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आध्यात्मिक

तात्त्विक

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

Admin 0 7515 Article rating: 4.0
 पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । 
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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

Bapuji Apkay Aghya Say Samarpith Hogayi Thi Par Mata-pita Ni Ghar Pay Lay Gaya Aur Veh Sadhik Nahi Hai. Ab Mai Chahti Hu Ki Fir Apkay Aghya Le Kar Sam

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 Bapuji Apkay Aghya Say Samarpith Hogayi Thi Par Mata-pita Ni Ghar Pay Lay Gaya Aur Veh Sadhik Nahi Hai. Ab Mai Chahti Hu Ki Fir Apkay Aghya Le Kar Samarpith Ho Jao Par Mere Sir Par Karza Hai Aur Mata-pita Anumathi Bhi Nahi De Rahi Hai. Iss Karan Maan Bahut Ashant Rahat Hai.

साँईं। क्या गुरु से भौतिक रूप से दूर रहकर भी साक्षात्कार हो सकता है?

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  साँईं। क्या गुरु से भौतिक रूप से दूर रहकर भी साक्षात्कार हो सकता है? यथा आप अहमदाबाद में विराजो और हम अलवर में रहें।

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ध्यान विषयक

निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

Admin 0 4582 Article rating: 4.3
श्री हरि प्रभु ! चालू सत्संग में जब मन निःसंकल्प अवस्था में विषय से उपराम होकर आने लगता है ,तो प्रायः निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

ध्यान की अवस्था में कैसे पहुंचे ? अगर घर की परिस्थिति उसके अनुकूल न हो तो क्या करे ?

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ध्यान  की  अवस्था  में  कैसे  पहुंचे ? अगर  घर  की  परिस्थिति  उसके  अनुकूल  न  हो  तो  क्या  करे ?

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Admin

भगवान की प्राप्ति का मार्ग- Sant Shri Asaram Bapu ji (आसाराम बापू जी)

भगवान की प्राप्ति का मार्ग
P.P.Sant Shri Asharamji Bapu – Delhi – 20 July 2013 Part –I
 
