How to obey the orders of SatGuru?

How to obey the orders of SatGuru?

पूज्य बापूजी के जीवन-प्रसंग

गुरुआज्ञा-पालन कैसे करें ?

सद्गुरु की आज्ञा वास्तव में उनका आशीर्वाद ही होती है । वे जो बताते हैं, संकेत करते हैं उसमें हमारी उन्नति का रहस्य छुपा होता है । वे हमारे लिए जो उचित समझते हैं वह हमें जँचे चाहे न जँचे, हमारे लिए वही हितकर होता है । ‘गुरुभक्तियोग’ शास्त्र में आता है कि ‘सदैव याद रखो, उच्चात्मा गुरु को जो अच्छा लगता है वह आपकी पसंदगी की अपेक्षा अधिक हितकर होता है ।’

गुरुआज्ञा-पालन के संदर्भ में श्री आनंदमयी माँ कहती थीं : ‘‘अविचार से (अपनी बुद्धि से कुछ मिलावट किये बिना) सद्गुरु के आदेश का पालन करो, ऐसा करने से काम बन जायेगा ।’’

अहमदाबाद आश्रम की वाटिका में बगीचे की सेवा करनेवाले संतोषभाई अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं : एक बार पूज्य बापूजी प्रातः-भ्रमण करते हुए गौशाला पधारे थे तो वहाँ का फाटक देखकर पूछा : ‘‘यह तिरछा कैसे हो गया ?’’

सेवक : ‘‘ट्रैक्टर चलाते समय चालक से धक्का लग गया था ।’’

‘‘उसको बोलना ध्यान रखा करे । चलो, इसको सीधा करो ।’’

उस फाटक का एक हिस्सा झुक गया था तो बापूजी बोले : ‘‘जो हिस्सा ऊपर उठ गया है उसको तार से बाँधकर नीचे किसी खूँटी से कस दो तो फाटक सीधा हो जायेगा ।’’ इतना बोलकर पूज्यश्री घूमने चले गये ।

‘ऐसा तो मैं कर चुका हूँ मगर सीधा नहीं हुआ ।...’ ऐसा सोच के मैं अपनी बुद्धि चलाने लगा । बहुत कोशिशें कीं, फाटक के नीचे खुदाई भी कर दी, जिस खम्भे पर वह लगा था उसको सीधा कर दिया, ठोका-पीटा परंतु कुछ नहीं हुआ । दूसरों की मदद भी खूब ली पर जो करना चाहिए वह नहीं किया । बापूजी लौटकर आनेवाले थे, सोचा कि ‘अब एक बार वैसा ही करके देखता हूँ जैसा गुरुजी ने बताया था ।’ फाटक को तार से 4-5 लपेटा मारकर खींचा और बाँध दिया तो एकदम सीधा हो गया । मुझे हमेशा के लिए एक सीख मिल गयी कि गुरु-उपदिष्ट मार्ग पर चलने में ही जीवन की सफलता है ।

बापूजी का अद्भुत संकल्प !

एक साधक भाई ने उनके द्वारा प्रत्यक्ष देखी गयी घटना बतायी कि 1993 की बात है । अहमदाबाद आश्रम में पूज्य बापूजी के पावन सान्निध्य में ध्यानयोग शिविर चल रहा था । उस समय आश्रम के सत्संग-मंडप की छत पक्की नहीं थी, घास-फूस की बनी थी । एक दिन शाम के साढ़े छः बजे गुरुदेव ने सत्संग के बाद धीर-गम्भीर वाणी में ध्यान कराना शुरू किया तभी अचानक जोरों की बारिश आ गयी । सूखे पत्तों की छत पर पानी गिरने से बहुत तेज आवाज आने लगी, जिससे शिविरार्थियों को पूज्यश्री की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी ।

बापूजी आसमान की ओर देखते हुए बोले : ‘‘मेघराज ! देखो तो जरा, ध्यान चल रहा है, बंद करो इसे ।’’ तुरंत बारिश बिल्कुल बंद हो गयी । ध्यान फिर से चलने लगा । ध्यान पूरा होने के बाद कीर्तन शुरू हुआ तो पूज्यश्री ने ऊपर इशारा करते हुए कहा : ‘‘कीर्तन में संगीत बजे ऐसा रिमझिम बरसो ।’’ और बारिश ऐसे शुरू हुई जैसे कोई साज बजा रहा हो ! कीर्तन के उपरांत दर्शनार्थियों की कतार लगी तो पूज्यश्री ने साधकों से कहा : ‘‘जल्दी करो, बारिश को रोक रखा है ।’’ जैसे ही दर्शनार्थियों की कतार समाप्त हुई, बापूजी ने ऊपर इशारा करते हुए कहा : ‘‘दे दनादन !’’ इतना कहते ही खूब मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी ।

