Sant Shri Asharamji Ashram
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| साधऩा-सुरक्षाः व्यसनमुक्ति
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| साधऩा-सुरक्षाः व्यसनमुक्ति |
साधऩा-सुरक्षाः व्यसनमुक्ति
पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू
एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये। वहाँ एक महिला बैठी मिली। उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थीं। कालिदास ने उस महिला से पूछाः "क्या बेच रही हो ?"
महिला ने उत्तर दियाः "महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ।"
कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछाः "पाप और मटके में ?"
महिला बोलीः "हाँ, महाराज ! मटके में पाप है।"
कालिदासः "कौन सा पाप है ?"
महिलाः "आठ पाप इस मटके में हैं। मैं चिल्लाकर कहती हूँ कि मैं पाप बेचती हूँ पाप.... और लोग पैसे देकर पाप ले जाते हैं।"
अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआः "पैसे देकर लोग पाप ले जाते हैं ?"
महिलाः "हाँ, महाराज ! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते हैं।"
कालिदासः "इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से हैं ?"
महिलाः "क्रोध, बुद्धिनाश, यश का नाश, स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार और अन्याय, चोरी, असत्य आदि दुराचार, पुण्य का नाश और स्वास्थ्य का नाश....ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में हैं।"
कालिदास को कौतूहल हुआ कि यह तो बड़ी विचित्र बात है। किसी भी शास्त्र में नहीं आया कि मटके में आठ प्रकार के पाप होते हैं। वे बोलेः "आखिरकार इसमें क्या है ?"
महिलाः "महाराज ! इसमें शराब है शराब !"
कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोलेः "तुझे धन्यवाद है ! शराब में आठ प्रकार के पाप हैं यह तू जानती है और ʹमैं पाप बेचती हूँʹ ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले जाते हैं। धिक्कार है ऐसे लोगों को !"
जो लोग बीड़ी या सिगरेट पीते हैं तो बीस मिनट के अन्दर ही उनके शरीर में निकोटीन नामक जहर फैल जाता है। बीड़ी पीने वाले व्यक्ति के साथ कमरे में जितने व्यक्ति होते हैं उन्हें भी उतनी ही हानि होती है जितनी हानि बीड़ी पीने वाले व्यक्ति को होती है।
बीड़ी कहे मैं यम की मासी।
एक हाथ खडग, दूसरे हाथ फाँसी।।
बीड़ी पीने वाला मनुष्य खुद की आयु तो नष्ट करता ही है, साथ ही साथ अपने पास वालों के जीवन को भी नष्ट करने का पाप अपने सिर पर लेता है। एक बीड़ी पीने से छः मिनट की आयुष्य का नाश होता है। फिर भी लोग पैसे देकर मुँह में आग भरते हैं, धुआँ भरते हैं। कितने बुद्धिमान हैं वे लोग !
समर्थ रामदास कहते हैं कि एक माला करने से जो सात्त्विकता पैदा होती है वह एक बीड़ी पीने से नष्ट हो जाती है। बीड़ी पियो, तम्बाकू खाओ या तपकीर (नास, छींकणी) मुँह में भरो इनसे बहुत हानि होती है।
किसी व्यक्ति ने मुझे पत्र लिखाः ʹबापू ! आप कहते हैं कि बीड़ी नहीं पीनी चाहिए तो फिर भगवान ने उसे बनाया ही क्यों ? भगवान ने बीड़ी बनाई है तो पीने के लिए ही बनाई है।ʹ
वास्तव में भगवान ने बीड़ी नहीं बनाई, तम्बाकू बनाया है और वह भी दवाइयों में काम आता है। बीड़ी तो मनुष्य ने बनाई है। यदि भगवान ने जो कुछ बनाया है उन सबको तुम उपयोग में लाना चाहते हो तो लो, मेरी मनाही नहीं है परंतु भगवान ने तो धतूरा भी बनाया है। तुम उसकी सब्जी क्यों नहीं बनाते ? भगवान ने काँटे भी बनाये हैं। तुम उन पर क्यों नहीं चलते ? जैसे छुरे-चाकू सब्जी काटने के लिए हैं वैसे ही तम्बाकू दवाइयों के लिए है। जैसे चाकू छुरी पेट में भोंकने के लिए नहीं है ऐसे ही तम्बाकू खाने के लिए नहीं है। जब तुम आक-धतूरे की नहीं खाते, उसमें अपनी बुद्धि का उपयोग करते हो तो फिर यह जानते हुए भी कि बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, शराब आदि हानिकारक हैं तो क्यों लेते हो ?
