| सदगुरु से क्या सीखें ? |
पहली बात, गुरुजी से संयम की साधना सीख लेनी चाहिए।
ब्रह्मचर्य की साधना सीख लो। गुरु जी कहेंगे- "बेटा ! ब्रह्म में विचरण करना ब्रह्मचर्य है। शरीरों को आसक्ति से देखकर अपना वीर्य क्षय किया तो मन, बुद्धि, आयु और निर्णय दुर्बल होते हैं। दृढ़ निश्चय करके ʹૐ अर्यमायै नमः।ʹ का जप कर, जिससे तेरा ब्रह्मचर्य मजबूत हो। ऐसी किताबें न पढ़, ऐसी फिल्में न देख जिनसे विकार पैदा हों। ऐसे लोगों के हाथ से भोजन मत कर मत खा, जिससे तुम्हारे मन में विकार पैदा हों।"
दूसरी बात गुरु से सीख लो, अहिंसा किसे कहते हैं और हम अहिंसक कैसे बनें ?
बोलेः "मन से, वचन से और कर्म से किसी को दुःख न देना ही अहिंसा है। |
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| समस्त पापनाशक स्तोत्र |
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जो मनुष्य पापों का विनाश करने वाले इस स्तोत्र का पठन अथवा श्रवण करता है, वह शरीर, मन और वाणीजनित समस्त पापों से छूट जाता है एवं समस्त पापग्रहों से मुक्त होकर श्रीविष्णु के परम पद को प्राप्त होता है। इसलिए किसी भी पाप के हो जाने पर इस स्तोत्र का जप करें। यह स्तोत्र पापसमूहों के प्रायश्चित के समान है। कृच्छ्र आदि व्रत करने वाले के लिए भी यह श्रेष्ठ है। स्तोत्र-जप और व्रतरूप प्रायश्चित से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए इनका अनुष्ठान करना चाहिए।
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| यकृत चिकित्सा |
सुबह खाली पेट एक चुटकी (लगभग 1 ग्राम) साबुत चावल पानी के साथ निगल जायें।
हल्दी, धनिया एवं जवारा का रस 20 से 50 मि.ली. की मात्रा में सुबह-शाम पी सकते हैं।
रोहितक का चूर्ण 2 ग्राम एवं बड़ी हरड़ का चूर्ण 2 ग्राम सुबह खाली पेट गोमूत्र के साथ लेना चाहिए।
पुनर्नवामंडूर की 2-2 गोलियाँ (करीब एकाध ग्राम) सुबह-शाम गोमूत्र के साथ लेना चाहिए। यह सब संत श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द्र (आश्रम) में भी मिल सकेगा।
संशमनी वटी की दो-दो गोलियाँ सुबह-दोपहर-शाम पानी के साथ लेना चाहिए।
आरोग्यवर्धिनी वटी नं 1 की 1-1 गोली सुबह-शाम पानी के साथ लेना चाहिए।
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| मन को कैसे जीतें ? |
मल्लाहः "महाराज ! यहाँ एक तपस्वी ने तप करते-करते अपने तन को सुखा डाला था कि उसके प्राण पखेरू उड़ गये थे और अस्थियाँ रह गयी थीं। फिर वह बार-बार जन्म लेकर इन्हीं द्वीपों पर मृत्युपर्यन्त तप करता रहा। इस तरह उसने अपने 99 जन्मों तक कठोर तप किया। उसी तपस्वी के 99 जन्मों के अस्थिपिंजरों का यह ढेर है।"
संतः "वह तपस्वी कौन था ?"
मल्लाहः "वह तपस्वी था उत्तानपाद राजा का पुत्र ध्रुव। 99 जन्मों का उसका अभ्यास था अतः 100 वें जन्म में छः महीने के अभ्यास से ही उसे परमात्म दर्शन हो गये।" |
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| बिना दवा स्मरणशक्ति का विकास |
मनोवैज्ञानिक विश्लेषणानुसार, ʹकुछ याद रखनाʹ एक प्रकार की जटिल मानसिक प्रक्रिया है। स्मरणशक्ति अर्थात् सुनी, देखी एवं अनुभव की हुई बातों का वर्गीकरण करके मस्तिष्क में उन्हें संगृहीत करना तथा भविष्य में जब भी उनकी आवश्यकता पड़े उन्हें फिर से जान लेना।
स्मृति के लिए दिमाग का जो हिस्सा कार्य करता है उसमें एसीटाइलकोलीन, डोयामीन तथा प्रोटीन्स के माध्यम से एक रासायनिक क्रिया होती है। एक प्रयोग के द्वारा यह भी सिद्ध हुआ है कि मानव-मस्तिष्क की कोशिकाएँ आपस में जितनी सघनता से गुंथित होती हैं उतनी ही उसकी स्मृति का विकास होता है। |
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