Verily, watchfulness is sadhana

Verily, watchfulness is sadhana

पूज्य बापूजी के प्रेरक जीवन-प्रसंग

सावधानी ही साधना है !

कई वर्ष पहले की बात है । एक बार पूज्य बापूजी अहमदाबाद आश्रम में टहल रहे थे । टहलते-टहलते वहाँ के ‘ऋषि प्रसाद’ प्रेषण (डिस्पैच) विभाग में पहुँचे । वहाँ पत्रिकाओं के बंडल बनाने में काम आनेवाले 2-4 रबर बैंड सफाई के बाद कोने में रह गये थे । बापूजी ने उनको उठाया और साफ करके टेबल पर रख दिया । फिर सबको समझाते हुए बोले : ‘‘एक-एक रबर बैंड का भी ध्यान रखना, कोई भी वस्तु व्यर्थ न जाय । पाई-पाई का ध्यान रखना । सावधानी ही साधना है !’’

सत्संग की सीख को प्रत्यक्ष जीवन में एवं वेदांत को व्यवहार में लाने की कला सिखानेवाला प्रेरणास्रोत बना वह प्रसंग ! आज समय के प्रवाहवश उन सेवकों के स्थान पर दूसरे पुण्यात्मा समाजरूपी ईश्वर तक सद्ज्ञान पहुँचाने की सेवा कर रहे हैं । परंतु अपने गुरुदेव के उस संकेत को उन्होंने सुंदर परम्परा का रूप देकर स्थायित्व प्रदान किया है । आज भी उस विभाग में झाड़ू लगाने के बाद देखते हैं कि कहीं कोई रबर बैंड आदि तो नहीं चला गया और पाया जाता है दोहरा लाभ... एक ओर सावधानी का संतोष तो दूसरी ओर प्रेरणादाता की पावन स्मृति !

धर्म का एक पैसा भी व्यर्थ न जाय, करकसर (मितव्ययिता) का अवलम्बन लेकर समाज को ज्यादा-से-ज्यादा सत्कार्यों का लाभ दिलाया जाय, यह सिद्धांत पूज्य बापूजी के जीवन में पग-पग पर दिखाई देता है और आश्रम के सेवाकार्यों में भी इस बात का ध्यान रखा जाता है ।

‘हरि ॐ’ से शुरू कहानी बदली मेरी जिंदगानी

अहमदाबाद के रहनेवाले एस.पी. पटेल सन् 1980 से पूज्य बापूजी के श्रीचरणों में आते रहे हैं तथा ऋषि प्रसाद के सेवाधारी हैं । वे अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं कि 1995 की बात है । मैं एक कपड़े की मिल में इलेक्ट्रिशियन का काम करता था । कुछ दिनों बाद मैंने सुना कि ‘यह मिल बंद होनेवाली है ।’ तो मैंने अपना व्यवसाय खोलने का विचार किया ।

एक दिन मैं पूज्यश्री के दर्शन हेतु गया तो अपनी समस्या गुरुदेव के चरणों में रखी व प्रार्थना की : ‘‘बापूजी ! मुझे कोई काम-धंधा शुरू करना है ।’’

पूज्यश्री : ‘‘किस चीज का काम करना है ?’’

‘‘जी, इलेक्ट्रिकल्स का ।’’

‘‘अच्छा, ‘हरि ॐ’ के नाम से चालू करो, बढ़िया चलेगा ।’’

मैंने गुरुआज्ञा मानकर दुकान खोली और उसका नाम रखा ‘हरि ॐ इलेक्ट्रिकल्स । बापूजी के आशीर्वाद से वह दुकान इतनी अच्छी चली कि कुछ दिनों बाद दूसरी दुकान खोल ली । अभी मेरी तीन दुकानें हैं, तीनों इलेक्ट्रिकल्स की हैं और खूब बढ़िया चल रही हैं । आज भी किसीका फोन आता है या कोई ग्राहक आता है तो हम ‘हरि ॐ’ से ही शुरुआत करते हैं क्योंकि मुझे गुरुदेव के वचन याद हैं कि ‘हरि ॐ से शुरू करो ।’

कुप्रचार की चपेट में आया कोई बेचारा ग्राहक हमसे कहता है कि ‘अभी भी हरि ॐ-हरि ॐ करते हो !’ तो हमें उस पर दया आती है और उसे समझाते हैं कि ‘सच यह-यह है... आपको झूठी बातें फैलाकर भ्रमित किया गया है ।’ जिस ‘हरि ॐ’ के प्रभाव और गुरुदेव के उपकार से जीवन में इतने बदलाव आये, उन्हें हम कैसे भूल सकते हैं ?

