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ज्ञानी महापुरुष
ज्ञानी महापुरुष

 


 


जितनी भी वासनाएँ अधिक है उतना वो प्राणी तुच्छ है । चाहे लोगों की नजर में बड़ा उद्योगपति दिखे । बड़ा ऊँचा दिखे । लेकिन वासनाएँ अधिक हैं तो वो दरिद्र है । अंदर से ज्यादा गुलाम है । कहाने वाले जो बड़े लोग हैं वो सच-मुच में बड़े नहीं । वो तो अपने अंतरंग नौकर-चाकरों के भी गुलाम होते हैं । पत्नी और पति के भी गुलाम होते हैं । वाईन और सिगरेट के भी गुलाम होते हैं । वो बड़े दिखने भर को बिचारे बड़े हैं ।जितना आदमी अंदर से गिरा हुआ होता है उतना ही उसे बाहर की चीजों से बड़पन क्रिएट करने की अंधी दौड़ होती है । और जितना आदमी अंदर से ऊँचा होता है उतना ही बाहर की चीजों की ही बेपरवाही, निष्फिकर्ता उसके जीवन में आ जाती है । जिसके जीवन में निष्फिकर्ता बढ़ती जा रही है समझो वो सच-मुच में बड़ा हो रहा है । और जिसके जीवन में इच्छाएँ बढ़ती जा रही हैं समझो वो छोटा हो रहा है ।
चाह चमारी चुहरी अति नीचन की नीच, तू तो पूर्ण ब्रह्म था जो चाह ना होती बीच ।
वासना ही बंधन है । वासना निवृति ही मुक्ति है ।
ऐसा कोई महापुरुष दुनिया में नहीं मिलेगा जिसने वासनाओं को क्षीण ना किया हो । वासना अगर क्षीण ना हुई तो वो महापुरुष महापुरुष नहीं हो सकते है । वासनाएं २ प्रकार की होती हैं । एक नेह त्याग और दूसरी देह त्याग । अज्ञानी आदमी को खाता, पीता, चलता, माँगता, लेता, देता हम देखते हैं और ज्ञानी को भी खाता, पीता, चलता, माँगता, लेता, देता हम देखते हैं । लेकिन अज्ञानी की वासना नेह सहित है । उसमें इच्छा है ये मिल जाये तो अच्छा । अपने सुख की इच्छा है । अपने भले होने की इच्छा है । अपने को कहीं पहुँचने, कुछ पाने की इच्छा है । लेकिन ज्ञानी के अंदर जो इच्छाएं दिखती हैं व्यवहार में वो अपने सुख के लिए नहीं । वो औरों के हित के लिए उसके द्वारा चेष्टाएँ होती हैं । और कभी-कभी उसकी शारीरिक सुविधा के लिए अथवा उसको अपने सुख के लिए भी चेष्टा करते देखा जाये तो वो महापुरुष की वासना उसको बंधन करता नहीं होती क्योंकी वो नेह त्याग है । उस वासना में नेह नहीं । जैसे एक जली हुई अख़बार है और दूसरी कोरी अख़बार है, बिना जली हुई अख़बार है । तो जली हुई अख़बार पर भी कुछ खबरें दिख रही हैं, कुछ कार्टून के चिन्ह दिख रहे हैं । और ऐसी-वैसी अख़बार में भी दिख रहे हैं । लेकिन जली हुई अख़बार में कार्टून के चिन्ह देखने भर को है । खमण खाने के काम वो अख़बार नहीं आएगी । ऐसे ही जिनकी वासनाएँ दब्ध हो गयी हैं वो दूसरा माता के गर्भ में खमण खाने को जन्म नहीं उसको मिलेगा । वो मुक्त हो जाता है ।