हरी ॐ .......  कीर्तन | 
ॐ दुर्जन: सज्जनो भूयात सज्जन: शांतिमाप्नुयात्‌ । 
शांतोमुच्येत बंधेभ्यो  मुक्त: चान्यान् विमोच्येत् ।। हरि ॐ हरि ॐ
तापत्र्यादी तप्तानाम अशांत प्राणिनामभुवी ।
गुरुरेव पराब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
ज्योत से ज्योत जगाओ .......... आरती |
     व्यास पूर्णिमा मनुष्य जीवन को सुव्यवस्थित करने वाली पूर्णिमा है | लघु को ऊँचा बनाने वाली पूर्णिमा | लघु वस्तुओं की प्रीति जीवात्मा को तुच्छ करती है | और परमात्मा का प्रेम जीवात्मा को महान बना देता है | 
दीर्घ प्रणव जप ॐ ....... | गहरा श्वास लो फिर से थोड़ा, मैं प्रभु का हूँ, प्रभु मेरे हैं, अन्तर्यामी प्रभु का नाम ॐ है, मैं उसकी शरण हूँ । मैं उसका जप करता हूँ, मेरे जीवन में भगवदप्राप्ति का विवेक जाग जाए । तुच्छ इच्छाएँ, वासनाएं और अहंकार विदा हो जायें, भगवान का विवेक, प्रेम और आनंद प्रकट हो इसलिए मैं जप करता हूँ । फिर से गहरा श्वास ॐॐॐ ( कंठ से ) । दोनों नथुनों से गहरा श्वास भरें तो और अच्छा है, गहरा श्वास भरो और रोके रखो, मन में ॐ ॐ जप करो । अब कंठ से करो ॐॐ (कंठ से), फिर से गहरा श्वास लो, पहली उंगली अंगूठे के साथ, तीन उंगली सीधी, दोनों हाथ घुटने पर । दीर्घ प्रणव जप मन को परमात्मा में शांत करने वाला प्रयोग ॐ....ॐ....हरि ॐ.... अब होंठों में जप करेंगे और ललाट में ॐ स्वरुप ईश्वर की आकृति की भावना करेंगे । 
भगवान की प्राप्ति का मार्ग -
    ललाट में ॐ कार का ध्यान करने से बुद्धि में विलक्षण योग्यताए विकसित होती हैं | और नाभि में सूर्यदेव का ध्यान करने से आरोग्य में विलक्षण रोग प्रतिकारक शक्ति और स्वास्थ्य की कुंजियाँ सहेज में मिलती हैं | और इन दोनों से सर्वोपरी सहेज में भगवान की प्राप्ति का मार्ग है | एक होता है क्रिया प्रधान और दूसरा होता है विवेक प्रधान | तीर्थ, यज्ञ, दान, पुण्य, जप करना ये सब क्रिया प्रधान है | ये क्रिया प्रधान साधन करते-करते सत्संग में रूचि होने लगती हैं | तो फिर विवेक प्रधान साधन में मनुष्य प्रविष्ट हो जाता है |
बिनु सत्संग विवेक न होवहि, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई |
तीर्थ यात्रा, मंदिर, देव दर्शन, दान-पुण्य, बूढ़े-बुजुर्ग, संतो की सेवा का फल क्रिया प्रधान से विवेक प्रधान साधन में पहुंचा देगा | विवेक प्रधान साधन में सत्संग बहुत मदद करता है | 
दुखो से छुटने का उपाय -
    भगवान वेद व्यास जी से ऋषियों ने पूछा के सर्व सुलभ और सर्व ग्राहिय दुखो से छुटने का उपाय बताने की कृपा करें | ब्रह्म पुराण के आधार पर  व्यासजी कहते हैं के तुम्हारे सवाल का मैं अभिवादन करता हूँ | तुमने बहुत सुंदर सवाल पूछा है | जो भी इस सवाल-जवाब को सुनेगा, विचारेगा उसकी हीनता, लोभ, भय,  मोह, अशांति, काले कर्म मिट जायेंगे और शांति का प्रकाश होगा उसके जीवन में | धन्य हो ऋषि तुम | जो सवाल पूछा है वो मानव मात्र का उद्धार करने वाला है | जैसे पिता बालको को कहानियाँ, किस्सों से संकेत करके अनुचित मार्ग से बचाकर उचित मार्ग पर ले चलता है, ऐसे ही मनुष्य को इन्द्रियों के विषय-विकारों से बचाने के लिए उनको बहला-फुसला के, बिन जरूरी देखे काहे को, बिन जरूरी बोले काहे को, बिन जरूरी खाए काहे को, बिन जरूरी जगह पर जाए काहे को | 
