ईश्वर अंश जीव अविनाशी
P. P. Sant Shri Asharamji Bapuji Satsang - Haridwar (Ekant), 3rd May’ 2013 Part-1
हरि तो सर्वव्यापक सामान रूप से है l भगवान बोलते हैं मेरा किसी से राग नहीं है और किसी से द्वेष नहीं है लेकिन जो मेरे को भजते हैं वो मुझमय होते हैं मैं उनमें होता हूँ | भजन वाले का संकल्प हुआ न | ऐसा नहीं है भगवान किसी को मिले, किसी को न मिले तो राग-द्वेष हुआ l समोहम सर्वभूतेषु न मै द्वेषो असी न प्रिय l मेरा कोई द्वेषी भी नहीं है और कोई प्रिय भी नहीं है लेकिन जो मुझे भजते हैं वो मुझमें होते हैं मैं उनमें होता हूँ तो भजन की बलिहारी हुई l भजन करते-करते स्मरण बन जाए |
सुमिरण ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट |
मन ईश्वर में लीन हो हले न जीह्वा होंठ ||
ईश्वर अंश जीव अविनाशी | जीव अविनाशी है, जो अपने को विनाशी मानते हैं वो अपने को सताते हैं | मै मर जाऊंगा....मरेगा शरीर | तुमको तो भगवान भी नहीं मार सकते |
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन विमल सहज सुख राशी ||
चेतन है और विमल है उसमें मल, दोष, पाप नहीं है | पाप, मल, दोष, मन में है, प्रकृति में है, जीव में नहीं है |
ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन विमल सहज सुख राशी |
सो माया वश भयो गोसाईं बंध्यो जीव मरकट के नाहीं ||
जैसे बन्दर मुठठी बाँध के सकडे मुँह वाले बर्तन में खुद ही फँसता है.. वैसे खुद ही मान्यताओं से फंस जाता है l ये ऐसा है, ये ऐसा है, बहू ठीक हो जाए, बेटा ठीक हो जाए..| अरे ! समय की धारा में सब अदल-बदल होता ही रहता है l भगवान कृष्ण के बेटे कृष्ण को सुनाते थे गालियाँ | कभी मारने को दौड़ते थे कृष्ण हँस देते थे कि समय की धारा में सब..| फिर लड़के मर गए कृष्ण ज्यों के त्यों | लड़के मरे तो भी कृष्ण को दुःख नहीं.. गालियाँ दे तब भी दुःख नहीं..| अपना आत्मा तो सहज सुख राशी है | अपनी पकड़ होती है | ऐसा हो जाए, बहु ऐसी हो जाए, बेटा ऐसा हो जाए, वो कैसा हो जाए..| होता है होता है नहीं होता हो तो इसी का नाम दुनिया है | महा जय जयकार इसी को बोलते हैं l अब पार्वती दक्ष के यज्ञ में ना जाये तो ठीक है | शिवजी ने समझाया लेकिन पार्वती नहीं मानी गई, तो शिव जी कहा- ठीक है | तलाक देने को थोड़े गए शिवजी अथवा झगड़ा किया ? ठीक है.. चलो उपराम हो गए l समझो बेटा है.. बहु है.. कोई नहीं मानता है आपका कहना तो उसके पीछे लगकर दुखी मत हो | बेटा मेरा है, बहु में री है, ये भ्रम था | सब ईश्वर के राज्य में, सब अपने अपने मन से, अपने अपने प्रारब्ध से जी रहे हैं | ईश्वर के थे... मैं अपनी ममता लगाकर दुखी हो रहा था l अपनी ममता समेट लो | तुम्हारा भी भला