pujya Bapuji’s life.

Around 1978, many devotees came to attend satsang by crossing the Sabarmati River. After the Satsang, Bapuji would make them sit in a small boat and steering the boat himself ferry them joyfully across the river singing kirtans (hymns). Once Pujyashri carried my younger brother aged 5-6 years on his shoulders across the river.

Pujyashri is a great saint, a Self-realised great man, yet so humble and unaffected! He does not have an iota of conceit despite having attained the highest state.

He tied the knot of my life to God

Once I went to Pujya Bapuji for blessings. I wished to seek blessings for a suitable groom for marriage. However, I was a bit hesitant to ask. Pujyashri asked me, “Beti, what is your age?”

I said, “Ji, 21 years.”

Pujya Bapuji asked, “There must be talk about your marriage?”

I said, “Ji, talk happens.”

Pujyashri said, “So what happened?”

I was surprised how Bapuji read my mind.

I said, “I don’t like boys.”

Pujyashri asked me, “Why you don’t like boys?”

I said, “Sometimes the boy is not up-to-date and sometimes the mother is not up-to-date.”

Pujyashri said, “So do you want a mother-in-law like Yashoda Maiyya, (the mother of Lord Krishna)?” Then Pujyashri added, “Ok, you do Sadhana. Have you taken mantra diksha from any SatGuru?”

I said out of curiosity, “What is that? I have not taken it.”

Pujyashri said, “Take Guru mantra.”

Whenever I used to come, Pujyashri asked me to do sadhana.

Once I came on Uttarayana festival to the ashram. Pujyashri told me, “Today a Mantra Diksha session has been organised, you also attend.”

I sat for the mantra Diksha session totally oblivious of its importance. Just like a child is unaware of the various efforts a mother undertakes for his well-being and development, similarly Pujyashri blessed me with this invaluable gem in the form of ‘Guru Mantra’. After Mantra Diksha, the knot of my life was tied to that Immortal God.   (To be continued…)


[Rishi Prasad Issue309-September 2018]


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