सत्संग सरिता
Created by salvation67 on 12/29/2012 2:15:20 AM

शास्त्र में भगवान कहते हैं-
"जो मेरे नाम का गान करता हुआ नाचता है और मुझे अपने समीप मानता है, जो सुख में, दुःख में, सबमें मेरा हाथ देखता है, मित्रों के स्नेह भरे व्यवहार में मुझ परम मित्र को ही देखता है, शत्रुओं की कटुता में भी मेरे संयम भरे संदेश को ही देखता है... तुमसे सत्य कहता हूँ अर्जुन ! मैं उसके द्वारा खरीद लिया गया हूँ। मैं उसका हो गया हूँ। वह मुझसे दूर नहीं रह सकता है और मैं उससे दूर नहीं रह सकता हूँ।"


सत्संग सरिता
पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू
शास्त्र में भगवान कहते हैं-
"जो मेरे नाम का गान करता हुआ नाचता है और मुझे अपने समीप मानता है, जो सुख में, दुःख में, सबमें मेरा हाथ देखता है, मित्रों के स्नेह भरे व्यवहार में मुझ परम मित्र को ही देखता है, शत्रुओं की कटुता में भी मेरे संयम भरे संदेश को ही देखता है... तुमसे सत्य कहता हूँ अर्जुन ! मैं उसके द्वारा खरीद लिया गया हूँ। मैं उसका हो गया हूँ। वह मुझसे दूर नहीं रह सकता है और मैं उससे दूर नहीं रह सकता हूँ।"
हमारे जीवन में केवल समझ आ जाये। धन आ गया तो क्या हो गया ? सत्ता आ गयी तो क्या हो गया ? सौंदर्य आ गया तो क्या हो गया ? दोस्त मिल गये तो क्या हो गया ? ये तो सब छूटने वाली चीजें हैं। यदि सत्संग के द्वारा सत्य की समझ आ जाये तो वह समझ अमर आत्मा से मिला देगी।
श्रीमद् भागवत की कथा और सत्संग से मनुष्य का काम, क्रोध, भय, रोग, शोक, स्वार्थ, निंदा, घृणा, ग्लानि ये दोष सहज में क्षीण होते रहते हैं। श्रीमद् भागवत की कथा से मनुष्य में दया, क्षमा, उदारता, सज्जनता, शूरवीरता, सहानुभूति और प्राणीमात्र के हित की भावना से प्रेरित होकर सत्कर्म करने में मनुष्य की रूचि हो जाती है। लम्बे-चौड़े कायदे-कानून तो कोर्ट कचहरी या संसद में रखे रह जाते हैं लेकिन बढ़िया कार्य तो उन्हीं के द्वारा होता है, जिनके जीवन में सत्संग है, जिनके जीवन में सदाचार है, जिनके जीवन में गीता और भागवत जैसे ग्रंथों का ज्ञान है। फिर वे चाहे राजसत्ता में हैं चाहे नौकरी या बिजनेस के क्षेत्र में हैं लेकिन उनके द्वारा अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा समाज के हित के कार्य ज्यादा होते हैं।
स्वामी विवेकानंद कहते थेः "अभी भी अस्पतालों में, कोर्ट कचहरियों में या समाज में जहाँ कहीं भी सच्चाई और सज्जनता दिखती है, उसके पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष सत्संग का ही हाथ होता है। सदाचारी महापुरुषों के संग का ही प्रभाव है जिससे वे लोग अच्छाई से जी रहे हैं। हो सकता है कि भगवान का भक्त या सत्संगी व्यक्ति पचास गलतियाँ करते दिखे लेकिन वह अगर सत्संगी नहीं होता तो पचास की जगह पाँच सौ गलतियाँ करता।"
सत्संग सुनने से गलतियाँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं, आसक्तियाँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। कितना भी ज्ञान हो, कितनी भी अक्ल हो, कितनी भी होशियारी हो लेकिन विषय भोग की आसक्ति अक्लवाले को भी मूढ़ और बुद्धु बना देती है। ऐसा नहीं है कि वायसरॉय में अक्ल नहीं होती है। अरे ! उसके एक हस्ताक्षर मात्र से हजारों लोगों की हत्या हो सकती है। इतना अधिकार और इतनी अक्ल उसको होती है। उसकी एक आज्ञा मात्र से हजारों सैनिकों में खडभड़ाहट हो जाती है, लेकिन रात को वह वायसराये लेडी के आगे गिगिड़....गिगिड़... करके उसके इशारों पर नाचने लग जाता है। विषयासक्ति मनुष्य को अंधा बना देती है और भगवान की आसक्ति मनुष्य को महापुरुष बना देती है।
