Such a yearning in childhood!

Such a yearning in childhood!

पूज्य बापूजी के जीवन-प्रसंग

अहमदाबाद निवासी रमेशभाई पगारानी पूज्य बापूजी के भानजे हैं तथा सन् 1962 से पूज्यश्री के दर्शन-सत्संग का लाभ पाते रहे हैं । वे पूज्यश्री के सान्निध्य के प्रसंगों तथा बापूजी की बहन व पूजनीया मातुश्री श्री माँ महँगीबाजी आदि के श्रीमुख से सुने प्रसंगों का स्मरण कर बताते हैं : 
पूज्यश्री बचपन से ही अलौकिक योग्यताओं के स्वामी रहे हैं । सरलता, विनम्रता, दृढ़निश्चयी व हँसमुख स्वभाव, कुशाग्र बुद्धि, जिज्ञासु वृत्ति, माता-पिता व संत सेवा जैसे सद्गुण बचपन में ही बापूजी के जीवन में खिलने लगे थे । 

पुत्र में दिखा पिता को ईश्वरीय नूर

अम्माजी कहती थीं कि ‘‘साँईं (पूज्य बापूजी) के पिताजी ने मुझे साफ कह रखा था कि ‘‘किन्हीं संत या गरीब को दान देकर ही भोजन बनाना ।’’ तो इस नियम का मैं पहले भी पालन करती थी और बाद में भी करती रही ।’’ संतसेवी, दानी, धर्मात्मा व उदार हृदय के धनी माता-पिता के घर पूज्य बापूजी जैसे महान संत का अवतरण हुआ । 
पूज्यश्री अवतरण के समय बहुत गोरे थे तो सब लोग आपको ‘भूरा’ कहकर पुकारते थे । एक दिन पिता पूज्य थाऊमलजी ने उँगलियों पर कुछ गणना करके अम्माजी से कहा : ‘‘भूरा नाम ठीक नहीं है, इसका नाम ‘आसु’ रखेंगे । यह कोई दिव्यात्मा है, यही बेटा तुम्हारा मंगल  करेगा । पहले  इसको खिलाना  फिर तुम  खाना, इसको खिलाये बिना मत खाना ।’’
मानो पिताजी को भी बालक आसुमल में ईश्वरीय नूर के दर्शन हो गये थे । थाऊमलजी द्वारा दिये गये इस निर्देश को अम्माजी ने नियम बना लिया था । पिताजी की भविष्यवाणी आखिर सच साबित हुई । पूज्य बापूजी के द्वारा अम्माजी को साधनामय आध्यात्मिक जीवन का बहुत ऊँचा लाभ मिला । आखिर में शोक, दुःख, मोह की दलदल से परे मोक्षसुख का परम लाभ भी मिला । 
अम्माजी थाऊमलजी को कभी कुछ खाने हेतु बना के देती थीं तो वे पूछते थे कि ‘‘आसु ने खाया कि नहीं ?’’ श्री थाऊमलजी के शरीर छोड़ने के एक-दो दिन पूर्व की बात है, जब उनको भोजन दिया गया तो उन्होंने यही पूछा : ‘‘आसु को दिया कि नहीं ?’’
‘‘नहीं, बाहर गया है, आयेगा तो दे देंगे ।’’
‘‘नहीं, पहले उसे बुलाओ और दो फिर खाऊँगा ।’’
पिताजी जान चुके थे कि बालक आसु के रूप में हमारे यहाँ साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा ने ही लोकोद्धार के लिए अवतार लिया है इसलिए वे अपने इन सुपुत्र का बहुत आदर करते थे । ‘श्री आशारामायणजी’ में उनके वचन हैं : 

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम ।  
लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम ।।