    जरूरी में जरूरी अपने सोऽहं स्वभाव में आये | समय, शक्ति का दुरूपयोग करने वाले की दुर्गति होती है | सदुपयोग करने वाले की सद्गति होती है | परमात्मा प्राप्ति होती है | व्यर्थ के चिंतन, वाद-विवाद से बचे | इन्द्रियों को थोडा संयत करें | सौ-सौ ख्वाहिशे पैदा हो, लेकिन खवाहिश को महत्व ना देकर अपने  कल्याण को महत्व दें | सौ-सौ ख्वाहिशे आये, सौ की कर दो ६०, आधा कर दो काट, १० पूरी करेंगे, १० छुड़ायेंगे, १० के हाथ जोडेंगे | अभी तो अपने आत्म-संयम में रहो | इन्द्रियों को रोके मन में और मन को रोके मति में और मति को स्थिर करें | परमात्मा शांत रूप हैं, चैतन्य रूप हैं, आनंद रूप हैं, ज्ञान स्वरूप हैं | ऐसे आत्म-तृप्ति और आत्मजा बुद्धि प्राप्त करें मनुष्य | जैसे धुए रहित आग शोभायमान होती है, ऐसे ही संशय रहित उसका आत्म सुख शोभायमान होता है |
     मोक्ष के उपाय में व्यास जी ने कहा क्षमा अपने जीवन में लाओ | क्षमा से क्रोध के दुर्गुण को जीतो | निसंकल्पता से कामनाओ को जीतो | मन में कामनाए आये तो छोड़ दो | इधर-उधर की हापा-धापी छोड़ दो | ॐ शांति..... | निसंकल्पता से तुच्छ कामनाओ को जीतो | निर्भय से भय को जीतो | भय किस बात का आत्मा अमर है | शरीर मरने वाला है | मर जायेंगे, मर जायेंगे डर किस बात का है | तो अप्रमाद, सावधानी से भय को जीतो | धैर्य के द्वारा विकार, कामनाओ, और व्यर्थ के चिंतन को जीतो | चंचलता को ज्ञान अभ्यास से जीतो | ॐ...... एक टक भगवान को देखो और लम्बा उच्चारण करो | चंचलता को जीतोगे तो एकाग्र होओगे | एकाग्रता की शक्ति अदभुद होती है | सभी तपस्याओं में एकाग्रता श्रेष्ठ माना जाता है | तो चंचलता को ध्यान, ज्ञान अभ्यास से जीतो | हितकर खाओ | स्वास्थ्य के अनुकूल खाओ, मजा लेने के लिए मत खाओ | कम खाओ, सुपाच्य खाओ | और वर्षा ऋतू में तो खास करके | ह्ढ़द की दाल, राजमा, भारी खुराक का त्याग करना चाहिए | ह्ढ़द रसायन की गोली खाए अथवा ह्ढ़द चुसे | खूब भूख लगे तो खाएं और भोजन के बीच थोडा गुनगुना पानी पिए | १ महीना और १ दिन अधिक वर्षा ऋतू है | हितकर भोजन करें, थोडा कम भोजन करें | और सम्पूर्ण विघ्नों को जीतने वाला लोभ, मोह, से परे करने वाला भगवान का सत्संग सुने | और चतुर्मास में मौन रहें | एकांत में रहें | स्नेह मनुष्य को फसाता है | संसार अनित्य है | किस-किस से बाहर प्रीति करोगे | ईश्वर के सिवाय कहीं भी प्रीति करी, पति-पत्नी में प्रीति काम जगाएगी, पैसों में प्रीति लोभ जगायेगी, परिवार में प्रीति मोह की पाश बाँधेगी | वाह-वाही की प्रीति अहँकार की आग में जलाएगी | इसीलिए परमात्मा प्रीति के सिवाय बाकि की प्रितियों से अपने को समेटता रहे | तो वाणी बोलते समय विचार करें के १० शब्द की अपेक्षा ६ शब्द में सार बात कह दें | वाणी एक शक्ति है उसका दुरूपयोग ना करें | कम बोले, सारगर्भित बोले, ईश्वर परत बोले | सच्चाई, स्नेह से बोले | अहंकार रहित बोले तो उसकी वाणी सुनकर लोग भी सुखी होंगे और खुद भी सुखी होगा | वाणी को मन में, मन को बुद्धि में और बुद्धि को भगवत ज्ञान में विलय करें | महा तत्व में और शांत आत्मा में विलय करें | इससे जीव शंतात्मा, परमात्मा के सुख को पायेगा | काम-विकार से बचे, हाड-मास के शरीर में रखा क्या है ? 
      क्रोध अग्नि है, तपस्या और पुण्य को नष्ट कर देता है | लोभ दल-दल है, खपे-खपे में आदमी खप जाता है | भय जीव की योग्यताओं को हर लेने वाला है | और स्वप्नों को ना संजोये सपना तो सपना है | रात को सपना ज्यादा आता हो तो ॐ कार का गुजन कर लें १०-१५ मिनट, बाद में सोयें | सपने की बातों को जैसे जाग्रत में महत्व नही देते ऐसे ही संसार भी सपना है | सफलता आये तो फूलें नही, सफलताए आ-आ के चली जाती हैं | विफलताए आ-आ के चली जाती हैं | किसका क्या महत्व है ? हानि तो हानि है, जिसको लाभ बोलते हो उसमें भी कोई दम नही | जिस लाभ से आत्म-लाभ न हो, जिस लाभ से मोक्ष लाभ न हो, जिस लाभ से परमात्म लाभ न हो, उन लाभों की ऐसी-तैसी | उन हानियों की ऐसी-तैसी | हानि-लाभ दोनों सपना है | लेकिन ये सब बीतता है तब भी जो हमारा साथ नही छोड़ता वो साक्षी, चैतन्य, परमेश्वर मेरा अपना है | वे दिन कब आयेंगे के हानि और लाभ, मान-अपमान, निंदा-स्तुति, सफलता-विफलता तुच्छ लगेंगे | उसको जानने वाला साक्षी आत्मा चम-चम चमकेगा, ऐसे दिन कब आयेंगे ? ऐसे दिन अभी आ सकते हैं अगर लग जाओ सावधान होकर तो | सत्शास्त्रों का अभ्यास करें | 