हो जाएगा, उनका भी भला हो जाएगा | कितने लोग कहना तुम्हारा नहीं मानते.. उसका तो दुःख नहीं होता | ये नहीं मानता है तो दुःख होता है | जब ५०० करोड़ लोग तुम्हारा नहीं मानते तो तुम्हे दुःख नही होता तो दो-पाँच लोग ओर उसमें मिला दो बस हो गया | अपनी ममता ज्यादा दुःख देती है | ऐसा होना चाहिये.. ऐसा नहीं होना चाहिये | जो नहीं मानता है उसको ईश्वर के हवाले कर दोगे न तो ईश्वर उसकी बुद्धि फेर देगा | तुम्हारी ममता हटने से फिर ईश्वर का संकल्प काम करने लगेगा और जिस किसी से भी दुश्मनी हो.. अनबन हो.. सुबह उठ के मन ही मन-भाई उसमें मेरा ईश्वर है | कैसा भी है लेकिन उसके मन का आवेग है | बाकी उसकी गहराई में तो चैतन्य है मेरा | ईश्वर आनंद स्वरुप है, सुख रूप है, ऐसा करके.. आनंद रूप है, सुख रूप है, अपने शत्रु के प्रति और फिर उसकी मन ही मन प्रदिक्षणा करो | वो शत्रु मित्र बन जाएगा | महा जय जयकार हो जाए... जय हो ! जय हो ! ये कुंजियाँ है महा जय जयकार के पास l किसी के प्रति द्वेष.. किसी के प्रति राग रखने वाला स्वयं को ही घाटे में डालता है | भगवान अपने को घाटे में क्यों डाले ? समोहम सर्वभूतेषु ना मैं द्वेशु असी ना मै प्रियः | मेरा कोई द्वेषी भी नहीं है l रावण को मारते हैं, कंस को मारते हैं, दैत्यों को मारते हैं, राक्षसों को मारते हैं, घटोत्कच को मरवाते हैं लेकिन द्वेष नहीं है और अर्जुन का रथ चलाते हैं, मेरा कोई प्रिय नहीं है तो सरासर झूठ बोल रहे हैं भगवान ! झूठों को दिखेगा कि भगवान झूठ बोल रहे हैं | भगवान में ना द्वेष है, ना राग है | सामने वाले कि... अर्जुन की प्रार्थना और भक्ति रथ चलवा रही है और उन दुष्टों के दुष्ट कर्म भगवान से उनको मरवा रहे हैं | भगवान अपने तरफ से नहीं करते l ऐसे ही ब्रह्मवेत्ता भी अपनी तरफ से नहीं करते | लोगों के प्रारब्ध से.. लोगों के संकल्प से सब होता है l हरि ॐ.. नारायण ॐ.. प्रभुजी ॐ.. प्यारे जी ॐ... मेरे जी ॐ ॐ | क्या टाइम हो गया ? तुम्हारा वास्तविक तुम्हारा असली.. तुम भी सम हो, क्यों ? कि तुम भगवान के वंशज हो, भगवान से अलग नहीं हो सकते तो जैसे भगवान अमर हैं तो तुम भी अमर हो.. शरीर मरने के बाद भी तुम रहते हो | भगवान ज्ञान स्वरुप है तो तुम भी ज्ञान स्वरुप हो | भगवान चैतन्य है तो तुम भी चैतन्य हो लेकिन मरने वाले शरीर को ‘मैं’ मान के उलझ गए | ये ऐसा हो, ये ऐसा हो, ये ऐसा हो, भृगु ने लात मार दी तो भगवान दुखी नहीं होते, कि अरे आपके पैर में चोट लगी होगी | मेरा ह्रदय तो युद्ध करके.. दैत्य दानवों का पक्षपात करके.. ह्रदय कठोर हो गया होगा, आपको पीड़ा तो नहीं हुई l ऋषियों में चला था.. ब्रह्मा विष्णु महेश हैं | तीन महादेव हैं तीनों, लेकिन