देवता भी ऐसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की आज्ञा का पालन कर अपना भाग्य बनाते हैं । प्रकृति ऐसे महापुरुषों की दासी होती है, उनकी आज्ञा में चलती है परंतु महापुरुष स्वयं के लिए उसमें हस्तक्षेप नहीं करते हैं । परोपकार के लिए या लोगों को ईश्वर के रास्ते लगाने के लिए उनके द्वारा ऐसी लीलाएँ प्रसंगवश होती रहती हैं ।

भगवान सबको भवबंधन से मुक्त करनेवाले हैं परंतु लीला करके नागपाश में बँध गये और गरुड़जी को बंधन काटने की सेवा दी । जो भगवान दूसरों को भवबंधन से छुड़ाते हैं उन्होंने अहिरावण की कैद में बँधने की लीला की और मुक्त कराने का निमित्त बनाकर हनुमानजी को सेवा का अवसर दिया तथा हनुमानजी की महिमा संसार को बतायी । ऐसे ही महापुरुष कभी-कभी बंधन को स्वीकार कर लेते हैं पर इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे असहाय हैं बल्कि वे तो भक्तों के सामर्थ्य को विकसित करना चाहते हैं और संसार के सामने उनकी महिमा प्रकट करना चाहते हैं ।

...और वह चल पड़ी

अहमदाबाद निवासी 77 वर्षीय कंचन पटेल अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहती हैं :

1984 की बात है । मैं आश्रम में पूज्य बापूजी का सत्संग सुन रही थी । मुझे संदेश मिला कि ‘आपकी छोटी बहन का जीप से एक्सीडेंट हो गया है, जिससे उनको शरीर के दायें भाग में लकवा मार गया है ।’ मैंने पूज्यश्री से बहन की जीवन-रक्षा हेतु प्रार्थना की ।

गुरुदेव ने आशीर्वाद दिया और बोले : ‘‘जिस भाग में लकवा हुआ है उस भाग पर बड़ बादशाह की मिट्टी लगाना, सब ठीक हो जायेगा ।’’

मैंने हॉस्पिटल में जाकर देखा तो बहन लाश जैसी पड़ी थी । उसका मुँह टेढ़ा हो गया था, एक शब्द भी नहीं बोल पा रही थी । मैंने बड़ बादशाह की मिट्टी लगायी ।

कुछ दिनों के बाद मैं अपनी बहन को पूज्यश्री के दर्शन हेतु ले के गयी और प्रार्थना की : ‘‘गुरुदेव ! मेरी बहन बिना सहारे के बिल्कुल भी नहीं चल पाती है, कृपा कीजिये ।’’

उस समय वहाँ एक भाई अपनी नयी जीप लाये थे गुरुदेव के करकमलों से शुभारम्भ कराने के लिए । बापूजी ने बहन से कहा : ‘‘बैठ जा बेटी !’’

उसको गाड़ी में बैठा के पूज्यश्री ने वहीं एक-दो चक्कर लगाये और कहा : ‘‘अब इसको छोड़ दो, पकड़ना मत । आज से यह बिना सहारे के ही चलेगी ।’’ मैंने उसे तुरंत ही छोड़ दिया ।

और आश्चर्य ! एक कदम भी बिना किसी सहारे के न चल पानेवाली मेरी लकवाग्रस्त बहन उसी समय लगभग 50-60 कदम बिना सहारे के चली ! बापूजी बड़ बादशाह के पास खड़े थे, बहन गुरुदेव को देखते-देखते धीरे-धीरे कदम रखते हुए उनके समीप गयी । गुरुदेव के श्रीमुख से निकला ब्रह्मवाक्य सत्य सिद्ध हुआ ।

आज मेरी बहन बिना सहारे के चलती है, सीढ़ियों पर चढ़ जाती है और सत्संग-दर्शन हेतु आश्रम में भी जाती है । उसके शरीर की तकलीफ तो दूर हुई, साथ ही उसे भक्ति का रंग भी लग गया । महापुरुषों की कृपा अकल्पनीय होती है !

ऐसे साध्य एवं असाध्य रोगों से गुरुकृपा के द्वारा मुक्ति पाने के अनुभव लाखों भक्तों को हुए हैं । इससे श्री आशारामायण की ये पंक्तियाँ चरितार्थ होती हैं :

लाखों के हैं रोग मिटाये, शोक करोड़ों के हैं छुड़ाये ।

 

The Life-tales of Pujya Bapuji

 

How to obey the orders of SatGuru?

The order of SatGuru is actually His blessing. The secret to our progress lies in whatever He points out. What He thinks appropriate for us, whether we like it or not, is good for us. The book Guru Bhakti Yoga states: ‘Know that what Guru, the exalted one, chooses is better than what you choose.’

Anandamayi Ma said about obeying the orders of SatGuru: “Obey His orders implicitly. This will work.”

Santosh Bhai who serves as a gardener in the Ahmedabad ashram vatika tells about an event of his life, “Once, Pujya Bapuji came to the Gaushala while taking a stroll in the morning. He saw the gate, and said, “How did it become slanted?”

Attendant: “It was struck by the tractor driver.”

“Tell him to drive carefully. Let us straighten it.”

The rear end of the gate was stooping. Bapuji said, “Fix the elevated portion of the gate with a wire to any nail below, then the gate will become straight.” Pujyashri went to stroll by saying so much.