व्यासजी कहते हैं के सत्संग की पुस्तके पढ़ें | ग्रहस्ती आदमी कमाई का कुछ हिस्सा दान करे | सत्य बोलें, झूठ का त्याग करें | आपस में मेल से रहें, लेकिन ममता छोड़ें | स्वभाव में क्षमा और कोमलता का सद्गुण भर लें | भीतर से और बाहर से शुद्ध रहें, पवित्र रहें | आचार, व्यवहार शुद्ध रखें | इन्द्रियों का सयम करके परमात्मा रस की प्राप्ति में लगें | व्यासजी ने इतना सुंदर उपाय सुनाया किस प्रकार निष्पाप होकर मनुष्य आत्मतेज के प्रभाव से सम्पन्न रहे | परम पद को प्राप्त हो जाये | बुद्धि में पुण्य आ जाएँ, मन थोडा वश में हो जाये | और हमेशा पवित्र रहे उसका जीवन धन्य हो जाता है | धन कमाकर, अटालिकाए बनाकर मर गया तो धिक्कार है उसको | कुड-कपट करके या ईमानदार होकर भी मर गया तो तुच्छ जीवन है | मरने वाले शरीर में अपनी अमरता का ज्ञान सुन लें व्यवहार में भी अपने अमरता का सुमिरन कर लें | दुःख आता है तो ये मर जायेगा, दुःख रहेगा नही, उसको जानने वाला मैं अमर हूँ | सुख आये तो भी मर जायेगा इसका बहुजन हिताय उपयोग करो | सुख-दुख, लाभ-हानि, सफलता-विफलता मरती है लेकिन आत्मा अमर है | अपने कर्मो की, भाव की शुद्धि का ध्यान रखें | विवेक शुद्ध रखें |
    शुद्ध विवेक क्या है ? के अमर आत्मा है और मरने वाला संसार और शरीर है | नित्य आत्मा, परमात्मा है, अनित्य संसार और शरीर है | सुख रूप आत्मा-परमात्मा है, दुःख रूप संसार और शरीर है | ये विवेक करें तो शुद्ध चिंतन होगा | शुद्ध तो परमात्मा है बाकि सब तो अशुद्ध है | शुद्ध चिंतन से आदमी शुद्ध हो जाता है और अशुद्ध से अशुद्ध हो जाता है | अशुद्ध चिंतन से अशुद्ध कर्म होते हैं | अशुद्ध कर्मो से राग-द्वेष की आग जलाकर व्यक्ति दुखी होते हैं | दुःख का कोई कारण नही है, नाहक से लोग दुखी हो रहे हैं | न जाने कितनो-कितनो के आगे गिडगिडाते हैं | कितना-कितना झूठ बोलते हैं, कितने-कितने बंडल मारते हैं | वो आदमी विवेक के बिना कुछ का कुछ बोलते रहते हैं, कुछ का कुछ करते रहते हैं | इससे कीमत घट जाती है |
वाणी ऐसी बोलिए मनवा शीतल होय | औरों को शीतल करे आप भी शीतल होय |  
    भिड़ाना, झगडना ये मन का, वाणी का दोष है | जीवन बड़ा कीमती है और अल्प जीवन है | और आत्मा-परमात्मा को पाने का काम बहुत ऊँचा है | जितनी भी सफलता मिल गयी धिक्कार है उसको | जितनी भी विफलता हुई तुच्छ है | सफलता, विफलता का महत्व नही है | परमात्मा प्राप्ति का महत्व है | सुख-दुःख में सम रहने का महत्व है | निंदा-स्तुति में सम रहने का महत्व है | शरीर को फुलाना, सूजना महत्वपूर्ण नही है | शरीर को कमजोर करना महत्वपूर्ण नही है | लेकिन ये शरीर जिससे चलता-फिरता है उस आत्मा को मैं, मेरा मानना महत्व पूर्ण है | 
वेद व्यासजी की समता और सरलता -
     भगवान वेद व्यासजी नैमिश्यअरण्य में सुबह-सुबह टहलने को जा रहे थे तो एक भील होंठो में जप कर रहा था वृक्ष को झुकाने का | खजूर का वृक्ष झुक रहा था | उस भील ने उसमें से खजूर का रस निकाला | गुड़ बनाकर बेचेगा ४-६ आने में आटा-दाल लेगा, एक आने का पहुआ पिएगा | लेकिन व्यासजी देखो कितने महान संत | बोले ये विद्या तो इसके पास है, मेरे पास नही है | उसके पीछे गए तो वो समझ गया के मेरे से विद्या सीखना चाहते हैं | भील जाति में जो कुरूप होते हैं उनको शबर जाति का बोलते हैं | वो दौड़ा तो व्यासजी उसके पीछे गए | उसने