ऐसे लगा भक्ति का रंग

अम्माजी ने बालक आसुमल को लाड़-प्यार देने के साथ उनमें भक्ति के संस्कारों का सिंचन कर दिया । बाल्यावस्था से ही उनके चेहरे पर विलक्षण कांति तथा नेत्रों में अद्भुत तेज था । अम्माजी उनको ठाकुरजी की मूर्ति के सामने बिठा देतीं व कहतीं : ‘‘बेटा ! भगवान की पूजा और ध्यान करो । प्रसन्न होकर वे तुम्हें प्रसाद देंगे ।’’
बापूजी ऐसा ही करते और अम्माजी अवसर पाकर चुपचाप उनके सम्मुख मक्खन-मिश्री रख जातीं । जब वे आँखें खोलकर प्रसाद देखते तो प्रभुप्रेम में पुलकित हो उठते थे ।
रमेशभाई के इस संस्मरण से जुड़ी रोचक बातें बताते हुए अम्माजी की सेविका कहती हैं कि उन दिनों में बापूजी की बड़ी बहनें खिम्मी व किस्सी बालसुलभ चपलता से बोलती थीं : ‘‘आसु ! यह प्रसाद तो अम्मा ने रखा है, भगवान ने नहीं रखा है ।’’ तो भी आसुमलजी को उनकी बातों पर विश्वास नहीं होता और अम्माजी की बात को ही सच मानते थे । अम्माजी अपनी दोनों बेटियों को डाँटती थीं कि ‘‘क्यों तोड़ती हो उसका विश्वास ? इस बहाने उसे भक्ति का रंग लगेगा ।’’

दे दे मक्खन मिश्री कूजा, माँ ने सिखाया ध्यान औ’ पूजा ।।

सभी माताओं को ऐसी युक्तियों से अपने बच्चों में भक्ति के संस्कार डालने चाहिए । अम्माजी सत्संग सुनने जातीं और आकर अपने सुपुत्र आसुमल को सुनातीं तथा उन्हें भी सत्संग में ले जाती थीं । सत्संग के संस्कारों से बालक आसुमल कितने महान संत बने ! बचपन में ऐसी तड़प !

रमेशभाई बताते हैं कि घर में अलग से एक छोटा-सा पूजा का कमरा था, जिसमें बापूजी 4-4.30 बजे स्नान आदि करके ध्यान-भजन करने बैठ जाते और 9.30-10 बजे तथा कभी-कभी तो 11 बजे बाहर निकलते फिर दूध पीते थे । तब करीब 10-11 वर्ष की उम्र रही होगी ।
भगवद्-ध्यान , भगवन्नाम-जप आदि में रुचि रखनेवाले आसुमल का मन संसारी खेल या मौज-मस्ती में नहीं रमता था । इस नन्ही उम्र में अक्सर वे एक पीपल के पेड़ के नीचे या किसी शांत वातावरणवाले सात्त्विक स्थान पर घंटों-घंटों ध्यान में बैठे रहते थे । इतने छोटे बालक को ध्यान में बैठे देख लोग आश्चर्य करते हुए कहते : ‘अरे ! यह किसका बच्चा है ? इतना छोटा बालक ! कितनी देर से बैठा है और कितना गहरा ध्यान लगा है ! भक्ति का कैसा रंग लगा है अभी से !’ 
भगवन्नाम-संकीर्तन के साथ प्रभातफेरी निकलती तो बालक आसुमल एक वाद्य बजाते हुए ईश्वरीय मस्ती में खो जाते ।  जब सीताजी मंदिर में पूजन करने जातीं तो माता पार्वती की फूलमाला गिर पड़ती । बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ।। (रामायण) देव-प्रतिमा से फूल गिरना ईश्वर की प्रसन्नता का संकेत माना जाता है । जब आसुमल मंदिर में जाते थे तो कभी-कभी देवमूर्ति से ईश्वरीय प्रसन्नता के प्रकटीकरण के रूप में फूल या बेलपत्र गिर जाते थे, मानो वे बालक की साधना-भक्ति से प्रसन्न हों । 