I thought: ‘I have tried it but the gate does not become straight.’ I tried to find the solution with my intellect. I made many attempts. I even dug below the gate, straightened the pole on which it was fixed, struck it, but to no avail. I took help from others too but did not do what was needed. Bapuji was about to return. I thought: ‘Let me now do what Guruji has said’. I wrapped the gate 4-5 times with a wire, pulled and fastened it. And it became straight. I learnt a lesson from it: ‘The success of life lies in following the method prescribed by the Guru.’

Pujya Bapuji’s tremendous willpower!

One devotee mentioned an event experienced directly by him in 1993. Dhyan Yoga Shibir (a meditation intensive) was being conducted in the holy presence of Pujya Bapuji. During that time, the roof of the Satsang hall was not concrete but thatched. It was mainly made of plant materials. One evening around 6.30 pm, Gurudev, after concluding the Satsang, started introducing all into meditation with His sonorous voice. And suddenly it started raining heavily. Because of the loud noise of the rain drops falling on the thatched roof, the Shivir attendees were unable to hear the voice and words of Pujya Bapuji distinctly.

Pujya Bapuji looked into the sky, and said, “Megharaaj (the lord of rain)! See, People are meditating. Stop the rains!” The rains stopped instantly. The meditation session was resumed. After the meditation, it was time for Kirtan. Bapuji looked up at the sky again and commanded, “Rain rhythmically like the sound of music played in Kirtan.” And it started raining as if a musical instrument was being played by someone. After the kirtan was over, people started queuing up to have darshan of Pujya Bapuji. Bapuji told the devotees, “Be quick. I have halted the rains.” As soon as the queue of the sadhakas ended, Bapuji made a gesture looking upwards, and said, “Rain heavily!” The moment these words were uttered, torrential rain started.

Even the demigods earn religious merits by obeying the commands of such Self-realised saints. But the saints never use this power for their own needs. Nature is an obedient maid of such great men. But the great men do not interfere with her acts for their personal needs. Such lilas happen through them occasionally for turning people towards God or benevolence.

Though God cuts the bondage of samsara (transmigration) to release all devotees, He accepted to be bound by the Nagapasha (as we read in the epic of Ramayana) and blessed Garudji with an opportunity to serve Him by cutting that bondage. The God who sets others free from the bondage of Transmigration performed the lila of being imprisoned by Ahiravana and blessed Hanumanji with an opportunity to serve Him by rescuing Him and thereby showed the greatness of Hanumanji to the world. Similarly, the great men accept bondage sometimes. This doesn’t mean that they are helpless, but in fact they give an opportunity to the devotees for developing their might and show their greatness to the world.

…And she started walking

A 77 year old woman Kanchan Ben Patel of Ahmedabad narrated an episode of her life associated with Pujya Bapuji:

“In 1984, I was listening to Pujya Bapuji’s Satsang in the Ahmedabad ashram, when I received a message: ‘Your younger sister has met with an accident involving a jeep leaving right the side of her body completely paralyzed.’ I prayed to Pujyashri for the protection of my sister’s life.

Gurudeva imparted His blessings and said: “Apply soil from ‘Barh Badshah’ (a banyan tree charged with spiritual power by Pujyashri) on the side affected by paralysis, everything will be alright.”

I went to the hospital and found my sister lying like a corpse. With her face drooping on one side, she was unable to speak even a single word. I applied the soil from ‘Barh Badshah’.

Some days later I took my sister for Pujyashri’s Darshan and prayed to Him: “O Gurudeva! My sister is simply unable to walk without any support. Please have mercy on her.”

At that time, one (sadhak) brother had brought his jeep there to get it inaugurated by the lotus hands of Pujyashri. Bapuji said: “Sit in the jeep, daughter!”

After she sat in the jeep, he drove it only for a couple of rounds; then said: “Now, leave her alone, don’t support her. From today onwards, she will walk without any support.” I took my hands off her immediately.

And amazingly! My paralyzed sister who was unable to walk even a single step without support, walked about 50-60 steps without any support! Bapuji was standing near the ‘Barh Badshah’. My sister, moving slowly whilst looking at Him, went to Him. The Brahmavakya escaped from Gurudev’s mouth came true.

Today, my sister walks and even goes upstairs without any support, and also goes to the ashram for Darshan and Satsang. Not only was her physical disability removed, but she was also imbued with the joy of devotion. Grace of the great men is beyond imagination!

Lakhs of devotees have experienced freedom from curable and incurable disease through Guru’s grace. This goes to vindicate the following verses from Shri Asharamayana verbatim:

लोखों के हैं रोग मिटाये, शोक करोडों के हैं छुडाये ।

“Lakhs have been cured of diseases and crores relieved of grief (by His grace).”

[Rishi Prasad Issue-303] 

 

Previous Article The satisfaction of the Guru alone is the root of sadhana
Print
1727 Rate this article:
3.5

Please login or register to post comments.

Name:
Email:
Subject:
Message:
x