| अडिग विश्वास से असम्भव भी सम्भव | देवनाथ श्लोकों पर केवल उँगली रखते जायें और बोलते जायें ! गीता एक ऐसा अदभुत दैवी ग्रंथ है कि एक अनपढ़ आदमी, जो ʹक, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ...ʹ नहीं जानता था, वह गीता के श्लोकों पर उँगली रखता जाय और गीता गूँजती जाय ! यह इस दैवी ग्रन्थ का देवत्व है।
देवनाथ द्वारा गीता के श्लोकों का ही शुद्ध उच्चारण हो रहा था, यह तथ्य जब उन्हें बताया गया तो वे गदगद हो गये। उनके नेत्रों से अश्रुधाराएँ बहने लगीं। इसके बाद तो देवनाथ सिंह ने अपना जीवन परमार्थ में ही लगा दिया। उन्होंने पैदल भारत-भ्रमण किया। जब वे द्वारिका पहुँचे तो भगवान द्वारिकाधीश का दर्शन करते हुए और गीता के श्लोकों का उच्चारण करते हुए ही उनका शरीर शान्त हो गया। |  |
|
|
|
|
|
| दुःखी कब होना चाहिए ? | दुष्कर्म करते समय जो संकल्प होता है, उसी समय दुःखी होना चाहिए। सत्संग में ऐसा ही प्रसंग निकल पड़ा कि ʹजो आदमी दुष्कर्म करता है, करते समय भी पश्चाताप नहीं करता। दुःसंकल्प और दुष्क्रिया के समय भी वह दुःखी नहीं होता लेकिन दुःसंकल्प और दुष्क्रिया का जब फल भोगता है तब आदमी दुःखी होता है। जैसे काम-विकार का संकल्प हुआ तो उसी समय दुःखी होना चाहिए लेकिन दुःखी नहीं होता, काम-विकार भोगते समय भी दुःखी नहीं होता, काम-विकार भोगने के बाद फें...... फें.... पश्चाताप करता है तथा बुढ़ापा और बीमारियों को बुलावा देता है। |  |
|
|
|
|
|
| गाय की बहुउपयोगिता | वैज्ञानिकों के अनुसार गाय के दूध में 8 प्रकार के प्रोटीन, 6 प्रकार के विटामिन, 21 प्रकार के एमिनो एसिड, 11 प्रकार के चर्बीयुक्त एसिड, 25 प्रकार के खनिज तत्त्व, 16 प्रकार के नाइट्रोजन यौगिक, 4 प्रकार के फास्फोरस यौगिक, 2 प्रकार की शर्करा, इसके अलावा मुख्य खनिज सोना, ताँबा, लोहा, कैल्शियम, आयोडीन, फ्लोरिन, सिलिकॉन आदि भी पाये जाते हैं।
इन सब तत्त्वों के विद्यमान होने से गाय का दूध एक उत्कृष्ट प्रकार का रसायन (टॉनिक) है, जो शरीर में पहुँचकर रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य को समुचित मात्रा में बढ़ाता है। यह पित्तशामक, बुद्धिवर्धक और सात्त्विकता को बढ़ाने वाला है। विभिन्न वैज्ञानिकों ने खोजों के आधार पर अपने मत प्रस्तुत किये हैं। |  |
|
|
|
|
|
| नजरें बदलीं तो नजारे बदले..... | सुख सपना दुःख बुलबुला, दोनों हैं मेहमान।
दोनों बीतन दीजिये, आत्मा को पहचान।।
अपने आपको पहचानो। सुख सपना व दुःख बुलबुला है, दोनों मेहमान हैं। जो सुखाकार दुःखाकार वृत्ति है वह चित्त में पैदा होती है। सुखद-दुःखद परिस्थितियों के पास समय नहीं कि आपको सुखी-दुःखी करने के लिए ठहरें। सभी परिस्थितियाँ आ-आकर चली जाती हैं लेकिन हम मूढ़ता से परिस्थितियों को अपने में आरोपित कर लेते हैं। प्रारब्ध से, ईश्वर की व्यवस्था से, ऋतु-मौसम के अनुसार सुख-दुःख, ठंडी-गर्मी आती है लेकिन ʹमैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँʹ - यह मूढ़ता करें अथवा तो सजाग हो जायें कि ʹमैं इनको देखने वाला हूँ, मैं साक्षी हूँʹ यह अपने हाथ की बात है। |  |
