Sharad Rituchrya
Created by sukeshini.ashram on 8/28/2011 3:12:59 PM

 शरद ऋतु स्वच्छता के बारे में सावधान रहने की ऋतु है अर्थात इस मौसम में स्वच्छता रखने की खास जरूरत है | रोगाणाम् शारदी माता : | अर्थात् शरद ऋतु रोगों की माता है |


शरद ऋतु

शरद ऋतु स्वच्छता के बारे में सावधान रहने की ऋतु है अर्थात इस मौसम में स्वच्छता रखने की खास जरूरत है | रोगाणाम् शारदी माता : | अर्थात् शरद ऋतु रोगों की माता है |

भाद्रपद एवं अश्विन ये शरद ऋतु के दो महीने हैं | शरद ऋतु में स्वाभाविक रूप से ही पित्तप्रकोप होता है | इससे इन दिनों में ऐसा ही आहार एवं औषधि लेनी चाहिए जो पित्त का शमन करे | युवानी में एवं मध्याहन् के समय पित्त बढ़ता है | तीखे , नमकीन , खट्टे , गरम , एवं दाह उत्पन्न करने वाले द्रव्यों के सेवन से , मधपान से , क्रोध अथवा भय से , धूप में घूमने से , रात्रि जागरण एवं अधिक उपवास से भी पित्त बढ़ता है | दही , खट्टी छाछ , इमली , टमाटर , नीबू , कच्चे आम , मिर्ची , लहसुन , राई , खमीर लाकर बनाये गये व्यंजन एवं उड़द जैसी चीजें भी पित्त की वृद्धि करती हैं |  

*   सावधानियाँ     *

  • श्राद्ध के दिनों में १३ दिन तक दूध , चावल , खीर का सेवन पित्तशामक है | परवल , मूँग , पका पीला पेठा (कद्दू) आदि का भी सेवन कर सकते हैं |

  • दूध के विरुद्ध पड़नेवाले आहार जैसे कि सभी प्रकार की खटाई , लहसुन , अदरक , नमक , मांसाहार आदि का त्याग करें | दही , छाछ , भिंडी , ककड़ी आदि अम्लविपाकी ( पचने पर खटास उत्पन्न करनेवाली ) चीजों का सेवन न् करें |

  • कड़वा रस पितशामक एवं ज्वर – प्रतिरोधी है | अत : कटुकी , चिरायता , नीम की अंतरछाल , गुडुच , करेले , सुदर्शन , इंद्रजौ आदि का सेवन हितावह है |

  • धूप में न घूमें | श्राद्ध के दिनों में एवं नवरात्रि में पितृपूजन हेतु सयंमी रहना चाहिए | कड़क ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए | ‘ यौवन सुरक्षा ‘ पुस्तक पाठ करने से ब्रह्मचर्य में मदद मिलेगी |

  • इन दिनों में रात्रिजागरण , रात्रिभ्रमण अच्छा होता है इसलिए नवरात्रि वगैरह का आयोजन किया जाता है | रात्रिजागरण १२ बजे तक ही माना जाता है | अधिक जागरण से , सुबह एवं दोपहर को सोने से त्रिदोष प्रकुपित होते है जिससे स्वास्थ्य बिगड़ता है |

  • हमारे दूरदर्शी ऋषि – मुनियों ने शरद पूनम जैसा त्यौहार भी इस ऋतु में विशेषकर स्वास्थ्य की द्रष्टि से ही आयोजित किया है | शरद पूनम के दिन रात्रिजागरण , रात्रिभ्रमण , मनोरंजन आदि को उतम पित्तनाशक विहार के रूप में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है |

  • शरद पूनम की शीतल रात्रि में चंद्रमा की किरणों में छत पर रखी हुई दूध – पोहे अथवा दूध – चावल की खीर सर्वप्रिय , पितशामक , शीतल एवं सात्विक आहर है | इस रात्रि को ध्यान , भजन , सत्संग , कीर्तन , चन्द्रदर्शन आदि शारीरिक व मानसिक आरोग्यता के लिये अत्यंत लाभदायक है |

 

 

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By frqocgz on 4/23/2012 2:14:02 AM Like:-1 DisLike:-1
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By aanbnri on 4/21/2012 9:05:40 PM Like:-1 DisLike:-1
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Way to go on this essay, hleped a ton.
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By Virginia on 4/21/2012 10:23:15 AM Like:-1 DisLike:-1