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ऋतुराज ने टी.वी. देखकर घटना को अंजाम दियाः पुलिस

पुलिस का मानना है कि ऋतुराज की जब आश्रम के गुरुकुल से बाहर जाने की कोई जुगत न लड़ी तो उसके मन में आया कि अमदावाद के दो बच्चों की मृत्यु के बाद गुरुकुल बंद कर दिया गया था । यहाँ भी इस तरीके से गुरुकुल बंद करवाया जाये । यही सोचकर उसने 29 जुलाई 2008 को 4 वर्षीय रामकृष्ण को मार दिया । (10 अप्रैल को गुरुकुल में प्रवेश लिया और उसके मात्र 19 दिन बाद घटना को अंजाम दिया ।) प्रारम्भ में यह घटना इस प्रकार लग रही थी कि उसकी मृत्यु आकस्मिक हो । पुलिस सूत्रों के अनुसार ऋतुराज ने पुलिस को बताया कि जब गुरुकुल बंद नहीं हुआ तो उसने 31 जुलाई 2008 को दूसरे बच्चे वेदान्त की मौत को अंजाम दिया

यहाँ पर यह बात विशेष वर्णन योग्य है कि इस प्रकार की घटना पहली बार नहीं हुई – छः वर्ष पूर्व भी मध्यप्रदेश के शिवपुरी से 35 किं.मी. की दूरी पर स्थित आरोग गाँव की एक घटित घटना हैः- आजकल खुलेआम दिखायी जाने वाली टी.वी. फिल्मों से प्रेरणा पा कर 16 वर्षीय मनोज और 13 वर्षीय रामनिवास ने अपने मालिक के पुत्र शानु का अपहरण करके उसके पिता से धन की माँग की और शानु की हत्या कर दी । 17 जनवरी 2002 को शानु का मृत शरीर मिला । दोनों किशोरों ने पुलिस को आत्मसमर्पण किया और अपराध कबूल किया । उन्होंने यह स्वीकार किया कि यह प्रेरणा उन्हें फिल्म देख कर मिली थी

ऐसी ही एक और घटना 22 अप्रैल को आगरा से प्रकाशित समाचार पत्र दैनिक जागरण में दिनांक 21 अप्रैल 1999 को वाशिंगटन (अमेरिका) में घटी एक घटना प्रकाशित हुई थी । इस घटना के अनुसार किशोर उम्र के दो स्कूली विद्यार्थियों ने डेनवर (कॉलरेडो) में दोपहर को भोजन की आधी छुट्टी के समय में कोलंबाइन हाई स्कूल की पुस्तकालय में घुसकर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिससे कम-से-कम 25 विद्यार्थियों की मृत्यु हुई, 20 घायल हुए । विद्यार्थियों की हत्या के बाद गोलीबारी करने वाले किशोरों ने स्वयं को भी गोलियाँ मारकर अपने को भी मौत के घाट उतार दिया । हॉलीवुड की मारा-मारीवाली फिल्मी ढंग से हुए इस अभूतपूर्व कांड के पीछे भी चलचित्र ही (फिल्म) मूल प्रेरक तत्त्व है, यह बहुत ही शर्मनाक बात है । भारतवासियों को ऐसे सुधरे हुए राष्ट्र और आधुनिक कहलाये जाने वाले लोगों से सावधान रहना चाहिए

सिनेमा-टेलिविज़न का दुरूपयोग बच्चों के लिए अभिशाप रूप है । चोरी, दारू, भ्रष्टाचार, हिंसा, बलात्कार, निर्लज्जता जैसे कुसंस्कारों से बाल-मस्तिष्क को बचाना चाहिए । छोटे बच्चों की आँखों की ऱक्षा करनी जरूरी है । इसलिए टेलिविज़न, विविध चैनलों का उपयोग ज्ञानवर्धक कार्यक्रम, आध्यात्मिक उन्नति के लिए कार्यक्रम, पढ़ाई के लिए कार्यक्रम तथा प्राकृतिक सौन्दर्य दिखाने वाले कार्यक्रमों तक ही मर्यादित करना चाहिए

प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कीनो फेरियानी ने लिखा है कि निरंतर 20 वर्ष तक मैंने अपराध, मनोविज्ञान तथा बाल मनोविज्ञान का अध्ययन किया है और हजारों बार मुझे इस कष्ट भरे सत्य को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है कि 80 प्रतिशत बच्चों को अपराधी मनोवृत्तिवाला बनने से बचाया जा सकता था यदि उनके माँ बाप समय रहते उन्हे अच्छी शिक्षा, ज्ञान, ऊँची विचारधारा से परिचय करवाकर उन्हें वीरता, देशभक्ति, मानव-कल्याण का पाठ पढ़ाते । इस प्रकार उनके जीवन का समूचा रूप बदल सकता था

एक सर्वे के अनुसार तीन वर्ष का बच्चा जब टी.वी. देखना शुरू करता है और उस घर में केबल कनैक्शन पर 12-13 चैनल आती हों तो, हर रोज पाँच घंटे के हिसाब से बालक 20 वर्ष का हो तब तक इसकी आँखें 33000 हत्या और 72000 बार अश्लीलता और बलात्कार के दृश्य देख चुकी होंगी।

यहाँ एक बात गंभीरता से विचार करने की है कि मोहनदास करमचंद गाँधी नाम का एक छोटा सा बालक एक या दो बार हरिश्चन्द्र का नाटक देखकर सत्यवादी बन गया और वही बालक महात्मा गाँधी के नाम से आज भी पूजा जा रहा है। हरिश्चन्द्र का नाटक जब दिमाग पर इतनी असर करता है कि उस व्यक्ति को जिंदगी भर सत्य और अहिंसा का पालन करने वाला बना दिया, तो जो बालक 33 हजार बार हत्या और 72 हजार बार बलात्कार का दृश्य देखेगा तो वह क्या बनेगा? आप भले झूठी आशा रखो कि आपका बच्चा इन्जीनियर बनेगा, वैज्ञानिक बनेगा, योग्य सज्जन बनेगा, महापुरूष बनेगा परन्तु इतनी बार बलात्कार और इतनी हत्याएँ देखने वाला क्या खाक बनेगा? आप ही दुबारा विचारें

याद रखें, बच्चे देश की संपत्ति हैं। उन्हें ऐसा वातावरण उपलब्ध करायें जिससे वे भविष्य में आपके लिए व देश के लिए उपयोगी सिद्ध हो। कहीं ऐसा न हो कि आपके बच्चे आपके लिए व समाज के लिए मुसीबत बन जायें। माता-पिता, सरकार व देश के कर्णधारों का यह नैतिक दायित्व है कि वे युवा पीढ़ी को कुप्रवतियों से बचाने के लिए उचित कदम उठायें। गलत बातें सोचकर तथा सिनेमा के कुप्रभाव का शिकार होकर युवा पीढ़ी जीते-जी नरक का दुःख भोगने पर विवश हो रही है, क्या यह ठीक है?

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