खिलाया मक्खन का गोला, मैं 16 साल बाद बोला...

अहमदाबाद के दिलीपभाई हरपलानी अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं कि मैं बचपन से ही बोल नहीं पाता था । लगभग 15-16 साल की उम्र तक मैं एक शब्द भी नहीं बोला था । सब लोग कहते थे कि ‘अब यह कभी नहीं बोल सकेगा ।’ डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था ।

मेरी माँ ने पूज्य बापूजी से प्रार्थना की : ‘‘साँईं ! डॉक्टरों ने कहा है कि इसका कोई उपाय नहीं है ।’’ जिस समस्या का हल किसीके पास नहीं होता उसका हल संतों के पास होता है ।

बापूजी बोले : ‘‘सुबह-सुबह एक छोटे लड्डू बराबर मक्खन का गोला जीभ के नीचे रखना, सब ठीक हो जायेगा । एकदम पक्की बात है ! अगर तेरा बेटा नहीं बोले तो मैं आश्रम छोड़कर चला जाऊँगा ।’’

मेरी माँ ने वैसा ही किया । केवल दो दिन सुबह-सुबह 4 बजे मेरी जीभ के नीचे मक्खन रखा और मैं बोलने लग गया ! आज मैं अच्छी तरह से बात कर सकता हूँ । हालाँकि मक्खन खाने से कोई गूँगा बोलने लग जाय ऐसा कोई नुस्खा पढ़ने-सुनने में नहीं आता । मेरा तो यही अनुभव है कि बापूजी की वाणी में, उनके संकल्प में दिव्य प्रभाव है । उनके आशीर्वाद से असम्भव भी सम्भव हो गया ।

प्रकृति भी मानती है गुरु की आज्ञा

जयपुर के रहनेवाले एक साधक परसराम हरपलानी सन् 1974 से पूज्य बापूजी का सान्निध्य पा रहे हैं । वे अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं कि मेरा एक मित्र था किशनचंद । एक बार मैंने उससे कहा कि ‘‘चल, बापूजी के दर्शन करने चलते हैं ।’’

वह बोला : ‘‘वहाँ पर कुछ अनुभव होता है कि नहीं ?’’

मैंने कहा : ‘‘मैं तो क्या बताऊँ, तू खुद ही अनुभव कर लेना ।’’ मैं उसे अपने साथ अहमदाबाद के ध्यानयोग शिविर में लेकर गया ।

गुरुपूनम का अवसर था । बापूजी मोक्ष कुटीर के अंदर थे और हम लोग बड़ बादशाह की दूसरी तरफ काफी दूर बैठे थे ।

मित्र बोला : ‘‘कितनी गर्मी है आज, बारिश क्यों नहीं हो रही है ?’’

सत्संग शुरू हुआ तो बापूजी बोले कि ‘‘कोई ऐसा सोच रहा है कि गर्मी बहुत है ।’’ संतश्री ने ऊपर की ओर देखा और बोले : ‘‘बड़ बादशाह ! बरस... बरस... बरस... ’’ इतना बोलना ही था कि बहुत जोरदार बारिश होने लगी ।

मैंने कहा : ‘‘देख भाई, गुरुदेव की महिमा !’’

थोड़ी देर बाद फिर बापूजी बादलों की ओर देखते हुए बोले : ‘‘बस, हो गया, अभी जाओ ।’’

इतना ही कहना था कि बारिश रुक गयी ।

मित्र तो देखकर दंग रह गया, बोला : ‘‘जादू है जादू ! हम लोग तो इतने दूर बैठे थे, बापूजी को हमारी बात कैसे पता चली !’’  (क्रमशः)

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Inspirational life-tales of Pujya Bapuji

Verily, watchfulness is sadhana

This incident took place many years ago. Whilst strolling in the Ahmedabad Ashram Bapuji stepped into the office of ‘Rishi Prasad’, where He noticed around 2-4 rubber bands lying in a corner which are used for packing Rishi Prasad bundles. Bapuji picked up the rubber bands, cleaned and placed them on the table. Bapuji explained to all present, “Take care of each and every rubber band. Ensure that no object goes to waste. Be careful about every single piece. Verily, watchfulness is sadhana.”