अपने बेटे कृपालु को कहा की व्यासजी बड़े महान संत हैं, मेरे से ये विद्या सीखना चाहते हैं | दीक्षा लेना चाहते हैं | लेकिन शिष्य के बिना दीक्षा फलती नही है | जिसको श्रद्धा-भक्ति नही और जो शिष्य नही उसको मंत्र फलेगा नही | इसलिए मैं यहाँ से भाग जाता हूँ, पेड़ पर चढ़ जाऊंगा | छुपकर बैठूँगा | तुम व्यासजी को बोलना मेरे पिताजी आज आये ना आयें कल आयें | आप अभी जाओ, फिर कभी आना | ऐसे पटाकर रवाना कर देना | तो उसके बेटे कृपालु ने व्यासजी को रवाना कर दिया | लेकिन व्यासजी चुप कब रहने वाले थे | जब भी घूमने जाते तो भील कभी कभार मिल जाता | तो उसी पुरानी पद्धति से व्यासजी को रवाना करते | २५ सौ बार व्यासजी रवाना हुए लेकिन निराश नही हुए | खजूर का रस निकलने वाली तुच्छ विद्या के लिए भी महापुरुष कितने तत्पर रहते हैं | २५ सौ बार जाने के बाद उस कृपालु को व्यासजी पर दया आ गयी | पूछा के आप मेरे पिताजी से क्या लेना चाहते हैं ? आपने तो १८ पुराण लिखे हैं, ४,००,००० श्लोक में | १,००,००० श्लोक वाला महाभारत जैसा महान ग्रन्थ लिखा है आपने | आप पांडू और धृतराष्ट्र के पिता और पांडवो और कोरवों के दादा हो | श्री कृष्ण, ऋषि मुनि आपका आदर करते हैं | आप हम जैसे भीलों के घर बार-बार आते हो और खाली जाते हैं | क्या आपको अपमान का दुःख नही होता है ? बोले अपमान और मान तो सपना है | सुखी-दुखी होना तो मुर्ख बच्चों का काम है | अपना उद्देश पूरा करना चाहिए | व्यासजी की समता और सरलता देखकर कृपालु का हृदय द्रवीभूत हो गया | बोले वो मंत्र अगर आप लेना चाहते हैं तो वो मेरे को मेरे पिताजी ने दिया है मैं दे देता हूँ | व्यासजी ने विधिवत श्रद्धा से मंत्र लिया | व्यासजी तो अपने आश्रम की तरफ चले | वो भील जब आया तो अपने बेटे से पूछता है क्या उनको तू कुछ बता रहे थे | बोले मैंने उनको मंत्र दिया | बाप ने सिर कुटा के जो मंत्र मैं नही देना चाहता था वही मंत्र तुने दिया | उनमें श्रद्धा नही होगी तो मंत्र फलेगा नही | तत्परता, सयम, श्रद्धा नही होगी तो फलेगा नही | परीक्षा लो | व्यासजी आश्रम में ऊँचा सत्संग कर रहे थे के वो भील का लड़का आया | सत्संग चल रहा था के मनुष्य को सुख-दुःख का भोगी नही होना चाहिए | जो दुःख को सुख से दबाना चाहता है उसका दुःख बार-बार आता है | जो सुख से संसार में रहना चाहता है उसको संसार सताता है | संसार में सुख नही है | सुख अपने आत्मा में है | और बाहर का सुख आये तो बहुतों के लिय बाँट देना चाहिए | और दुःख आये तो सुख से दुःख को नही दबाना चाहिए | दुःखहरी हरी में प्रीति करें और वासनाओं को मिटाए | दुःख में कोई निर्णय ना लें, गलत निर्णय लेंगे | दुखी होकर, रोगी होकर, आवेश में आकर, अस्वस्थ होकर कोई निर्णय नही लेना चाहिए | निर्णय शुद्ध बुद्धि से शुद्ध समय में लेना चाहिए | जो भी बड़े-बड़े निर्णय होते हैं वो सुबह में ही लेने चाहिए, सात्विक वातावरण में | आपके निर्णय आपको गिराने वाले ना हो | भगवान की तरफ बढ़ाने वाले हों | शरीर के अभिमान के कारण भगवान से लड़कर निर्णय मत करो | मान-अपमान होता है तो शरीर का होता है | भगवान वेद व्यासजी बड़ी ऊँची बात बता रहे थे | भील के लड़के पर नजर गयी तो उठके खड़े हो गए | उसको आदर से लाये और उसका सम्मान किया | भील का लड़का अपने बाप को बताता है के हम तो तुच्छ लोग हैं | जरा सा खजूर का रस लेने वाला मंत्र बताया तो इतना आदर किया मेरा वेद व्यास भगवान ने | तो जो भगवान को पाने का, विकारों पर विजय पाने का, जन्म-मरण के चक्कर से बचने का उपाय बताते हैं, ज्ञान देते हैं, ऐसे गुरूओं का आदर तो जितना करो उतना कम है | गु माना अंधकार, रु माना पाप राशि को नष्ट करने वाला | गु माना आत्मा का ध्यान करने वाला | रु माना ईश्वरीय ऐश्वर्य को जगाने वाला | गुरु शब्द का बड़ा भारी महत्व है | और ये गुरु पूर्णिमा है | लघु को गुरु कर दे | शरीर लघु, मन लघु, विकारों में फसने वाला जीव, इन विकारों से छुटकर आत्मा को पाए इसीलिए व्यास पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा है | 
