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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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Admin
/ Categories: PA-000201-Vaastu

वास्तु शास्त्र

मानवीय जरूरतों के लिए सूर्य, वायु, आकाश, जल और पृथ्वी – इन पाँच सुलभ स्रोतों को प्राकृतिक नियमों के अनुसार प्रबन्ध करने की कला को हम वास्तुशास्त्र कह सकते हैं। अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँच तत्त्वों के समुच्चय को प्राकृतिक नियमों के अनुसार उपयोग में लाने की कला को वास्तुकला और संबंधित शास्त्र को वास्तुशास्त्र का नाम दिया गया है। वर्तमान युग में वास्तुशास्त्र हमें उपरोक्त 5 स्रोतों के साथ कुछ अन्य मानव-निर्मित वातावरण पर दुष्प्रभाव डालने वाले कारणों पर भी ध्यान दिलाता है। उदाहरण के तौर पर विज्ञान के विकास के साथ विद्युत लाइनों, माइक्रोवेव टावर्स, टीवी, मोबाइल आदि द्वारा निकलने वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगें आदि। ये मानव शरीर पर अवसाद, मानसिक तनाव, हड्डियों के रोग, बहरापन, कैंसर, चिड़चिड़ापन आदि उत्पन्न करने का एक प्रमुख कारण पायी गयी हैं। कैंसर जैसे महारोग के प्रमुख कारणों में विद्युत भी एक है। आधुनिक विज्ञान ने इन दुष्परिणामों को मापने के लिए मापक यंत्रों का भी आविष्कार दिया है, जिससे वातावरण में व्याप्त इनके घातक दुष्प्रभावों का मापन कर उन्हें संतुलित भी किया जा सके। पंचतत्त्वों से निर्मित मानव-शरीर के निवास, कार्यकलापों व शरीर से संबंधित सभी कार्यों के परिवेश अर्थात् वास्तु पर पाँचों तत्त्वों का समुचित साम्य एवं सम्मिलन आवश्यक है अन्यथा उस जगह पर रहने वाले व्यक्तियों के जीवन में विषमता पैदा हो सकती है।
हमारे पुराने मनीषियों ने वास्तुविद्या का गहन अध्ययन कर इसके नियम निर्धारित किये हैं। आधुनिक विज्ञान ने भी इस पर काफी खोज की है। विकसित यंत्रों के प्रयोग से इसको और अधिक प्रत्यक्ष व पारदर्शी बनाया है। शरीर पर हानिकारक प्रभाव डालने वाली उच्च दाब की विद्युत, चुम्बकीय, अल्फा, बीटा, गामा व रेडियो तरंगों के प्रभाव का मापन कर वास्तु का विश्लेषण किया जा सकता है। वर्तमान में हम किसी भी मकान, भूखंड, दुकान, मंदिर कारखाना या अन्य परिसर में वास्तु की निम्न तीन तरह से जाँचकर मानव-शरीर पर इसके प्रभावों की गणना कर सकते हैं।
परम्परागत वास्तुः विभिन्न दिशाओं में आकृति, ऊँचाई, ढाल तथा अग्नि, जल, भूमि, वायु, आकाश के परस्पर समायोजन के आधार पर।
वास्तु पर पड़े रहे प्रभावों का मापनः आधुनिक यंत्रों की सहायता से परिसर व भवन में व्याप्त प्राकृतिक व मानव निर्मित कृत्रिम वातावरण से उत्पन्न विद्युतीय एवं अन्य तरंगों के प्रभावों का अध्ययन (एन्टिना तथा अन्य वैज्ञानिक यंत्रों, गास मीटर, विद्युत दाब (E.M.F.) का मापन द्वार निर्मित वास्तु∕भूमि पर पड़ रहे विभिन्न प्राकृतिक व कृत्रिम प्रभावों का मापन न निष्कर्ष)।
वास्तु क्षेत्र एवं वहाँ के रहवासियों के आभामंडल(Aura) का फोटो चित्रण तथा रहवासियों के हाथ के एक्यूप्रेशर बिन्दुओं का अध्ययन आधुनिक विज्ञान ने परम्परागत वास्तु के नियमों को न केवल सही पाया बल्कि मानव निर्मित उच्च दाब की विद्युत लाइनों व अन्य कारणों, मकानों-परिसर व मानव शरीर पर इसके दुष्प्रभावों की जानकारी देकर इसे और व्यापक बनाया है। हाल ही में वास्तु के आभामंडल के चित्रण एवं एक्यूप्रेशर के यंत्रों द्वारा मानव शरीर पर वास्तु के प्रभावों के अध्ययन ने तो इसको और भी ज्यादा स्पष्ट कर प्रभावी विज्ञान का दर्जा दिया है। वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों का पालन करने से उनमें रहने वालों की भौतिक आवश्यकता के साथ-साथ मानसिक एवं आत्मिक शांति की प्राप्ति भी होती है। भवन कितना भी सुविधाजनक और सुन्दर हो यदि उसमें रहने वाले अस्वस्थ, अशांत अथवा अनचाही परिस्थितियों में घिर जाते हों और ऐच्छिक लक्ष्य की प्राप्ति न होकर अन्य नुकसान होता हो तो ऐसा भवन∕वास्तु को त्यागना अथवा संभव हो तो उसमें वास्तु अनुकूल बदलाव करना ही श्रेयस्कर होता है। वास्तु से प्रारब्ध तो नहीं बदलता परंतु जीवन में सहजता आती है। वास्तु सिद्धान्तों को मानने से जीवन के कठिन काल के अनुभवों में कठिनाइयों कम होती हैं और सुखद काल और भी सुखद हो जाता है।
वास्तु सिद्धान्तों के पालन से भवन की मजबूती, निर्माण अथवा लागत में कोई अन्तर नहीं आता केवल दैनिक कार्यों के स्थल को वास्तु अनुकूल दिशाओं में बनाना जरूरी होता है इस परिप्रेक्ष्य से वास्तु को "अदृश्य या अप्रगट भवन निर्माण तकनीक" (Invisible architecture) भी कहा जाता है।
 


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