This incident became an inspiration to learn the art of translating the teachings from satsang, in life, and living Vedanta in practice. Though, in place of those attendants today, other virtuous souls, following the course of time, are doing the service of distributing the spiritual knowledge to God society, they have adopted the hint given by their Gurudev as a permanent custom. Even today, while sweeping, the attendants check to ensure that no rubber bands or other utility items have been discarded. This gives them a double advantage. One is the satisfaction of being watchful and the other is holy remembrance of the inspiring Guru.

Bapuji says that every single penny that has been received in the form of donation should not be wasted and should be channeled towards good deeds for giving maximum benefit for society whilst adopting frugality. This principle is practiced by Bapuji in every step and due attention is being paid to it, in each and every philanthropic activity undertaken by the Ashram.

‘Hari Om’ metamorphosed my life

Ahmedabad based Mr. S. P. Patel has been visiting Pujya Bapuji to sit at His lotus feet since 1980 and is also a volunteer for ‘Rishi Prasad’. He narrated an incident which he experienced in 1995. “I was working as an electrician in a cloth mill. When I heard that the mill was on the verge of closure, I contemplated on starting my own business.

One day, I went to have Darshan of Pujyashri and mentioned my problem to him and prayed, “Bapuji I want to start a business.”

Pujyashri said, “What kind of business do you want to start?”

I said, “Electricals.”

Pujyashri said, “Start your business in the name of ‘Hari Om’; it will run well.”

I obeyed Gurudev’s command and started a shop. It was named ‘Hari Om Electricals’.

By the blessing of Param Pujya Bapuji, the business flourished so much that I opened another shop. Now I have three shops. All three are Electrical shops. Even now when I receive a phone call or a customer comes to my shop, I greet the person saying “Hari Om” as I remember Pujya Bapuji’s words, “Start with Hari Om”.

When any customer, misled by the vicious propaganda tells me, “Still you are saying Hari Om Hari Om”, I take pity on him, and explain, “This is the truth of the matter. You have been brainwashed by false propaganda.” How can I forget Gurudev’s obligation and the influence of Hari that brought about so many positive changes in my life?”

Miraculous cure of 16-year long aphasia

Dilipbhai Harpalani from Ahmedabad cites a beautiful incident of his life, “I was dumb since childhood”. Almost till the age of 15-16 years I could not utter even a single word. Everyone said, “This boy will never be able to speak.” The doctors had also lost hope.

My mother prayed to Param Pujya Bapuji, “Sai, doctors have diagnosed that his disease is incurable.” But saints have the solution to the problem that cannot be solved by any other person.

Pujya Bapuji said to my mother, “Keep a small ball of butter, the size of a laddu under his tongue in the morning. He will be cured. This is a guaranteed remedy. If this doesn’t work, I will leave the Ashram.”

My mother did as she was advised by Pujya Bapuji. She  placed the ball of butter under my tongue at 4 am in the morning for two consecutive days and I started speaking! Now I can speak perfectly. Nevertheless, I have not read or heard anywhere that eating butter will make a dumb person speak. But it is my personal experience, that Bapuji’s words and will have a divine power. With His blessing the impossible became possible.

Nature also obeys the command of Guru

Parasarama Harpalani, a sadhaka from Jaipur, Rajasthan, has been blessed with the proximity of Pujya Bapuji from the year 1974. He narrates a wonderful incident from his life- “I had a friend Kishanchand. I told him one day, “Come, let us go together and have darshan of Pujya Bapuji.”

He asked, “Can we expect any spiritual experiences over there?”

I said, “What to speak of that, you experience it yourself.”

I took him along with me to the Dhyana Yoga Shivir (meditation intensive) which was being held in Ahmedabad.

It was the occasion of Guru Poonam. Bapuji was inside the Moksha cottage and we were
sitting far away near Barh Badashaah (a wish-fulfilling banyan tree charged with spiritual power by Pujya Bapuji).

My friend said, “It is so hot today. Why is not raining?”

When Satsang commenced, Bapuji mentioned, “Some person is thinking - Why is it not raining today?” Bapuji looked up at Barh Badashaah and said, “Barh Badashaah! Rain... rain… rain…” As soon as these words were uttered, it started pouring.”

I told my friend, “Brother, see the greatness of my Guru.”

After a while, Bapuji looked at the clouds and said, “It is enough, now go.”

The rains stopped instantly.

My friend was astonished. He said, “This is magic! We were sitting so far away. How did Bapuji know what we were discussing?” (To be continued…)


[Rishi Prasad ISSUE299]

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