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अहम् के मूल में आसक्त हो जाओ
अहम् के मूल में आसक्त हो जाओ

 


 

शरीर से ऊँची इन्द्रियाँ हैं । इन्द्रियों से ऊँचा मन है । मन से ऊँची बुद्धि है । बुद्धि से ऊँचा मैं है जो बुद्धि को लगाता है । और उस मैं से भी ऊँचा मैं का मूल परमात्मा-आत्मा । तरंग है मैं और पानी है मूल । स्फुरणा है मैं लेकिन अहम का मूल परमात्मा हैं । ये अहम तीन प्रकार का होता है । जब शरीर से जुड़कर अहम चलता है, तो तुच्छ अहंकार होता है । मैं धनी, मैं निर्धन, मैं पढ़ा-लिखा, मैं अनपढ़ हूँ । मैं दुखी हूँ, मैं सुखी हूँ । मैं पुण्यात्मा हूँ, मैं पापी हूँ - ये तुच्छ अहम है । दूसरा होता है भक्त अहम । मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं। बाकी ये सब लीला है । दुःख देकर भगवान हमारे दोष मिटाते हैं, अहंकार मिटाते हैं । सुख देकर भगवान हमारा औदार्य बढ़ाता है । हाँ, आह्लाद देता है । ये सब भगवान की प्रसादी है । मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं । ये भक्ति परायण मैं, तुच्छ मैं से ये बहुत ऊँचा मैं है । लेकिन इससे भी ऊँचा शुद्ध-बुद्ध जो भावना को भी जानता है, तुच्छ मैं के सुख-दुःख को भी जानता है, भावना वाले मैं की भावना के रस को भी जानता है । वो है वास्तविक परब्रह्म-परमात्मा का स्वरूप मैं । भाव समाधि लगी उसको भी कोई जानता है । ध्यान लग गया उसको भी कोई जान रहा है । ध्यान नहीं लग रहा है उसको भी कोई जान रहा है वो शुद्ध स्वरूप है । उस शुद्ध स्वरूप को मैं मानने के लिए ॐ कार का गुंजन और वहाँ शांत । ॐ कार का गुंजन और वहाँ शांत । फिर वहाँ का स्वाद आएगा । बड़ा रस आने लगेगा । और बार-बार जो चीज अच्छी लगती है ना तो उसको बोलते हैं आसक्ति । भगवान बोलते हैं इन्द्रियों के द्वारा, मन के द्वारा, बुद्धि के द्वारा जो अच्छा लगे उसमें आसक्त होकर मेरी माया में गुलाटियाँ खाते रहो । लेकिन मुझ में आसक्त हो जाओगे तो हे पार्थ अनन्य प्रेम से, अन्य-अन्य में जो अन्य-अन्य नहीं है उसको बोलते हैं अनन्य । अनन्य प्रेम से मुझ में आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण रूप से और संशय रहित रूप से जानेगा वह विद्या मेरे से तू सुन । वो विद्या क्या है ?

भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, ये पंच भौतिक शरीर मैं नहीं हूँ । मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं हूँ । तो ये शूद्र अहंकार मैं नहीं हूँ । इस अहंकार के बदलाहट को भी मैं जानने वाला हूँ । शुद्ध-बुद्ध, चैतन्य । और वो चैतन्य अनेक रूपों में, पांच भूतों में भी वही, पांच भूतों से भौतिक वस्तुओं में भी वही । जैसे सूत के बने हुए गांधी, उनका चश्मा भी सूत्र का, और उनके हाथ में जो छड़ी है वो भी सूत की । सूत के बने हुए गांधीजी के चित्र की चप्पलें भी सूत की । और गांधीजी का सिर भी सूत का, हाथ भी सूत के और जो मूछें दिख रही है सफेद वो भी सूत की, कलर किया है । ऐसे ही सूत्रे मणिगणा इव । अर्जुन ! जैसे सूत की मणियाँ और सूत के धागे में परो दो तो मणियाँ अलग लगती हैं धागा अलग लगता है । लेकिन है वही का वही । तरंग अलग लगते हैं, भवर अलग लगते हैं । बुल-बुले अलग लगते हैं, झाग अलग दिखती है । और काई अलग दिखती है लेकिन मूल तत्व एक है ।