|
|
|
|
|
| परम उन्नतिकारक श्रीकृष्ण-उद्धव प्रश्नोत्तरी | ʹप्रारब्ध पहले रच्यो, पीछे भयो शरीर।
तुलसी चिंता क्या करे, भज ले श्री रघुवीर।।
ૐ ૐ प्रभु जी !...... चिंता आयी है..... राम राम राम..... ૐ ૐ..... हा... हा.... हा....ʹ (हास्य प्रयोग करो)। चिन्ता तो दुःख दे रही थी लेकिन स्वभाव बदल दिया। यह शूरवीरता है।
माँ ने कुछ सुना दिया, बाप ने कुछ सुना दिया या गुरु ने कुछ सुना दिया। लगा कि इतने आदमियों के बीच हमारा अपमान हो गया। अरे, यह धक्का लगता है अहं को। सोचो, ʹमाँ ने, पिता ने, गुरु ने जब कहा है तो यह हमारे अहं को कहा है, हमारी भलाई के लिए कहा हैʹ ऐसा करके अपने स्वभाव को बदलें – यह शूरवीरता है। यह ज्ञान आपको सारी जिंदगी में कहीं नहीं मिलेगा। |  |
|
|
|
|
|
| स्रष्टा की विश्वलीला में सहायकः देवर्षि नारदजी (देवर्षि नारदजी जयंतीः 6 मई 2012) | समुद्र-मंथन के परिणामस्वरूप लाभ के सारे अंश देवताओं के हिस्से पड़े थे, तथापि भयंकर युद्ध चलता रहा और देवताओं ने असंख्य असुरों का वध किया। ऐसी अवस्था में नारदजी ने समरक्षेत्र में उपस्थित होकर देवताओं से कहाः "आप लोगों ने तो अमृत पाया है, लक्ष्मी देवी को प्राप्त किया है तब और किस वस्तु के लिए युद्ध ?" उनके उपदेश से देवगण असुर विनाश के कर्म से विरत हुए। |  |
|
|
|
|
|
| सत्साहित्य जीवन का आधार है | जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनके जीवन पर दृष्टिपात करो तो उन पर किसी न किसी सत्साहित्य की छाप मिलेगी। अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक इमर्सन के शिष्य थोरो ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। उन्होंने लिखा हैः ʹʹमैं प्रतिदिन गीता के पवित्र जल से स्नान करता हूँ। यद्यपि इस पुस्तक को लिखने वाले देवता को अनेक वर्ष व्यतीत हो गये लेकिन इसके बराबर की कोई पुस्तक अभी तक नहीं निकली है।" |  |
|
|
|
|
|
| औषधीय गुणों से सम्पन्नः अनानास | अनानास के ताजे, पके और मीठे फल के रस का ही सेवन करना चाहिए। कच्चे या अति पके व खट्टे अनानास का उपयोग नहीं करना चाहिए।
अम्लपित्त या सतत सर्दी रहने वालों को अनानास नहीं खाना चाहिए।
अनानास के स्वादवाले आइस्क्रीम और मिल्कशेक ये दूध में बनाये पदार्थ कभी नहीं खाने चाहिए। ये स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक है।
भोजन के बीच में तथा भोजन के कम से कम आधे घंटे बाद रस का उपयोग करना चाहिए।
भूख और पित्त प्रकृति में अनानास खाना हितकर नहीं है। इससे पेटदर्द होता है।
छोटे बच्चों को अनानास नहीं देना चाहिए। इससे आमाशय और आँतों का क्षोभ होता है।
सूर्यास्त के बाद फल एवं फलों के रस का सेवन नहीं करना चाहिए। |  |
|
|
|
|
|