एक शराबी था। शराब की प्यालियाँ पीकर, अपनी गाड़ी चलाते हुए घर की ओर जा रहा था। रास्ते में उसकी गाड़ी के टायर में पंक्चर हो गया। वह गाड़ी खड़ी करके पंक्चरवाले पहिये के नट-बोल्ट खोलकर पीछे रखता गया। पीछे एक नाली थी। उसके सारे नट-बोल्ट पानी में बह गये। जब उसने दूसरा पहिया निकाला और लगाने गया तो सारे नट-बोल्ट नाली में लुढ़क चुके थे। वह रोने लगाः "अब मैं घर कैसे पहुँचूँगा ?
बगल में पागलों का एक अस्पताल था। एक पागल आरामकुर्सी पर बैठकर शराबी की सब हरकतें देख रहा था। शराबी बड़बड़ा रहा था कि ʹअब घर कैसे जाऊँ ? वह कोसता जा रहा था कि ʹयहाँ नाली किसने बनाई ? म्युनिसिपालिटी (नगर-निगम( के लोग कैसे हैं।ʹ आदि-आदि। इतने में वह पागल आया और बोलाः
"रोते क्यों हो यार ! बाकी के तीन पहियों में से एक-एक नट निकालकर चौथे पहिये में लगा दो और घर पहुँच जाओ।"
शराबी ने पूछाः "आप रहते कहाँ हो ?"
उसने जवाब दियाः "मैं पागलों की अस्पताल में रहता हूँ और अपना इलाज करवाने आया हूँ।"
शराबीः "क्या आप सचमुच इलाज करवाने आये हो ?"
पागलः "हाँ, मैं इलाज करवाने के लिए ही आया हूँ। मुझे थोड़ी दिमाग की तकलीफ थी इसलिए आया हूँ। मैं एक पागल हूँ।"
शराबीः "आप पागल हो फिर भी मुझे अक्ल दे रहे हो ?"
पागलः "मैं पागल हूँ पर तुम्हारे जैसा शराबी नहीं हूँ।"
शराबी मनुष्य तो पागल से भी ज्यादा पागल होता है। पागल व्यक्ति तो केवल अपना थोड़ा नुकसान करता है जबकि शराबी व्यक्ति के शरीर में अल्कोहल फैल जाता है। अल्कोहल एक प्रकार का जहर है। हम जैसा खाते-पीते हैं उसका असर हमारे शरीर पर जरूर होता है। अल्कोहल के कारण शराबी के बेटे को आँख का कैन्सर हो सकता है क्योंकि शराबी के रक्त में अल्कोहल ज्यादा होता है। उसके बेटे को नहीं तो बेटे के बेटे को, उसको भी नहीं तो बेटे के बेटे को.... इस प्रकार दसवीं पीढ़ी तक के बालक को भी आँख का कैन्सर होने की संभावना रहती है। शराबी अपनी जिंदगी तो बिगाड़ता ही है किन्तु दसवीं पीढ़ी तक को बिगाड़ देता है।
जब शराबी दसवीं पीढ़ी तक की बरबादी कर सकता है तो राम-नाम इक्कीस पीढ़ियों को तार दे इसमें क्या आश्चर्य है ?
जाम पर जान पीने से क्या फायदा ?