तीर्थ का फल पुण्य होता है, पुण्य सुख देकर नष्ट हो जाता है | पाप दुःख देकर नष्ट हो जाता है | लेकिन गुरु पूर्णिमा का पूजन और पुण्य नष्ट नही होता है |
तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार ||
     ये गुरु पूर्णिमा का फल, पूर्णिमा का फल, सत्संग का फल अनंत होता है । अपने जीवन में अब पक्का करो के चतुर्मास का अब एक महीना रहा है | संयम रखेंगे, ब्रह्मचर्य पालेंगे | रात्रि को १० से ३ के बीच जगना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | सुबह ४ से ५ के बीच प्राणायाम करना प्राणबल, मनोबल, बुद्धिबल बढ़ाने के लिए बेजोड़ है | 
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं हे महाबाहो, जो मनुष्य किसी से द्वेष नही करता, किसीसे आकांक्षा नही करता, वह सदा सन्यासी समझने योग्य है | क्योंकी वो द्वन्दों से रहित मनुष्य सम्पूर्ण संसार बन्धनों से मुक्त हो जाता है | गीता के पाँचवे अध्याय का तीसरा श्लोक है जब भी कर्म करो तो द्वेष से प्रेरित होकर ना करो | दक्ष प्रजापति ने यज्ञ कर्म किया लेकिन द्वेष से भरकर किया तो सिर कटवाना पड़ा | राग, द्वेष से प्रेरित होकर नही, भगवान की प्रसन्नता से प्रेरित होकर कर्म करो | कामना बढ़ाने वाला कर्म जीव को बंधन में डालता है | लेकिन कामना मिटाने वाला कर्म जीवात्मा को परमात्मा से मिलाता है |
परहित सरिस धर्म नही भाई |
    रामायण में भी कहा और वेद व्यासजी भी कहते हैं, परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीरन | दूसरे को पीड़ा देकर जो सुख भोगता है उसको प्रकृति बड़े दुखो में घसीटती है | आपके द्वारा किसी को पीड़ा ना पहुँचे इसका ख्याल रखना | परोपकाराय, पुण्याय, किसी प्राणी का तन से, मन से, वाणी से उपकार हो इसका ख्याल रखे | जो परहित में नही लगता, उसकी वासनाए नही मिटती, उसका अपना हित नही होता है | राग और द्वेष का त्याग करे बिना कोई सन्यासी नही होता है | व्यवहार में बाहर का सबंध दिखते हुए भी भीतर अपना अहंकार और वासना नही है तो वो सन्यासी है | वो द्वन्दों से मुक्त है | भोगों, वाहवाही, सुविधा-असुविधा को महत्व ना दे | समता को महत्व दे वो सन्यासी योगी हो जाता है | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय...........|
 गुरु पूर्णिमा के महादिवस पर सुबह ८:५८ के बाद १०८ बार जप करें :-
ॐ ऐम ह्रीं श्रिम क्लिम वाग वादिनी सरस्वति मम जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐम ह्रीं श्रिम क्लिम नमह स्वाहा ||
    और रात को को ११ से ११:४८ के बीच जिव्हा पर लाल चन्दन से सोने की सिलाई से ह्रीं लिखे |  इसमें ५ बीज मंत्र हैं और २ बार आये हैं तो १० बीज मंत्रो का प्रभाव आ गया | एक भी बीज मंत्र होता है जिस मंत्र में, जैसे बम बीज मंत्र है, वो घुटनों के दर्द को और वायु की ८० प्रकार की बिमारियों को मार भगाता है | बम बीज मंत्र है शिवजी का | इस में तो ५ बीज मंत्र हैं और उनकी फिर पुनरावृति है | एक बार ये मंत्र बोलने से १० बार बीज मंत्र का उच्चारण होता है | इसलिए ये बड़ा प्रभावशाली है |
मंत्र जप के प्रभाव से बारिश-