श्रीमद् भागवत में आता है कि कपिल भगवान ने माता देवहूति से कहाः "आसक्ति को सर्वथा त्यागना चाहिए। वैसे तो आसक्ति है ही दुःखदायी, चाहे वह धन की हो, चाहे सत्ता की हो, चाहे किसी भी वस्तु को हो, लेकिन वही आसक्ति भगवान और भगवान के प्यारे संतों, महापुरुषों के प्रति है तो वह आसक्ति तारने वाली हो जाती है, कल्याण करने वाली हो जाती है। प्रभु के सेवक का स्वभाव ही होता है कि किसी भी प्राणी, पदार्थ या परिस्थिति के प्रति उसकी आसक्ति नहीं होती कि ʹऐसी ही परिस्थिति सदा बनी रहे।ʹ वह यदि किसी व्यक्ति से मिलता है या किसी वस्तु, प्राणी अथवा पदार्थ को पाता है तब भी उस पर अंदर से अपना अधिकार नहीं मानता है। वह समझता है कि यह जो कुछ मिला है वह छोड़ने के लिए ही मिला है। चाहे कितना भी पकड़कर रखो, छोड़ना ही पड़ता है। जैसे, सिर पर पगड़ी पहनी है तो कुछ समय के बाद उतारनी ही पड़ती है, जूते पहने हैं तो उन्हें भी उतारने पड़ते हैं। कितना भी धन पाया, पर अंत में छोड़ना ही पड़ता है। मित्र मिलता है तो वियोग भी होता ही है। जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो सदा तुम्हारे साथ रहे। ऐसी कोई व्यक्ति नहीं जो सदा तुम्हारे साथ रहे। ऐसी कोई परिस्थिति नहीं जो सदा एक-सी बनी रहे। जो वस्तु, परिस्थिति सदा साथ नहीं रहती उसी को पकड़कर रखने की बेवकूफी कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्यमात्र दुःखी है, चिंतित और भयभीत है।
ठंडी आयी तो उसका मजा लो और गर्मी आयी तो उसका भी मजा ले लो। गर्मी में गर्मी के अनुकूल वस्त्र पहनना ठीक है, सर्दी में जरा गरम वस्त्र पहनना ठीक है, लेकिन सर्दी आयी तब भी रोये कि ʹहाय... हाय... बहुत ठंड है...ʹ गर्मी आयी तब भी रोये कि ʹहाय.... हाय.... बहुत गर्मी पड़ रही है।ʹ अरे ! गर्मी नहीं पड़ेगी तो बारिश ठीक से नहीं होगी। बारिश आयी तो रो रहे हैं कि ʹहाय.... हाय.... कीचड़ हो गया।ʹ जिसको ठंडी सहने का अभ्यास नहीं है वह गर्मी भी नहीं सह सकता। जो सर्दी और गर्मी के अनुकूल नहीं हो सकता है वह बारिश में भी दुःखी ही रहेगा। अरे ! शरीर मिला है तो सब परिस्थितियों को पचाते जाओ। शरीर को मजबूत बनाओ।
शास्त्र कहते हैं-देवव्रत भीष्म जब ननिहाल में रहते थे तब एक बार वे पहाड़ से गिरे, तो जिस चट्टान पर गिरे वह चट्टान टूट गयी किन्तु देवव्रत भीष्म को कुछ नहीं हुआ। ऐसा मजबूत शरीर था। आज कल तो बच्चे चलते-चलते फिसल जायें तो फ्रेक्चर हो जाता है।
हमारे यहाँ वैदिक परम्परा है कि बच्चा जब जन्म ले तब उसकी जिह्वा पर ʹૐʹ लिखा जाये जिससे बच्चा बड़ा होकर तेजस्वी बने। साथ ही उसके कान में कुछ कहा जाता है किः ʹहे पुत्र ! तेरा शरीर पत्थर की नाईं मजबूत रहे। तू कुल्हाड़े की तरह विघ्न-बाधाओं को काटने वाला हो, तू सूर्य की तरह, अग्नि की तरह तेजस्वी हो और सब कर्मबन्धनों को जलाकर भस्म करने वाला हो। हरि ૐ....ૐ.....ૐ......
