Sant Shri Asharamji Ashram
Official Website
|
|
40+ Years, Over 425 Ashrams, more than 1400 Samitis and 17000+ Balsanskars, 50+ Gurukuls. Millions of Sadhaks and Followers.
|
|
|
| शरीर स्वास्थ्य
|
| शरीर स्वास्थ्य |
शरीर स्वास्थ्य
पालक
हरे पत्तों की तरकारियों में पालक के पत्तों की तरकारी अधिक पथ्य और उपयोगी है। पालक के पत्तों में पर्याप्त औषधीय गुण विद्यमान हैं। पालक में लौह और तांबे के अंश होने के कारण यह पांडुरोग के लिए पथ्य है। यह रक्त को शुद्ध व हड्डियों को मजबूत बनाती है।
पाचन तंत्र के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। इसके नियमित सेवन से उदर-विकारों व कब्ज से मुक्ति मिलती है व भूख भी खुलकर लगती है। इसके नियमित सेवन से गर्भवती महिला को प्रसव के समय अधिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।
यह वायु करने वाली, शीतल व मधुमेह के रोग में भी अत्यन्त गुणकारी है। इसके बीज यकृतरोग, पीलिया व पित्तप्रकोप को मिटाते हैं। कफ और श्वास संबंधी रोगों में भी ये हितकारी हैं।
खांसी और गले की जलन तथा फेफड़ों की सूजन में पालक के रस के गराटे करने से लाभ होता है। बाल अधिक झड़ने तथा बालों में रूसी की शिकायत होने पर पालक के उबले रस में नींबू का रस समानमात्रा में मिलाकर सिर धोने से इस समस्या का छुटकारा मिलेगा। दाँतों में पायोरिया की बीमारी होने पर कुछ रोज प्रातःकाल आधा गिलास पालक का रस खाली पेट लें। इसके अलावा कच्चा पालक चबा-चबाकर खायें। पालक के रस में गाजर का रस मिलाकर पीने से मसूड़ों से खून आना बंद हो जाता है। पालक के पत्ते नीम की पत्तियों के साथ पीसकर बनाया हुआ लेप मवाद भरे फोड़ों पर लगाने से खराब रक्त बाहर निकल जाएगा और फोड़ा ठीक हो जायेगा।
जले हुए अंग पर पालक के पीसे हुए पत्तों का तत्काल लेप करने से जलन शांत होगी व फफोले नहीं पड़ेंगे। किसी दवा का प्रतिकूल असर (साइड इफेक्ट) होने या कोई विषैली वस्तु खा लेने पर पानी में पालक उबालकर उस पानी में अदरक का थोड़ा सा रस मिलाकर प्रभावित व्यक्ति को देने से तत्काल राहत मिलती है। रक्ताल्पता की बीमारी में पालक की सब्जी का नियमित सेवन व आधा गिलास पालक के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर 50 दिन पियें। इससे काफी फायदा होगा।
पालक के नियमित सेवन से समस्त विकार दूर होकर चेहरे पर लालिमा, शरीर में स्फूर्ति, उत्साह, शक्ति-संचार व रक्त-भ्रमण तेजी से होता है। इसके निरन्तर सेवन से चेहरे के रंग में निखार आ जाता है। नेत्रज्योति बढ़ती है।
पालक पीलिया, उन्माद, हिस्टीरिया, प्यास, जलन, पित्तज्वर में भी लाभ करता है।
विशेषः पालक की सब्जी वायु करती है अतः वर्षाकाल में इसका सेवन न करें। इसके पत्तों में सूक्ष्म जन्तु भी होते हैं अतः गर्म पानी से धोने के बाद ही इसका उपयोग करें।
अच्छी सेहत के लिए हल्का गर्म पानी
हल्का गुनगुना पानी पीने से शरीर पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ता है, इससे खून का दौरा भी बढ़ता है और रोग प्रतिरोधी शक्ति बढ़ती है जिससे शरीर से विषैले पदार्थ मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।
तरीकाः पानी को हल्का गर्म करके थर्मस में भर लें। उसमें से थोड़ा-थोड़ा सारा दिन पीते रहें।
बड़ (बरगद)
बवासीर, वीर्य का पतलापन, शीघ्रपतन, प्रमेह, स्वप्नदोष आदि रोगों में बड़ का दूध अत्यन्त लाभकारी है। प्रातः सूर्योदय के पूर्व वायु सेवन के लिए जाते समय 2-3 बताशे साथ ले जायें।
बड़ की कली को तोड़कर एक-एक बताशे में बड़ के दूध की 4-5 बूँद टपकाकर खा जायें। धीरे-धीरे बड़ के दूध की मात्रा बढ़ाते जायें। 8-10 दिन के बाद मात्रा कम करते-करते अपनी शुरूवाली मात्रा पर आ जायें। कम-से-कम चालीस दिन यह प्रयोग करें।
बड़ का दूध दिल, दिमाग व जिगर को शक्ति प्रदान करता है एवं मूत्र रूकावट (मूत्रकृच्छ) में भी आराम होता है। इसके सेवन से रक्तप्रदर व खूनी बवासीर का रक्तस्राव बन्द होता है। पैरों की एड़ियों में बड़ का दूध लगाने से वे नहीं फटतीं। चोट, मोच और गठिया रोग में इसकी सूजन पर इस दूध का लेप करने से बहुत आराम होता है।
मुफ्त में उपलब्ध यह दूध अच्छे-से-अच्छे बलवीर्यवर्धक नुस्खे की बराबरी कर सकता है। वीर्य-विकार व कमजोरी के शिकार रोगियों को धैर्य के साथ लगातार ऊपर बताई विधि के अनुसार इसका सेवन करना चाहिए।
बड़ की छाल का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन एक कप मात्रा में पीने से मधुमेह (डायबिटीज) में फायदा होता है व शरीर में बल बढ़ता है।
उसके कोमल पत्तों को छाया में सुखाकर कूट-पीस लें। आधा लिटर पानी में एक चम्मच चूर्ण डालकर काढ़ा करें। जब चौथाई पानी शेष बचे तब उतारकर छान लें और पिसी मिश्री मिलाकर कुनकुना करके पियें। यह प्रयोग दिमागी शक्ति बढ़ाता है व नजला जुकाम ठीक करता है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1997, पृष्ठ संख्या 29,19 अंक 54
ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ
|
|

|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|