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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

मन्त्रजाप के समय कभी ध्यान लगता है कभी इधर उधर भतकता है जो ना सोचने की कोशिश करो वही विचार अधिक आते है इससे बचने की युक्ती बताइये प्रभू?

मन्त्रजाप के समय कभी ध्यान लगता है कभी इधर उधर भतकता है जो ना सोचने की कोशिश करो वही विचार अधिक आते है इससे बचने की युक्ती बताइये प्रभू?

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गुरुदेव ! सदा और सर्व अवस्थाओ में अद्वैत की भावना करनी चाहिए पर गुरु के साथ अद्वैत की भावना कदापि नही करनी चाहिए - ऐसा जो कहा गया है उसका रहस्य समझाने की कृपा करें।

पूज्य बापूजी :- सब जगह अद्वैत ब्रम्हा है, ऐसी भावना करनी चाहिए लेकिन गुरुदेव के साथ अद्वैत की भावना नही करनी चाहिए क्योंकि अद्वैत मतलब 'सबमे मैं ही हूँ।' गुरु के साथ अद्वैत की भावना करोगे तो शिष्टाचार को धक्का लगेगा। इसमें शास्त्र वचन है : 
या  पर्यंत जीवेत् त्रयो वंद्य:
ईश्वरो गुरुर्वेदांतश्च। 
जब तक जिये तब तक ईश्वर, गुरु और वेदांत - तीनो को आदर से देखे, तीनो वंदनीय है। गुरु से अद्वैत भाव करोगे, शिष्टाचार नही रखोगे तो गुरु के हृदय में तुम्हारे लिए अहोभाव कैसे झलकेगा ? मैं अगर गुरुदेव के साथ अहोभाव-आदरभाव नही रखता, अद्वैतभाव करता तो कही का न रहता। कितनी कृपा है वेद -शास्त्रो की ! सब जगह अद्वैत भाव करो तो राग द्वेष मिटेगा लेकिन गुरु के साथ अद्वैतभाव करोगे तो उच्छ्रंखल हो जाओगे। तो यह शास्त्र की कृपा है कि हमको उच्छ्रंखल होने से बचाता है।
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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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