संतसेवी बालक आसुमल

पूज्यश्री बचपन से ही संतों का बहुत आदर करते थे । सद्गुरु मिलने से पहले कोई संत आते तो उनका सत्संग सुनने जाते । अहमदाबाद में एक संत पधारे तो आसुमल ने अम्माजी को कहा : ‘‘माँ ! मैं भी चलूँगा दर्शन करने आपके साथ ।’’
अम्माजी : ‘‘बेटा ! जब तक मैं सत्संग सुनूँगी तब तक तुम बैठोगे ?’’
‘‘हाँ, माँ ! मैं भी पूरा सत्संग सुनूँगा ।’’
‘‘तो चलो बेटे !’’
‘‘माँ ! संतश्री के लिए प्रसादरूप में हम क्या लेकर चलेंगे ?’’
‘‘बेटा ! देशी गाय का दूध ले लो ।’’
बालक आसुमल ने एक पात्र में गोदुग्ध लिया और अपने छोटे-छोटे हाथों से लेकर सत्संग में गये । सत्संग-श्रवण की कैसी प्यास ! संत-सेवा का कैसा भाव ! कैसा आदर !!
बच्चों में ऐसे संस्कार डालने चाहिए कि उनको सत्संग के प्रति रुचि हो, भगवान व भगवत्प्राप्त संतों-महापुरुषों के प्रति आदर और प्रेम हो । सत्संगी बच्चे स्वयं तो तरते हैं, परिवार, समाज और देश को भी तारनेवाले होते हैं । 


(पूज्य बापूजी के बाल्यकाल के और भी प्रसंग पढ़ने हेतु प्रतीक्षा करें आगे के अंकों की ।)

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The Life-tales of Pujya Bapuji

Mr. Ramesh Bhai Pagarani, the nephew (sister’s son) of Pujya Bapuji, resides in Ahmedabad, and he has been availing himself of the pious company of Pujya Bapuji since 1962. Reminiscing the events happened in the company of Pujyashri and the events heard from Pujyashri’s sister and mother, Shri Maa Mehangiba, he says, “Pujyashri has been a master of divine powers since His childhood. The qualities of simplicity, humility, dogged determination, cheerful demeanour, sharp intellect, inquisitive nature, attitude of service towards his parents and saints have adorned Pujya Bapuji since a tender age.

Father beheld the divine radiance in his Son

Ammaji would say “Sai (Pujya Bapuji’s) father had clearly told me: “Cook meals only after you give charity to a Saint or a poor person.” I abided by this rule even earlier and continued the same. Thus a great Saint like Pujya Bapuji incarnated as a son to the parents who were, charitable, virtuous, magnanimous, and servants of saints.

Pujyashri had a fair complexion as a baby, so everyone used to call Him ‘Bhura’. Pujyashri’s father Thaumalji did some calculation on his fingers and told Ammaji: “Bhura is not a suitable name; we should name him ‘Asu’. He is a divine soul; he will emancipate you. Only after feeding him, should you have your food.”

Shri Thaumalji could also behold the divine radiance in his son. As a rule, Ammaji strictly abided by the direction given by Shri Thaumalji. The prophecy made by Thaumalji indeed came true. Ammaji received great benefit from Pujya Bapuji, who led her on the path of spiritual living through spiritual discipline. Finally she crossed the mire of grief, sorrow and delusion by the supreme grace of Param Pujya Bapuji and she received the supreme gift of Moksha, liberation from grief, sorrow and delusion.

Whenever Ammaji cooked food and served it to Shri Thaumalji, he would ask, “Has Asu eaten yet?” Even 2-3 days before departing this life, when Shri Thaumalji was served food, he asked her, “Have you given food to Asu?”

Ammaji said: “No. He has gone out. When he comes back, I shall give it to him.”

“No, first you call him and give him; then I shall eat.”

Pujyashri’s father had realised: “Verily the Supreme Brahman has incarnated in the form of ‘Asu’ in my home for the emancipation of the world.” Hence, he had immense respect for his good son. Shri Asharamayan also reflects his thoughts and words:

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम ।  
लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम ।।

“Your name will be immortal in the world. O Son, Desires of the people will be fulfilled by your grace.”

Thus he was imbued with Devotion!