उन तीनों में से सर्वश्रेष्ठ कौन है ? तो फैसला नहीं हो रहा था तो भृगुजी ने कहा- मैं करवाता हूँ फैसला l जरा शिवजी के यहाँ गए | टेढे-में ढे चले तो शिवजी ने लाल आँखे कर दीं l ब्रह्माजी के पास गए | कर्मंडल से पानी लेकर.. ॐ अपवित्रो पवित्रोवा..., ये अशुद्ध भूमि शुद्ध हो जाये तो मै बैठूँगा | ब्रह्माजी ने कहा- “ए क्या करता है ? इधर अशुद्ध-शुद्ध भूमि कहाँ से आई ? ये कोई मनुष्य लोक है क्या” ? ब्रह्माजी चिढ़ गए | गए विष्णु के पास... वो तो लेटे थे, धड़ाक से छाती पे लात मार दी ? विष्णु ने कहा- “आपके पैरों में चोट तो नहीं लगी महाराज !” भृगु ने कहा- विष्णु सर्वोपरि है इसीलिए विष्णु की पूजा खूब होती है | शिवजी की भी होती है और शिवजी में भी ज़रा नाराजी दिखती हैं लेकिन बहते हुए पानी में लकीर जैसा l पार्वती को उठा के पुलाव बना दिया और शिवजी के आगे कटोरा रखा l ज़रा नाराज़ हुए | घबराये, हू हू कर के.. जिसने जो जो खाया.. किसी ने नाक निकाली, कान निकाला, आँख निकाली, उंगलियां निकाली l पार्वती को जोड़ के शादी करा दी तो शिवजी फिर उन भूतड़ो को बोले कि रहो यहीं जो हुआ सो हो गया l शिवजी में भी नहीं है ऐसा l अरे ! ईश्वर के रास्ते जाने वाले साधक में भी द्वेष नहीं रहता ज्यादा तो शिवजी में क्या रहेगा l राग नहीं रहता... द्वेष नहीं रहता और फिर भी शिवजी रागी दिख रहे हैं l अपनी जाँघ पर पार्वती को बिठा के और ऋषियों को ब्रह्मज्ञान का उपदेश देते हैं l
चित्रकेतु तपस्या के बल से, विचरण करने की शक्ति वाला हो गया | विचरण करते-करते शिवलोक में गया, ”अरे ! बोले भगवान हो कर अपनी पत्नी को जाँघ पे बिठा के उपदेश देते हैं l ये तो मर्यादा के खिलाफ है उचित नहीं है |” तो शिवजी को तो कुछ नहीं हुआ | पार्वती जान गयीं l बोली- “राजा चित्रकेतु तपस्या के बल से यहाँ तक तो पहुच गया, लेकिन अभी भी शिवजी में दोष देखता है, अपने अन्दर ही द्वेष है, दोष है | जा तू राक्षस बनो l” तो चित्रकेतु में से वृत्रासुर राक्षस बना और फिर युद्ध में बोलता है कि “हरि ! लगाओ बाण, ये शरीर छूटेगा मैं तो अमर हूँ l” भगवान की स्तुति किया | “आप सर्वज्ञ हो और में रा ये आत्मा आप एक ही हो l” ऐसी-ऐसी राक्षसों के द्वारा भी भगवान ने ऐसी ऐसी अनिभुती बताई कि हृदय भर आता है कि क्या भगवान की कृपा है | क्या हिन्दू धर्म के शास्त्रों की महानता है l