माँ में वातसल्य उस परमात्मा का है । पिता में अनुशासन और विकास का सामर्थ्य उसी का है । जहाँ भी श्रेष्ठता और दैवी सद्गुण देिखते हैं उस परमात्म देव के हैं । और दुर्गुण आदि दीखते हैं तो देव की तमस की लीला है । कोई क्रोधी आदमी है तो उसको देखकर दुखी मत होना । ये मेरे नरसिंह का अंश इसमें अवतरित हुआ है । अगर कोई अहंकारी है तो भगवान का वो अंश, अहंकार का अंश इसमें विकसित हुआ है । कोई क्रुद्ध है तो बोले नरसिंह का अंश भगवान ने इसमें दिखाया है । कोई स्नेह है तो बोले कृष्ण का अंश इसमें दिखा है । कोई सज्जन है, मर्यादा वाले हैं तो बोले श्री रामजी का अंश इसमें दिखा है । अंदर से सभी में ऐसा मानो, बाहर से यथायोग्य व्यवहार करो । आप भगवान के समग्र स्वरूप में, समाधि के सुख में और जागृत के व्यवहार में अविकम्प हो जायेगें । कुछ लोग बोलते हैं मेरे को अनुभव हो जायेगा - भगवान का अनुभव हो जायेगा । भगवान का अनुभव हो जायेगा तो भगवान जो अनुभव की बात बता रहे हैं तो उसपर ध्यान दो -
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन्मदाश्रयः ।  असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥
हे पार्थ ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्तिचित तथा अनन्यभाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण रूप से और संशय रहित रूप से तू मुझे जानेगा वह विद्या तू मेरे से सुन । वह विद्या है
भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
तो अब आपको क्या करना है ?  ये मैं शरीर पंचभौतिक नहीं हूँ, मन नहीं हूँ, बुद्धि नहीं हूँ । मैं इन सबसे परे आनंद स्वरूप हूँ । मैं प्रेम स्वरूप, शांत स्वरूप आत्मा हूँ । मैं अपने आत्मा में आनंदित हूँ, शांत हूँ । और व्यवहार में उसी आत्म सत्ता से एक चैतन्य अनेक रूपों से व्यवहार करता है । देखने की चीजें अनेक लेकिन देखने वाले नेत्र एक । सुनने की बातें अनेक लेकिन कान वही एक के एक । स्वाद चखने की चीजें अनेक, जीभ एक । गंध लेने की वस्तुएं अनेक, नाक एक । स्पर्श करने की चीजें अनेक, स्पर्श इंद्री एक । ये पांचों इन्द्रियों के विषय अनेक लेकिन पांचों इन्द्रियों को सत्ता देने वाला मन एक । बातों में से फिर नीचे आगये । मन के संकल्प-विकल्प अनेक लेकिन बुद्धि के निश्चय उससे कम है । और बुद्धि के निश्चय भी कुछ हैं लेकिन उसको जानने वाला जीव एक । जीव की परिस्थितियां अनेक लेकिन उसका दृष्टा मैं एक का एक । बचपन में जो परिस्थितियां आई, डर के समय जो परिस्थितियां आई वो सब परिस्थितियां चली गयी लेकिन उसको जानने वाले तुम एक के एक ।
 

