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संसार-स्वप्न से जागो
संसार-स्वप्न से जागो

संसार-स्वप्न से जागो
पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू
चित्त की समता प्रसाद की जननी है। हजारों वर्ष नंगे पैर घूमने की तपस्या, सैंकड़ों वर्ष के व्रत उपवास चित्त की दो क्षण की समता की बराबरी नहीं कर सकते। चित्त को सम करना यह आपके हाथ की बात है और यह समत्वयोग समस्त योगों में शिरोरमणि है।
समत्वं योग उच्यते।
दुःख के समय आप सम रह जायें तो आप दुःख का उपयोग करके दुःखहारी श्रीहरि से मिलने में दो कदम आगे बढ़ जायेंगे। सुख के समय सम रहकर सुख का उपयोग करें तो सुखस्वरूप चैतन्य में विश्रान्ति पाने में भी आप सफल हो जायेंगे। सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जीवन-मरण ये सब मायामात्र द्वैत में हैं। समर्थ रामदास ने ʹदासबोधʹ में कहा हैः
"एक अजात पुरुष को (जो अभी जन्मा ही नहीं है उसको) स्वप्न आया कि ʹमेरे पिता मुझ पर प्रसन्न हैं और उन्होंने मेरा राजतिलक किया। मैं राज्य भोगते-भोगते मौत के कगार पर जा खड़ा हुआ और सावधान होकर सत्कर्म में लग गया एवं सत्पुरुषों के पास गया। उन सत्पुरुषों ने मेरे बंधन काट दिये और अब मैं मुक्त हो गया हूँ....।ʹ
बहुत बड़ी बात कह दी है उन महापुरुष ने कि अजात पुरुष-जो अभी जन्मा ही नहीं, उसका राजतिलक भी हो गया, उसने भोग भी भोग लिये और मुक्ति भी हो गयी... ऐसा उसने स्वप्न देखा ऐसे ही आप-हम भी स्वप्न देख रहे हैं।
वास्तव में हमारा-आपका असली रूप में जन्म ही नहीं हुआ है। स्वप्न देख रहे हैं कि ʹमेरा जन्म हुआ... मैं जूटमिलवाला.... मैं आश्रमवाला.... मैं पैसे वाला.... मैं महलवाला....ʹ हकीकत में यह स्वप्न ही देखा जा रहा है। इसी स्वप्न से जागने का संकेत करते हुए तुलसीदास कहते हैं-
मोहनिशा सब सोवनहारा।
देखहिं स्वप्न अनेक प्रकारा।।
वास्तव में जो हम हैं उसका पता नहीं और जो हम नहीं हैं मानकर और स्वप्न जैसी वस्तुओं को ʹमेरीʹ मानकर हम स्वप्न देख रहे हैं।
एक बार संत कबीर ने अपने प्यारे शिष्यों के लिए एक लीला रची। प्रभातकाल में सब शिष्य गुरु के दर्शन करने के लिए आते थे। भजन कीर्तन करते थे। सुबह-सुबह गुरु के दर्शन करने वाले शिष्यों ने देखा कि गुरु तो छाती पीटकर रो रहे हैं।
शिष्य आश्चर्यचकित होकर पूछने लगेः "गुरुदेव ! आप रो रहे हैं ?"
कबीर जीः "क्या करें ? मेरा तो सब चला गया।"
शिष्यः "गुरुदेव ! क्या हुआ ? किस प्रकार आपका दुःख दूर हो सकता है ? आप आज्ञा करें तो हम प्रयास करें।"
कबीर जीः "तुम क्या करोगे...? हाय रे हाय ! अब क्या होगा...?" कबीर जी पुनः रोने लगे।
जो नकल होती है उसका प्रभाव असल से भी ज्यादा होता है। गरीब होने का, भिखारी होने का अभिनय सच्चे भिखारी से ज्यादा जोरदार होता है और सम्राट का अभिनय वास्तविक सम्राट से भी ज्यादा  प्रभावशाली होता है। कबीर जी तो कर रहे थे लीला। वे रो पड़े। उनका रूदन देखकर शिष्यवृंद भी रोने लगा और बोलाः
"गुरु जी ! ऐसी कोई चीज नहीं है कि हम आपको लाकर न दे सकें। अथवा, आपको किसी ने सताया है ? बताइये।"
कबीर जीः "मुझे किसी ने सताया नहीं है और न ही मुझे कोई वस्तु चाहिए।"
शिष्यः " तो फिर आप रो क्यों रहे हैं ?"
कबीरजीः "अब रोने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं है।"
शिष्यः "आखिर बात क्या है ?" खूब आग्रह करके शिष्य पूछने लगे। "स्वप्न में ऐसा क्या देखा, गुरुदेव ! कि आप अभी रो रहे हैं ?"
कबीरजीः "स्वप्न में मैं चिड़िया बन गया था।"
शिष्यः "ऐसा तो होता रहता है, इसमें रोने की क्या बात है गुरुदेव !"
कबीरजीः "परन्तु मुझे अब पता नहीं कि मैं कबीर हूँ कि चिड़िया हूँ ?"
शिष्यः "गुरुदेव ! आप संत कबीर हैं, चिड़िया नहीं हैं।"
कबीरजीः "यह कैसे मानूँ ? स्वप्न में चिड़िया था तो सच्चा लग रहा था और इस समय यह सच्चा लग रहा है। इन दोनों में सच्चा क्या ?"
शिष्यः "गुरु जी ! वह झूठा अर्थात् स्वप्न झूठा और यह सच्चा है।"
कबीर जीः "यह सच्चा कैसे ? उस समय तो चिड़िया होना सच्चा लग रहा था, यह झूठा लग रहा था। हाँ, एक फर्क है कि जब मैं चिड़िया बन गया था उस समय कबीर की स्मृति नहीं थी लेकिन अब जब मैं कबीर हूँ तब भी चिड़िया की स्मृति है। चिड़िया की स्मृति गहरी है तो शायद मैं वही हूँ।"
शिष्यः "गुरुदेव ! आप चिड़िया नहीं हैं।"
कबीरजीः "सुनो। आप जैसा अपने में स्मरण थोपते हैं ऐसा अपने को मानते हैं। वास्तव में मिथ्या में स्मरण थोपकर मिथ्या शरीर को ʹमैंʹ मान लेते हैं और सत्य में स्मृति थोपकर सत्यस्वरूप परमात्मा में जाग जाते हैं, मुक्त हो जाते हैं।"
शिष्य समझ गये कि इस लीला के द्वारा भी गुरु हमें जगाना चाहते हैं ताकि हम भी अपने वास्तविक स्वप्न में परमात्मतत्त्व में जाग जायें।
नुकते की हेर-फेर में खुदा से जुदा हुआ।
नुक्ता अगर ऊपर रखें तो जुदा से खुदा हुआ।।
उस अकाल पुरुष से तुम्हारी चेतना उठती है और शरीर को ʹमैंʹ मानने लगती है तो तुम हो गये संसारी। ईंट, चूना, लोहे-लक्कड़ के मकान का नाम संसार नहीं है। इस देह को ʹमैंʹ मानना और मिटने वाली चीजों को ʹमेराʹ मानना – यह मान्यता ही संसार है। संसरति इति संसारः। जो सरकता जाये उसी को तो संसार कहते हैं लेकिन जो सरकने वाले संसार को देखता है वह कभी न सरकने वाला आत्मा है और उस आत्मा में ʹमैंʹ की वृत्ति टिक जाये तो कल्याण हो जाये।
मिल जाये कोई ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष और लग जाये कोई सत्शिष्य ईमानदारी से.....
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1997, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 54
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  Comments

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