     मंत्रो की सच्चाई गजब की है | हम जयपुर जाने वाले थे और अजमेर में ठहरे थे, ढुंगरिया गाँव के आश्रम में ठहरे थे, एकांत आश्रम है लेकिन वहां पानी की किल्लत थी बरसात कम पड़ी थी । हमने हमारे सेवकों को बोला तुम आहुतियाँ डालो, हम भी बैठे थे, लोगों को बोला संकल्प करो कि इस ढुंगरिया गाँव क्षेत्र में बरसात हो । साढ़े पाँच बजे यज्ञ पूरा हुआ और हम लोग कार में बैठे, देखा बरसात हो गयी, गाड़ी चलते-चलते किशनगढ़ पार नहीं किया उसके पहले खबर हुई कि बरसात चालू हो गयी है । धूप थी और बरसात चालू हो गयी । भले बरसात थोड़ी देर हुई लेकिन बाद में पता चला कि ढुंगरिया गाँव के आसपास के गाँवों में भी ठीक-ठाक बरसात हुई । तो मंत्रों में बड़ी शक्ति होती है । 
 मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा पंचम भक्ति अवेद प्रकाशा |
     भक्ति मार्ग का पाँचवा सोपान है मंत्र जाप | भगवान वेद व्यासजी का बड़ा उपकार रहा मानव जाति पर | देवताओं ने वेद व्यासजी को प्रार्थना किया के कोई भी देवी-देवता का पूजन करते हैं तो वो सुख फल देकर नष्ट हो जाता है | लेकिन गुरु का पूजन शाश्वत फल देता है | तो उनकी पूजा का कोई वार्षिक और साप्ताहिक दिवस | सोमवार और शिवरात्रि शिवजी का है, मंगल और शनि हनुमानजी का है | हनुमान जयंति हनुमानजी का है | ऐसे ही गुरुवार गुरु पूजन का दिवस और व्यास पूर्णिमा वार्षिक दिवस गुरु के पूजन, ध्यान, धारणा के लिए | 
सावनी पूनम ब्राह्मणों का विशेष त्यौव्हार माना जाता है | और दशहरा क्षत्रियों के लिए | दीवाली वैश्यों के लिए और होली चारों वर्णों के लिए | लेकिन ये गुरु पूनम तो चारों वर्णों के लिए तो है ही है, लेकिन देवता भी ब्रहस्पति का पूजन करते हैं, दैत्य भी अपने गुरु का पूजन करते हैं और भगवान राम और कृष्ण भी अपने गुरु का आदर, पूजन करते हैं | जो गुरु का आदर, पूजन करता है, वो अपने जीवन का ही आदर, पूजन करता है | अपने ज्ञान का, अपने लक्ष्य का आदर, पूजन करता है | मन की चाही बात हो जाये तो उसमे ज्यादा खुश मत हो जाओ | नही तो उसमे फसोगे, धीरे-धीरे आदत बिगड़ेगी | मन के विपरीत हो तो भी सम रहो और मन के अनुकूल हो तो भी सम रहो | इसको भगवान ने उत्तम योग बताया है |
समत्व योगम मुच्यते, सुखम वा यदि वा दुखम, सैयोगी प्रमोमता ||
     सुखद, दुखद अवस्था में फसो मत, ये तो अवस्था आती-जाती है | लेकिन तुम रहने वाले हो | अपने रहने वाले स्वभाव की स्मृति करो | एक होता है क्रिया प्रधान साधन | और दूसरा होता है विवेक प्रधान साधन | तो क्रिया प्रधान साधन में विवेक पर्याप्त नही होता है | क्रिया तो करता रहा, तीर्थ में भी गया, उपवास भी किया, जप भी किया | लेकिन सत्संग में नही गया और विवेक का आश्रय नही लिया तो फिर गलत निर्णय करेगा | जैसे पतंगियों में विवेक नही है तो फिर-फिर से गिरते हैं | जलते हैं तो किनारे हो जा, नही फिर जलते हैं | दारुडिया, पान मसाला खाने वाले में विवेक नही तो फिर-फिर से | व्यसनी में विवेक नही तो फिर-फिर से व्यसन में गिरता है | लेकिन साधक को विवेक वान होना चाहिए | 
व्यसनियों से ज्यादा बुद्धिमान तो बंदर हैं !!! -
      मैं तो नायजिरिया के एक बंदर को शाबाश देता हूँ | वहाँ के एक सरकारी इंजीनियर ने बंदर पाल रखा था | उसको ठेकेदार डिनर पर बुलाते, शराब की बोतले खुली तो सबने पिया तो उसने अपने बंदर को भी पिलाया | बंदर तो नकल करता है | तो वो भी पिए | उसकी इतनी सी खोपड़ी | उसने एक प्याली पी तो नशा-नशा हो गया, बेजार हो गया | मालिक ले गया उसको | फिर १० दिन बाद दूसरी जगह महेफिल हुई | बंदर को ले गया, वहाँ भी प्यालियाँ खुली, तो बंदर ने मुँह मोड़ लिया | उसके मालिक ने फिर कोशिश की उसको पिलाने की | बंदर ने तो खूब गुस्सा दिखाया | इतने नालायक लोग हैं की अगली बार प्याली पीकर इतनी तकलीफ हुई फिर प्याली पीकर मुझे पीला रहे हैं | उस बंदर को जितनी अक्ल थी, उतनी शराबियों को होती तो कितना भला हो जाता | 
 