Ammaji, along with motherly love and care sowed the seed of devotion in child Asumal. Right from his childhood, Pujya Bapuji’s face radiated a divine glow and his eyes were amazingly lustrous. Ammaji would ask Him to sit in front of Lord Krishna’s idol and say, “Son! Pray and meditate on God. He will be pleased with and give Prasada to you.”

Pujya Bapuji would do the same and Ammaji kept butter and sugar candy, stealthily in front of him. When he opened his eyes, he would be enraptured with divine love.

Ammaji’s female attendant says some interesting facts related with reminiscences of Ramesh Bhai. She says, “Stemming out of innocent childishness, Pujya Bapuji’s elder sisters Khimmi and Kissi used to say to Pujyashri: “Asu! This prasad is placed by mother. God has not placed it.” Despite these remarks, Asumalji did not trust them and believed in the words of His mother. Ammaji would reprimand the sisters, “Why are you trying to shake His faith? On this pretext (of receiving prasada from God) he will get imbued with Bhakti (devotion).”

दे दे मक्खन मिश्री कूजा, माँ ने सिखाया ध्यान औ’ पूजा ।।

“Mother taught him worship and meditation by giving him butter and sugar candy.”

All mothers should use such tactics and inculcate the samskaras of Devotion in their children. Ammaji would go to hear Satsang discourses, and on coming back describe the stories to her dutiful son. Occasionally, she took him to satsang venue. The samskaras of Satsangs have played a phenomenal role in making Pujya Bapuji such a distinguished and extraordinary Saint!

Such a yearning in childhood!

Ramesh Bhai further mentions that there was a small separate prayer room in the house in which Pujya Bapuji would sit for prayers and meditation around 4.-4.30 am after taking a bath and would come out of the room around 9.00-10.00 am. There were also occasions when He would come out at 11.00 am. He consumed milk after leaving the prayer room. Pujya Bapuji was around 10-11 years old at that time.

Asumal’s mind, having deep interest in meditation on God and Japa of the divine Name did not rejoice in worldly plays and merry-making. Ever since this tender age, At this tender age, he would often sit engrossed in meditation under a Peepal tree or in any quiet or sattvic place for hours. People were astonished, seeing such a small boy absorbed in meditation, and asked, “Arrey! Whose child is this? Such a small boy! He has been sitting here for such a long time and how deep His meditation is! He is so deeply imbued with devotion at this age.”

When people sang kirtana of God during ‘Prabhat Feri’ (going round the city in the morning singing devotional songs), Pujya Bapuji played a musical instrument and would become absorbed in divine intoxication.

In the epic Ramayana, it is mentioned that when Sitaji visited temples, the flower garland adorned by Parvati Mata’s idol dropped. बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ।। “Bhavani (divine Mother) was overcome by her meekness and devotion, the wreath on the image dropped and the idol smiled.”

If a flower drops from a photo or idol of God, it indicates that God is pleased with us. When child Asumal would go to a temple, sometimes a flower or Bael leaves from the idol of God dropped as a mark of His pleasure. It indicated that God was pleased with the sadhana and devotion of the child.

Child Asumal served saints

Pujyashri respected saints deeply since his childhood. He would go to hear satsang of any saint who visited the city before meeting SatGuru. On one occasion, a Saint visited Ahmedabad. Asumal told his mother, “I shall come with you to have his darshan.”

Ammaji: “Son! Will you remain seated till I hear the complete Satsang?”

Pujyashri: “Yes, Yes mother! I shall also hear the complete satsang.”

Ammaji: “OK. Then you can come along, Son.”

Pujyashri: “Ma! What should we carry for making an offering to the saint?”

Ammaji: “Son, take milk of a Desi (Indian) Cow.”

Child Asumal took some milk of a Desi cow in a vessel. He held the vessel in his small hands and went to attend satsang. What a thirst for hearing satsang! What a spirit of serving the saints! What deep respect!!

Such samskaras should be inculcated in children so they develop interest in satsang, respect and love for God and God-realized saints and great men. Satsangi children cross the ocean of Transmigration themselves, and help their family, society and country do the same.

(Wait for the coming issues of Rishi Prasad to read many other events of Pujya Bapuji’s childhood.)


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