ऐसी वासना भी ३ प्रकार की होती है । मंद वासना, तीव्र वासना और तरतीव्र वासना । मंद प्रारब्ध, तीव्र प्रारब्ध और तरतीव्र प्रारब्ध । मंद प्रारब्ध तो छोटे-मोटे प्रयास से रोक लेता है साधक । तीव्र प्रारब्ध से सुख-दुःख को भोग लेता है । उसका भी प्रारब्ध होता है, यश का भी प्रारब्ध होता है भोग लिया । लेकिन अज्ञानी यश के लिए तड़पता है । ज्ञानी के लिए वो ॐ, गेट है । अज्ञानी जिस यश के लिए, मान के लिए, पुश-मालाओं के लिए, यश गान के लिए, पैर छुवाने के लिए छटपटाता, मरता रहता है । ज्ञानी के लिए वो तो गेट है । लेकिन ज्ञानी के सुकृत ऐसे हैं, उसके पास यश, आदर खीच के आ जाता है । फिर भी ज्ञानी को ऐसा नहीं के कल ५०००,  १०,००० आदमियों ने आदर दिया, तो आज २,००० क्यों, ८,००० कम आदमियों ने क्यों प्रणाम किया । ऐसा ज्ञानी को नहीं होता ।  ८,००० तो क्या, सारे के सारे लोग जो आदर करते हैं वो अनादर भी करने लग जाएँ तो ज्ञानी के चित में शोभ नहीं होता । ऐसा उसको स्वछंद मिला है, ऐसा वो जीवन मुक्त महात्मा है ।
निर्वसनों, निरलम्बा । सव्छ्न्दों मुक्त बन्धनात ॥
स्व का अपने आप का रस मिल गया है । और इस रस में कोई बाधा नहीं है । ये रस सबके पास है, उतने का उतना है । लेकिन अज्ञान के कारण वासनाओं को पोसते-पोसते वासनाओं के सागर पर जैसे सरोवर पर लिर जमती जाये तो सरोवर होते हुए नहीं दीखता । ऐसे आनंद का, प्रेम का, ज्ञान का, आत्मदेव का सरोवर होते हुए, वासना के पटल चढ़ते गए । जैसे लोहे पर काट चढ़ता जाये अथवा अंगारे पर राख चढ़ती जाये तो अंगारा होते हुए भी राख दिख रहा है । ऐसे ही आत्मानंद सबके भीतर होते हुए भी दुखी, संसारी आदमी हो रहे हैं । साधन, सतसंग, भजन करके वो राख फूँकी जाती है । अंगारे की चमक आ जाती है । बेडा पार हो जाता है । यहां कहते हैं
निर्वसनों, निरलम्बा । सव्छ्न्दों मुक्त बन्धनात ॥
कोई वासना नहीं रही । प्रारम्भ में अच्छा करने की वासना होती है बुरा से बचने की वासना होती है सज्जनों की । और उस वक्त अगर सतर्क ना रहे, तो अपने दोषों को पोषण दे देगा । तो सद्गुण नहीं बढ़ेगें । सद्गुण नहीं बढ़ेंगें तो सत्य में प्रीति नहीं होगी । प्रारम्भ में अच्छे को बढ़ाता जाये ताकि जन्मों के पुराने संस्कार जो हैं, वासनाएं हैं हल्की वासनाएं, उसको कम होने का मौका मिले । जितनी अच्छाई बढ़ती जाती है उतनी हल्काई करने की प्रवृति कम होती जाती है । तो कई बार हल्के विचार, हल्की इच्छाएं, हल्की वासनाएं उठती है । उस समय अच्छे विचार, अच्छे इच्छाएँ, अच्छी वासनाएँ करना उचित है । लेकिन जिसने तत्वज्ञान पाकर, गुरु की शरण पाकर अपने स्व का छंद पा लिया उसके लिए हल्की वासना और अच्छी वासना, दोनों वासनाएँ उनके लिए त्याज्य हो जाती हैं । यहाँ तक की उसे भगवान का अवलंबन भी नहीं लेना पड़ता है । कई लोग भगवान का, मंदिर, देव-देवता का अवलंबन लेते हैं । लेकिन वो अवलंबन क्यों लेते हैं ? अपनी वासना पूरी करने के लिए । मंदिर में जाकर सुबह देखेंगे तो कई भगत मिलेंगें । भक्त तो शायद कोई मिल जाये, भिखमंगे बहुत होंगें । मेरा ये हो जाये, मेरा ये हो जाये अथवा रोज जाता हूँ तो मेरा व्यवहार का टटू है वो वैसा ही चलता जाये इस वासना से लोग हाजरी पुरने को जाते हैं । ज्ञानी को कोई वासना नहीं इसीलिए ज्ञानी किसी मंदिर की भी नाक रगड़ नहीं करता है । वाह रे ठाकुरजी । नहीं उसको तो अपना स्व का छंद मिल गया, उसका तो आत्मा ही अपना परमात्मा ही मंदिर है । फिर भी वो मंदिर में जाता है तो जाता है नहीं जाता तो नहीं जाता है । उसके लिए कोई बंधन नहीं । उसके लिए कोई पूनम और अमावस्या का भेद नहीं । उसके लिए कोई पुण्य और पाप की व्यवस्था, व्याख्या नहीं है । वो तो स्व के छंद में मस्त है । उसको सारा जगत अपने विशाल चैतन्य घन परमात्मा का विलास मात्र भासता है ।
परमात्मा के २ रूप । एक शांत, मधुर, रसमय । दूसरा मधुर, आह्लाद, और रसमय । जैसे सागर की गहराई में पानी शांत और शीतल है और सागर के ऊपर तरंगे हैं, आह्लाद कर रहे हैं । तरंगों का आह्लाद करना भी अपने ढंग का अच्छा है । और वे तरंग कभी किनारों को छूते हैं, कभी किनारों के पेड़ों को लेकर अपने में समेट लेते हैं । तो कभी सागर के मोतियों को पकड़ के बाहर उछेल देते हैं । लेकिन है सारा का सारा क्रियाकलाप उस सागर की गहराई के आधार पर ही तरंगें सब कुछ करते हैं । ऐसे ही भगवान के शांत अव्यक्त ब्रह्म के आधार पर ये सव्यक्त ब्रह्म भी नाच रहा है कभी पुष्पों में खिल रहा है, कोयलों में गुनगुना रहा है । पक्षियों में गीत गए रहा है । झरनों में उसके झंकार आ रहे हैं । और हवाओं में उसकी खबरें आ रही हैं । उसमे भी वही परमात्मा की सत्ता है लेकिन वो आह्लादनी शक्ति है । और वह शांत शक्ति है । ब्रह्मवेत्ता को शंट शक्ति का अनुभव हो । तो बाहर भी उसके लिए संसार ब्रह्म रूप हो जाता है । आह्लादनी शक्ति से भरा हुआ अपना ब्रह्म रूप हो जाता ।
बाहर भीतर एको जानो ये गुरु ज्ञान बताई गुरुवाणी में ।
फिर बाहर और  तत्व का उसे बोध हो जाता है । अज्ञानी कुछ अच्छा मानता है कुछ बुरा मानता है । कुछ अपना मानता है कुछ पराया मानता है । लेकिन ज्ञानवान के लिए कोई अपना नहीं कोई परया नहीं । है तो सब अपना है और नहीं तो कोई अपना नहीं ।  ऐसी व्यापक दृष्टि हो जाती है । योगवशिष्ठ में आया रामजी ज्ञानवान चाहे अरण्य में रहे चाहे बस्ती में रहे । बस्ती में भी उसे अरण्य है और अरण्य में भी उसे बस्ती है । जंगल में रहता है तो मृग उसके बच्चे और परिवार हो जाते हैं । वृक्ष भी उसके परिवार हो जाते हैं । क्योंकी वृक्षों में भी वो अपने प्यारे को निहार लेता है, अपने स्वरूप को निहार लेता है । जंगल के पशु और पक्षी भी उसके अपने मित्र बन जाते हैं । क्योंकी ज्ञानी  स्वभाव स्व में स्थित है, स्व छंद मिल गया है ।




 

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