तो एक में से अनेक, अनेक में से एक । डालियाँ अनेक, पत्ते अनेक, फूल अनेक, फल अनेक, लेकिन मूल में पेड़ की जड़ एक । और ऐसे पेड़ भी अनेक लेकिन पृथ्वी तत्व एक । सारे पेड़ पृथ्वी मय हैं । ये सारी धरती पे जो पेड़ हैं सारे पृथ्वीमय हैं । ऐसे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, ये पंचभौतिक शरीर सब पांच भूतमय है । मन, बुद्धि, अहंकार ये शुक्ष्म भूतों का है । इनमें परिवर्तन होता है क्योंकी प्रकृति के हैं । लेकिन मुझ चैतन्य की सत्ता से परिवर्तन होता है । सूरज वहाँ है लेकिन यहाँ के हवामान में परिवर्तन हो जाता है । सुबह सूर्यूदय के समय से टेम्प्रेचर बदलते-बदलते दोपहर को तेज गर्मी हो जाती है, शाम को फिर कम हो जाता है । सूरज तो लाखों-करोड़ों माइल दूर है । तो उसके प्रभाव से यहाँ सब उधल-पाथल हो जाता है । ऐसे ही सूरज में और पृथ्वी में जो परमात्म सत्ता है उसीकी सत्ता से सूरज, चंदा सब में होता है । और वही मेरे आत्मदेव होकर बैठे हैं - ज्ञान स्वरूप, स्तरूप, चेतनरूप । मैं उन्हीं में विश्रांति पाउँगा । मैं उन्हीं में आसक्त होऊंगा । छोटी-छोटी चीजों में आसक्त होंगें तो छोटी-छोटी आसक्ति कई जन्मों में भटकाएगी । बड़े में बड़े मूल में आसक्त हो जाएँ तो मूलमय हो जायेंगें । मूल क्या है ? हरि ॐ  ………… । मूल प्रेम स्वरूप है, मूल आनंद स्वरूप है । यहाँ अक्ल-होश्यारी को पाँच भूतों में छोड़ दो । अपने आत्मदेव में प्रीति करो ॐ  ………… आ गए, आ गए हम तो अपने घर में । जाना जहाँ था वहीँ पहुँच गए ।
आप भी पहुँचो मेरे साथ चलो ॐ  …………। आनंद है । ॐ  ………… आँखें बंद करके कोई कोशिश नहीं करनी, ध्यान लगाना नहीं है । सहेज में जो है उसमें मौज मारो, बस ! मौज ही है । ॐ ॐ  ………… । आप ध्यान के करता मत बनो । कोशिश मत करो, कुछ ना करो । जबतक जहाज में नहीं बैठे तो गाडी में, कार में, ऑटो में पहुँचे । अब जहाज में बैठे तो कोशिश नहीं करना, जहाज अपने आप चलेगा, आप को तो मजिल पे पहुँचा देगा, बस । ॐ  ………… । प्रयत्न करोगे तो मैं  में आ जाओगे । और प्रयत्न करोगे तो बुद्धि में आ जाओगे, मन में आ जाओगे । और प्रयत्न करोगे तो इन्द्रियों में आ जाओगे । प्रयत्न शिथिल होते जाओगे तो मुझ में आ जाओगे । और मेरा स्वाद मिला तो मुझमें आसक्त हो जाओगे ।

