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गुरु की बात को पकड़ लो !

गुरु की बात को पकड़ लो !
P.P.Sant Shri Asharamji Bapuji  - Haridwar (Ekant) Satsang – 14 May 2013 – Part - II


 मनुष्य ईश्वर को पा सकता है | ईश्वर क्या होता है? जिसको कभी छोड़ नहीं सकते और संसार क्या है ? जिसको आप सदा रख नहीं सकते | जिसको रख नहीं सकते वो संसार है, और जिसको छोड़ नहीं सकते वो अपना आपा है ब्रम्ह है, ईश्वर है | शरीर तो छोड़ देंगे लेकिन आत्मदेव को नहीं छोड़ सकते | नरक में भी तो चैतन्य रहेगा ही, नरक का प्रतिकूलता का ज्ञान किसको होता है | चैतन्य को होगा की जड को होगा? चैतन्य को होगा | स्वर्ग का ज्ञान किसको होता है? जड को होगा की चेतन को होगा ? चेतन को होता है | जो चेतन है वो विमल है अर्थात निर्मल है और सहज सुख राशी है | तुलसीदास ने कहा, चेतन विमल सहज सुख राशी, सो माया वश भव गोसाई | वो चेतन है विमल है उसमें मल नहीं है, राग द्वेष, काम, क्रोध ये सब मन में है, शरीर में है, आत्मा में नहीं है | ईश्वर अंश जीवन अविनाशी चेतन, विमल सहज सुख राशी | सौ माया वश भव गोसाई मरे जीव मर्कट की नाई | जैसे बंदर सकडे मुँह के बर्तन में हाथ डालता है, तो मुट्ठी बंद हो जाती है, अब वो पैर, हाथ, सिर, पूछ पछाड़ता है, डबल और सिंगल भी कर देता है, सब कर देता है लेकिन जो करना चाहिए उतना ही नहीं करता | मुट्ठी खोल दे तो अभी मुक्त है, लेकिन अभी मुट्ठी बंद है तो पकड़ा है, अपनी पकड़ से | ऐसे ही हमने नासमझी की मुट्ठी बांध रखी है | तुम दु:खो में, जन्म-मरण में साधन करते हुए भी दु:खों का अंत नहीं कर पाते, क्योंकी अपने को जीव मानते, अपने को कर्म का कर्ता मानते, बाहर से सुख अंदर भरने की गलती करते | रात को कुछ नहीं होता फिर भी कैसी सुखद नींद आती है | भीतर अपना सुखरूप है | जिसको महत्व दिया जैसे मोगरे का गजरा बहुत अच्छा है, आपने महत्व दिया तो वो कीमती हो गया | जिस जमींन को जिस बस्ती को तुम महत्व देते हो, वहां की जमीने महेंगी हो जाती है | जिसको महत्व नहीं देते है, वो जमीने सस्ती पड़ी रहती है |

तो आप चैतन्य हो जिसको महत्व देते हो जिसमे रस देखते हो वो रसमय हो जाता है | सुन्दरे ने देखी अपनी सुन्दरी, तो बाँछे खिल गयी सुन्दरी देखा सुन्दरा तो बाँछे खिल गयी, लेकिन कुत्ता-कुत्ती उनको देखें तो उनको कुछ भी नहीं और कुत्ता अपनी कुत्ती को सुंदरी मानेंगा तो अपनी मान्यता तो वो सुंदर लगते है, सुख के साधन लगते है | वास्तव में आप अपने चैतन्य का सुख उधर उधेलते | जैसे कुत्ता हड्डी लेके चबाता है लेकिन हड्डी में तो कुछ रस नहीं है और हड्डी चबाते-चबाते उसके मसुडो को को हड्डी की ठोकर लगता है, तो खून निकलता है, तो कुत्ता समझता है की इसमें से आ रहा है | ऐसे ही अपने ही रस से जगत रसमय हो रहा है | जैसे शराबी, कबाबी, जुआरी को शराब कबाब मिले तो उसको रस आ रहा है, क्योंकी उसने उसको महत्व दिया | अमलानंद के आगे ये चीज  ला के रखों तो चिड जायेगें बोले ऐसी चीज साधू के आगे रखते है, जिधर रखी आसन को भी फेंक देंगे |

