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ईश्वर है इसका अकाट्य प्रमाण क्या है ?

 ईश्वर है इसका अकाट्य प्रमाण है कि तुम हो। 'मैं हूँ कि नही ?' ऐसा तुम कभी बोल सकते हो। चाहे मैं अमीर हूँ, गरीब हूँ, वकील हूँ, मैं सेठ हूँ, मैं माई हूँ, मैं भाई हूँ लेकिन मैं हूँ। 'यह हूँ, वह हूँ...' यह वह बदलेगा लेकिन 'हूँ' रहेगा। तो ईश्वर के अस्तित्व का अकाट्य प्रमाण यही है कि तुम हो। तुम्हारा आत्मा होगा, तुम होंगे तभी तो बोलोगे कि 'यह ईश्वर है।' तो ईश्वर के दृष्टा भी तुम्ही बनोगे। तुम्हारे सिवाय ईश्वर दिखेगा तो किसको दिखेगा ? ईश्वर मिलेगा तो किसको मिलेगा ? तो ईश्वर के होने का अकाट्य प्रमाण है कि तुम सदा हो - आदि में थे, अभी हो और सदा रहोगे। अपने को नही जानते तो जन्म - मरण के फंदे में हो लेकिन तुम हो सही !
    तो ईश्वर का मूल पता तुम्हारे अंतरात्मा तक आ जाता है और अंतरात्मा से ठीक पहचान लो तो शरीर की बीमारी अपनी बीमारी नही लगेगी, मन का दुःख अपना दुःख नही लगेगा, चित्त की चिंता अपनी चिंता नही दिखेगी। हम इन सबको जानने वाले है। हम है अपने आप, हर परिस्थिति के बाप ! दुःख, चिंता, बीमारी का प्रभाव तुम पर न पड़े, मृत्यु का प्रभाव तुम पर न पड़े तो तुम मुक्त हुए कि नही ?
मंसूर कहता है : 'अनहलक ! मौत मुझे नही मार सकती। मौत मारती है तो शरीर को मारती है।' सुकरात जहर पी रहे है, बोले : 'मरेगा तो शरीर मरेगा, मेरा क्या !'
    अपने मुक्तस्वभाव को कही जाकर पाना नही है। मुक्तस्वभाव को बनाना नही है। जो है उसकी स्मृति करना है, उसका ज्ञान पाना है। 'मैं दुःखी हूँ, दुःखी हूँ' - ऐसा सोचने से दुःख बढ़ जाता है। शत्रु का चिंतन करने से मन में अशांति बढ़ जाती है, मित्र का चिंतन करने से आसक्ति बढ़ जाती है, वस्तुओं का चिंतन करने से ममता और आसक्ति बढ़ जाती है। लेकिन अपने भगवत्स्वभाव का ज्ञान पाने से, उसका चिन्तन करने से अंदर भगवाद् रस, भगवाद्ज्ञान, भगवत्स्मृति से तुम निहाल हो जाते हो, तुम्हारी मीठी निगाहों से समाज भी निहाल होने लगता है।
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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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