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भारतीय संस्कृति की सुंदर व्यवस्थाः तिलक-धारण

उँगलियों के प्रयोग का विधान
अनामिका शांतिदा प्रोक्ता मध्यमायुष्करी भवेत्।
अंगुष्ठः पुष्टिदः प्रोक्ता तर्जनी मोक्षदायिनी।।
ʹअनामिका से तिलक करने से सुख-शांति, मध्यमा से आयु, अँगूठे से स्वास्थ्य और तर्जनी से मोक्ष की प्राप्ति होती है।ʹ (स्कन्द पुराण)
तर्जनी से लाल या श्वेत चंदन का, मध्यमा से सिंदूर का तथा अनामिका से केसर, कस्तूरी, गोरोचन का टीका लगाना चाहिए। इनके लिए क्रमशः पूर्व दिशा, उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा निर्धारित हैं। इस ओर मुँह करके ही इनका तिलक धारण करना चाहिए। अँगूठे से भी चंदन-तिलक करने की परम्परा है।
इस प्रकार तिलक की परम्परा के पीछे कितना सूक्ष्म विज्ञान है ! इसको समझकर भारतीय संस्कृति की इस अनमोल देन का भरपूर लाभ उठायें।

देर से नाल काटना लाभदायी

स्वीडिश शोधकर्ता ओला एंडरसन, लीना हेलस्टोर्म, डैन एंडरसन और मैग्नस डोमेनॉफ ने अपने शोध के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है कि ʹजन्म के समय के तीन मिनट या उससे थोड़े अधिक समय के बाद नवजात शिशु की नाल काटना शिशु के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। ऐसा करने से नवजात शिशु में आयरन (लौह तत्त्व) की कमी होने की सम्भावना काफी कम हो जाती है।ʹ
जिनकी नाल तुरंत काटी जाती है, उन शिशुओं को लौह तत्त्व की कमी के कारण जो रक्ताल्पता का रोग होता है और उससे उनके विकास में रुकावट आती है, ये समस्याएँ 3 मिनट के बाद नाल काटने पर नहीं होतीं क्योंकि करीब 50-100 मि.ली. जितना रक्त 3 मिनट में नाल के द्वारा शिशु को मिलता है, जो उसे 1 वर्ष तक विकास में उपयोगी सिद्ध होता है। इस अध्ययन के पूर्व ऐसा मानते थे कि तुरंत नाल न कटवाने से संतान को पीलिया तथा फेफड़े व हृदय के विकार हो सकते हैं। यह मान्यता भी गलत सिद्ध हुई।

संगीत का प्रभाव

पूज्य बापूजी कहते हैं- ʹʹमैं डॉ. डायमंड को शाबाशी दूँगा कि उसने सच्चाई लिखने की हिम्मत की है। उसने 13 वर्ष रिसर्च की कि रॉक और पॉप म्यूजिक से जीवनी शक्ति का ह्रास होता है तथा सेक्सुअल केन्द्र, काम केन्द्र उत्तेजित होते हैं। इससे युवक-युवतियाँ अपने को बरबादी की ओर ले जाते हैं लेकिन भारतीय पद्धति से कीर्तन करने से जीवनी शक्ति का विकास होता है।ʹʹ
भारतीय शास्त्रीय संगीत में रोगनिवारक क्षमता तो है पर यह तो उसका गौण लाभ है। मुख्य लाभ तो यह है कि संगीत हृदय को सर्वशक्तिमान परमात्मा से जोड़ने का एक सुन्दर माध्यम है।

स्वास्थ्यवर्धक खजूर

नशा-निवारकः शराबी प्रायः नशे की झोंक में इतनी शराब पी जाता है कि उसका यकृत नष्ट होकर मृत्यु का कारण बन सकता है। इस स्थिति में ताजे पानी में खजूर को अच्छी तरह मसलते हुए शरबत बनायें। यह शरबत पीने से शराब कै विषैला प्रभाव नष्ट होने लगता है।
आँतों की पुष्टिः खजूर आँतों के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है, साथ ही खजूर के विशिष्ट तत्त्व ऐसे जीवाणुओं को जन्म देते हैं जो आँतों को विशेष शक्तिशाली तथा अधिक सक्रिय बनाते हैं।
हृदयरोगों में- लगभग 50 ग्राम गुठलीरहित छुहारे (खारक) 250 मि.ली. पानी में रात को भिगो दें। सुबह छुहारों को पीसकर पेस्ट बना के उसी बचे हुए पानी में घोल लें। इसे प्रातः खाली पेट पी जाने से कुछ ही माह में हृदय को पर्याप्त सबलता मिलती है। इसमें 1 ग्राम इलायची चूर्ण मिलाना विशेष लाभदायी है।
तन-मन की पुष्टिः बच्चों को दूध में खजूर उबाल के देने से उन्हें शारीरि-मानसिक पोषण मिलता है व शरीर सुदृढ़ बनता है।
 