रात बीती सुबह को उतर जायेगी।
तू हरिनाम की प्यालियाँ पी ले।
तेरी सारी जिंदगी सुधर जायेगी।।
मनुष्य यदि किसी भी व्यसन का आदी हो जाये तो उसके स्वास्थ्य की बहुत हानि होती है। चाय तो मनुष्य के लिए बहुत ही हानिकारक है।
खाली पेट चाय पीने से बहुत नुकसान होता है। चाय पीने से स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, दिमाग ठिकाने नहीं रहता, अजीर्ण और कब्जियत की बीमारी हो जाती है। चाय पाचक रसों में रूकावट पैदा करती है। इन्हीं सब कारणों से जो लोग चाय-कॉफी बहुत ज्यादा पीते हैं उनका शरीर पतला रहता है, गाल बैठ जाते हैं, चेहरा मलिन होता है तथा सिरदर्द की तकलीफ अधिक होती है।
चाय के अधिक सेवन से पित्त का प्रकोप होता रहता है। बाल जल्दी झड़ने लगते हैं अथवा सफेद हो जाते हैं। वात का प्रकोप और लकवे की संभावना बढ़ जाती है। शरीर कमजोर हो जाता है, नसें कमजोर होने से पक्षाघात भी हो जाता है।
जो स्वयं चाय पीता है उसको तो हानि होती ही है किन्तु यदि माता-पिता चाय पीते हैं तो बालक कमजोर पैदा होते हैं। जैसा बीज होता है वैसा ही वृक्ष होता है। चाय तो पीने वाले पीते हैं किन्तु भुगतना उनके बच्चों को भी पड़ता है। शराब तो पीने वाले पीते हैं किन्तु भुगतते उनके बेटे भी हैं।
व्यसन तो मानव जाति के घोर शत्रु हैं। व्यसनी स्वयं का तो शत्रु है ही, किन्तु अपने मित्रों का भी शत्रु है। कबीर जी ने कहा हैः
कबीरा कुत्ते की दोस्ती, दो बाजू जंजाल।
रीझे तो मुँह चाटे, खीझे तो पैर काटे।।
कुत्ता यदि बहुत प्रसन्न हो जायें तो मुँह चाटने लगता है और नाराज हो जाये तो काटने लगता है।
जापान के किसी राजकीय पुरुष ने कहा था किः "चाय और कॉफी जैसे नशीले पदार्थ अपने देश में आने लगे हैं तो अब मुझे डर लगने लगा है कि चीन और भारत जैसी कंगाल स्थिति कहीं अपने देश की भी न हो जाये क्योंकि यदि अपने देश के युवक इन नशीली वस्तुओं का इस्तेमाल करने लगेंगे तो उनके जीवन में क्या बरकत रहेगी ? उनकी संतानें कैसी होंगी ?ʹ
बीड़ी पीने वाले लड़के अपनी मानसिक शक्ति को नष्ट कर बैठते हैं। इतना ही नहीं, अपने जोश, बल और दृढ़ता का भी नाश कर बैठते हैं। अक्लवान् बुद्धिमान मनुष्य तो वह है जो गीता के ज्ञान का अमृतपान करके, जीवन्मुक्ति के विलक्षण आनंद की अनुभूति करने के लिए अपने जीवन में प्रयास करता है। वे मनुष्य, वे बालक-बालिकाएँ सचमुच में भाग्यशाली हैं जिनको गीता के ज्ञान में, उपनिषदों के ज्ञान में, संतों के सत्संग में, रामायण में, भागवत में श्रद्धा है, मंत्र में दृढ़ता है। वे सचमुच ही बड़े भाग्यशाली हैं जो व्यसनी लोगों के संपर्क से बचते हैं, उनकी नकल करने से बचते हैं और ध्रुव, प्रहलाद, नानक, कबीर, मीरा, तुकाराम, जनक, शुकदेव आदि महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा पाकर अपने जीवन में उनके आचरणों को उतारने का प्रयास करते हैं। वे सचमुच महान हैं जो इन संतों के जीवन को निहारकर अपने जीवन को भी योग एवं आत्मविद्या से संपन्न करते हैं। ऐहिक विद्या, यौगिक विद्या (अर्थात् भक्तियोग, ध्यानयोग, नादानुसंधान योग आदि) एवं आत्मविद्या से संपन्न होकर जो अपने जीवन को उन्नत करता है, वही मनुष्य वास्तव में इस पृथ्वी पर आने का फल प्राप्त करता है।
उसी का जीवन सफल है जिसके जीवन में दृढ़ता है। उसी का जीवन सफल है जिसके जीवन में सत्संग के लिए स्नेह है। उसी का मनुष्य जन्म सफल है जिसके जीवन में सादगी, सच्चाई और पवित्रता है, जीवन व्यसनों से मुक्त है। उसे अनुकूलताएं बाँध नहीं सकतीं और प्रतिकूलताएँ डिगा नहीं सकतीं।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1997, पृष्ठ संख्या 26,27,28 अंक 54
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