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यह कौन सा युग है ? ʹअध्यात्म-विज्ञानʹ का युग... ʹआध्यात्मिक क्रान्तिʹ का युग

यह कौन सा युग है ?
ʹअध्यात्म-विज्ञानʹ का युग...
ʹआध्यात्मिक क्रान्तिʹ का युग
आधुनिक विज्ञान ने जो तरक्की की है, वह अपनी जगह पर ठीक है परंतु हमारी युवा पीढ़ी से एक भूल तब होती है जब वह भौतिक तरक्की को ही सब कुछ मान बैठती है। अनेक लोग बात-बात में यही कहते नजर आते हैं कि ʹविज्ञान का युग है, विज्ञान का युग है।ʹ ऐसा करके वे अध्यात्म व संतों-महापुरुषों से होने वाले महान लाभ से वंचित रह जाते हैं। वास्तव में देखा जाय तो अध्यात्म ही सच्चा और सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है। भगवान श्रीकृष्ण ने ʹगीताʹ में अध्यात्म-विज्ञान के परमोच्च अनुभव से तृप्त सत्पुरुष का वर्णन ही इन शब्दों में किया हैः ʹज्ञानविज्ञानतृप्तात्माʹ.... ज्ञान यानी आत्मा-परमात्मा का शास्त्रोक्त शाब्दिक ज्ञान और विज्ञान यानी इसी का साक्षात् अपरोक्ष अनुभव। जो आत्मज्ञान और आत्मविज्ञान से तृप्त हो जाते हैं, उनके जीवन में संत कबीर जी की ये पंक्तियाँ चरितार्थ हो जाती हैं- ʹएकै साधे सब सधै।ʹ
आत्मविज्ञान के पूर्ण अनुभव से सम्पन्न महापुरुष ने बाह्य विज्ञान के जगत में भी अनेक खोजें की हैं। हमारे ऋषियों ने तो विज्ञान में इतनी प्रगति कर ली थी कि आधुनिक विज्ञान को वहाँ पहुँचने में हजारों वर्ष भी कम पड़ेंगे। ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष इस बात को भी जानते थे कि बाह्य विज्ञान व्यंजन-वानगियाँ बनाने की मशीनें दे सकता है पर भूख नहीं, स्प्रिंगयुक्त गद्देवाले बिस्तर दे सकता है नींद नहीं, युद्ध के लिए बम तो दे सकता है पर आंतरिक शान्ति नहीं। आंतरिक शांति तो अध्यात्म-विज्ञान से परितृप्त ʹज्ञानविज्ञानतृप्तात्माʹ ब्रह्मज्ञानी सदगुरु ही दे सकते हैं।
पूज्य बापू जी कहते हैं- "भागवत में आता है कि कर्दम ऋषि ने अपने योगबल से एक विमान बनाया था। वह सब सुविधाओं से सम्पन्न था, मन के संकल्प से चलता था। ईंधन, हवाईपट्टी की जरूरत नहीं थी और मौसम की अनुकूलता-प्रतिकूलता भी नहीं देखनी पड़ती थी। योग-सामर्थ्य के ऐसे कई पौराणिक-ऐतिहासिक प्रसंग हमने सुने हैं और इस जमाने में भी ऐसे योगियों के विषय में थोड़ा जानते भी हैं। मेरे गुरुदेव भगवत्पाद परम पूज्य साँईं लीलाशाहजी महाराज के जीवन में मैंने ऐसा बहुत कुछ योग का सामर्थ्य देखा है।
एक बार गुरुदेव पाटण से मेहसाणा की तरफ जाने वाली गाड़ी में बैठे थे। उनके साथ मैं, एक सेवक और एक डॉक्टर, शोभसिंह था। डॉक्टर ने ʹटॉइम्स ऑफ इंडियाʹ अखबार पढ़ा और कहाः "बाबा जी ! वैज्ञानिक चन्द्रलोक पर पहुँच गये हैं, वहाँ से मिट्टी भी लाये हैं। वे लोग उधर होटल बनायेंगे और धनाढ्य लोग वहाँ रह सकेंगे।"
गुरुदेव चालू ट्रेन में एक क्षण अपने-आप में शांत हुए, योगशक्ति का उपयोग किया और हँस पड़े। बोलेः "कुछ नहीं होगा, करोड़ों डॉलर खर्च करके थक जाएँगे, चुप होकर बैठ जायेंगे।" साधारण वेश में घूमनेवाले भारत के संत साँईं श्री लीलाशाह जी बापू जी ने जो बात एक मिनट में लोकल ट्रेन में यात्रा करते-करते जान ली, उसे जानने के लिए अमेरिका को करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़े और कई जानें गँवानी पड़ीं। आज 40-42 साल हो गये, अभी तक तो चाँद पर कोई होटल नहीं बना है।"
महापुरुषों की पहुँच बाह्य विज्ञान से बहुत आगे होती है। भूत-भविष्य उनके लिए कुछ नहीं है, सब वर्तमान है। वे तीनों से पार होते हैं। इस धरती पर आज तक अनेक राजा-महाराजा आये, अनेक रियासतें हुई। अनेक ज्योतिषी, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, धर्म-धुरंधर आये और अपने-अपने समय में एक सीमित क्षेत्र में अपने ढंग की पहुँच बनाकर चले गये। राजाओं का राज चला गया, रियासतें बदल गयीं। आधुनिक वैज्ञानिकों के बनाये नियमों में परिवर्तन हो गया। परंतु ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों का स्वरूपानुभव अबदल है।
आधुनिक विज्ञान के कई सिद्धान्त और सूत्र ऐसे हैं कि एक वैज्ञानिक ने वे बनाये तो दूसरे ने उनका खंडन किया। एक वैज्ञानिक कोई भी उपकरण बनाता है तो दूसरा उसमें परिवर्तन कर देता है। उनका कोई भी मत शायद ही ऐसा बना हो जो प्रतिपादन के बाद 100-200 वर्षों तक ज्यों का त्यों रहा हो। उसमें कुछ-न-कुछ परिवर्तन जरूर होता जाता है लेकिन ब्रह्मज्ञान का जो सत्संग है, आत्मा की अमरता का ज्ञान है, अध्यात्म-विज्ञान का जो सिद्धान्त है वह आदिकाल में भी वही था, अब भी वही है और आगे भी वही रहेगा। अणु-परमाणु का, प्रकाश का स्वरूप भले भौतिक विज्ञानी अलग-अलग बताते गये हों किंतु गीता का ज्ञान तो आज भी वही का वही है। जो अध्यात्म ज्ञान महर्षि वामदेव जी ने माँ पार्वती को दिया था, वही वसिष्ठजी ने भगवान श्रीकृष्ण को, शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को, स्वामी केशवानंद जी ने पूज्य साँईं लीलाशाह जी महाराज को दिया। पूज्य साँईं लीलाशाह जी महाराज से वही ज्ञान अपने पूज्य बापू जी को मिला और वही-का-वही ज्ञान बापूजी के द्वारा देश-विदेश में करोड़ों-करोड़ों लोगों में बँट रहा है। आगे भी यह ज्ञान ऐसे-का-ऐसा, इतने का इतना ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के द्वारा समाज को मिलता ही रहेगा। इसमें कोई कमी नहीं होती, कोई परिवर्तन नहीं होता, कोई अपवाद नहीं होता।
वास्तव में देखा जाय तो समाज को उसी को विशेष महत्त्व देना चाहिए जिसकी उसे परम आवश्यकता हो। प्रगति के नाम पर आपाधापी एवं चिंता तनाववाले जीवन की ओर मुड़े आज के मानव-समाज को इससे भी अधिक गति से अध्यात्म-ज्ञान की ओर मुड़ना चाहिए और वह शीघ्र ही मुड़ेगा ऐसा महापुरुषों का संकल्प है। अतः अब आगे का युग ʹअध्यात्म-विज्ञानʹ का, ʹआध्यात्मिक-क्रान्तिʹ का युग कहा जायेगा, जो समाज को वास्तविक शांति, वास्तविक आनंद से परिपूर्ण करके युगाधिपति के ज्ञान से परितृप्त कर देगा।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, जनवरी 2012, अंक 175, पृष्ठ संख्या 2,7
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  4/22/2013 11:26:31 AM
vishal 