तो भागवत कहते है कि, भगवान कैसे है? भगवान रसस्वरुप है | रसो वैसो वैश्नावरों | नर जो अन्न को पचाते है, अन्न में से रस बनाते है, मन और बुद्धि बनाते है, वो सब प्राणियों के ह्रदय में है | जैसे आकाश सब घरो में है, सब गिलासों में, सब कुल्लरो में आकाश है उससे भी सूक्ष्म चैतन्य परमात्मा है | तो परमात्मा रस स्वरुप भी है और चेतन स्वरुप भी है और ज्ञान स्वरुप भी है | और सूक्ष्म इतना है की छोटे से छोटी चीज खोजना है की परमात्मा | भगवान से छोटा कोई नहीं | और बड़े से बड़े कोई चीज खोजनी है तो परमात्मा, भगवान से बड़ा कोई नहीं | जैसे आकाश में छोटी से छोटी चीज वस्तु में भी आकाश है, तो छोटे में छोटा आकाश है और सारे चौदाह, चौदाह लोक आकाश के अन्दर है तो बड़े में बड़ा आकाश है | ऐसे ही शास्त्र  कहते है  अनुव अनुव: महत्व महिया, बारीक़ से भी बारीक़ वो परमात्मा है, और महान से भी महान,  व्यापक से भी व्यापक वो परमात्मा है | वही अपना आत्मा है, वही से मैं स्फुरता है | मैं दुखी, मैं सुखी, मैं जहाँ से स्फुरता है, मैं वही हूँ, ये साक्षात्कार है | जहाँ से मैं उठता है, सोSहम.. सोSहम... ये मानसिक जप बहुत अच्छा है, लेकिन उससे भी आगे जाना है | ये प्राण जपते है, मन जपता है, तो उसको जाननेवाला मैं उसका भी उदगम स्थान अधिष्ठान, जप का भी अधिष्ठान, तप का भी अधिष्ठान |
 

कर्म तीन प्रकार के होते है, कर्म, अकर्म और विकर्म | जैसे ये सब करते है यज्ञ, दान ये तो ये सब कर्म है | विकर्म वो है हिंसा किया, दुःख दिया, किसीको सताया विपरीत कर्म ताप कर्म है विकर्म है | तो कर्म भी बांधते है, विकर्म नीचता में ले जाते है, गन्दी जगह बांधते है | कर्म ठीक ठाक जगह बांधते है | लेकिन अकर्म कर्म तो करे लेकिन फल की इच्छा न रखे, जप तो करे फल की इच्छा न रखे, परोपर करे फल की इच्छा न रखे, कर्म करके छोड़ देते, कर्म का आरंभ भी होता है और अंत भी होता है, कर्म का जीव भी होता है और अंत भी होता है | तो ऐसे कर्म का फल भी जीव अंत होता है | तो कर्म फल भोगनेवाले शरीर का भी जीव अंत होता है | लेकिन आत्मा परमात्मा का आदि अंत नहीं है , परमात्मा अनादि है और अनंत है अंत नहीं है | वही परमात्मा अपना आत्मा है, वास्तव में वही अपना है | कर्म जो करते और उसका भोग भी करते और छोड़ते है लेकिन अपने आपको हम छोड़ सकते हैं क्या ? हमने पाप कर्म किये और नरक घूम के आये, हमने पूण्य कर्म किये स्वर्ग घूमके आये हमने मिश्रित कर्म किये तो मनुष्य लोक में सुख दुःख के ठोकरे खा रहे है | लेकिन हम अपने आपको छोड़ सकते है क्या ? जिसको आप कभी नहीं छोड़ सकते वो परमेश्वर आत्मदेव है, वही मैं हूँ | छे हजार वर्ष की तपस्या से जो नहीं मिला वो इस ज्ञान से मिल जाएगा | सोने की लंका बनाने के बाद भी जो सुख नहीं मिला वो उससे ज्ञान से मिल जायेगा | ये ऐसी ऊँची आत्मविद्या है, इसी विद्या को सब विद्याओ का राजा बोलते है | गीता में भगवान ने कहा-  राज विद्या राज गुइह्म, पवित्रं मिदं उत्तमम | प्रत्यक्ष धर्ममय प्रत्यक्ष फल देती है, अभी यज्ञ करो तो धुआ चाटो मिलेगा स्वर्ग तभी मिलेगा, अभी दान करो उसका जब उसका दस मन होगा, तभी उसका फल मिलेगा तभी मिलेगा | लेकिन ये ब्रह्मज्ञानी की विद्या का प्रत्यक्ष फल है और सुगम भी है | यज्ञ में तो चीज  वस्तु भी जुटाओ, रूपया-पैसा चाहिए, इसमें तो खाली गुरु बोल रहे है, खाली उस बातको तुम स्विकार करो पकड लो बस | कृष्ण गुरु बोल रहे है और अर्जुन ने पकड लिया तो अर्जुन का दुःख बचा नहीं, सुख मिटा नहीं | रामजी और सीताजी बोलते है और हनुमानजी ने पकड लिया और हनुमानजी हो गये ब्रम्हवेत्ता | अष्टावक्र बोलते है और जनक ने पकड लिया हो गये जनक राजा पार | तो ऐसे ही तोतापुरी गुरु ने बोला और गदाधर पुजारी ने पकड लिया तो हो गये रामकृष्ण परमहंस | लीलाशाह गुरु ने बोला और आसुमल ने पकड लिया तो हो गये आशाराम बापू तुम्हारे सामने है | खाली गुरु की बात को पकड लो बस और पकड में नहीं आती, नहीं बैठती तो उसके उपाय है | ऐसी ऊँची विद्या है, राज विद्या राज गुह्यं और जिनको नहीं है उनको दो चार बच्चे करना और पेट भरने तक की बुद्धि नहीं दिया है | वो तो मच्छर को भी है वो भी बच्चे पैदा कर लेता है, पेट भर लेता है, अपना घर मकान वैसे मच्छर का भी फार्म हाउस होता होगा | सोने की लंकावाला भी रो के गया | मेरी दो फैक्ट्रिया है, मेरी १० कोठिया है, मेरे १० आश्रम है, ये सब छोटी चिजे है | मैं कौन हूँ इसको जान लो, देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया, ना छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया |
   