बड़ा आसान तरीका.. ईश्वर को पाने का सुलभ तरीका, “पर हित सरिस धरम नहीं भाई l” दूसरे के हित का सोचने के बराबर कोई और धर्म नहीं है और दूसरे का अहित सोचना-करना.. उसके बराबर कोई पाप नहीं है l बस ये दो बात पकड़ ले तो भी धर्म- धर्म है l “पर हित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़न सम नहीं अधमाई” l हमारे ज्ञान के द्वारा, विचार के द्वारा, ठगी के द्वारा, किसी का शोषण होता है तो ये अधमाई है l अब मुशर्रफ कितना शोषण कर के बैठ गया राष्ट्रपति पद पे | आई मुसीबत तो भाग गया विदेशों में, फिर भी कैसा कर्म नियंता ने प्रेरित किया | चल बेटा ! पाकिस्तान चुनाव लड़ो | चुनाव लड़ने के बहाने आए और अभी जेल में | कैसी व्यवस्था है भगवान की ! पाकिस्तान सरकार में दम नहीं था कि उसको ले आये वहाँ से, खुद ही आयाl तो प्रेरक भी खुद ही है | उल्टी बुद्धि सुझा के ठीक कर देता है l उसको प्रीती पूर्वक भजो तो सुमति देता है और उसको छोड़ के जगत को भजो तो फिर कुमति देके अपने पास ले आता है l सुमति-कुमति सब के उर रहई, वेद पुराण निगम असतहीं” | अच्छाई-बुराई सबके ह्रदय में छुपी हैं l अच्छा करते हैं तो अच्छाई का हिस्सा विकसित होता है और बुराई करते हैं तो बुराई का हिस्सा विकसित होता है और ईश्वर को पाना चाहो तो अच्छाई करो और ईश्वर को अर्पण, बुराई से बचो और ईश्वर को मिल जाओ l ईश्वर मिले हैं तो बाहर से आ के नहीं मिलेगा, मिला मिलाया है, लेकिन नासमझी हट जायेगी l
आज ३ बज के २-४ मिनट हुए थे | आँख खुल गयी ३ बज के ४ मिनट के १० मिनट तो बिस्तर पे से खड़े हो गए | नींद तो पहले खुल जाती है, फिर तो लेटे लेटे थोडा चिंतन किया | रात को जल्दी सोता हूँ ना तो सुबह बहुत अच्छी होती है l आज सुबह बहुत अच्छी हुई | प्राणायाम सब डट के कर लिए | आसान वासन सब हो गया l ये ३ से ५ वाला प्राणायाम वाला.. ५ से ७ वाला पानी पीना और शौच आदि का नियम बहुत फायदा करता है l जिसको डॉक्टर ने बोला कि ऑपरेशन कराओ.. वो गोधरा वाली बाई.. नहीं तो दोनों मार जायेंगे बच्ची और माँ, नहीं कराया तो भी दोनों ठीक हैं | अब फेफड़े खराब हुए | डॉक्टर बोलता है- फेफड़ा निकालवाना पड़ेगा | बापूजी के दर्शन के लिया आना चाहते हैं l बेटा! इधर आओ मत | फेफड़ा निकालने की ज़रूरत ही नहीं है | कमरा बंद कर के गोचंदन अगरबत्ती जलाओ | उस पर घी की बूंदे डालो | उसमें ४ से ५ के बीच प्राणायाम करो | ऐसे ही फेफड़े ठीक हो जायेंगेl किसी आदमी को खाना हजम नहीं होता | जो भी खाता है.. वमन हो जाता है ऐसा है | पाचन खराब है कुछ खा नहीं सकता, जीना तो है | फिर खाद्य पदार्थों की आहुति दो और उसी धुएं को खाए, तभी भी जिए और कई गुना ताकत हो जाती है, तो मै ऐसा धुंआ खाता हूँ | सुबह ये खोल-खोल के.. तभी का खोला हुआ है.. रोम कूप भी साँस लेती है न l घी डाल देता हूँ | कभी सिर का तेल डाल देता हूँ | सिर का तेल भी अच्छा होता है | आजकल नीम का तेल भी है मेरे पास | तो कभी कभी नीम का तेल डाल देता हूँ तो मच्छरों को और हानिकारक जीवाणु को तो नीम का तेल महाजय-जयकार करा देता है | महाजय-जयकार l जाली वाले दरवाजे पे सेट हो जाते हैं | दरवाजा खोल देता हूँ.. जाओ भाई! राम राम..