श्री कृष्ण का चौथा स्वरूप
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन्मदाश्रयः ।  असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥
संशय रहित होकर मुझे जानोगे । रात को सोते समय भी ऐसा पक्का, पंचभौतिक शरीर मैं नहीं हूँ, अब उससे काम नहीं लेना, मन भी मैं नहीं हूँ । बुद्धि भी मैं नहीं हूँ, ये तो प्रकृति के हैं । अहम भी मैं नहीं हूँ । इन सबको जो जानता है मैं उसी में हूँ, आत्मा - ॐ  ………… आप भगवान में सोने लग जाओगे और भगवान से ही उठोगे । और भगवान से ही व्यवहार करोगे । दिन भर भगवान में ही जियो । नहीं मिला तब तक कठिन है और मिल जाये तो बाबा ! हाथ नहीं जमा तो १०-२० लिखना कठिन है, १,२,३ लिखना कठिन है और हाथ जम गया तो आसान । ऐसे ही थोड़ा बहुत रस आने लग जाये तो अपने आप । बच्चा था ना मिटटी का आम चूस रहा था । माँ ने आँखें दिखाई मुर्ख कहीं का ! छोड़ता नहीं है नालायक, मिटटी है, केमिकल का रंग चूस रहा है, तेरे बाप का आम है ! माँ ने डाँटा बच्चा डर गया, आम तो छोड़ दिया । माँ कहीं इधर-उधर गयी, बच्चे भी बड़े मनोवैज्ञानिक होते है । धीरे से उठाया । दूसरी सयानी माँ के बच्चे ने भी ऐसा ही किया । अरे बेटा वो आम नहीं है, ठहर बेटे, माँ गयी घर में आम ले आई । धो के उसको गोल घुमा दिया, बिंदी उतार के २ बूँद गिरा दिया । अब होंठों को लगा दिया । अब माँ थोड़े ही सिखाएगी  चूसना है ! अपने आप स्वाद आता जायेगा चूसता जायेगा । रस आता जायेगा चुस्त जायेगा । ऐसे ही तुम्हारे मन को स्वाद आने दो चैतन्य स्वरूप का । जो आनंद स्वरूप है, प्रेम स्वरूप है, शांत स्वरूप है, ज्ञान स्वरूप है । सारे स्वरूपों का मूल स्थान है, सारे रस उसी से पैदा होते हैं ।

पृथ्वी की मिटटी चखोगे तो कोई रस नहीं आएगा पानी चखोगे ना तभी भी खट्टा-खारा, तीखा-नमकीन नहीं आएगा । लेकिन उस पृथ्वी और पानी के मेल से खट्टा-खारा, तीखा-नमकीन, तीखी मिर्ची भी पैदा होती है और गना भी वहीं पड़ा है मीठा । और टमाटर वहीँ है खट्टे पास में । और आलू फिर कुछ अलग ही होते हैं । करेले भी वहीँ पैदा होते हैं । एक-दो एकड़ की जमीन में सब प्रकार के रस पैदा हो जाते हैं आँवला भी पांच रस । पृथ्वी में आँख फाड़-फाड़ के देखोगे तो रस नहीं दिखेगा । ऐसे ही कलेजे चिर-चिर के देखोगे तो भगवान का रस नहीं दिखेगा । लेकिन भगवत भाव से देखोगे, भगवत प्रेम से देखोगे, भगवत नाम का उच्चारण करते हुए विश्रांति पाओगे तो आसान है । ॐ   ॐ   …………  मुझे बोलना पड़ता है, ऐसे ही चुप रहता हूँ तो हृदय में चलता है । और कभी-कभी चलने के फल में शांत भी हो जाता है । आप भी ऐसे ही मैं ना बोलू तभी भी आप ॐ शांति, ॐ आनंद । अभी स्वाद लो परमात्म सुख का । सहेज में, कोई प्रयत्न ना करो । आनंद, शांति । जैसे बच्चा माँ की गोद में थका हुआ, अपने बिस्तर पर आ गया । भुला हुआ अपने गंतव्य स्थान को पा लिया । ॐ हरि ॐ, प्रभु ॐ, प्यारे ॐ, आनंद ॐ, माधुर्य ॐ ।
अपनी-अपनी भावना से कोई शोर करे, कुछ भी करे, आप अपनी मस्ती में रहो । ॐ ॐ प्रभुजी ॐ, आत्मदेव ॐ, शांति ॐ, माधुर्य ॐ । अदभुद लीला, अदभुद अनुभूतियाँ । अदभुद का सब कुछ अदभुद । अन्न में से सत्व रस बनना ये भी अदभुद है । और उसमें माता-पिता के बूँद से ये बड़े वैज्ञानि  माँ के आगे तो  ये भी अदभुद है । अदभुद के मूल तक पहुँचना ये भी अदभुद है । काय झाले ओहो ! ॐ ॐ  तम नमामि हरिम परम, तम नमामि हरिम परम, तम नमामि हरिम परम । हरि ॐ ।

 

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