     रामायण में सवाल आता है कि सबसे उत्तम शरीर कौन-सा है | नर तन सम नही कौनो देहि | मनुष्य शरीर सबसे उत्तम है लेकिन सबसे अधिक दुःख क्या है | दरिद्र सम दुःख जग नाही । और रुपय-पैसों की दरिद्रता कोई दरिद्रता नही है, जिसके पास भावना, ज्ञान नही है वो बहुत दुखी होता है | रुपय-पैसों की कमी तो शबरी के पास भी थी लेकिन वो फिर भी सुखी थी | क्योंकी सत्संग था | सत्संग से भाव, ज्ञान की दरिद्रता मिट जाती है | तो बाकि की दरिद्रता का कोई महत्व ही नही होता है | इसलिए सत्संग सर्वोपरी चीज है | सत्संग के ग्रन्थ बार-बार पढ़ना चाहिए | बिन सत्संग विवेक न होई | 
उम्र के अनुसार खान-पान -
    ६ से १९ साल तक के बच्चो को कैसे, क्या खाना, खिलाना चाहिए उसका ध्यान रखना चाहिए | ६ से १२ तक बाल्य अवस्था, १३ से १९ तक यौन शुरू होता है किशोर अवस्था छुटती है | शरीर की हड्डियाँ तेजी से बढ़ती हैं, विकास होता है | तो केल्शियम की आवश्यकता पडती है | दूध, छाछ, दही. मक्खन, तिल, मूँगफली, पत्ता गोभी, गाजर, गन्ना, संतरा, सुखा मेवा, शलगम पर्याप्त केल्शियम वाला भोजन खिलाना चाहिए | लोह की कमी होने से बौद्धिक कमजोरी रहेगी | शारीरिक विकास में रुकावट होगी | सब्जी, मेथी, अंजीर, काजू, पुदीना, खुरमानी, खजूर, टमाटर, अंगुर, आदि का उपयोग करना चाहिए | २० से ३० साल की उम्र तक शरीर में एंटी ऑक्सीडेंट की जरूरत होती है | फोलिक ऐसिड की | वि.इ. और वि.सी. विटामिन्स की | लोह तत्व, मासिक धर्म धारण के लिए दुगने की आवश्यकता होती है | लोह तत्व स्त्रियों के जीवन में विशेष चाहिए | आलू-बुखारा खाना चाहिए, मुनका, जामुन, बेर, नारंगी, काले अँगुर, स्ट्राबैरी आदि महिलओं को खाना चाहिए | बुढ़ापे को रोकने के लिए नारंगी और नारियल आदि का उपयोग करना चाहिए, मालिश आदि करना चाहिए | 
    अब बरसात को रोकने के लिए करना है क्या कुछ, बरसात लाने का मंत्र भी है, रोकने का भी मंत्र है । मंत्र है बरसात रोकने का - ‘स्तमभया स्तमभया वर्षां स्तमभया स्तमभया’ वो थोड़ी देर करें तो वर्षा रुक सकती है । रोकना है क्या बरसात ? नहीं रोकना है, चलो ठीक है । ॐ...निद्रा लाने का भी मंत्र है और निद्रा रोकने का भी मंत्र है । ॐ...हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ । 

 

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

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