| कमरा बिलकुल शुद्ध हो जाता है और नीम का तेल मिलता भी सस्ता है | ५०-६० रुपये लीटर होगा बस | ७० में होगा और क्या l दिया जलाता हूँ ना वहाँ एक बोतल रख दी है १०-१५-२५-३० ग्राम वाली | कभी दिए में भी डाल देता हूँ | पहले घी का दिया करता था तो घी महंगा पड़ता है | ७०० रुपये घी | तो फिर मैंने अरंडिया का तेल चालू कर दियाl तो महंगा तो मेरे को परवाह नहीं आश्रम में बहुत है घी लेकिन है तो सही.. कीमत तो है | आज सब लोगों ने खा लिया | मै दिए में जलाऊं इससे तो सबने खाया ना | थोडा थोडा घी खाया आज l आँवला, घी, शरबत मिश्रण कटोरी-कटोरी जिसने पिया.. अपने हाथ ऊपर करो | देख लो ! ये पिया तो करकसर किया ना | दिए में नहीं जलाया तो इधर आ गया काम में l जय हो जय हो l तो बहु की चिंता, बेटे की चिंता दुनिया की चिंता.. ये सब नासमझी है | अत्यंत तुच्छ जगत है | स्वप्ने की नाईं बदल रहा है | समय आते ही सब ठीक हो जायेगा l ये बीमारी, ये बीमारी.. डॉक्टर बोला- तुम ठीक नहीं हो सकते हो, बीमारी तुम्हारे को लगी रहेगी l मरीज ने कहा- डॉक्टर ! तुम पागल हो | बीमारी मेरे को है ही नहीं | बोले- ये बीमारी ? अरे ! बीमारी शरीर को है | शरीर जल जायेगा | मुझे क्या लगी रहेगी | महाजय-जयकार.. डॉक्टर भी देखता रहा l अभी आप किसी ज्योतिषि को दिखाओ तो कोई ना कोई गृह.. कभी कुछ, कभी कुछ..| फिर ये पहरों, वो पहरों | फिर भी कुछ ना कुछ कमी दिखे है l डॉक्टर को दिखाओ तो कभी एक दिन ऐसा नहीं आएगा जब डॉक्टर बोलेगा आपका सब कुछ ठीक है l कभी बोलेगा बी.पी. ऐसा है, कभी बोलेगा यह है, कभी बोलेगा शुगर है, कभी कुछ.. कभी कुछ.. कभी कुछ निकलता ही रहेगा l जो शरीर की ज्यादा परख कराते रहते है न ! वो ज्यादा झंझट में फंसते रहते हैं | हाँ, चिंतन भी वो ही करते रहते हैं और जो भाग्य दिखाते रहते हैं ज्योत्षियों को.. वो भी मारे जाते हैं और जो नग पहन के सुखी होना चाहते हैं वो भी नंगे ही हो जाते हैं जड़ बुद्धि l कैसे मूर्ख लोग हैं ? ब्रह्मज्ञान का सत्संग मिला है.. ब्रह्मज्ञानी गुरु की दीक्षा मिली | फिर बोले- ज्योत्षी ने बोला ये नग पहरों.. वो नग पहरों तो जाओ ! जेब खाली करो.. ठगवायो l ज्योतिषि ने कहा- तुम्हारा बेटा एक्सीडेंट हो जाएगा मार्च महीने में | मैने कहा- ज्योतषि को बोल कि लिख के दे देवे | मेरे बेटे का नहीं हुआ एक्सीडेंट तो तेरे बेटे का कराएगा तू l ऐसे ही डरा रहे हैं मंत्र कराओ बस l
“संशय सबको खात है संशय सबका पीर |
संशय की जो फांकी करे उसका नाम फ़कीर ||
हद टूपे सो ओलिया बेहद टूपे सो पीर,