ऐसा एक संत उनका नाम था डायोजिनीस, उन्होंने देखा की सिकंदर आ रहा है | तो वो संत जान बुजकर पतली गली में लेट गए तो रास्ता बंद हो गया | मंत्री ने बताया सिकंदर को की एक संत है, पैर पसार के रास्ता बंद करके लेट गये | तो महान सिकंदर बोला विश्व विजय करने आया और हमारे रास्ते में कौन पैर पसारते, रुको मैं खुद देखता हूँ | डायोजिनीस  को देखते ही वो ठंडा हो गया, के ये आदमी इतना प्रसन्न होकर धरती पे पड़ा है, न सेना है न राज है, न चीज वस्तु है, न हुकुमत है और चेहरे पर इतनी शांति और ख़ुशी | बोले तुम कौन हो? रास्ता रोक के पैर पसार के पड़े हो, बड़े खुश नजर आते हो | संत बोले तुम कौन हो, बोले महान सिकंदर विश्व विजय करने को निकला हूँ | तो वो संत ठाहका मारके हँसे, उनकी हंसी में बड़ा आध्यात्मिक व्यंग था लेकिन हंसी भी बड़ी प्यारी थी | संत की हंसी तो संत ही जाने, साधक जाने | वो भी कुछ थोडा बहुत अक्लवाला था, उनकी हंसी देखकर प्रमाण हो रहा है | बोले तुम इतने खुश, मैं महान सिकंदर विजय करने को जा रहा हूँ | संत बोले विजय, बोले विश्व विजय संत बोले आजतक कोई कर सका है क्या ? विश्व पर कोई विजय होती है ? विजय जब भी होगी अपनेपर होगी, कैसे आदमी हो अपने आप पर विजय पाओ विश्व की विजय पा कर क्या करोगे ? विश्व विजय नहीं होता है, अपने आप पर देखो कितनी ख़ुशी है कितनी व्यापकता है | अपना आपा इतना विजयी है की महाप्रलय भी उसको कुछ नहीं कर सकता, ३३ करोड़ देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी उसका कुछ बिगाड नहीं सकते ऐसा अपना आप है | बोले, बाते तो तुम्हारी अच्छी लगती है, मुझे पसंद भी है लेकिन मैं जरा विश्व विजय करके फिर आता हूँ तुम्हारे पास | संत बोले फिर नहीं आ सकोगे, विश्व विजय नहीं होता है अभी जगा है मेरे पास में यहाँ बैठो और अपने उपर विजय पा लो | | अपने पर विजय पाना है तो जरुरी लेकिन अभी जाने दो बाद में आऊंगा | संत बोले जाते तो जाओ लेकिन वापिस आ नहीं पाओगे और वो आ भी नहीं सका रास्ते में ही मर गया | अपने पर विजय पाना आसन है , विश्व पर विजय पाना असंभव है | क्या रावण पाया विश्वपर विजय ? नहीं पा सका, क्या हिरणाकश्यपु पा सका ? नहीं पा सका, जिनकी सोने की हिरणपुर थी, ४०० से ४०० कोस में जिनकी सोने की लंका थी वो भी विश्व पर विजय नहीं पा सके | लेकिन शबरी भिलन ने अपने मन पर विजय पा ली बस गुरु के ज्ञान में लग गयी | रामकृष्ण ने पा ली विजय गये ऊँची  स्तिथि | अमल सदा आनंद में रहो आपने आप, रामा रहो अपने आप, तुम को क्या चिंता पड़ी को कव्वे का बाप | क्यों चिंता करते हो ? अपने आत्मा में विजयी हो जाओ | चिंतासे चतुराई घटे, घटे रूप और ज्ञान, चिंता बड़ी अभागिनी चिंता चिता समान | 


नारायण हरि हरि ॐ हरि नारायण नारायण नारायण नारायण | 

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