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  4/20/2013 10:48:33 PM
Anonymous 


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mera aapki dua se sab kam ho raha hai. shukrane hain.
  4/10/2013 8:50:40 AM
Anonymous 


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  2/18/2013 6:01:10 PM
Govind Singh 


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Hey gurudev aap jaisha dusra nahi hai.
  2/18/2013 5:59:25 PM
Govind Singh 


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Hey gurudev aap jaisha dusra nahi hai.
  2/5/2013 6:57:53 PM
pramod 


hariom 
shri sadgurudev ke charno me mera sat sat naman.....hey guruwar apki lila aprampar hai..hariom
  1/14/2013 10:07:17 PM
balveer chouhan 


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yadi koi vayakti hame tantra mantra kriya karvakar pareshan karta he to hame kaya karna chhahi ye ans- plese
  1/8/2013 1:51:25 PM
tejsingh gurjar 


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sabka mangal,sabka bhla ho,sadguru chhna esi h. isiliye to aaye dhra pr sadguru Aasramji h.......HARI HARI OM
  12/31/2012 12:42:27 PM
Surekha Naik 


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bapuji ke charano me sadar naman meri guruvar ke charano prarthana hai,net se live satsang dekhne ko mile to badi kripa hogi mangalmay chanal hai per usape to abhi live satsang nahi dikha rahe live satsang dikhane ki kripa kare
HARI OM prabhuji
  11/25/2012 9:40:45 PM
ashish 


gurudev 
gurudev , we love u
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