अश्मा भव। परशुर्भव। हिरण्यमंस्तूतं भव।
हे पुत्र ! तू पत्थर बन। तू कुल्हाड़ा बन और स्वर्ण की भाँति इस संसार में चमकता रहे।
शरीर को मजबूत बनाने के साथ-साथ शरीर स्वस्थ रहे ऐसे नियमों को जान लेना चाहिए। इसी प्रकार यदि मन बड़ा चंचल, अशांत और दुःखी रहता है तो मन को शांत करने का उपाय भी जान लेना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण मन को शांत रखने का उपाय बताते हुए गीता में कहते हैं-
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।
ʹयह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में निरुद्ध करो।ʹ गीताः 6.26
ध्यान भजन के समय यह मन जहाँ कहीं भी जाये, वहाँ-वहाँ से हटाकर इसके एक ही स्थान पर लगाओ। जिसने मन को जीत लिया, उसने सारे जग को जीत लिया। जिसका मन एकाग्र है उसका शत्रु क्या बिगाड़ सकता है ?  उसके आगे स्वर्ग का सुख क्या होता है ? पृथ्वी भर के राज्य का सुख क्या होता है ? जितने अंश में तुम्हारे मन की एकाग्रता होगी उतने अंश में तुम संसार में, स्वर्ग में, अतल में, वितल में, तलातल में, रसातल में और पाताल में सफल हो जाओगे।
तुम तो सफल हो जाओगे, साथ ही तुम्हारे सम्पर्क में आऩे वाले लोगों को भी शांति और आनंद की प्राप्ति होने लगेगी। तुम इतने महान बन जाओगे।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1997, पृष्ठ संख्या 14,15,28 अंक 54
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he sacchidanandaswarupa sadgurudeva koti koti pranam.hari om......
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By sangita on 1/25/2013 3:19:41 PM Like:-1 DisLike:-1
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Satsang sarita ka gyan apar hein,isme gota lagana hum sadhakon,!! ko bahut unche pad ki aur le jaa sakti hein!!!!!hari om
gyan sagar
By kshama on 1/22/2013 12:34:09 AM Like:-1 DisLike:-1
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HRIOM, YDI HR MATA PITA APNI SNTAN KO AISA GHAYAN DE. UNHE SNTO OR RISHI SNSKARO SE PRICHIT KRVAYE,JIVN KO KISE JINA H.YE GHYAN UNHE SCHOOL ME NI MIL SKTA,BRAMH GHYAN, KRMYOG,GHYANYOG, BHATI YOG KA JIVN ME SMAVESH HO, HR SCHOOL ME YE JRURI HO, TO BHARAT KI HR SCHOOL ME VIVEKANAND, GARGI JAISE MHAMANAV HONGE...OR JIVN K MULYO KA AADAR HOGA, SAMAJ ME KAM, BHOG, DHAN KI JO LIPSA H SARE APRADHO KA MUL H. USE KEVAL SNTO KA GHYAN HI DUR KR SKTA HAI.JIS SMAAJ ME SNTO OR UNKE GHAN KA AADAR NHI VHA MANAV NHI DANAV HI UTPAN HOTE H.
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By KIRTI CHOWDHARY on 1/7/2013 9:08:22 PM Like:-1 DisLike:-1
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HRIOM, YDI HR MATA PITA APNI SNTAN KO AISA GHAYAN DE. UNHE SNTO OR RISHI SNSKARO SE PRICHIT KRVAYE,JIVN KO KISE JINA H.YE GHYAN UNHE SCHOOL ME NI MIL SKTA,BRAMH GHYAN, KRMYOG,GHYANYOG, BHATI YOG KA JIVN ME SMAVESH HO, HR SCHOOL ME YE JRURI HO, TO BHARAT KI HR SCHOOL ME VIVEKANAND, GARGI JAISE MHAMANAV HONGE...OR JIVN K MULYO KA AADAR HOGA, SAMAJ ME KAM, BHOG, DHAN KI JO LIPSA H SARE APRADHO KA MUL H. USE KEVAL SNTO KA GHYAN HI DUR KR SKTA HAI.
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By KIRTI CHIWDHARY on 1/7/2013 8:50:57 PM Like:-1 DisLike:-1