हद बेहद मैदान में सोया दास कबीरl”
काहे को सुकडना, काहे को डरना, काहे को मरना, होगा सो देखा जाएगा l आत्मा तो नित्य है और शरीर अनित्य है | फिर चिंता किस बात की है l सम्बन्ध सच्चे नहीं हैं और सदा नहीं हैं, बहुएँ-ससुरे का सम्बन्ध सच्चा नहीं है l ममता घुस गयी | ममता भगवान से कम है इसलिए संसार का दुःख दिखता है l नहीं तो कैसा भी हो ? कृष्ण के बेटे कैसा उल्टा चलते थे l हमारे भी कई बेटे उल्टे चलते हैं | कृष्ण के बहुत थे हमारे भी बहुत सारे हैं उलटे चलते हैं l हमको दुःख नहीं होता है, बेटे हैं तो बहुएँ भी आएँगी उल्टा चलने वालीl कई बहुएँ हैं.. कई बेटे हैं.. कोई फिकर नहीं l तुम्हारे तो एक दो बेटा-बहु हैं तो फिकर कर रहे हो | मेरे तो कितने बेटे-बहू हैं.. कोई फिकर नहीं | जीवन जीने की कला सीख लो | अपनी निर्लिप्ता जान लो | प्रयत्न करो ठीक-ठाक हो बाकी तो फिकर काहे को, सुकडन काहे को | समय आता है.. सब ठीक हो जाता है l कई लोग बदल जाते हैं समय की धारा में | छोटा-मोटा टेंशन लेकर घुमते हैं | बड़े में बड़ा परमात्मा है वो हमारा आत्मा बन के बैठा है l उसी की नित्यता.. उसी की चेतनता.. उसी के आनंद को जागृत रखो l
ये तुलसी होम्यो गोलियाँ हैं l भूख नहीं लगती तो १-२ गोलियाँ चूस लो | हे भूख धडाधड.., मोटापा है तो १-२ गोली चूस ले.. मोटापा नियन्त्रण, आज भूख लगेगी तेज l
बिजनौर... इधर से तो थोडा गर्म होगा टेम्परेचर | देखो कैसा है ? बिजनौर वालों को तो पता होगा.. इधर से तो गर्म ज्यादा है बिजनौर l हरिद्वार से तो गर्मी ज्यादा होगी बिजनौर में l चला चली का में ला | “देखत नयन चलो जग जाई का मांगू कछु स्थिर ना रहाई” | कुछ स्थिर तो है नहीं क्या मांगे l इसको मिटाओ.. उसको मिटाओ.. क्या मिटाना ? इसको लाओ.. उसको लाओ.. क्या लाना l अपने समत्व में रहो | जितना हो गया सो ठीक है | जो धन मिला सो मिला, जो गया सो गया l जो मान मिला सो मिला, अपमान हुआ सो हुआ.. सब ठीक.. बह रहा है, जो अच्छे दिन आए तो आए, बुरे दिन आए तो आए.. सब जा ही रहे हैंl बुरे दिन आके भी तो जा रहे हैं | अच्छे दिन आके भी तो जा रहे हैं तो फिर क्या ? जो सदा रहता है उसको खोज लो बस l सदा तो अपना आपा रहता है l अखंडानंद जी ने एक मस्त संत के दर्शन किये, बड़े प्रसन्न रहते थे एकदम ब्रह्मानंद में रहते l बोले- स्वामी जी! संत को कैसे पहचाने? अरे ! थोड़ी देर तो चुप रहे | फिर बहुत जोर से हँसे | बोले- सब संत ही संत हैं | अन्दर से असंत हटा दो | अन्दर से बुराई हटा दो तो सब अच्छे ही अच्छे हैं l बुराई तो ऊपर की आरोपित है | सब अच्छे ही अच्छे हैं l सब संत ही संत हैं, सब ब्रह्म ही ब्रह्म है | ऐसा एकदम ऊंचा संकेत दे दिया l वासुदेव ! वासुदेव! हरि ! हरि !