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ज्ञान के बिना भोग नहीं
ज्ञान के बिना भोग नहीं

ज्ञान के बिना भोग नहीं
पूज्य बापू जी
ज्ञान के बिना भोग नहीं होता। जीभ पर स्वादिष्ट-सलोना व्यंजन आया लेकिन उसका ज्ञान होगा तभी मजा आयेगा। खट्टे खारे का ज्ञान होगा तभी उसका मजा आयेगा। यह हमारा हितैषी है, उसका ज्ञान होगा तब उसको देख के मजा आयेगा। बिना ज्ञान के भोग नहीं होता।
वास्तव में देखा जाय तो ज्ञानस्वरूप ईश्वर को ही हम भोग रहे हैं और ईश्वर से ही भोग रहे हैं। यहाँ भी ईश्वर की सत्ता है और इन्द्रियों के द्वारा ज्ञान में भी ईश्वर ही अनेक लीलाएँ करता है। जैसे – स्वप्नद्रष्टा आप ही रेलगाड़ी बन जाता है, आप ही यात्री बन जाता है, आप ही स्टेशन और जंक्शन बन जाता है और मुंबई का हलवा, नड़ियाद का गोटा (पकौड़ा) खा ले, भरूच की सींग खा ले... सपने में भरूच भी तू ही बन गया और नड़ियाद भी तू ही बन गया और नड़ियाद के गोटे भी तू ही बन गया और खाने वाला दूसरा आया क्या ? तू ही खाता है। जान गये बलमा, पहचान गये... गाड़ी आगे चली तो आबू की रबड़ी-पूड़ी... अजमेर का दूध मीठा... क्या-क्या देखते हैं ! एक ही स्वप्नद्रष्टा क्या-क्या बन जाता है ! क्या तेरी लीला है ! हे प्रभु ! हे देव ! हे ज्ञानस्वरूपा, चैतन्यस्वरूपा ! उसकी महिमा विचारते-विचारते चुप हो गये तो बस, ठहर गये। जैसे रात्रि को चुप हो जाते हैं न, तो थकान मिट जाती है, ऐसे ही उसके प्रेम में चुप हो गये तो जन्म-मरण की थकान का पर्दा खुल जाता है धड़ाक-धुम ! ब्राह्मी स्थिति आ जाती है।
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।
मोह कभी न ठग सके....
ऐसा नहीं कि मोह सुबह न ठग सके, मोह रात को न ठग सके, मोह अमावस्या को न ठग सके, कभी न ठग सके-
 मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।
पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।
आसुमल से हो गये, साँईं आसाराम।।
मालूम पड़ने से ही भोग होता है और भोग से ही सुख होता है तो ज्ञान से ही मालूम पड़ेगा, ज्ञान से ही भोग होगा, ज्ञान से ही सुख होगा। जो हिन्दी भाषा कतई न जानता हो अथवा बहरा हो, निपट निराला..... वह सत्संग में बैठा हो तो उसको सुख नहीं मिलेगा, माहौल के आन्दोलनों का भले उसे पुण्य हो लेकिन जो ज्ञान से सुख होता है न, वह फल वस्तु, व्यक्ति से नहीं होता। कुर्सी मिल गयी तो वह फल नहीं है लेकिन कुर्सी के सुख का फल हृदय में आया, वही फल है। चीज वस्तु पड़ी है वह फल नहीं है लेकिन उससे हृदय में जो सुख-दुःख होता है वही फल है। जब हृदय से ही सुख और दुःख के फल का एहसास होता है तो हृदय को ही ऐसा बनाओ की भावनामय हो जाये। काहे को झंझट में पड़ो ! बड़ा सौदा कर लो।
बुद्धि में सत्य का ज्ञान, सत्य का प्रकाश, इन्द्रियों में सच्चरित्रता, मन में सदभाव लाओ और ईश्वर को अपना मानो। सौंप दो उसको, बस हो गया। ज्यादा झंझट में पड़ो ही मत ! तीसरी पढ़े तो पढ़े, नहीं तो नहीं जाना ! हम गये तो समय बिगाड़ा तीन साल, हरि ૐ.... ૐ.... ऐसा अथाह खजाना है। हमने 3 साल बिगाड़े तो कोई 18 साल, 21 साल बिगाड़ के इधर आये। ईश्वर के सिवाये न जाने कितने जन्म बिगड़ गये, हे हरि ! कितनी उपलब्धियाँ बिगड़ गयीं ! क्योंकि  आप शाश्वत हो और शरीर, वस्तु और उपलब्धियाँ ने नश्वर हैं। आप नित्य हो, शरीर, उपलब्धियाँ अनित्य हैं। आप सुखस्वरूप हो, ज्ञानस्वरूप हो, चैतन्यस्वरूप हो। उपलब्धियाँ तो सँभाल-सँभाल के थक जाओगे। बुद्धि में सत्य का निश्चय हो। सत्य एक परमात्मा है। चित्त में समता हो, मन में भगवान का प्रेम हो, अपनत्व हो, सदभाव हो और आचरण में पवित्रता हो, बस ! फिर तो मौज हो गयी मौज ! मुक्ति हो गयी... शोक, दुःख, जन्म-मरण से पार हो गये !
स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 20 अंक 240
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