ʹवेलेन्टाईन डेʹ पर रूस की रोक

निर्धन ईसाई मुक्ति आन्दोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष आर.एल. फ्रांसिस कहते हैं- "वेलेन्टाईन डे जैसी संस्कृति-घातक परम्पराओं से सावधान रहकर राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए। पश्चिमी सभ्यता का मुकाबला करने के लिए हमें मैकाले से बड़ी लकीर खींचनी होगी।"
ʹद इंडियन न्यूज पोर्टलʹ के अनुसार रशिया का यह कदम उसके द्वारा शुरू की गयी ʹआध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान करने के उपायʹ इस पहल का एक अंग है। रक्षात्मक विचारधारावाले रशियनों के अनुसार वेलेन्टाईन डे एक समाज-विघातक विदेशी प्रथा है।
हिन्दू जनजागरण समिति के प्रवक्ता रमेश शिंदे कहते हैं- "वेलेन्टाईन डे के कारण आज समाज में जो अनैतिक चीजें शुरू हो गयी हैं उसकी जगह ʹमातृ-पितृ पूजन दिवसʹ मनाने की जो प्रेरणा पूज्य संत श्री आशारामजी बापू ने दी है, जो काम किया है वह एक बहुत अच्छा काम है।

विश्व-संस्कृति का उदगम् स्थान भारतवर्ष

जावा के लोगों का विश्वास है कि भारत के पाराशर तथा वेदव्यास ऋषियों ने वहाँ विकसित सभ्य बस्तियाँ बसायी थीं। सुमात्रा द्वीप में हिन्दू राज्य की स्थापना चौथी शताब्दी में हुई थी। यहाँ पाली एवं संस्कृत भाषा पढ़ायी जाती थी।
बोर्निया में हिन्दू राज्य की स्थापना पहली सदी में हो गयी थी। यहाँ भगवान शिव, गणेशजी, ब्रह्माजी तथा अगस्त आदि ऋषियो व देवी-देवताओं की मूर्तियाँ प्राप्त हुई। कितने ही पुरातन हिन्दू मंदिर आज भी यहाँ मौजूद हैं।
इतिहासकारों के अनुसार थाइलैंड का पुराना नाम ʹश्याम देशʹ था। यहाँ की सभ्यता भारत की संस्कृति से मेल खाती है। दशहरा, अष्टमी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि पर्वों पर भारत की तरह यहाँ भी उत्सव मनाये जाते हैं। थाई रामायण का नाम ʹरामकियेनʹ है, जिसका अर्थ है ʹरामकीर्तिʹ।

यह कौन सा युग है ? ʹअध्यात्म-विज्ञानʹ का युग... ʹआध्यात्मिक क्रान्तिʹ का युग

आधुनिक विज्ञान के कई सिद्धान्त और सूत्र ऐसे हैं कि एक वैज्ञानिक ने वे बनाये तो दूसरे ने उनका खंडन किया। एक वैज्ञानिक कोई भी उपकरण बनाता है तो दूसरा उसमें परिवर्तन कर देता है। उनका कोई भी मत शायद ही ऐसा बना हो जो प्रतिपादन के बाद 100-200 वर्षों तक ज्यों का त्यों रहा हो। उसमें कुछ-न-कुछ परिवर्तन जरूर होता जाता है लेकिन ब्रह्मज्ञान का जो सत्संग है, आत्मा की अमरता का ज्ञान है, अध्यात्म-विज्ञान का जो सिद्धान्त है वह आदिकाल में भी वही था, अब भी वही है और आगे भी वही रहेगा। अणु-परमाणु का, प्रकाश का स्वरूप भले भौतिक विज्ञानी अलग-अलग बताते गये हों किंतु गीता का ज्ञान तो आज भी वही का वही है। जो अध्यात्म ज्ञान महर्षि वामदेव जी ने माँ पार्वती को दिया था, वही वसिष्ठजी ने भगवान श्रीकृष्ण को, शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को, स्वामी केशवानंद जी ने पूज्य साँईं लीलाशाह जी महाराज को दिया। पूज्य साँईं लीलाशाह जी महाराज से वही ज्ञान अपने पूज्य बापू जी को मिला और वही-का-वही ज्ञान बापूजी के द्वारा देश-विदेश में करोड़ों-करोड़ों लोगों में बँट रहा है। आगे भी यह ज्ञान ऐसे-का-ऐसा, इतने का इतना ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के द्वारा समाज को मिलता ही रहेगा। इसमें कोई कमी नहीं होती, कोई परिवर्तन नहीं होता, कोई अपवाद नहीं होता।

  
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